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भावनात्मक क्रिकेट : एक दृष्टिकोण

- Sunday, September 14, 2014 No Comments

भारत ने विश्वकप क्रिकेट का फाइनल मुकाबला जीत लिया है, इस बात की हमें बहुत खुशी है कि भारत ने आखिर एक खेल में तो अपना परचम फहराया और विश्व में सर्वश्रेठ होने की बात साबित की। मगर मैं अभी जो बात करना चाहता हूँ वो इस माहौल से थोड़ी हट कर है। हमारे देश में क्रिकेट का बुखार इस कदर हावी है कि जो व्यक्ति क्रिकेट का मैच देखता है उसे बड़े सम्मान की नजर से देखा जाता है और अगर किसी भी कारण या खेल भावना से प्रेरित होकर कोई व्यक्ति भारत के किसी खिलाड़ी के बॉलिंग करने के तरीके या बैटिंग करने के तरीके पर नकारात्मक टिप्पणी कर दे तो उसे बड़े संदेह की नजर से देख कर देशद्रोही तक कह दिया जाता है। 
हमारे देश में वर्तमान में क्रिकेट प्रेमी को ही देशप्रेमी माना जाता है, अगर आप क्रिकेट से प्रेम नहीं करते तो लोग आपको बड़ी उपेक्षा की नजर से देखते हैं। भारत पाकिस्तान के बीच मैच के कारण भारत और पाकिस्तान के लोगों के मन में जो जहर था वो निकल गया। वास्तव में अगर मैं कहूँ तो हम हिंसा और युद्ध के प्रेमी ही रहे हैं और हार व जीत में ही आनंद मिलता है। हमारे ऐतिहासिक नायक राम, कृष्ण, अर्जुन, भगतसिंह हमें लड़ते हुए ही अच्छे लगे हैं। ये लोग लड़ते रहे और हम इनको पूजते रहे और इनकी प्रतिमाऍं ओर तस्वीरों का बाजार खड़ा कर दिया ताकि लोग इनसे प्रेरणा लेते रहे। अमिताभ बच्च्न भी एंग्री यंग मैन बनकर ही फिल्मों में छाए थे और हमारे देश में मारधाड़ वाली फिल्म कभी फ्लॉप नहीं होती है। हमें रेस के घोड़ो का दौड़ाने में और सांडों व मुर्गों की लड़ाई में हमेशा आनंद मिला है और हमने ऐसा आनंद बरसों बरस तक उठाया है।

वर्तमान सचिन, धोनी, आदि खिलाड़ियों की स्थिति भी वही हो गई है, हम चाहते हैं कि वे लड़े और हमें मजा आए और अगर अगर हमारा सांड या मुर्गा हार गया तो हम उसको लानते मारते हैं और जलील करते हैं और जीत गया तो उसकी पूजा करते हैं और सम्मान देते हैं। अब देखा ही होगा आपने कि हम पाकिस्तान को हराने के लिए कितना आमदा थे और चाहते थे कि हर हाल में हमारे ोर जीते। पाकिस्तान से जिस दिन भारत का मैच था उस दिन तो जूनून देखने लायक था और ऐसा लग रहा था जैसे पूरा देश ही युद्ध का मैदान बन गया हो और हर व्यक्ति इसमें योद्घा बनकर अपनी भूमिका निभा रहा हो। उस दिन सबके मुँह से यही सुना जा रहा था कि चाहे विश्व कप न जीत पाए लेकिन पाक को हराना जरूरी है। हम पाकिस्तान को हराने में शौर्य महसूस करते हैं लेकिन उनको हराने में नहीं जिनके हम दो सौ साल तक गुलाम रहे और जिन्होंने हमे जोंक की तरह चूसा और हमारे अस्तित्व को मिटाने का भरसक प्रयास किया। हम यह भूल जाते हैं कि पाकिस्तान भी उनकी ही देन है और पाकिस्तान से दुश्मनी भी उनकी ही