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टूटेगी चैन तो हारेगा कोरोना

- Thursday, July 9, 2020 No Comments
Covid 19 Curfew In Bikaner
कोरोना महामारी के कारण बीकानेर शहर के बडे भाग में कफर््यू लगा दिया गया है। यह पहला मौका है जब बीकानेर में इतने बडे भूभाग पर कफर््यू लगा है। वैसे पिछले महीनों से यह शहर पूरे देश की तरह लाॅकडाॅउन की स्थिति से गुजर ही चुका है और शहर के कुछ कुछ हिस्सों में कफ्र्यू भी लग चुका है लेकिन इतने बडे पैमाने पर कफ्र्यू लगना शहर के लिए पहला अनुभव होगा। इस दौरान कफ्र्यू के क्षेत्र को जीरो मोबिलिटी भी घोषित किया गया है जिसका मतलब है कि लोग अपने घरों में रहेंगे। दूध और दवाई की सेवा सहित समय समय के हिसाब से परचून की दुकानें खुली रहेगी। वैश्विक महामारी कोरोना का यह दंश इस शहर को भी लगा है। पिछले दिनों में आए कोरोना पाॅजिटिव के आंकडों पर गौर करें तो यह बात सामने आती है कि घनी आबादी का यह शहर चाहते हुए भी अपने आप को इस महामारी से बचा नहीं सका और देखते ही देखते सैकड़ों लोग इस माहामरी की चपेट में आए गए। सामाजिक समरसता के इस शहर में लोगों का आपस में मिलना जुलना, सामाजिक रीति रिवाजों को निभाना, शादी विवाह के दौर सहित सगाई समारोह और मृत्यु भोज के आयोजनों ने इस फैलती महामारी के आग में घी का काम किया। मस्तमौला लोग कुछ समझ पाते उससे पहले ही महामारी ने इस शहर को अपनी चपेट में ले लिया। वैसे सब लोगों का शुरू में यह सोचना था कि बीकानेर में यह महामारी नहीं आने वाली। जब आई तो लोग सोचने लगे परकोटे में नहीं आएगी और जब परकोटे में संक्रमित लोगों का आना शुरू हुआ जब भी कुछ लोग यह सोचते रहे कि अभी अपने मौहल्ले में यह बीमारी नहीं आई है लेकिन देखते ही देखते कुछ ही दिनों मंे इस बीमारी ने शहर के हर गली, मौहल्ले, काॅलोनी को अपनी आगोश में ले लिया। फक्कड और अख्खड स्वभाव के लोग अब घबरा गए और प्रशासन और जिला विधायक सहित जिला कलक्टर से लोग प्रार्थना करने लगे कि अब शहर में कफ्र्यू लगा दिया जाए। लगातार उठ रही इस मांग को जिला प्रशासन ओर नगर विधायक , काबीना मंत्री ने गंभीरता से लिया। इस विषय पर शहर की बसावट और सामाजिक ताने बाने को ध्यान में रखकर इस सख्त निर्णय लिया गया और एक बडे क्षेत्र में कफ्र्यू दिया गया। यह समय पर लिया गया सही कदम साबित होगा। जैसे हर निर्णय के दो पहलू होते हैं वैसे ही इस निर्णय के भी सकारात्मक और नकारात्मक पहलू दोनों ही है। वर्तमान परिस्थिति को देखा जाए तो यह निर्णय लिया जाना जरूरी था। दूसरी तरफ वो लोग चिंतित है जो प्रतिदिन मजदूरी करके अपना घर चलाते हैं। जैसे थडी वाले गाडे वाले, दैनिक मजदूरी वाले मजदूर, सब्जी वाले, चाय की थडी लगाने वाला, आदि आदि। अगर हम पिछले दिनों के संक्रमित मरीजों पर गौर करें तो यह तथ्य सामने आते हैं कि पान की दुकान वाला, चाय की दुकान वाला, कचैरी समोसे बेचने वाला, पिचका पापडी बेचने वाले सहित दैनिक मजदूरी करने वाले और डाॅक्टर तथा आमजन कोरोना बीमारी से संक्रमित हुए हैं, तो ऐसे में जीवन की महत्ता पहली है बाकी सब बाद में है। अगर व्यक्ति जिंदा ही नहीं रहेगा या स्वस्थ ही नहीं रहेगा तो कैसे मजदूरी करेगा और कैसे अपने परिवार का पालन पोषण करेगा। जान है तो जहान है। जिला प्रशासन द्वारा लिया गया यह निर्णय कोरोना संक्रमण की चैन तोडने में प्रभावी कदम होगा ऐसी आशा की जा रही है। आमजन को इससे राहत मिलेगी और इस दौरान बिजली, पानी, दूध, दवाई, परचून सहित अन्य अतिआवश्यक सेवाएं भी सुचारू रहेगी तथा आमजन को परेशानी नहीं होगी। जरूरत है आमजन को  आगे बढकर सहयोग देने की ताकि कोरोना को हराया जा सके। जयपुर में जो हालात रामगंज के हुए थे उससे बचने के लिए जिला प्रशासन द्वारा लिया गया यह निर्णय आमजन के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी रहेगा ऐसी उम्मीद है। जयजय बीकाणा। 
श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’
पुष्करणा स्टेडियम के पास
बीकानेर

मदर्स डे मेरी नजर में

- Sunday, May 10, 2020 No Comments
Mothers day जैसे दिन अप्रांसगिक लगते हैं। दैनिक जीवन में हर दिन माँ से शुरू होकर माँ पर समाप्त होता है। प्यार, प्रेम, समर्पण का प्रदर्शन नहीं होता और माँ के प्यार का तो प्रदर्शन बिल्कुल ही नहीं। हर दिन mothers day है। वैसे मैं पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति का विरोधी नहीं हूं पर किसी भी बात या विचार का आंख मूंदकर समर्थन करना मेरे लिए मुमकिन नहीं। कॉर्पोरेट जगत के बनाये ये व्यावसायिक day जिनके लिए महत्वपूर्ण है वे उसको मनाए उससे भी मुझे आपत्ति नहीं न ही उनके किसी सेलिब्रेशन पर प्रश्न चिन्ह। बस माँ,पिता, भाई, बहन, पत्नी, भाभी, मौसी, ताया, ताई, चाचा, चाची, जैसे सामाजिक रिश्ते सदैव जीवंत रहे और सदैव इनका सम्मान हो ऐसा ही जरूरी है। ऐसे दिन सेलिब्रेशन करने के पीछे कॉर्पोरेट जगत की बडी व्यावसायिक सोच है जो भावनाओं को भुनाती है। ऐसे लोग जो ऐसे दिन सेलिब्रेट नहीं करते उनके सामने इस मिलेजुले सामाजिक परिवेश में कभी कभी संकट उत्पन्न हो जाता है। आस पास पड़ोस के लोग, कुछ रिश्तेदार केक काटते हैं, बैलून फोड़ते हैं और fb तथा।wup पर शेयर करते हैं तो एक अजीब स्तिथि से वो लोग रूबरू होते हैं और ऐसे आलेख लिखकर अपने मन की बात स्पष्ट करते हैं। आज के दौर में सब रिश्ते मजबूती माँग रहे हैं, विश्वास मांग रहे हैं, अपनत्व माँग रहे हैं, त्याग माँग रहे है। नमन और प्रणाम उन तमाम रिश्तों को उन तमाम लोगों को जो है या नहीं भी है पर जिनके कारण आज हमारा सामाजिक तानाबाना मजबूत रहा है।
लेखक : श्याम नारायण 

जल संकट एक समस्या एक चुनौती

- Wednesday, June 12, 2019 No Comments
water problem in india 
पृथ्वी के अधिकांष रहने वाले भयंकर जल संकट के दौर से गुजर रहे हैं। गांवों से लेकर कस्बो शहरों तक पानी के घमासान मचा होने की खबरें आ रही है। ये हालात किसी एक देष विषेष के नहीं बल्कि पूरी दुनिया के है। यह विडम्बना है कि धरती के सत्तर प्रतिषत क्षेत्र में पानी होने के बावजूद भारत सहित पूरा विष्व जल संकट का सामना कर रहा है। आज के ये हालात भयावह भविष्य की ओर संकेत कर रहे हैं। एक आंकडे के अनुसार पृथ्वी जल उपलब्ध कुल जल का महत एक प्रतिषत ही पीने योग्य है बाकि महासागरों का जल इतना खारा व लवणीय है कि वह जानलेवा है। पृथ्वी पर उपस्थित ग्लेषियर भी ग्लोबल वार्मिंग के कारण तेजी से पिघल रहे हैं और वह पीने योग्य पानी भी महासागरों का हिस्सा बनता जा रहा है।