देन है। मेरी इस बात पर सैंकड़ो तर्क आ जा सकते हैं लेकिन कोई यह मानने को तैयार नहीं होगा क्योंकि हमें सिर्फ जीत चाहिए थी अगर हार जाते तो इल्जाम लगाते, भला बुरा कहते। हमारी मानसिकता है यह कि हम अपने ही भाई को अपना सबसे बड़ा दोस्त और सबसे बड़ा शत्रु मानते हैं और जब कभी भी मौका पड़ता है तो अपने ही व्यक्ति को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। अगर हम अपने जोश को नियंत्रण में लेकर और दिमाग को ठंडा करके सोचे तो क्या यह सही है कि हम अपने पड़ोसी देश के प्रति एक खेल में ऐसा व्यवहार रखें। यह बात जरूर है कि वर्तमान में प्रत्येक भारतीय पाकिस्तान को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है लेकिन खेल के माध्यम से क्या हम दुश्मनी को ब़ा रहे हैं या उसको प्रेम में बदलने का प्रयास कर रहे हैं।
खेल माध्यम है अनुशासन की जीवन की शैली को अपनाने का और प्रेम और भाईचारे से खेलने का परन्तु जिस खेल के कारण पूरे देश में तनाव हो जाए और जिसके कारण सरकार को संवेदनशील जगहें घोषित करनी पड़े और जिस खेल के कारण साम्प्रदायिक तनाव होने की आशंका हो और जिस खेल के कारण अतिरिक्त पुलिस व सुरक्षा बल लगाना पड़े तो क्या ऐसे खेल से देश को फायदा हो रहा है। यह सोचने की बात है। जब पाकिस्तान से भारत ने जीत दर्ज की तो हमारे देश के लोगों ने उन जगहों पर जाकर थालियाँ बजाई, पटाखे छोड़े व प्रदशर्न किया जहाँ मुसलमानों की आबादी ज्यादा हो और सरकार यह बात जानती है कि ऐसा होगा तो सरकार ने पहले से ही ऐसे क्षेत्रों में पुलिस बल तैनात कर रखा था तो क्या हमारे हुक्मरान इस तरह की गतिविधियों को ब़ावा देना चाहते हैं अगर नहीं तो क्या जरूरत है इस देश के प्रधानमंत्री को अपना पूरा दिन एक खेल के पीछे खराब करने की। क्या जरूरत है क्रिकेट के नाम पर डिप्लोमेसी करने की। जब देश की सर्वोच्च सत्ता पर बैठे लोगों का व्यवहार ही ऐसा हो तो आम जन की क्या बात की जा सकती है। एक खेल को खेल ही रहने दें तो ज्यादा अच्छा है हम खेल के नाम पर राजनीति न करें और इस गर्मी में अपनी अपनी रोटियाँ नहीं सेके। अगर खेल में देश की भावना जोड़ दी जाए तो वह खेल नहीं जंग बन जाती है जो किसी भी सूरत में सही नहीं कहा जा सकता है। क्रिकेट के चौदह खिलाड़ी एक सौ इक्कीस करोड़ लोगों की भावनाओं की प्रतिनिधित्व कर रहे हैं ऐसा करना सही नहीं है। वास्तव में यह एक पूर्व नियोजित प्रकि्रया है जिसमें आम आदमी की भावना को जोड़ा जाता है और पूरा बाजार इस भावना को कैश करता है। जो लोग बेचना जानते हैं और जो लोग अच्छे विक्रेता है उन्हें कोई मतलब नहीं कि कौन जीते और कौन हारे उन्हें तो अपना माल बेचना है, अपना ब्राण्ड स्थापित करना है और इसी बाजार ने इस खेल को स्थापित किया, आम आदमी की भावना को प्रेरित कर इस खेल से जोड़ा ओर फिर इस खेल के रोम रोम में बाजार को चिपका दिया ताकि देखने वाले को ब्राण्ड दिखे, सुनने वाले को ब्राण्ड सुनाई दे। ऐसे कुछ ही लोग है जो ऐसा माहोल बनाते हैं और मुर्गे और सांड की लड़ाई में बाहर से हुर्रे हुर्रे करते हैं क्योंकि इस हुर्रे में उनका फायदा है, भीड़ जुटाने से उनको लाभ होता है और वे ऐसा ही कर रहे हैं। हमें दिमाग से सोचना होगा न कि दिल से कि हम खेल का सम्मान करें, खिलाड़ी का सम्मान करें लेकिन किसी के हाथ की कठपुलती न बने। भीड़ में दिमाग नहीं होता और इसी का फायदा लोग उठाते हैं। पागलों की तरह अनियंत्रित भीड़ को जो दिशा दिखा दी जाए सब भेड़ चाल में उसी तरफ दौड़ पड़ते हैं सो भीड़ न बने संगठन बने जिसमें ताकत होती है जिसका उद्देश्य होता है। 
जब हमने विश्वकप जीता तो माहौल बहुत खुशनुमा बना ओर पूरे देश ने जश्न मनाया मैं इस जश्न और खुशी हो बुरा नहीं मानता। लेकिन यह बात जरूर दिमाग में आती है कि आज इस देश में एकमात्र खेल क्रिकेट ही रह गया है। हम आज भी अंग्रेजों के दिए इस खेल से दिमाग व दिल की गहराईयों से जुड़े हैं। क्या ऐसा जुनून हमारी मानसिक गुलामी को नहीं दशार्ता कि हम अपने देश के पारम्परिक खेलों की तरफ तो गौर नहीं करते परंतु एक गुलामी के प्रतीक खेल के को दिवानगी की हद तक चाहते हैं। खेल कोई बुरा या अच्छा नहीं होता लेकिन खेल के प्रति जो भावना होती है वह सोचने पर मजबूर करती है। भारत का राट्रीय खेल हॉकी आज अपने अस्तित्व के लिए संघार कर रहा है। भारत के लिए पहलवानी, कुश्ती और निशानेबाजी,शतरंज में पदक लाने वाले खिलाड़ीयों की तरफ कोई गौर नहीं कर रहा है परन्तु एक खेल ऐसा हो गया है जो आज वास्तव में पूरे देश का खेल बन गया है। वे खेल जो सिर्फ और सिर्फ व्यक्तिगत योग्यता पर आधारित है उनके खिलाड़ियों के साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार हो रहा है और जो टीम आधारित खेल है उस पर धन की बारिस हो रही है। अब सारी परिस्थितियाँ हमारे सामने हैं और सोचना इस देश को है, देश चलाने वालों को है कि वे कौनसी दिशा तय करे और किसे कितना महत्व दे बाकि तो लोकतंत्र है और जनता जनार्दन है सो जय जय जनता की।
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’ (Shyam Narayan Ranga)

बीकानेर की कुश्ती के गौरव - नृसिंह लाल किराडू

- Monday, July 20, 2009 4 Comments
कुश्ती भारत का ही नहीं बल्कि विश्व का सबसे प्राचीनतम खेल है। रामायण, महाभारत काल में भी इस खेल के संकेत मिलते हैं। भारत में भी कई विश्वविजयी पहलवान पैदा हुए हैं। गामा से लेकर दारासिंह तक के नाम की एक लम्बी कतार को उसमें गिना जा सकता है। इसी का परिणाम है कि आज भी भारत के पास अन्तर्राष्ट्रीय पहलवानों की एक लम्बी कतार है। बीकानेर के एक ऐसे ही पहलवान नृसिंह लाल किराडू हैं जो कि न केवल बीकानेर बल्कि पूरे कुश्ती जगत में मनोहर पहलवान के नाम से विख्यात है।