सोशल मीडिया मेरी नजर में

- Monday, June 3, 2019 No Comments
सोशल मीडिया बाकी परम्परागत मीडिया से एक जुदा साधन है। इसके द्वारा अपने मोबाइल और कम्प्यूटर पर एकांत में बैठा व्यक्ति पूरी दुनिया से जुडा रह सकता है। फेसबुक, वाॅट्सअप, लिंकडइन, इन्स्टाग्राम आदि आदि सोषल मीडिया के बहुत सषक्त और आसान उपलब्ध साधन है। वर्तमान में जिंदगी का अहम् हिस्सा बन चुका यह मीडिया सूचना, संचार, षिक्षा, मनोरंजन और जागरूकता का आधुनकि प्रभावकारी तरीका है। सामाजिक सम्पर्क के इन साधनों ने लगभग हर आम आदमी को अपनी बात कहने का मंच दिया है और एक तरह से कहे तो पत्रकार बना दिया है।

यह लोकतंत्र की हार है, सामाजिक कार्यकर्ता नेता नहीं बनते

- Friday, March 17, 2017 1 Comment
इरोम शर्मिला का संघर्ष और नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। सषस्त्र बल विषेषाधिकार अधिनियम को हटाने की मांग को लेकर लगभग 16 साल तक भूख हड़ताल का विष्व रिकार्ड कायम करने वाली ईराम शर्मिला को 2007 में मानवाधिकारों के लिए उनकी लड़ाई के लिए ग्वांगजू पुरस्कार, एशियाई मानवाधिकार आयोग ने 2010 में उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ प्लानिंग एंड मैनेजमेंट ने उन्हें रवींद्रनाथ टैगोर अवार्ड से नवाजा है। इतना सब कुछ होने के बाद जब ऐसी सामाजिक कार्यकर्ता लोकतंत्र के इस दंगल में उतरती है और चुनाव लड़ती है तो उसको वोट मिलते हैं सिर्फ 90। यह इस बात का प्रतीक है कि इस लोकतंत्र में हर सामाजिक कार्यकर्ता नेता नहीं बन सकता। ईरोम की हार के कईं मायने हैं और इसको कईं नजरियों से देखा जा सकता है।

नोटबंदी मेरी नजर में

- Friday, November 25, 2016 No Comments
भारतीय अर्थव्यवस्था गांव की अर्थव्यवस्था है। भारत की सारी आर्थिक ताकत कृषि व पषुपालन पर टीकी है। संेसेक्स उपर नीचे होने का प्रभाव उतना नहीं पड़ता होगा जितना इस बात का जरूर पड़ता है कि गाय ने आज दूध दिया या नहीं दिया। इस बात का आज भी प्रभाव पड़ता है कि बरसात अगर अच्छी हुई तो दाम सस्ते हो जाएंगे और ये सारे संेंसेक्स व सूचकांक भारत की इसी ग्रामीण जमीन के धरातल पर टीके हैं जहां हल चलाकर देष का किसान देष देष के भविष्य व वर्तमान की ईबारत लिखता है। महात्मा गांधी ने बरसो पहले कहा था कि प्रत्येक गांव स्वावलंबी बने और अपने स्तर पर मजबूत हो तो पूरा भारत की आर्थिक ताकत बन जाएगा। गांधी का सपना था कि देष इतनी बड़ी आर्थिक व लोकतांत्रिक ताकत बने कि वह अपने आप को विष्व की रक्षा के लिए समर्पित कर सके। इसलिए इस देष की केन्द्रीय सत्ता जब भी कोई निर्णय लेती है तो उसको अंत में बैठे हुए उस आदमी की तरफ देखना ही होगा कि उस लास्ट खड़े व्यक्ति को कितना फायदा होगा और अगर वह अंतिम स्तर का व्यक्ति पेरषानी में है तो इसका मतजब केन्द्रीय सत्ता में बैठे लोग देष की नब्ज को पहचान नहीं पा रहे हैैं।

भारत एक लोक कल्याणकारी राज्य

- Sunday, May 29, 2016 No Comments
वर्तमान में देष की संसद से लेकर गली मौहल्ले नुक्कड़ तक यह बात चर्चा की रही है कि देष की व्यवस्था में राज्य की क्या भूमिका है। राज्य की जिम्मेदारी क्या है और प्रत्येक नागरिक राज्य की ओर आषा भरी निगाह से देखता है और मायूष होकर नजरें झुका लेता है। आज हम चर्चा करेंगे एक एसे ही महत्वपूर्ण बिंदू पर जिसको लोककल्याणकारी राज्य कहा गया है।

लोकतंत्र में न्यायिक सक्रियता

- Friday, May 20, 2016 No Comments
भारत में आजादी के बाद लोकतांत्रिक गणराज्य की अवधारणा को लागू किया गया और पूरे देष में व्यवस्था को विधायिका, न्यायपालिका एवं कार्यपालिका के रूप में तीन भागों में बांटा गया। इन तीनों अंगों का अपना अपना कार्यक्षेत्र भी निर्धारित किया गया और यह तय किया गया कि कोई भी अंग किसी दूसरे के कार्यक्षेत्र और अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करेगा। विष्व के सबसे मजबूत लोकतंत्र का दावा भारत का इसी आधार पर है कि हमारे यहां तीनों अंगों ने अपनी अपनी भूमिका का सक्रिय व उचित निर्वहन किया है परंतु कभी कभी यह देखने को मिलता है कि देष में संवैधानिक संकट की स्थिति हो जाती है जब एक अंग किसी दूसरे अंग के कार्यक्षेत्र व अधिकारक्षेत्र में हस्तक्षेप करता है।

मनचाही नहीं अनचाही मौत : आत्महत्या

- No Comments
प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन के साथ साथ अपने जीवन को समाप्त करने का अधिकार लेकर पैदा होता है। कानून भले की इस अधिकार पर प्रतिबंध लगा दे लेकिन व्यक्ति के पास यह अधिकार सदैव स्वतंत्र रहता है। कानूनी प्रतिबंध के बावजूद प्रतिवर्ष दुनिया में लाखों लोग आत्महत्या करते हैं। आत्महत्या का विचार इतना प्रबल होता है कि जब यह विचार आता है तो सिर्फ विचार अंतिम उपाय नजर आता है। यह विचार क्षणिक होता है लेकिन होता प्रभावी है। आत्महत्या किसी भी अस्थायी समस्या का स्थायी समाधान है। क्षणभर का अवसाद जब संकुचित मानसिकता के दायरे में आता है तो आत्महत्या के अलावा कोई उपाय नजर नहीं आता।

लोकतंत्र मे विचार की लड़ाई

- Sunday, February 14, 2016 No Comments
देश वर्तमान मे वैचारिक लड़ाई के दौर से गुजर रहा है
एक तरफ वो लोग है जो सिर्फ अपने आप को ही सही बताने मे जूटे है और दूसरी तरफ वो सोच है जिसने बरसो भारत पर राज किया है
एक तरफ इस देश को एक आँख से देखने की कोशिश हो रही है वहीँ दूसरी तरफ ये देश सैकड़ो उम्मीदों के साथ अटल खड़ा है

जल संकट: जल बचत

- Wednesday, July 8, 2015 No Comments
   
Shyam Narayan Ranga
 वर्तमान में पूरा विश्व जल संकट के भंयकर दौर से गुजर रहा है। विश्व के विचारकों का मानना है कि आने वाले समय वर्तमान समय से भी बड़ा संकट बनकर दुनिया के सामने प्रस्तुत होने वाला है। ऐसी स्थिति में किसी की कही बात याद आती है कि दुनिया में चैथा विश्व युद्ध जल के कारण होगा। यदि हम भारत के संदर्भ में बात करें तो भी हालात चिंताजनक है कि हमारे देष में जल संकट की भयावह स्थिति है और इसके बावजूद हम लोगों में जल के प्रति चेतना जागृत नहीं हुई है। अगर समय रहते देष में जल के प्रति अपनत्व व चेतना की भावना पैदा नहीं हुई तो आने वाली पीढि़या जल के अभाव में नष्ट हो जाएगी। हम छोटी छोटी बातों पर गौर करें और विचार करें तो हम जल संकट की इस स्थििति से निपट सकते हैं। ऐसी ही कुछ महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख मैं यहां करना चाहूॅंगा।