इनका जन्म १५ अगस्त,१९४७ को बीकानेर में हुआ। इनके पिता का नाम दुर्गादत्त किराडू था। जो अपने समय में प्रथम श्रेणी के नगर दण्डनायक थे। आपकी शिक्षा बीकानेर में हुई। आपने शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। आपने एम.ए.इतिहास, एल.एल.बी, डी.पी.एड., डी.ए.के.एस. जैसी कई महत्वपूर्ण डिग्रियां हासिल की हैं।कुश्ती के क्षेत्र में आपने कई सफलताएं हासिल हैं। आप अपने समय में राजस्थान विश्वविद्यालय में अपने भार वर्ग में लगातार तीन साल (१९६४-६५, ६५-६६, ६७-६८) तक विजेता रहे। १९६५-६६ में आप राजस्थान विश्वविद्यालय के कप्तान भी रहे। १९६७-६८ में आपने ऑल इंडिया एण्ड सिलोन इंटर यूनिवर्सिटी रेस्टलिंग प्रतियोगिता में चौथा स्थान प्राप्त किया। यहां पर किराडू ने एक रिकार्ड भी बनाया जो आज तक विद्यमान है। आपने यहां पर ६ सैकेण्ड में कुश्ती जीतकर न टूटने वाला रिकार्ड बनाया। आपकी विशेषता यह रही है कि अपने अधिकतर कुश्तिायां सैंकेण्डों में ही जीती हैं। इसी वर्ष आपको कम्बाईड यूनिवर्सिटी कैंप के लिए भी चयनित किया गया। इसी वर्ष ’’भारत कुमार‘‘ दंगल के लिए भी राजस्थान विश्वविद्यालय से चयनित हुए। किराडू न केवल एक अच्छे पहलवान बल्कि बहुत अच्छे वेटलिफ्टर व बॉडी बिल्डर भी रह चुके हैं। आपने इन खेलों में भी उल्लेखनीय सफलताएं हासिल की हैं। आप १९६९-७० में वेटलिफ्टिंग में राजस्थान विश्वविद्यालय के अपने भार वर्ग में विजेता रहे। राज्य स्तर पर १९७०-७१ में आपने प्रथम स्थान प्राप्त किया। आपकी प्रेस पूरे राजस्थान में सर्वाधिक हुआ करती थी। आपने १९६७-६८ में ’’मि. यूनिवर्सिटी‘‘ होने का भी गौरव प्राप्त किया।मनोहर जी पूरे राजस्थान के एक मात्र ऐेसे खिलाडी है कि जिन्होने एक ही वर्ष में कुश्ती, वेटलिफ्टिंग व शरीर सौष्ठव प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया हो। यह भी अपने आप में एक रिकार्ड है।आप उपरोक्त तीनों खेलों के अच्छे खिलाडी ही नहीं वरन् अच्छे प्रशिक्षक भी साबित हुए हैं। आपने तीनों खेलों के सैकडों राष्ट्रीय स्तर के खिलाडी तैयार किये हैं जिन्होने अपने अपने खेलों में राजस्थान का नाम रोशन किया है। किराडू को बीकानेर भारोत्तोलन का भीष्म पितामह भी कहा जा सकता है। क्योंकि वेटलिफ्टिंग, पॉवर लिफ्टिंग आदि खेलों को सर्वप्रथम आपने ही बीकानेर में शुरू कराया। बीकानेर भारोतोलन का इतिहास आपसे शुरू होता है।वर्तमान में आप पिछले ३५ वर्षो से मारूति व्यायाम मंदिर में अवैतानिक प्रशिक्षण दे रहे हैं। आफ ही नेतृत्व में मारूति व्यायाम मंदिर द्वारा मारूति कप फुटबाल प्रतियोगिता का आयोजन लगातार ८ वर्षों तक किया गया। जिसमें समस्त राजस्थान की टीमें भाग लेती थी। आप प्रो. आर. के. रंगा के भी प्रिय शिष्य रहे हैं। उनसे आपने शरीर सौष्ठव, योग, आँख से लोहे का सरिया मोडना आदि दुर्लभ चीजें भी सीखी। इसके अलावा (खेल के) आपको वुड फॉसल्स (काष्ठावेश संग्रह) संग्रहण का भी शौक रहा है। बीकानेर में ७ से ११ करोड वर्ष पुराने काष्ठावेशषों की खोजकर आपने भूगर्भशास्त्र शोध के क्षेत्र में सभी को अचंभित कर दिया। आफ इस संग्रह पर बीकानेर के डॉ. राकेश हर्ष ने पी.