दो अक्टूबर की छुट्टी एक प्रहार

- Tuesday, September 30, 2014 No Comments
दो अक्टूबर गांधी जयंती के अवसर पर छुट्टी रद्द करना संघ की लाॅबी, भारतीय जनता पार्टी व इससे जुड़ी विचारधारा का कांग्रेस व कांग्रेस की विचारधारा पर जबरदस्त हमला है क्योंकि बीजेपी और आरएसएस को नुकसान या घबराहट कांग्रेस से नहीं है गांधी नाम से है क्योंकि ये लोग जानते हैं कि गांधी नाम में वजन है और जब तक गांधी का नाम रहेगा, गांधी नेहरू परिवार रहेगा और अगर नाम मिटेगा तो ही परिवार का वजूद और वैभव मिटेगा। इसलिए ये एक सोची समझी वैचारिक लड़ाई का हिस्सा है। वर्तमान समय में पहली बार बीजेपी पूर्ण बहुमत व अपनी पूर्ण ताकत के साथ सत्ता में आई है तो यह अपने विचार को फैलाने का प्रयास करेगी और अपने विरोधी विचार को समाप्त करने की कोषिष भी होगी। चूंकि गांधी एक व्यक्ति नहीं विचार बन चुका है और आज महात्मा गांधी एक अंतर्राष्ट्रीय शख्सियत बन चुके हैं, इसी का परिणाम है कि 2 अक्टूबर अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है और भारत में 2 अक्टूबर राष्ट्रीय पर्व है और 15 अगस्त व 26 जनवरी की तरह ये दिवस महत्वूपर्ण है। 2 अक्टूबर की छुट्टी रद्द करने वाले जानते हैं कि कुछ साल तो सफाई अभियान, सफाई सप्ताह आदि आदि के रूप में मनाया जाएगा और धीरे धीरे जब छुट्टी नहीं होगी तो आम जन भूल जाएगा कि ऐसा भी एक दिन था जिस दिन मानवता का मसीहा मोहनदास करमचंद गांधी पैदा हुआ था। ये एक प्रयास है गांधी के नाम को मिटाने का, एक प्रयास है गांधी की शख्सियत को छोटा करने का। बाकी इतिहास गवाह है कि जब जब गांधी से या गांधी के नाम से या गांधी के विचार से किसी ने भी छेड़छाड़ की है तब तब गांधी और गांधी का विचार और मजबूती से उभर कर सामने आया है। विचार मरते नहीं, व्यक्ति मरता है। विचार क्रांतियां लाते हैं, समय की धारा को बदलते है। गांधी के विचार को कभी किसी ने मात नहीं दी और न ही गांधी के विचार का सामना कोई कर सका और इसी का परिणाम था कि तर्क समाप्त हो चुके थे और विचार की लड़ाई में हार हो चुकी थी इसलिए उस समय आरएसएस से जुड़े नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या कर दी। जब व्यक्ति तर्क से नहीं लड़ सकता, विचार को नहीं जीत सकता तब व्यक्ति हथियार उठाता है और ये ही नाथूराम गोडसे ने किया और ये हमला गांधी को तो मार गया पर गांधी के विचार को मजबूत कर गया और जिसके बूते कांग्रेस पार्टी जो गांधी की राजनैतिक उत्तराधिकारी थी, ने दषकों तक इस देष पर राज किया और नेहरू गांधी परिवार के लोगों ने इस पार्टी का नेतृत्व किया। आज विरोधी विचार सत्ता में पूरी ताकत के साथ काबिज है तो समय आया है पहली बार विचार को मारने का, विचार को नेस्तनाबूद करने का, पर विचार जिंदा है और जिंदा रहेंगे। किसी वैज्ञानिक की कही उक्ति याद आती है कि आने वाली पीढीयां शायद भरोसा न करें कि हांड मांस का पुतला इस धरती पर आया था जिसने मानवता की धारा बदल दी। पिछले दो हजार साल में अगर कोई सच्चा वैचारिक व्यक्ति पैदा हुआ है जिसने अपने विचार को जीकर दिखाया तो वो गांधी थे जिसकी कथनी और करनी में भेद नहीं था। बाकि विचार तो महज विचार थे विचार की प्रक्रिया का हिस्सा थे, अच्छी अच्छी बातें थी जिसने कही उसने उन बातों को माना ये जरूरी नहीं परन्तु गांधी ने अपने विचार को जिया और साबित किया कि अहिंसा के बल पर और सत्य के प्रभाव से, बिना अस्त्र शस्त्र से क्रांति लाई जाती है और ऐसी क्रांतियां सफल भी होती है। इसलिए विचार जिसका प्रभाव पूरी मानवता पर हो उसको मिटाने का ये पहला कदम हो सकता है एक बार सफल होता
Shyam Narayan Ranga "Abhimanue"

नजर आए लेकिन इसकी पूर्ण सफलता संदिग्ध है।


by :- shyam narayan ranga

वर्तमान मीडिया ........ झूठ का व्यापार

- Sunday, September 14, 2014 No Comments

बात तब की है तब में एक अंतर्राष्ट्रीय न्यूज चैनल के लिए अपने जिले का प्रतिनिधि संवाददाता हुआ करता था। सर्दी के मौसम में मेरे पास उक्त चैनल के राजस्थान हैड का फोन आया और ठंडक पर एक खबर करके भेजने को कहा जबकि उस समय बीकानेर में इतनी ठंड नहीं थी परंतु हैड साहब ने मुझे यह कहकर समझाया कि मैं चार मफलर लूं और राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाकर किसी ऊॅंटगाड़े वाले को पकडूं और एक मफलर ऊॅंट को पहनाऊ एक गाड़े वाले को पहनाऊ और स्वयं पहनकर कर पीटीसी करूं कि बीकानेर में भयंकर ठंड का मौसम है। मैंने स्पष्ट तौर पर इस तरह की खबर करने से मना कर दिया लेकिन उस समय मेरे समझ में यह बात जरूर आ गई कि मीडिया में जो दिखता है वह होता नहीं है बल्कि वह दिखाया जाता है जो कि बिकता है। ऐसे कईं उदाहरण मेरे पिछले पत्रकारिता के जीवनकाल से जुड़े हैं जिसमें मैंने व्यक्तिगत तौर पर व काफी समीपता से मीडिया में फैले झूठ को देखा समझा और महसूस किया। मैं यहां यह जरूर कहना चाहूंगा कि यह झूठ इलेक्ट्रोनिक मीडिया और वेब मीडिया में प्रिंट मीडिया की अपेक्षा ज्यादा देखा जा रहा है। किसी भी तथ्य को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करना और बात का बतंगड़ बनाना वर्तमान में मीडिया की आदत का शुमार हो गया है और मीडियाकर्मी ऐसा करना अपना धर्म मानते हैं। मैंने अपने साथ काम करने वाले एक मीडियाकर्मी से जब यह पूछा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हो तो उसने कहा कि ऐसा करने का मन तो नहीं होता परंतु करें क्या चटपटी व धमाकेदार खबर के बिना चैनल की चर्चा नहीं होती। झूठ के इस व्यापार में मीडिया के मालिकों से लेकर स्थानीय संवाददाताओं तक का हाथ होता है और बड़ी बेखूबी से यह व्यापार फल फूल रहा है। प्रसिद्ध समाचार पत्रों व प्रसिद्ध न्यूज चैनलों की बेबसाईट पर जाकर देखो तो पता चलता है कि न्यूज की हैडिंग इतनी जबरदस्त व मसालेदार लगाई जाती है कि कोई भी पाठक उस पर क्लिक करके उसको पढ़ेगा और पूरी न्यूज पढ़ कर भी उसको न्यूज की हैडिंग से मिलता जूलता कुछ भी न्यूज में नजर नहीं आएगा। इस तरह की झूठे शीर्षक जहां पाठकों को गुमराह करते हैं वहीं मीडिया की विश्वसनीयता भी समाप्त करते हैं। यहां यह कहने मंे मुझे बिल्कुल भी हिचक नहीं है कि वर्तमान इलेक्ट्रिोनिक न्यूज चैनल पर भरोसा करना पाठक की मुर्खता की निशानी है। 140 करोड़ की आबादी वाले इस देश में जितना झूठ और अस्पष्ट वर्तमान में मीडिया से निकलकर समाज में आ रहा है उतना और कहीं से भी नहीं आ रहा है। 

बीच में यह एक फैशन चला था कि कुछ न्यूज भूतों की स्टोरी और भूतों की खबरें दिखाकर अपनी दुकान चलाते थे और उनका अपने लोकल संवाददाताओं पर यह दबाब रहता था कि वे जैसे तैसे करके भूतों की स्टेारी पर अपना सारा ध्यान केन्द्रित करें। इसका परिणाम यह हुआ कि उन दिनों में चैनलों को देखकर यह मालूम पड़ता था कि यह देश भूतों का देश है जहां पर भूतों का राज है। देश के प्रसिद्ध स्मारकों तक में भूत होने की खबरें उन दिनों बाजार में आई। इसी से जुड़ा किस्सा है कि हमारे शहर बीकानेर में भी संवाददाताओं ने भूतों की खबरों को करना शुरू कर दिया। उन दिनों बीकानेर में न्यू कोर्ट कैम्पस तैयार हो रहा था और निर्माण कार्य में एक मजदूर की मौत हो गई थी तो एक चैनल ने यह खबर चलाई थी कि न्यू कोर्ट कैम्पस में भूत है और जो मजदूर मरा है उसकी आत्मा यहां भटक रही है। इसी तरह बीकानेर के प्रसिद्ध तालाब व शिव मंदिर ‘फूलनाथ जी के तालाब’ के कैम्पस में भी भूत होने की खबर एक चैनल ने चलाई जिसका घोर विरोध हुआ और उक्त चैनल के रिपोर्टर को माफी मांगनी पड़ी। उसी दौरान गंगाशहर के बंगले मंे भूत की खबर चलाई गई। इसी तरह वर्तमान में राजनीति मंे झूठ की खबरें परवान पर है। देश के किसी भी हिस्से से राजनीतिक जोड़ तोड़ हो रहा है और कोई कुछ कह रहा है। जैसी अनाप शनाप खबरें इस देश में धड़ल्ले से बड़ी निरंकुशता से चल रही है। 
लोकतंत्र का यह चैथा स्तंभ अगर इतना मदमस्त होकर निरंकुश हाथी की तरह विचरण करेगा तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अच्छा नहीं होगा। आज लोग मीडिया पर विश्वास रखते हैं और आम आदमी यह सोचता है कि उसने जो टीवी में देखा है या इंटरनेट पर पढ़ा है वह सच है लेकिन झूठी खबरों को अपने नीजी स्वार्थ के लिए खुलेआम फैलाकर वर्तमान मीडिया अपने सामाजिक सरोकारों से पीछे हट रहा है और इस देश में अराजकता का माहौल पैदा कर रहा है। मीडिया की यह गैर जिम्मेदारी देश की आने वाली पीढ़ी कोे गुमराह कर कर रही है क्योंकि वर्तमान पीढ़ी के पास ज्ञानार्जन का तरीका ही इलेक्ट्रोनिक चैनल व इंटरनेट रह गया है।ऐसी स्थिति में देश का युवा जो देखता व पढ़ता है उसे ही सच मानता है। तो क्या यह मीडिया की जिम्मेदारी नहीं है कि भारत देश के युवाओं में झूठ की नींव न डालें और देश के भविष्य की ईमारत को कमजोर न करें। अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए और अंधे होकर आर्थिक लाभ कमाने की लालसा के लिए बड़े बड़े धनकुबेर मीडिया के मालिक बन गए हैं और उनके लिए पत्रकारिता मिशन न होकर व्यापार रह गया है। एक व्यापारी की तरह जैसे तैसे करके लाभ कमाने की लालसा ने मीडिया को झूठ और वो भी चटपटा झूठ बोलने के लिए प्रेरित किया है। 
क्या यह सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है कि वे इस तरह के फैल रहे झूठ पर अंकुश लगाए। भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 {1} {क} में दी गई वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह कभी मतलब नहीं है कि आप जो मन में आए वो बोलो बल्कि उसके मायने यह है कि आप जो भी बोलो वो जिम्मेदारी से बोलो । सरकारों को इस आजादी पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने का अधिकारी भी संविधान ने दिया है तो ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक व्यवस्था में तंत्र से उम्मीद की जाती है वे लोक में मीडिया के जरिये फैल रहे झूठ को रोकें और इस देश के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दें। 
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श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’ (Shyam Narayan Ranga)
नत्थूसर गेट के बाहर
पुष्करणा स्टेडियम के पास
बीकानेर {राजस्थान}334004
मोबाईल - 9950050079

जल संकट के वर्तमान हालात और उपाय

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जल ही जीवन है। जल जीवन का सार है। प्राणी कुछ समय के लिए भोजन के बिना तो रह सकता है लेकिन पानी के बिना नहीं। जल के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। अतः जल जीवन की वह ईकाई है जिसमं जीवन छीपा है। वर्तमान में इस जल पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। जल की कमी ने मानव जाति के सामने अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है। जल के लिए दुनिया के कईं राष्ट्रों में हालात विकट है।

Water is Life, Save Itअगर हम विश्व परिदृश्य पर गौर करें तो कईं चौकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। विश्व में 260 नदी बेसिन इस प्रकार के हैं, जिन पर एक से अधिक देशों का हिस्सा है, इन देशों के बीच जल बंटवारे को लेकर किसी प्रकार का कोई वैधानिक समझौता नहीं है। दुनिया के कुल उपलब्ध जल का एक प्रतिशत ही जल पीने योग्य है। हमें पीने का पानी ग्लेश्यिरों से प्राप्त होता है और ग्लोबल वार्मिंग के कारण पृथ्वी का तापमान बढा है और इस कारण भविष्य में जल संकट की भयंकर तस्वीर सामने आ सकती है। दुनिया में जल उपलब्धता 1989 में 9000 क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति थी जो 2025 तक 5100 क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति हो जाएगी और यह स्थिति मानव जाति के संकट की स्थिति होगी। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया में आधी से ज्यादा नदियाँ प्रदूषित हो चुकी है और इनका पानी पीने योग्य नहीं रहा है और इन नदियों में पानी की आपूर्ति भी निरन्तर कम हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार दुनिया भर में 86 फीसदी से अधिक बीमारियों का कारण असुरक्षित व दूषित पेयजल है। वर्तमान में 1600 जलीय प्रजातियाँ जल प्रदूषण के कारण लुप्त होने के कगार पर है। विश्व में 1.10 अरब लोग दूषित पेयजल पीने को मजबूर है और साफ पानी के बगैर अपना गुजारा कर रहे हैं। 

Water is Life - Save Itइसी संदर्भ में अगर हम भारतीय परिदृश्य पर गौर करें तो हालात और भी विकट है। वर्तमान में 303.6 मिलियन क्यूबिक फीट पानी प्रतिवर्ष एशियाई नदियों को हिमालय के ग्लेशियर्स से प्राप्त हो रहा है। जल विशेषज्ञों का अनुमान है कि सन् 2100 के समाप्त होते होते हिमालय के आधे ग्लैशियर सूख चुके होंगे और ऐसी स्थिति में पेयजल की क्या स्थिति होगी इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 4.4 करोड लोग भारत में बेहद प्रदूषित जल का सेवन करने को मजबूर है। हमारे देश में सिंचाई कार्यों के लिए 70 प्रतिशत जल भूमिगत जल स्रोतों से प्राप्त होता है और घरेलू कार्यों के लिए 80 प्रतिशत जल की आपूर्ति भूमिगत जल स्रोतों से की जाती है। वर्तमान में देश की राजधानी दिल्ली में चार घण्टे व देश की औद्योगिक राजधानी माने जाने वाले मुम्बई में लगभग 5 घण्टे जलापूर्ति की जा रही है। भारत की तीसरी लघु सिंचाई जनगणना के आंकडों के अनुसार   1.90 करोड कुऍं और गहरे ट्यूबवेल है। भारत में 39 प्रतिशत परिवारों को ही घरों में पेयजल की सुविधा उपलबध है और 22 प्रतिशत परिवारो को ही नल द्वारा जलापूर्ति की सुविधा उपलब्ध हो रही है। राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन संस्थान द्वारा करवाए गए एक सर्वे के अनुसार हमारे देश में 2 लाख से भी अधिक स्कूल ऐसे हैं जिन्हें पीने का पानी आज तक उपलब्ध नहीं करवाया जा सका है। एक अनुमान के मुताबिक 28.6 प्रतिशत परिवारों को पीने का पानी लाने के लिए 500 मीटर से अधिक का फासला तय करना पडता है।

ऊपर लिखे गए तथ्यों से ये स्पष्ट होता है वर्तमान में भी जल संकट अपने विकराल रूप में आ चुका है। मानव सभ्यता के लिए वर्तमान में यह सच है कि पर्याप्त विकास के बावजूद भी करोडों लोग आज भी पीने के पानी जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित है। पेयजल की यह स्थिति न जाने कितने लोगों का जीवन समाप्त कर देती है और न जाने कितने लोगों को बीमारियाँ दे जाती है। 