एच.डी. की डिग्री भी प्राप्त की है। इसी कारण १९९४ में जिलाधीश बीकानेर ने २६ जनवरी के दिन आपको सम्मानित भी किया। अलख सांस्कृतिक मंच ने इनके संग्रह की प्रदर्शनी भी लगाई।इसके साथ ही श्रीकिराडू भारत के सर्वाधिक काष्ठावशेष संग्रही के रूप में लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड्स में भी सन् २००० में दर्ज हो चुके हैं। इसके अलावा २००३ में जयपुर में गणतंत्र दिवस के मौक पर तत्कालीन राज्यपाल अंशुमानसिंह ने भी श्री नृसिंह लाल किराडू को विशेष रूप से सम्मानित किया है। किराडू को नगर विकास न्यास बीकानेर द्वारा भी सन् २००० में डॉ करणींसह खेल पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। इसके अलावा राव बीदाजी संस्थान द्वारा राव बीकाजी अवार्ड व राजीव यूथ कल्ब द्वारा राजीव रत्न अवार्ड प्राप्त कर चुके हैं।

खेलों मे बढती डोपिंग प्रवृति

- Monday, June 16, 2008 No Comments
जब से मानव सभ्य्रता अस्तित्व में आई है जब से खेलों का भी प्रादुर्भाव हुआ है और मानव सभ्यता के विकास भी निरन्तर जारी रहा है। खेल मनोरंजन का साधन है पुराने जमाने में मल्ल, युद्घ व तलवार भालों आदि के खेलों द्वारा राजा महाराजा अपना मनोरंजन के यम साधन उस समय के खिलाडियों के आजिविका का जरिया भी थे। खेल हमारे स्वास्थ्य को भी सही व सन्तुलित रखते हैं। किसी भी खेल को नियमित रुप से खेलने वाले खिलाडी का शरीर वज्र के समान कठोर होता है इस प्रकार अगर यह कहा जाए कि वर्तमान में खेल हमारें जीवन का आधार हैं तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। वर्तमान युग में भी खेलों का महत्व दिन प्रतिदिन बढता जा रहा हैं। वर्तमान में कई खेल प्रचलन में हैं। जैसे : फुटबाल, क्रीकेट, सोफ्टबाल, टेनिस, शतरंज, बेसबाल, इत्यादि। खेलों के बढते महत्व के कारण ही प्रत्येक देश के किसी न किसी खेल को अपने राष्ट्रीय खेल के रुप अपनाया है। जैसे: भारत ने होकी को अपने राष्ट्रीय खेल के में घोषित किया है। इतना सब कुछ होने के बावजूद अगर चारों ओर नजर दौडाई जाए तो खेलों के स्तर पर चिंता का प्रश्नचिह्न अवश्य खडा होता है। वर्तमान में खेलों के बिगडते स्वरुप में अनुशासनहीनता व नशावृत्ति इतनी बढ रही है कि खेलों पर प्रश्नचिह्न लग रहा है। इस बिगडते स्वरुप के लिये नशावृति या डापिंग प्रवृत्ति घोर जिम्मेवार है। खेलों में बढती नशावृति अत्यन्त चिन्ता का विषय है। आज खेलों में प्रतिदिन डोपिंग कि प्रवृति बढती ही जा रही है। इस डोपिंग प्रवृति ने लाखों खेल प्रेमियों व देशवासियों के ह्रदय में आघात लगाया है क्योंकि किसी भी खिलाडी को यह नही भूलना