अब हमें जब यह पता है कि जल संकट का विकट दौर चल रहा है तो हमें यह समझना होगा कि जल का कोई विकल्प नहीं है, मानव का अस्तित्व जल पर ही निर्भर है, जल सृष्टि का मूल आधार है, जल है तो खाद्यान है, जल है तो वनस्पतियाँ हैं, जल का कोई विकल्प नहीं है, जल संरक्षण से ही पर्यावरण संरक्षण है, जल का पुरर्भरण करना ही जल का उत्पादन करना है और हमें कुल मिलाकर ये समझना ही होगा कि जल है तो कल है। हमें यह मानना ही होगा कि मानव की जल की आवश्यकता किसी अन्य आवश्यकता से काफी महत्वपूर्ण है। हमें यह समझना और समझाना होगा कि जल सीमित है और विश्व में कुल उपलब्ध जल का 27 प्रतिशत ही मानव उपयोगी है। अब हमें यह गौर करना होगा वर्तमान में इस जल संकट के प्रमुख कारण क्या है।
  • जल का अंधाधुंध व विवेकहीन प्रयोग जल संकट का सबसे बडा कारण है। 
  • औद्योगिकरण व जल प्रदूषण के कारण हमारी नदियाँ व जल स्रोत प्रदूषित होते जा रहे हैं और इस कारण पेयजल का संकट उत्पन्न हो रहा है। 
  • बढती आबादी के कारण व औद्योगिकरण के कारण जल की मांग बढी है और इस कारण भी जल संकट सामने आया है। 
  • बरसाती पानी का समुचित संरक्षण नहीं होने के कारण भी जल संकट की स्थिति बन रही है।
  • परम्परागत जल स्रोतों के संरक्षण नहीं होने के कारण जल का समुचित भण्डारण नहीं हो पा रहा है और इस कारण भी जल संकट की स्थिति बन रही है।
  • भूमिगत जल के रिचार्ज न होने  के कारण भूमिगत जल का स्तर चिंताजनक स्थिति में घट रहा है और यह जल संकट का महत्वपूर्ण कारण है। जल बंटवारे को लेकर देश में कानून का अभाव है और इस कारण भी जल संकट की स्थितियाँ बन रही है। 
  • पारिस्थतिकी में हो रहे अनियंत्रण ने पारिस्थितिकी तंत्र में गडबड पैदा की है जिस कारण प्रकृति में अकाल व सूखे और बाढ जैसे हालात बन रहे हैं इस कारण पेयजल का संकट उत्पन्न हो गया है। 
इन तथ्यों पर गौर किया जाए तो हमारे सामने काफी भयंकर हालात उत्पन्न होते हैं और स्थितियॉ नहीं बदली तो जल का यह संकट मानव जाति के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर देगा। अतः मानव जाति को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए जल संरक्षण के उपाय करने ही होंगे। जल संरक्षण के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातों पर हम यहाँ चर्चा करेंगे। यह बात गौर करने की है कि प्रकृति हमें इतना पानी देती है कि अगर हम उस पानी को ठीक ढंग से सहेज कर रखें तो कभी भी हमारे सामने जल संकट की स्थिति उत्पन्न नहीं होगी। जब बरसात होती है तो बरसात का यह पानी बेकार न जाए इसके हमें मजबूत व पुख्ता इंतजाम करने होंगे। हम अपने घरों की छतों का निर्माण इस प्रकार करें कि बरसात का सारा पानी घर में ही बने एक कुण्ड में इकट्ठा हो जाए। सभी पक्के घरों की छतों की नालियों को पाइपों की सहायता से कुओं, बावडयों और तालाबों से जोडकर इनका पुनर्भरण किया जा सकता है। इससे बरसात के पानी की एक भी बूंद बेकार नहीं जाएगी और यह पानी हमारे काम भी आएगा। हमारे पूर्वजों ने ऐसी व्यवस्था कर रखी थी और परम्परागत जल स्रोतों का विकास किया था लेकिन हमने इन परम्परागत जल स्रोतों की अनदेखी की और इनको ठुकराया। हमें अपने आस पास के परम्परागत जल स्रोतों को सुधारना होगा और इनके पायतन व आगोर की रक्षा करनी होगी ताकि जल संरक्षण के ये साधन मानव जाति के लिए वरदान साबित हो सके। हमारा दायित्व है कि हम अपने खेतों में व खुले क्षेत्रों में ऐनिकट का निर्माण करे और हमारे आस पास जल पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण करें ताकि बरसात का सारा पानी भूमि के अंदर जा सके और भूमिगत जल का स्तर भी बढ सके क्योंकि भूमिगत जल अब समाप्त होता जा रहा है और डार्क जोन का क्षेत्र हमारे देश में बढता ही जा रहा है। 

हमें हमारी दैनिक दिनचर्या में भी परिवर्तन करेन होंगे। जैसे कुल्ला करते वक्त टोंटी या नल बंद करके पानी काम में ले और अच्छा तो ये हो कि हम मग में पानी लेकर कुल्ला करें, इसी तरह सीधा नल से नहाने की बजाय हम बाल्टी में पानी भरकर नहाऍं, इसी तरह पाखाने में पानी फ्लश से न चलाकर बाल्टी भर कर पानी फक दे और अपने बाग बगीचों में पाइप की बजाय बाल्टी से पानी दें, इसी तरह कार, मोटरसाईकिल, स्कूटर जैसे अपने वाहनों को पाइप की बजाय बाल्टी भर कर धोये। हम अपने घरों में पानी को लीक न होने दें, अगर किसी भी प्रकार का लीकेज हो रहा हो तो उसे तुरंत सुधारें क्योंकि हम लीकेज दिन भर में सैंकडों लीटर पानी व्यर्थ बहा देता है। हमारे किसान भाईयों को भी हालात को समझते हुए अब कम पानी की फसलों का उत्पादन करना होगा जैसे बाजरा, मूंग, मोठ आदि आदि। किसान भाई बूंद बूंद सिंचाई पद्धति व फव्वारा सिंचाई पद्धति अपनाकर भी पानी की बचत में अपना महत्वपूर्ण योगदान  दे सकते हैं। 

इसी के साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि हम एक ही जल का बार बार प्रयोग करें जैसे जिस पानी से नहाते हैं उस से कच्चा फर्श धोया जा सकता है और ऐसे पानी से ग्रामीण क्षेत्रों में उपले बनाए जा सकते हैं इसी प्रकार औद्योगिक इकाईयो में पानी को साफ करने के प्लांट लगाए जा सकते हैं ताकि खराब पानी वापस काम आ जाए। इस तरह दैनिक जीवनचर्या में छोटे छोटे सुधार करके मानव जाति के इस महान व पुनीत कार्य में प्रत्येक व्यक्ति अपना योगदान दे सकता है। 

अंत मे यही कहना चाहगा कि जल के प्रति स्वामित्व का भाव रखें और यह बात समझे कि जल का विकल्प नहीं है। समाज का हर वर्ग इसके लिए आगे आए। शिक्षक व विद्यार्थी अपने प्रयासों से समाज में उदाहरण पैदा करें, पत्रकार इस संबंध में लोगों को ज्यादा से ज्यादा जागरूक करें, राजनैतिक दल जल के इस मुद्दे को देश की केन्द्रीय राजनीति में लाए, समाजसेवी संगठन लोगों को जागरूक कर आम जन की सहभागिता इस कार्य में लें और इर तरह प्रत्येक वर्ग अपने अपने दायित्व को समझ कर उसका निर्वहन करें तथा जल संरक्षण की इस बात को घर घर पहचाए। जीवन के इस अमूल्य तत्व की सुरक्षा का दायित्व देश के प्रत्येक नागरिक पर समान भाव से है। एक प्रसिद्ध विद्वान ने कहा था कि विश्व में तीसरा विश्वयुद्ध पानी के कारण होगा और रावला घडसाना जैसे आंदोलन व कावेरी जल विवाद जैसी समस्याऍं कहीं इस इस भावी विश्वयुद्ध की प्रतिध्वनि तो नहीं है। हमें जल संकट ही इस आहट को पहचानना होगा और इसके लिए सतत प्रयास करने होंगें। 
 


श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘ (Shyam Narayan Ranga) "Abhimanue"
पुष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर 

बजट से जुडे कुछ रोचक तथ्य

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भारत के संविधान के अनुच्छेद 112 के अन्तर्गत बजट पेश किया जाता है। इसके अनुसार शासकीय आय व्यय का लेखा जोखा सरकार संसद के पटल पर प्रस्तुत करे। 
  
  1. भारत में बजट पद्धति की शुरूआत करने का श्रेय ब्रिटीश भारत के पहले वायसराय लार्ड केनिंग को जाता है जो 1856 से 1862 तक भारत के वायसराय रहे। 
  2. भारत का पहला बजट जेम्स विल्सन ने वायसराय परिषद में 18 फरवरी 1860 को पेश किया था। 
  3. जेम्स विल्सन को भारतीय बजट पद्धति का संस्थापक कहा जाता है। 
  4. आजादी के पहले भारतीय प्रतिनिधियों को बजट भाषण पर बहस करने का अधिकार नहीं था। 
  5. 1920 तक केन्द्र स्तर पर केवल एक ही बजट बनता था । सर्वप्रथम 1921 में पहली बार सामान्य बजट से रेल बजट को अलग किया गया तब से अब तक रेल बजट अलग ही पेश होता है। 
  6. Indian Budget - FACTSबजट वित्तमंत्री लोकसभा में ही पेश करता है और बाद में इसे राज्य सभा में भी रखा जाता है। 
  7. बजट हमेशा फरवरी के अंतिम तारीख को ही संसद के पटल पर रखा जाता है क्योंकि वित्तिय वर्ष अप्रेल से शुरू होता है और बजट पर चर्चा होनी होती है इसलिए इस चर्चा के लिए एक माह का समय मिल जाता ह। 
  8. बजट की तारीख राष्ट्रपति तय करता है और यह फरवरी माह की अंतिम तारीख होती है बशर्ते उस दिन कोई सरकारी अवकाश न हो। 
  9. बजट भाषण पढने के लिए लोकसभा अध्यक्ष वाकायदा वित्तमंत्री को आमंत्रित करते हैं और सुबह के 11 बजे वित्तमंत्री अपना बजट भाषण शुरू करते हैं। 
  10. अगर बजट प्रस्ताव संसद में पारित न हो सके तो इसका मतलब सरकार के गिराने से लगाया जाता है और प्रधानमंत्री को ऐसी स्थिति में अपना स्तीफा देना पडता है। 
  11. स्वतन्त्र भारत का पहला बजट 26 नवम्बर 1947 को पेश किया गया था । यह एक अंतरिम बजट था। इसे आर के षणमुगम चेट्टी ने पेश किया था। 
  12. भारतीय संसद में सबसे ज्यादा बार बजट पेश करने का रिकार्ड मोरारजी देसाई के नाम है। इन्होंने दस बार बजट पेश किया था। 
  13. यशवंत सिन्हा ने सात बार बजट पेश किया है। 
  14. प्रणव मुखर्जी, पी. चिदम्बरम, सीडी देशमुख ने छः बार बजट पेश किया है। 
  15. इंदिरा गाँधी एक मात्र महिला है जिन्होने भारतीय संसद में बजट पेश किया था। यह बजट 1970 में इमरजेंसी के समय पेश किया था। 
  16. अंग्रेजों के राज में बजट शाम को पॉच बजे पेश करने की परम्परा थी । क्योंकि उस समय भारत अंग्रेजों के गुलाम था और यह बजट इंग्लैण्ड में सुना जाता था इसलिए यहाँ शाम होती थी वहाँ सुबह रहती थी।  इस परम्परा को आजादी के बाद भी निभाया गया था परन्तु प्रथम बार 1999-2000  में यशवंत सिंहा ने सुबह के समय बजट पेश किया। 
  17. बजट पेश करने का दायित्व वित्त मंत्रालय का ही होता है। इसलिए देश का वित्तमंत्री ही बजट पेश करता है। 
  18. पहले बजट दो भागों में होता था पार्ट ए और पार्ट बी । दूसरा भाग जनता से जडा होता था परन्तु अब यह बजट भाषण एक ही भाग में होता है। 

संकलनकर्त्ता:- 


श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘ (shyam NARAYAN Ranga)
पुष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर 

ये क्या हो रहा है ... ?

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मेरा यह आलेख पुराना है और कईं वेबसाईट और पत्र पत्रिकाओं में तत्तकालीन समय में प्रकाशित हो चुका है, अब काफी समय बाद मैं यह आलेख अपने ब्लाॅग पर प्रकाशित कर रहा हूॅं। धन्यवाद।
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पहले जयपुर फिर अहमदाबाद और फिर सूरत और अब दिल्ली ये क्या हो रहा है भारत की शांति और अस्मिता को आतंकियों की नजर लग गई है। प्रत्येक भारतवासी के दिल में यह बात आ रही है कि आखिर य क्या हो रहा है इस देश का शासन कानून और प्रशासन कर क्या रहा है। अगर एक घटना होती तो यह माना जा सकता था कि किसी भूलवश ऐसा हो गया होगा लेकिन लगातार इस तरह की आतंकी घटनाओं का होना प्रशासन की नाकामी को दर्शाता ही है साथ ही यह भी जताता है कि इस देश की सुरक्षा व्यवस्था में कितनी खामियाँ है। यह इस बात को साबित करता है कि हम लोग आज भी इन घटनाओं के मौन मूक गवाह बनने के अलाबा कुछ नहीं कर पा रहे हैं 
हमारा सुरक्षातंत्र पूरी तरह से नाकाम हो रहा है और इतने बडे देश के इतने बडे सुरक्षातंत्र जिस पर प्रतिवर्ष अरबों का खर्चा हो रहा है ना जाने वे लोग कर क्या रहे हैं आज पूरे देश के दिमाग में यही बात आ रही है कि ये हो क्या रहा है । हिन्दुस्तान का दिल कही जाने वाली राजधानी दिल्ली पर हुआ हमला इस बात का प्रतीक है कि आतंकियों के हौसले कितने बुलंद है और हमारा तंत्र इन हौसलों के सामने कितना बौना नजर आ रहा है। समझ नहीं आ रहा कि आखिर ये हो क्या रहा है। शर्म आनी चाहिए इस देश के नेताओं को और अधिकारियों को कि उनकी नाकामी के कारण इस देश की माँओं की कोख उजड रही है, बहनों से भाई छिन रहे हैं और सुहागिनों की माँगे उजड रही है। लाल बहादुर शास्त्री के इस देश में अगर नैतिकता की बात करे तो इन नेताओं और अधिकारियों को कोई अधिकार नहीं है कि अपने पद पर रहे और ज्यादा शर्म की बात तो तब होगी जब कोई इनसे इस्तीफे की माँग करेगा और फिर भी ये लोग अपने पद पर आसीन रहेंगे। इतना होने के बाद यही बात दिमाग में आ रही है कि आखिर ये हो क्या रहा है। लोग हैरान है, निःस्तब्ध है किससे जबाब मांगे किसके आगे रोये और किनको गुनहगार ठहराए, लेकिन ये पूरी दुनिया जानती है कि इस देश के नागरिक का जज्बा कितना ऊंचा है और भारतीयों ने हर मुसीबत का एकजुट होकर निडरता से सामना किया है। 
पहले भी हमारे देश ने आतंकवाद के इस दंश को झेला है। पंजाब और कश्मीर सहित आसाम गुजरात और देश के कई भागों ने इस पीडा को अंतर तक झेला है और उसके बाद सब कुछ सामान्य हो गया था और अभी कुछ समय से पुराने दिनों की यादें फिर से ताजा हो रही है। कट्टरपंथी और कुछ फिरकापरस्त लोगों को भारत की शांति व प्रगति से बहुत पीडा होती है भारत की प्रगति इन लोगों को फुटी ऑंख नहीं सुहाती और ये लोग कभी भी यह सहन नहीं कर सकते कि यह देश विश्व की ताकतों में गिना जाए। आतंक के इस खेल को दुनिया के कईं कट्टरपंथी देशों से शह भी मिलती रही है। परतु ये लोग इस बात से अंजान है कि फटने वाला बम जाति धर्म मजहब या कुछ और देखकर नहीं फटता। यह बम और इसे बनाने वाले तथा इस प्रकार की ताकतों का शह देने वाले लोग इंसानियत के दुश्मन है और न तो किसी धर्म से मतलब है और नहीं इनको किसी मजहब से सरोकार है। अगर ऐसा होता रमजान के पवित्र महीने में इस तरह कि मानवता विरोधी हरकतों को अंजाम नहीं दिया जाता । वर्तमान में जरूरत है कि प्रशासन की ऑंखे खुले और देश के नेताओं की नींद टूटे। उन्हें यह सोचना होगा कि जेड प्लस की सुरक्षा भारत के प्रत्येक नागरिक को मुहैया नहीं है और न हीं देश के प्रत्येक बस स्टैंड व रेल्वे स्टेशन पर मेटल डिटेक्टर लगा हुआ है। सुरक्षा के वे उपाय किए जाए कि देश का हर नागरिक अपने आप को सुरक्षित महसूस करे और प्रत्येक नागरिक निर्भय होकर विचरण कर सके। अगर ऐसा न हुआ तो आने वाला समय व आने वाली पीढी कभी हमें माफ नहीं करेगी और हमशा हमारे से यह सवाल पूछेगी कि आखिर ये हो क्या रहा है।
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Article by : (Shyam Narayan Ranga) श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’