चाहिए कि खेलों के साथ लाखों लोगों की जन भावनाएं जुडी हुई रहती है और वे नशा लेकर खेलकर न सिर्फ अपना चरित्र खराब करते हैं बल्कि लाखों लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड करते है। नशा लेकर खेलने की प्रवृत्ति अन्तरर्--------- स्तर पर् अपने पाँव पसार चुकी हैं। बेन् जाँनसन पिछले ओलंपिक खेलों में नशे की दवाईयां लेकर दौडा और विश्व का सबसे तेज धावक बन गया परन्तु बाद मे घ्यान मे आने पर उसका स्वर्ण पदक छीन लिया गया।इसी प्रकार ही फुटबाल ए प्रसिद्ध खिलाडी मारर्डोना ने तो हद कर दी, बार-बार चेतावनी के बावजूद नशा लेकर खेलना उसकी मजबूरी बन गया। पहले पहल तो वह इंकार करता रहा अंतत: वह मान गया कि वह नशा लेकर खेलता है। विश्व के सर्वाधिक लोकपृय खेल के साथ ऐसा मजाक एक खिलाडी के मन में घोर शकांए पैदा करता है। इस तरह के खिलाडी,खिलाडी न हो कर नशेडी बन जाते है। खिलाडियों की इस डोपिंग प्रवृति ने उस खिलाडी की प्रतिष्ठा तो गिराई ही है व साथ में उस राष्ट्र का सिर भी नीचा किया है जिसका वह खिलाडी है। एक राष्ट्र के लोग बडे अरमानो से अपने देश के खिलाडी पर आँखे लगाते है और् अंतत: उनका खिलाडी नशेडी निकले तो उस राष्ट्र की प्रतिष्ठा गिर जाती व अरमान टूट जाते है। आज स्थानीय स्तर से अन्तर् राष्ट्रीय स्तर तक ऐसे खिलाडी है जो दवाईयां नशा ही है। शारीरिक दमखम के खेलों मे डापिंग प्रवृति अक्सर देखने मे आती है। खिलाडी मैदान मे उतरने से पहले व चलते मैच में नशा लेते है व इसी दम पर अपना दमखम दिखाते है इस तरह नशे के बल पर ही वह खेलता है।बहुत से ऐसे नामी खिलाडी है जिन्होंने संन्यास लेकर अपना खेल जीवन समाप्त कर लिया है, वे आज इस बात को स्वीकार करते है खेलो में डापिंग प्रवृति उनके समय भी थी। इस तरह यह सिद्ध होता है कि डापिंग प्रवृति आज की नही पुरानी है। यह तो हुई मानव द्वारा ली जाने वाली नशे की बात आज हमारे देश में बैलगाडी दौड्,घुड्दौड्,मुर्गी लडाना व सांड् लडाने जैसे खेलो को भी बडे शौक से आजमाया जाता है। इन खेलो मे भी नशावृति घुस चुकी है। इनमे भी पशुओ को दौडाया व लडाया जाता है ताकि वे जीत सकें। उनको को भी अफिम,गाँजा,बीयर,व्हीस्की आदि पिलाई जाती है व फिर खेलाया जाता है, इस तरह पशुओ के साथ भी यह मजाक किया जाता है।इस तरह हमने जाना कि खेलो में डापिंग प्रवृति दिन प्रतिदिन बढती जा रही है। अब एक नजर इसके नोकसान पर :-1 इससे खिलाडियों के अन्दर का खिलाडी मर जाता है व उसकी हैसियत एक नशेडी से ज्यादा कुछ नहीं रहती।2 इस प्रवृति से पूरे राष्ट्र का अपमान होता है।3 इससे लाखो लोगो की भावनाओ के साथ खिलवाड होता है।4 इससे खेलो में नैतिक पतन होता जा रहा है।अन्त में इतना ही अगर वास्तव में खेलो का स्तर बढाना है,स्वर्ण पदको से अपना गला चमकाना है तो डापिंग प्रवृति का अन्त करना होगा। Article By: Shyma Narayan Ranga, Bikaner