जयपुर मे सीरियल ब्लास्टः त्वरित टिप्पणी

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आतंकवाद का एक घिनौना चेहरा आज जयपुर में देखने को मिला है। लगातार सात बम ब्लास्ट ने शांत राजस्थान को हिलाकर रख दिया है। राजस्थान पूरे भारत में शांत प्रदेश के तौर पर जाना जाता है और इस बार इस प्रदेश को अशांत करने की कोशिश आतंकारियों द्वारा की जा रही है। एक समय था जब पूरे पंजाब व कश्मीर में इन आपराधिक तत्वों ने अपनी दहशतगर्दी को अंजाम दिया था लेकिन हिंदुस्तान की दिलेर व जाबांज जनता ने उस दौर का डट कर मुकाबला किया और आज पंजाब व कश्मीर में आतंकी अपना हौसला पस्त कर चुके हैं। अब इन आतंकियों को राजस्थान नजर आ रहा है। राजस्थान की अलमस्त और फक्कड मिजाज की जनता के माध्यम से ये लोग देश में अशांति व खौफ पैदा करना चाहते हैं लेकिन शायद ये लोग इस बात को भूल चुके हैं कि कश्मीर व पंजाब के लोगों में जितना हौसला है, राजस्थान के लोग भी इस हौसले में पीछे नहीं हटने वाले, वैसे भी मारवाडी कौम अपनी साहसिकता के लिए पूरे विश्व में जानी जाती है। 
पहले अजमेर के दरगाह शरीफ में और बाद में जयपुर में दहशतगर्दों ने जो हिमाकत की है उसकी जितनी भर्त्सना की जाए उतनी कम है। राजस्थान की जनता इन आतंकारियों को ये साफ तौर पर बता देना चाहती है कि इस मुल्क को तोडने की जो कोशिशे की जा रही है उसमें कभी भी कोई संगठन या व्यक्ति कामयाब नहीं हो सकता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक का सारा भारत एक है और हमेशा एक रहेगा कोई भी ताकत इस देश में किसी प्रकार का जहर फैलाकर कामयाब नहीं हो सकती है।
वैसे जब अजमेर के दरगाह शरीफ में ब्लास्ट हुआ था जब भारत सरकार के गृह राज्य मंत्री जयराम रमेश ने राजस्थान सरकार को चेता दिया था कि सुरक्षा ऐजेंसियों की राय है कि राजस्थान में आने वाले समय में आतंकी गतिविधियाँ तेज होने वाली है और उसी चेतावनी के मद्देनजर पूरे राजस्थान में उस समय हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया था और जन्माष्टमी के अवसर पर भारी सुरक्षा व्यवस्था पूरे प्रदेश में की गई थी लेकिन बाद में धीरे धीरे इसमें ढील बरती गई और आज जयपुर में वो हो गया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। केंद्र सरकार की चेतावनी के बावजूद राज्य सरकार की ढलाई ने एक बार फिर राज्य की सुरक्षा ऐजेंसियों व सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगा दिया है।
वैसे एक दूसरे पर दोषारोपण का काम हम बाद में भी कर सकते हैं अभी वक्त है एक दूसरे का हाथ पकड कर साथ देने का और अपने लोगों के ऑंसू पोंछने का । जो राजस्थानी अपने व्यवहार व साहस के कारण पूरे विश्व में पूजा जाता है आज उसकी परीक्षा है और उसके दिल में पूरा विश्वास है संकट के इस दौर में उसका हौसला बुलंद रहेगा। 
इस खबर वेबसाइट के माध्यम से हमारी पूरे प्रदेश के नागरिको व भाईयों व बहनों से अपील है कि अपने आस पास किसी भी लावरिस वस्तु के हाथ न लगाए और संदिग्ध व्यक्ति की सूचना तुरंत नजदीकी पुलिस स्टेशन पर दे। किसी भी प्रकार की दुर्घटना से घबराऍं नहीं और प्रत्येक सकट का डट कर मुकाबला करे। हमारी एक अपील यह भी है कि संकट के इस दौर में अपने प्रदेश के नागरिकों की दिलखोलकर सेवा करें और जरूरतमंदों कही सहायता करें और अपने नजदीकी अस्पताल में जाकर रक्तदान करें।

- श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’
- (Shyam Narayan Ranga)

एशिया के सबसे बडे गाँव को लगी नजर

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एशिया के इस सबसे बडे गाँव को लगता है किसी की नजर लग गई है। दुर्घटना दर दुर्घटना ने शहर को स्तब्ध कर दिया है। शहर का व्यक्ति डरा डरा सा रहता है कि कहीं कोई दुर्घटना की खबर न आए। घर में बडे बुजुर्गों के चेहरों पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती है। ऑफिस व काम पर गए अपने परिवार के सदस्य की जरा भी देर होने पर फोन व मोबाईल की घंटिया सुनाई देने लगती है या फिर वह व्यक्ति स्वयं ही अपने घर फोन कर देता है कि मै बस थोडी ही देर में आ रहा ह। पिछले एक सप्ताह में हुई पैंतीस मौतों ने शहर के आम आदमी को हिलाकर रख दिया है। शहर के युवा ललित से बात करने पर उसने बताया कि उसके दोस्तों की पिछले एक महीने से पिकनिक पर जाने की इच्छा है लेकिन शहर में हो रही दुर्घटनाओं के कारण शहर से बाहर जाने की हिम्मत नहीं हो रही वहीं दूसरी तरफ घरवालों से साफ मना कर दिया है कि कहीं पर नहीं जाना। शहर की के एक युवा पवन पुरोहित ने बताया कि पहले होली के बाद गोपाली की मौत व बाद में कुछ दिन पहले ही हुई गुण्डा महाराज की मौत ने बारहगुवाड चौक को हिलाकर रख दिया है। ये दोनों ही बारहगुवाड के रहने वाले थे और दोनों की मौत सडक दुर्घटना में ही हुई है। इसी तरह परिवार के सदस्य एक साथ कहीं जाने से भी डर रहे हैं क्योंकि पिछली दुर्घटनाओं में एक ही परिवार के कईं सदस्य एक साथ काल के ग्रास में समाए है। नत्थूसर गेट के बालू महाराज ने बताया कि होना वहीं है जो उपर वाले ने लिख रखा है लेकिन अपनी सुरक्षा करना सबसे बडा उपाय है। पास ही बैठे घेटड महाराज ने बताया कि उन्होंने मौहल्ले में साफ तौर पर घोषणा कर दी है कि कोई भी व्यक्ति बिना काम के घर से बाहर नहीं निकलेगा। इस तरह आज बीकानेर शहर का हर नागरिक खौफजदा है। 
वहीं दूसरी तरफ बीकानेर का प्रशासन कुंभकर्णी नींद में सोया है उसे इस बात से कोई लेना देना नहीं कि जनता की क्या हालत है। आज भी गंगानगर रोड व जयपुर रोड अंधाधुंध दौडते वाहन व ओवरलोड वाहन आपको नजर आ जाएंगे। देखते हैं बीकानेर के लोगों का खौफ कम होता है या प्रशासन की शर्म।



(Shyam Narayan Ranga) श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’

मिट्टी का माधो नहीं है राज्यपाल

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राजस्थान के राज्यपाल एस के सिंह ने जैसलमेर के उप पंजीयक कार्यालय में जाकर यह साबित कर दिया कि राज्यपाल का पद महज संवैधानिक प्रधान का ही नहीं होता बल्कि वास्तव में अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो तो वह अपनी सकि्रयता से राष्ट्र के प्रति अपने कर्त्तव्य को बखूबी निभा सकता है। राज्यपाल महोदय ने यह साबित किया है कि सिर्फ राजभवन में आने वाले मेहमानों की आवभगत करना ही उनका काम नहीं है या मंत्रियों व मुख्यमंत्री को शपथ दिलाने तक का ही दायित्व उसका नहीं है बल्कि वह अपने तंत्र को संभाल कर उसकी खामियों को देख सकता है। एस के सिंह ने जब से राज्यपाल का पद ग्रहण किया है तब से ही उनकी सकि्रयता ने राज्य के लोगों को अहसास करवा दिया था कि वे एक सकि्रय राज्यपाल हैं। सिंह ने राज्य के कईं मुद्दों पर मंत्रीय के बयानों पर बेबाक टिप्पणी की है और अपनी राय को मजबूती से रaखा है। राज्यपाल महोदय ने यह साबित कर दिया है कि वे राज्य में हो रहे कार्यों पर लगातार नजर रख रहे हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुडे मुद्दे पर वे खामोश नहीं रह सकते हैं। राज्यपाल महोदय का यह कदम कुंभकर्णी नींद में सो रहे राज्य के प्रशासन पर करारा तमाचा है और एक सीख प्रदान करने वाला कदम है कि अगर जिम्मेवार पदों पर काम करना है तो अपनी जिम्मेवारी निभानी पडेगी। राज्यपाल एस के सिंह ने समय समय पर राज्य के कईं मंत्रीयों को भी अपनी गरीमा याद दिलाई है। राजस्थान के राज्यपाल अपने इस कदम के लिए धन्यवाद व बधाई के पात्र है और महामहिम राज्य की जनता आपसे उम्मीद करती है कि ऐसे कदमों से राज्य तंत्र में फैले भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। 
समय समय पर भारत के लोकतंत्र में यह आवाज उठती रही है कि आखिर राज्यपाल के पद का क्या महत्व है। संवधान निर्माताओं ने अपने जिस मंतव्य के साथ इस पद को गढा है, ऐसे राज्यपालों ने संविधान निर्माताओं के उस मंतव्य को साफ किया है। पूर्व में मदनलाल खुराना व अंशुमान सिंह जैसे राज्यपालों ने भी अपनी सकि्रयता के कारण राज्यपाल की भूमिका को बताया था। वर्तमान में एस के सिंह महोदय के इस कदम ने भी भारतीय लोकतंत्र के इस पद को गरिमा व मान प्रदान किया है तथा इसकी प्रासंगिकता को सिद्ध किया है।
श्याम नारायण रंगा (Shyam Narayan Ranga)

एक अनशन जनता के लिए

- Friday, September 12, 2014 No Comments

Shyam Narayan Ranga

अभी हाल ही में कुछ दिन पहले अण्णा हजारे ने अनशन किया और मान गए और अब बाबा रामदेव अनशन कर रहे हैं। ये सब अनशन और आंदोलन और धरना प्रदर्शन जो हमारे देश में होते हैं वे सिस्टम के खिलाफ होते हैं और सब लोग मिलकर सारा दोष सरकार व सरकार चलाने वाले नेताओं पर मढ देते हैं और उनके खिलाफ इस प्रकार के प्रदर्शन कर अपना विरोध प्रदर्शित करते हैं। इन सब प्रदर्शनों को देखकर ऐसा लगता है कि सारा का सारा दोष इन नेताओं का ही है और एक मात्र राजनीति करने वाले ये लोग ही इस देश का बंटाधार कर रहे हैं। मैं इन सब के बीच एक बात कहना चाहंगा कि हम लोग लोकतांत्रिक व्यवस्था में जीते हैं और इस सिस्टम का निर्माण हमारी जनता ने ही किया है। जनता ही इस सारे सिस्टम और इस सारे नेताओं के मूल में है। लोकतंत्र में जनता जनार्दन है और भारत के भाग्य की विधाता भी जनता ही है। 
क्या वास्तव में सारे नेता ही इस सिस्टम और नकारापन के कारण है। ऐसा नहीं है वास्तव में हमारे देश की जनता भी इस सब दोषों के लिए बराबर की भागीदार है और सबसे बडा दोष जनता का ही है। लोकतंत्र में आखिरी निर्धारक जनता है सो जनता की ही जिम्मेदारी है कि वह जिस सिस्टम का निर्माण कर रही है उसे भली भाँति बनाए और सारे सिस्टम के बारे में सोचकर अपने वोट का प्रयोग करें। 
वास्तव में जनता ने ही इस सारे सिस्टम को खराब किया है। देश में काम करने वाले करोडो लोग चाहे वह आईएएस हो, क्लर्क हो, चपरासी हो, ठेकेदार हो, दुकानदार हो, व्यापारी हो सब के सब भ्रष्ट ह। इस देश की जनता ने खुद ने भ्रष्टाचार को पनाह दी है। देश का आईएएस भ्रष्टाचार म लिप्त हैं, क्लर्क पैसे खाता है, डॉक्टर बिना फिस देखता नहीं, इ्रंजीनियर घूस खाकर काम करता है, ठेकेदार मिलावट करने से चूकता नहीं, व्यापारी व उद्योगपति जमाखोरी कालाबाजारी में लगे हुए हैं, धर्म के नाम पर धंधा चल रहा है, साधु संयासियों के आश्रम ऐसो आराम और अय्यासी के अड्उे बने हुए हैं। कहने का मतलब है कि चारों ओर लूट मची है तो ऐसी स्थिति में सिर्फ नेताओं और राजनीति करने वालों पर  दोष मंढ कर मुक्त नहीं हुआ जा सकता। 
क्या इस देश के आईएएस, क्लर्क, चपरासी, डॉक्टर, इंजीनियर, ठेकेदार का दायित्व नहीं है कि वो ईमानदारी से काम करें वो अपना सब कुछ देश के हित में लगाए। जब ये सब के सब वर्ग के लोग भ्रष्टाचार में लिप्त है तो सिर्फ राज करने वाले लोगों पर दोष देना कितना उचित है। हमारी मानसिकता में परिवर्तन लाना बहत जरूरी है। हम सरकार की चीज को दुरूपयोग के लिए ही समझते हैं, सरकारी सम्पत्ति को तोडना, उसका उचित उपयोग न करना हम अपना दायित्व समझते हैं। आम आदमी खुद अपने पर नजर डाले कि वो टैक्स की चोरी कितनी करता है, दिन भर में कितनी दिवारों पर पान कि पीक थूकता है, यत्र तत्र कितना कूडा फैलाता है, ट्रेफिक नियमों को दिन भर में कितनी बार तोडता है, कितनी सरकारी सम्पत्ति का दुरूप्योग करता है, अपने काम पर समय पर जाता है क्या और अपने दफतर में कितनी देर बातें करता है, कितनी देर काम करता है, काम की चोरी कितनी करता है। क्या इस देश के आम नागरिक की जिम्मेदारी नहीं है कि वह खुद अपने पर ध्यान दें और अपने में सुधार के प्रयास करें। 
हम दूसरे विकसित देशों की बडाई करते हैं लेकिन एक बार सोचे कि हम अमेरिका या जर्मनी या कुआलालाम्पुर कहीं पर भी विदेश में जाते ह तो क्या एयरपोर्ट पर थूकते हैं, क्या सार्वजनिक जगहों को शौचालय बनाते हैं, क्या हम वहाँ पर ट्रेफिक नियमों का उल्लघंन करते हैं, क्या हम वहाँ पर बिना टिकट यात्रा करने का प्रयास करते हैं नहंी ना तो फिर दिल्ली, मुम्बई में घूसते ही हमें ऐसा क्या हो जाता है कि इन सब बातों को हम धडल्ले से करते हैं वहाँ कौनसा नेता आकर कहता है कि आप खुले आम थूकों, टिकट बिना यात्रा करों आदि आदि। एक नजर अपने पर डाले कि क्या धरना व प्रदर्शन जो कर रहे हैं वो कहीं अपने खिलाफ ही करें तो कितना अच्छा हो। 
हमारे अनशन करने वाले लोग राजघाट जाकर अपने इस शुभ कार्यों की शुरूआत करते हैं ताकि आम जन में ये संदेश जाए कि गाँधी जी के बताए सिद्धांतों व आदर्शों पर चलने का प्रयास किया जा रहा है। पर याद करो कि महात्मा गाँधी ने एक अनशन जनता के खिलाफ भी किया था। जब इस देश का विभाजन हुआ और चारों तरफ मारकाट मची थी तो इस युग पुरूष ने दिल्ली में भूख हडताल शुरू ही आम आदमी के खिलाफ और कहा कि जब तक आम आदमी शांति से नहीं रहेगा वे अनशन नहीं तोडेगे। आम आदमी ने उस राष्ट्रपिता की बात को सुना और माना। मारकाट बंद हुई तो क्या आज के इन बाबाओं को या समाज सेवकों को या किसी की भी ये जिम्मेदारी नह  बनती कि वे आम जनता को सुधाने के लिए अनशन करें और जनता को बनाए कि वह कितना गलत कर रही है।

सिस्टम खराब है, राजनेता ईमानदार नहीं रहे पर क्या जनता के आदर्श उच्च रहे हैं नहीं ना तो इस सिस्टम को जन्म देने वाली जनता ही पवित्र न होगी तो इससे पैदा होने वाला सिस्टम कैसे पवित्र होगा। हमें चाहिए कि हम अपने नैतिक चरित्र व राष्ट्रीय चरित्र को उच्च बनाए और महात्मा गाँधी के कहे उन शब्दों पर गौर करें कि किसी भी काम को करने से पहले यह सोचें कि आफ द्वारा किए गए इस काम से इस देश के सबसे गरीब आदमी को क्या फायदा होगा अगर कोई उस अंतिम आदमी को कोई फायदा हो तो ही वह काम करें अन्यथा नहीं। 
मेरी राय है या मांग है इन नेताओं से संस्थाओं से धर्म गुरूओं से कि वे एक विशाल अनशन करें जनता के खिलाफ, जनता की आदतों के खिलाफ, ताकि आम जन को लगे कि वो भी गलत है और इस सारी व्यवस्था में बराबर का भागीदार है।



श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘ 
पुष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर