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मदर्स डे मेरी नजर में

- Sunday, May 10, 2020 No Comments
Mothers day जैसे दिन अप्रांसगिक लगते हैं। दैनिक जीवन में हर दिन माँ से शुरू होकर माँ पर समाप्त होता है। प्यार, प्रेम, समर्पण का प्रदर्शन नहीं होता और माँ के प्यार का तो प्रदर्शन बिल्कुल ही नहीं। हर दिन mothers day है। वैसे मैं पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति का विरोधी नहीं हूं पर किसी भी बात या विचार का आंख मूंदकर समर्थन करना मेरे लिए मुमकिन नहीं। कॉर्पोरेट जगत के बनाये ये व्यावसायिक day जिनके लिए महत्वपूर्ण है वे उसको मनाए उससे भी मुझे आपत्ति नहीं न ही उनके किसी सेलिब्रेशन पर प्रश्न चिन्ह। बस माँ,पिता, भाई, बहन, पत्नी, भाभी, मौसी, ताया, ताई, चाचा, चाची, जैसे सामाजिक रिश्ते सदैव जीवंत रहे और सदैव इनका सम्मान हो ऐसा ही जरूरी है। ऐसे दिन सेलिब्रेशन करने के पीछे कॉर्पोरेट जगत की बडी व्यावसायिक सोच है जो भावनाओं को भुनाती है। ऐसे लोग जो ऐसे दिन सेलिब्रेट नहीं करते उनके सामने इस मिलेजुले सामाजिक परिवेश में कभी कभी संकट उत्पन्न हो जाता है। आस पास पड़ोस के लोग, कुछ रिश्तेदार केक काटते हैं, बैलून फोड़ते हैं और fb तथा।wup पर शेयर करते हैं तो एक अजीब स्तिथि से वो लोग रूबरू होते हैं और ऐसे आलेख लिखकर अपने मन की बात स्पष्ट करते हैं। आज के दौर में सब रिश्ते मजबूती माँग रहे हैं, विश्वास मांग रहे हैं, अपनत्व माँग रहे हैं, त्याग माँग रहे है। नमन और प्रणाम उन तमाम रिश्तों को उन तमाम लोगों को जो है या नहीं भी है पर जिनके कारण आज हमारा सामाजिक तानाबाना मजबूत रहा है।
लेखक : श्याम नारायण 

एक आवश्यक सामाजिक बुराई जुआ

- Wednesday, October 26, 2016 No Comments
समाज में विकास के साथ साथ बुराईयाॅं भी विकसित होती है। मनुष्य स्वभाव से अच्छा व बुरा दोनों ही प्रकार का होता है और समाज में बुराई व अच्छाई दोनों की साथ साथ पलती और विकसित होती है। बुराईयाॅं समाज की कोख से निकालने वाला ही फल है और कुछ बुराईयाॅं परम्पराओं के नाम पर भी फलती फूलती और विकसित होती है। उस परम्परागत बुराई में से एक बुराई है जुआ। दीपावली के अवसर पर जुआ खेलने की सदियों से परम्परा रही है और समाज में लोग सगुन के नाम पर दीपावली के दिन जुआ खेलते आए हैं। इतिहास में दीपावली के दिन नहीं अन्नकूट के दिन जुआ खेलने के तथ्य सामने आते हैं पर पूर्ण जानकारी के अभाव में दीपावली के दिन लोग जुआ खेलते हैं।

संस्कारों का ह्रास गिरता जीवन मूल्य

- Sunday, September 14, 2014 No Comments
भारतीय सभ्यता और संस्कर्ति अपने संस्कारों के लिए पूरे विश्व में जानी जाती है। भारतीय संस्कारों का ही परिणाम था कि एक समय भारत विश्व गुरू की पदवी धारण किए हुए था। यहाँ में लेखक होने के नाते यह स्पष्ट कर देता ह कि मेरा यहाँ संस्कारों से तात्पर्य सनातन धर्म के 16 संस्कारों से नहीं है वरन् दैनिक आचरण व जीवनशैली से जुडे उन संस्कारों से है जिनके चारों ओर हमारा जीवन जुडा हुआ है। हमारे देश की संस्कर्ति बहुधर्मी है और यहाँ एक कहावत प्रचलित है कि कोस कोस पर पानी बदले चार कोस पर वाणी परन्तु इसके बावजूद भी हम एक ऐसे सूत्र में पिरोए हुए हैं जो हम सबको भारतीय होने का गौरव प्रदान करता है और यह सूत्र संस्कारों से पिरोया हुआ है। 

 हमारे यहाँ एक समय ऐसा था जब अपने से बडों का आदर करना, गुरूजनों का सम्मान करना, पडसी पडसी में भाई भाई जैसा प्रेम, पूरे गॉव को एक ही परिवार के रूप में देखना आदि आदि ऐसी कईं दैनिक आचरण की बातें थी जो हमें पूरी दुनिया से अलग करती थी। किसी के बीमार हो जाने पर पूरे मौहल्ले का इकट्ठा हो जाना, महल्ले या गाँव में किसी की मृत्यु हो जाने पर पूरे गाँव में शोक का माहौल हो जाता था और किसी भी घर में खाना तक नहीं बनता था। इन सब उदाहरणों से मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि हम वसुधैव कुटुम्बकम् की जिस भावना की बात करते थे उस भावना के अनुसार अपना जीवन भी व्यतीत करते थे। हमारी कथनी और करनी में भेद नहीं था। जहाँ छोटे बडों का सम्मान करते थे वहीं बडे भी छोटों पर पूरा अधिकार रखते थे और उन्हें भटकाव से बचाने का पूरा प्रयास करते थे। अपनत्व का स्तर इतना था कि कोई भी बच्चा किसी परिवार का या व्यक्ति का नहीं वरन् महल्ले का और गाँव का माना जाता था, अमुक व्यक्ति कौन है तो उत्तर होता कि इस गाँव का है न कि इस कुल या परिवार का। छोटे बडे दोनों ही अपने अपने अधिकार व कर्तव्य से परिचित थे।
पिछले पिछले कुछ समय पर गौर करें तो यह बात सामने आती है कि यह सब बातें अब बीते समय की हो गई है। हम कहने को तो आज भी अपने आप को वैसा ही बताते हैं कि हम सब प्रेम से रहते हैं और हम मनुष्य मनुष्य में भेद नहीं करते परन्तु वास्तविकता कुछ और ही है। आज के इस भागदौड के जीवन में लोगों को अपने परिवार के लिए ही समय नहीं है और हालात ये है कि माता पिता अपने बच्चों से हफ्ते भर तक बात तक नहीं कर पाते। संयुक्त परिवार की टूटती स्थिति ने एकल परिवार की जिस संस्कर्ति को जन्म दिया है उससे संस्कारों का अवमूल्यन हुआ है। आज बच्चा साथ रहना नहीं सीखता तो वह कैसे अपने मौहल्ले को परिवार के रूप में आत्मसात करेगा। एक तरफ जहाँ उसके स्वयं के परिवार में परिवार जैसा माहौल नहीं है तो उससे कैसे उम्मीद की जाए कि वह पूरे शहर में परिवार के रूप में अपना सकेगा। आधुनिकता की दौड में हमने अंकतालिकाऍ तो अच्छी बना ली है और करोडों के सालाना पैकेज कैसे प्राप्त किए जाते हैं यह तो सीख लिया है लेकिन भाई भाई बनकर कैसे रहा जाए यह भूल गए हैं, हम भूल गए हैं कि कैसे हम अपने वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को जीकर लोगों के सामने आदर्श प्रस्तुत करें, अतिथि देवो भव की संस्कर्ति वाले इस देश में आज अतिथि के आने पर चेहरे पर सल उभर आते हैं और सोचते हैं कि अतिथि तुम कब जाओगे। भाई भाई में प्रेम नहीं रहा, बुजुर्गों का सम्मान समाप्त हो गया और हालात ये हो गए कि बुजुर्गों के सम्मान के लिए हमें कानून बनाने पडे। जिस देश में श्रवण कुमार की कहानियाँ सुनाई जाती थी जिसमें श्रवण कुमार के मरने की खबर सुनकर उसके माँ बाप ने तुरंत ही प्राण त्याग दिए वहीं आज इसी देश में माँ बाप के रिश्तों को तार तार करती नुपुर तलवार की खबरें सुर्खियों में है। संस्कर्ति के इस अवमूल्यन ने भारत की साख को हल्का कर दिया है। आज हमें किसी पर भी विश्वास नहीं रहा। भरोसे के रिश्ते समाप्त हो गए हैं। हम डर के माहौल में जी रहे हैं। संस्कर्ति की जडों के हिलने से हमारे खुशियों और परिवार व समाज की समृद्धि के फूल पनप नहीं रहे हैं। युवा पीढी भटकाव के दौर में है। रेव पार्टियों में खुले आम अश्लील व नशाखोरी की ताल पर नाचता युवा अपने पुरावैभव व पुरा संस्कर्ति से अपरिचित है। माँ बाप से जूठ बोलना, गुरूजनों का अपमान करना, पडौसी को पहचानना ही नहीं ओर हर किसी ओर लोभ लालच व अश्लील नजरों स देखने की प्रवृति ने हमारे अंदर के भारतीय गौरव को समाप्त कर दिया है। जहाँ युवाओं में भटकाव है वहीं उनको मार्गदर्शन देने वाला बुजुर्ग भी नजर नहीं आ रहा है, सुबह शाम की टहलने की प्रवृति ने मार्निंग वॉक की संस्कर्ति को जन्म दिया है। मार्गदर्शन के अभाव म समाज के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। 
आज जरूरत है अपने अतीत के गौरवशाली इतिहास से सांस्कर्तिक वैभव को अपनाने की ओर हम एक परिवार के रूप में रहना सीखे हम भाई भाई की तरह रहे, लालच को त्याग दे और जब पूरी वसुधा की हमारा घर हो जाएगी तो फिर क्या तेरा और क्या मेरा वहाँ तो सब सबका हो जाएगा। युवा अपने बडों का आदर करें, उनके अनुभव से सीखें और अपने बुजुर्गों को घर का महत्वपूर्ण व्यक्ति माने वहीं बुजुर्ग बच्चों को गलतियों पर टोके, उनका मार्गदर्शन करें ।आओ हम सब मिलकर एक ऐसे भारत के निर्माण का संकल्प ले जो पूरे विश्व के भाल पर तिलक की तरह चमके। 



श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘ (Shyam Narayan Ranga)
पुष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर

टूटते परिवार दरकते रिश्ते

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एक समय था जब लोग समूह में और परिवार में रहना पसंद करते थे। जिसका जितना बडा परिवार होता वो उतना ही सम्पन्न और सौभाग्यशाली माना जाता था और जिस परिवार में मेल मिलाप होता था और सम्पन्नता होती थी उसके पूरे क्षेत्र में प्रतिष्ठा रहती थी। यह ऐसा समय था जब समाज में परिवारों का बोलबाला था और समाज में सम्पन्नता की निशानी परिवार की प्रतिष्ठा से लगाई जाती थी। उस दौर में व्यक्ति की प्रधानता नहीं थी बल्कि परिवारों की प्रधानता थी। परिवार के धनी लोगों की बिरादरी में विशेष इज्जत होती थी और ऐसे लोग पूरे समूह और समाज का प्रतिनिधित्व करते थे। बडे परिवार का मुखिया पूरे समाज का मुखिया बन कर सामने आता था और उसकी बात का एक विशेष वजन होता था। संयुक्त परिवारों के उस दौर में परिवार के सदस्यों में प्रेम, स्नेह, भाईचारा और अपनत्व का एक विशेष माहौल रहता था। इस माहौल और संयुक्त परिवारों का फायदा परिवार के साथ पूरे समाज को मिलता था और जो पूरे समाज और राष्ट्र को एकसूत्र में बांधने का संदेश देता था। जहाँ तक मेरा मानना है उस दौर में संयम, बडो की कद्र, छोटे बडे का कायदा, नियंत्रण इन सब बातों का प्रभाव था। ऐसे ही संयुक्त परिवारों से संयुक्त समाज का निर्माण हुआ था और पूरा मौहल्ला और गाँव एक परिवार की ही तरह रहते थे। परिवार की नहीं मौहल्ले का बुजुर्ग सबका बुजुर्ग माना जाता था और ऐसे बुजुर्गो के सामने जबान निकालने या किसी अप्रिय कृत्य करने का साहस किसी का नहीं होता था। उस दौर में मौहल्लों में ऐसा माहौल और अपनापन होता था कि गाँव का दामाद या मौहल्ले का दामाद कहकर लोग अपने क्षेत्र के दामाद को पुकारते थे और अगर कोई भांजा है तो किसी परिवार का नहीं बल्कि पूरे मौहल्ले और गाँव का भांजा माना जाता था और यही कारण था कि लोग गाँव की बेटी या गाँव की बहू कहकर ही किसी औरत को संबोधित करते थे। सच कितना अपनापन और आत्मिक स्नेह था उस दौर में। यह वह समय था जब किसी व्यक्ति की चिंता उसकी चिंता न बनकर पूरे परिवार की चिंता बन जाती थी और सहयोग से सब मिलकर उस चिंता को दूर करने का प्रयास करते थे। ऐसे समय में रिश्तों में अपनापन था और लोग रिश्ते निभाते थे ढोते नहीं थे, उस समय में समाज में रिश्तों को बोझ नहीं समझा जाता था बल्कि रिश्तों की जरूरत समझी जाती थी ओर ऐसा माना जाता था कि रिश्तों के बिना जीवन जीया ही नहीं जा सकता है। 
लेकिन बदलते दौर और समय ने इस सारी व्यवस्था को बदल कर रख दिया है। अब वह दौर नहीं रहा। आज परिवार छोटे हो गए हैं और सब लोग स्व में केंन्दि्रत होकर जी रहे हैं पहले व्यक्ति पूरे परिवार के लिए जीता था पर आज अपने बीबी बच्चों के लिए जीता है। उसे अपने बच्चों और अपनी बीबी के अलावा किसी और का सुख और दुख नजर नहीं आता है वह अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ इसी उधेडबुन में लगा देता है कि कैसे अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाऍं दे दूं और कैसे अपने आप को समाज में प्रतिष्ठित बना सकूं। आपाधापी के इस दौर में जीवन से संघर्ष करता हुआ व्यक्ति आज रिश्तों को भूल गया है। आज के बच्चों को अपने चाचा, मामा, मौसी, ताया के लडके लडकी अपने भाई बहिन नहीं लगते उन्हें इन रिश्तों की मिठास और प्यार का अहसास ही नहीं हो पाता है क्योंकि कभी उन्होंने इन रिश्तों की गर्माहट को महसूस ही नहीं किया है। आज स्कूल के बस्ते के बोझ में दबा बचपन रिश्तों की पहचान भूल गया है। आज के बच्चों को अपने मौहल्ले में रह रहे बच्चो के बारे में ही पता नहीं होता तो उनको भाई बहिन मान कर प्रेम करने की बात तो कोसों दूर रह जाती है। 

Breaking Familyआज का व्यक्ति सिर्फ अपनी जिंदगी जी रहा है, उसे दूसरे की जिंदगी में झांकना दखलअंदाजी लगता है। वह सारी दुनिया की खबर इंटरनेट से रख रहा है पर पडसी के क्या हाल है उसे नहीं पता। परिवारों की टूटन ने रिश्तों की डोरी को कमजोर कर दिया है। आज का व्यक्ति आत्मनिर्भर होते ही अपना एक अलग घर बनाने की सोचता है। पहले हमारे बुजुर्ग जब भगवान से प्रार्थना करते थे तो कहते थे कि हे ईश्वर घर छोटा दे और परिवार बडा दे। ऐसा इसलिए कहते थे कि घर छोटा होगा और परिवार बडा तो परिवार के लोगों में प्रेम बढेगा। साथ रहेंगे तो अपनापन होगा, एक दूसरे की वस्तु को आदान प्रदान करना सीखेंगे और इससे एकता बढेगी लेकिन बदलते समय में व्यक्ति भगवान से एक अदद घर की प्रार्थना करता है कि हे ईश्वर मेरा खुद का एक घर हो। तो ऐसे एक अलग घर में रिश्तों की सीख नहीं बन पाती और ऐसा घर बनते ही परिवार टूट जाता है। 

सामूहिक परिवार में कब बच्चे बडे हो जाते थे ओर दुनियादारी की समझ कर लेते थे बच्चों के माँ बाप को पता ही नहीं लगता था पर आज बच्चो को पालना एक बडा काम हो गया है। सामूहिक परिवारों में बच्चे अपने चाची, ताई, भाभी के पास रहते थे और उन लोगों को भी अपने इन बच्चों से काफी प्यार होता था। सामूहिक परिवारों में एक परम्परा बहुत शानदार थी वह यह कि बच्चा अपने पिता से बडे किसी भी व्यक्ति के सामने अपने पिता से बात नहीं करता था और पिता भी अपने से बडे के सामने अपने बेटे बेटी का नाम लेकर नहीं बुलाता था और अक्सर ऐसा होता था कि बच्चा अपनी ताई, चाची या भाभी के पास ही रहता था। बच्चे से उनका भी बराबर का लगाव होता था और यही लगाव पूरे परिवार को एकसूत्र में बांध कर रखता था। हो सकता है कि भाई भाई में लडाई हो जाए पर भाई के बच्चे से लगाव के कारण परिवारों में टूट नहीं आती थी। शायद इसी अपनत्व का कारण रहा है कि आज भी उत्तर भारत में बेटी की शादी में बेटी के माँ बाप की अपेक्षा उसके चाचा चाची या ताया ताई से कन्यादान करवाया जाता है ताकि वे उसे अपनी बेटी ही माने। ऐसा देखा गया है कि ऐसे चाचा या ताया कन्यादान के बाद उसको अपनी ही बेटी मानकर प्यार करते थे और जीवनभर उसके साथ वो ही रिश्ता निभाते थे और सामाजशास्त्र के दृष्टिकोण से देखें तो यह एक महान् परम्परा रही है जिसने परिवारों को एकसाथ रहने के लिए प्रेरित किया है। 

ऊपर लिखे के बारे में मैं यह कह सकता ह कि मेरे स्वयं के परिवार में मैंने कभी भी आज तक मेरे दादाजी या मेरे पिजाती से बडे किसी के सामने उनसे बात नहीं की है और हमारे यहॉ आज भी कन्या की शादी में कन्यादान उसके चाचा या ताया ने ही किया है। लगभग यही परम्परा पूरे भारत में एक समय रही है और इसके फायदे हमेशा से ही पूरे परिवार व समाज को मिलते रहे हैं।

परन्तु बदलते समय ने व्यक्ति की सोच में निजता को हावी किया और इसी निजता ने व्यक्ति को परिवार से दूर करने के लिए प्रेरित किया। जबसे व्यक्ति ने अपने भतीजे या भतीजी को छोडकर अपने बेटे या बेटी के बारे मे सोचना शुरू किया है तब से संयुक्त परिवार टूटे हैं। व्यक्ति ने यह सोचना शुरू कर दिया कि मेरे परिवार में किसका योगदान ज्यादा है और किसका कम और यहीं से शुरू हुआ परिवरों में दरार आना। व्यक्ति ने सोचना शुरू कर दिया कि केसे मेरा बेटा सबसे आगे निकले ओर कैसे मैं अपनी कमाई के हिसाब से अपना जीवनस्तर जीना शुरू करूँ और इसी सोच ने अपनत्व और भाईचारे की भावना को आघात पहचाया है। आज हालात यह हैं कि व्यक्ति की इस सोच ने रिश्तों की पहचान को समाप्त कर दिया है। बच्चों से बचपन छिन गया है और बडो से बडपन्न। आज माँ बाप मजबूर है कि अपने बच्चों के साथ समय नहीं बिता पाते । आज छः माह या एक साल का बच्चा किसी आया के हाथ में पलता है और किराये का यह पालना किसी भी सूरत में ताई या चाची का अपनापन नहीं दे पाता है। आज पडौसी या मौहल्ले की समस्या से दूर भागना एक आदत बन गई है और यह सोचा जा रहा है कि अपने को क्या मतलब है किसी बात से। इसी सोच के कारण समाज में अपराध बढे रहे हैं, चोरियाँ हो रही है ओर अराजकता फैल रही है। भाईचारे के अभाव ने समाज में एक ऐसी दरार पैदा कर दी है कि हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को संदेह की नजर से देख रहा है। लोग कहते हैं आज जमाना नहीं रहा कि घर मे अकेले रहा जाय, आज जमाना नहीं रहा कि किसी नौकर को घर में अकेले छोडा जाय, अक्सर लोगों को कहते सुना होगा कि आज जमाना नहीं है कि अकेले बच्चों को बाहर भेजा जाए। आज कॉलोनियों और महानगरों मे रहने वाले परिवार अपने ही घर में सुरक्षित महसूर नहीं करते हैं और घर के मुख्य द्वार पर एक छेद रखा जाता है कि पहले देखा जाए कि कौन है। लोग दिन दिहाडे अपने घरों में अंदर से ताला लगाकर कैद होकर रह रहे हैं और कह रहे हैं कि जमाना बदल गया है। 

कभी सोचा है यह जमाना बदला किस ने। आज जरूरत है इन तालो को तोडने की, मुख्य दरवाजों में लगे इन छेदों की जगह दिल में रोशनदान बनाने की ताकि आप अपने मौहल्ले और शहर को अपना समझे और भाईचारा फैलाऍं। आज जरूरत है औपचारिकताओ को मिटाकर दिमाग के दरवाजे खोलने की ताकि आफ दिल में सारा परिवार समा जाए और पूरा मौहल्ला आ जाए और आपको लगे कि यह शहर मेरा है, यह परिवार मेरा है, यह मौहल्ला मेरा है। हम अपने संस्कारों को न भूले, अपनी परम्पराओं को न भूलें। याद रखे विकास करना बुरी बात नहीं है पर विकास के साथ परम्पराओं को भूलना नासमझी है। हम समझदार बने और संयुक्त परिवार और मौहल्ले के महत्व को समझे ताकि आने वाले समय में हमारी पीढी को कह सके कि हाँ हमने भी आफ लिए एक सुखी, समृद्ध, सम्पन्न और विकसित भारत छोडा है।


श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘ (Shyam Narayan Ranga) "Abhimanue"
पुष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर 

हम जानते हैं पर मानते नहीं

- Friday, September 12, 2014 No Comments


Shyam Narayan Ranga
हमारे समाज में और आस पास के माहौल में काफी दोहरे मह वाले लोग रहते हैं। लोग कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं। व्यक्ति के कहने और करने में बिल्कुल भिन्नता रहती है। यही प्रवृति आज समाज में सारी और दिखाई दे रही है। हालात ऐसे हो गए हैं कि ये समझ पाना मुश्किल हो गया है कि कौन कैसा है और पता नहीं कब किस रूप में सामने आ जाए। चारों तरफ ऐसे झूठ का माहौल है कि सारे वातावरण में झूठ ही झूठ घुलामिला नजर आता है। व्यक्ति की उपस्थिति उसके झूठी उपस्थित नजर आती है। आज कोई भी व्यक्ति किसी का असली चेहरा नहीं जान पाता है।

उदाहरण के लिए हम बात करें तो व्यक्ति आदर्श व समझ की बडी बडी बातें करता है परन्तु जब उसके सामने उन आदर्शों और उपदेशों को अपनाने की बात आती है तो यह कहकर पल्ला झाड लेता है कि ये तो सिर्फ कहने की बातें है अपनाई थोडी जाती है। मतलब जो बात उसने खुद ने कही उसे ही वह अगले ही पल मानने या उसके अनुसार चलने से मना कर देता है।

इस संदर्भ में एक कहानी मेरे जेहन में आती है कि एक सेठजी रोज एक महात्मा जी का प्रवचन सुनने जाते थे और महात्मा जी का बडा सम्मान भी करते थे। महात्मा के गुणगान सबके सामने ऐसे गाते थे जैसे उनके समान कोई और महात्मा है ही नहीं। ये महात्मा जी अपने प्रवचनों में रोज प्रत्येक जीव के प्रति प्रेम करने की बात कहते और प्रत्येक जीव को न मारने का प्रवचन देते थे। एक दिन सेठ जी इस सत्संग में अपने बेटे को भी लेकर गये। बेटे ने बडे श्रद्धा से प्रवचन सुना। सेठ जी अगले ही दिन बेटे को अपनी दुकान पर ले गए और दुकान बेटे के भरोसे छोड खुद प्रवचन सुनने चले गए। पीछे से दुकान में एक गाय ने मह मार लिया और वहाँ पडा सामान खाने लगी। यह देखकर बेटा गाय के पास बैठ गया और उसे सहलाने लगा। थोडी देर में सेठजी आए और यह दृश्य देखकर आग बबूला हो गए और बेटे को भला बुरा कहने लगे तो बेटे ने महात्मा जी का उल्लेख करते हुए कहा कि गाय को कैसे हटाता, वह तो अपना पेट भर रही थी और उसे मारने पर जीवों पर हिंसा होती। सेठजी समझ गए और तुरंत बोले कि बेटा प्रवचन सिर्फ सुनने के लिए होते हैं और उस पाण्डाल तक के ही होते हैं, वहाँ के प्रवचन दुकान पर नहीं लाए जाते सो आगे से ध्यान रखना।

कहने का मतलब यह है कि सब लोग जानते हैं कि सच क्या है और झूठ क्या तथा सही क्या है और गलत क्या और मजे की बात यह है कि सारे लोग आपस में चर्चा सही सही बातों की करते हैं और हर वक्त अपने आप को सही साबित करने की कोशिश में ही लगे रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति का अपने दोस्तों के सामने और समाज के सामने ऐसा ही व्यवहार होता है जेसे सारा संसार तो गलत है पर मैं एकदम सही ह और सत्य के मार्ग पर चलता  ह। प्रत्येक व्यक्ति हर वक्त यही साबित करने में लगा रहता है कि मैं एकदम सही ह ओर कभी गलत नहीं करता ह। मतलब यह है कि ऐसा प्रत्येक व्यक्ति सही और गलत की अच्छी समझ रखता है और पहचान सकता है कि कौनसी बात सही है और कौनसी गलत है। परन्तु जब व्यवहार में उस बात को अपनाने की बात आती है तो सब के सब पीछे हट जाते हैं और व्यवस्था और सिस्टम की दुहाई देकर अपना पल्ला झाडने की कोशिश करते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति को मालूम है कि झूठ नहीं बोलना चाहिए, भ्रष्टाचार नहीं करना चाहिए, सत्य का सहारा लेना चाहिए, चापलूसी नहीं करनी चाहिए, धर्म पर चलना चाहिए, कपट और धोखा नहीं करना चाहिए आदि आदि लेकिन ये सब कुछ जानने के बाद भी व्यक्ति इन बातों को मानता नहीं है। वह झूठ बोलता है, जमकर भ्रष्टाचार करता है, परनिंदा करता है, अधर्म और भ्रष्ट व्यक्तियों का साथ देता है, अपने राष्ट्र से गद्दारी करता है। इसका यह मतलब हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति जानबूझकर यह सब करता है और वह जानता है कि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए फिर भी वह करता है और मानता नहीं है।

हमारे धर्मगुरू, कवि, नेता, वकिल, डॉक्टर, पत्रकार आदि आदि सभी वर्गों के लोग एक दूसरे के सामने बडी सैद्धान्तिक और समझ की बातें करते हैं लेकिन जैसे ही अपनी गद्दी से उतरते हैं या माहौल से हटते हैं सब भूल जाते हैं। धर्मगुरू एक गद्दी पर बैठ कर सन्यास, बैराग, धर्म, परोपकार, सच, आस्था, भक्ति, त्याग, बलिदान की बातें करते हैं परन्तु जैसे ही भाषण पूरा होता है वे ही महँगी गाडयों में सवारी करते हैं और एयरकन्डीसन्ड कमरों में जीवन बीतातें हैं और ऐसे भी मामले आए हैं कि ये धर्मगुरू भोग, लिप्सा व वासना के चक्रव्यूह में फँसे रहते हैं। इसी तरह वकील कानून की बात करता है उसकी रक्षा करने की बात करता है परन्तु यह जानते हुए कि अमुक व्यक्ति ने हत्या की है उसे बचाने का प्रयास किया जाता है। ऐसे कितने वकील है कि जिन्होंने यह जानकर अपना क्लाईंट छोड दिया कि क्लाइन्ट गलत है। डॉक्टर बातें बहुत करते हैं लेकिन भारी भरकम फीस के बिना देखने वाले डॉक्टरों की संख्या बहुत कम है। मेरे कहने का यही सार है कि किसी को भी यह समझाने की जरूरत नहीं है कि उसे क्या करना चाहिए क्योंकि प्रत्येक वर्ग का व्यक्ति यह जानता है कि वह कर क्या रहा है और करना क्या चाहिए। उसे सही गलत में भेद करना आता है पर वह करता नहीं है।

यही कारण है कि आज हमारे देश में इतनी समस्याऍं हैं। हमारी कथनी करनी में भेद है। प्रत्येक व्यक्ति अगर अपनी कथनी और करनी में फर्क करना बंद कर दे तो सारी समस्याऍ ही समाप्त हो जाएंगी। व्यक्ति जैसा अपने आप को समाज और दोस्तों के सामने प्रकट करता है वेसा ही व्यवहार अपने जीवन में करना शुरू कर दे तो हमें किसी अन्ना हजारे या किसी समाज सुधारक ही जरूरत ही नहीं पडेगी। हमें जरूरत है कि हम सब अपने आप को सुधार लें और जो जो अच्छी और सही बातें हम जानते हैं उसे मानना भी शुरू कर दे और खुद अपनी समझ से काम लेना शुरू कर दें। बोलने व करने के इस भेद ने आज हमें ऐसे चौराहे पर ला खडा कर दिया है कि हम किसी पर भी भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। पता नहीं कब कौन धोखा दे जाए आज मनुष्य का मनुष्य पर से और अपनों का अपनों पर भरोसा उठ गया ह। आज सच्चे और ईमानदार रिश्तों का जो अभाव समाज में देखा जा रहा है वह इसी कारण है कि हम अपनी कथनी करनी में भेद कर कर हैं। संशय भरे इस माहौल में कोई भी किसी पर भी विश्वास नहीं कर पा रहा है। सब को यह डर लगा रहता है कि क्या पता कब कौन पलट जाए। आज आम आदमी की यह सोच बन गई है कि यार हम किसी से अपने संबंध क्यों खराब करें बस थोडा भला बोलना ही तो है भले ही वह झूठ हो और इसी प्रवृति ने इस समस्या को जन्म दिया है। हम सत्य बोले प्रिय बोले और असत्य प्रिय न बोले तभी समाज का भला होगा और तभी राष्ट्र का भला होगा। हम अपनी कथनी और करनी में एकता लाऍं और जो जानते हैं उसे मानना भी शुरू करे तो निश्चय ही समाज में समझ का माहौल बनेगा और हम निरंतर विश्वास के रिश्तों में बंधकर एक सुदृढ समाज और ईमानदार राष्ट्र का निर्माण कर सकेंग ।




श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘ 
पुष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर 

इक्कड बिक्कड बम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरा सौ.........

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कहाँ गया वो बचपन, छिन गया वो बचपन

Shyam N Rangaये वो शब्द है जो आजकल गली मौहल्लों में सुनने को नहीं मिलते है। इन शब्दों के साथ बच्चों का बचपन निकलता था और बच्चे इस तरह के सैकडों शब्दों के साथ अपना बचपन भरूपर जीते थे। आजकल ये शब्द सुनने को नहीं मिलते हैं। हमने विकास के साथ क्या पाया और क्या खोया कि अगर गणना करें तो बच्चों के हिस्से से हमने उनका बचपन छीन लिया है और उनके बचपन को हमने यांत्रिक बचपन बनाकर रख दिया है। याद करो वो दिन जब आप और हमारे जेसे बच्चे सुबह और शाम को अपने महल्ले में टोलियाँ बनाकर घूमा करते थे और दुनिया भर की चिंता से मुक्त होकर खुले आसमान में कभी गिल्ली डंडा खेला करते थे तो कभी किसी बाग में लुका छिपी का खेल खेलकर अपने साथियों को ढढा करते थे। बचपन की वो यादें आज भी हमारे जेहन में ऐसे ताजा है कि उनको याद कर हम आज भी खुद को तरोताजा महसूस करते है। 
एक समय था जब बचपन खेल खेल में निकल जाता था और बचपन का मतलब ही खेल खिलौनों से लगाया जाता था। हर गली मौहलले में बच्चों की टोलियाँ अलग अलग खेल खेला करते थे। कोई लुका छिपी खेलता तो कोई पकडा पकडी, गिल्ली डंडा का खेल तो बच्चों का सबसे प्रिय खेल हुआ करता था। इसी के साथ लंगडी खेलना,  लहे और लकडी का खेल खेलना, पेल दूज का खेल,  धाड धुक्कड का खेल,  गुड्डे गुड्डियों की शादी करना आदि आदि बहुत से ऐसे खेल थे जिनके माध्यम से बच्चे खेल खेल में बडे होने के साथ ही समाज की सामाजिकता को सीखते थे। 
याद करो वो अपने शहर में बारिस का आना और वो कागज की कशितयाँ बनाकर पानी में छोडना और उस कश्ती के पीछे पीछे जब तक जाना जब तक कि वह कश्ती दम न तोड दे । याद करो वो तेज ऑंधियों में कागज से बनी पतंगों को उडाना और आनन्द लेना। कितना खुशगवार होता था वह सब । कितना शानदार और यादगार रहा है हमारा बचपन । पर आज के बच्चों के नसीब में यह बचपन नहीं है, उनके पास कम्प्यूटर है, टीवी है, विडियोगेम है और आधुनिक साजो सामान के बने यंत्र है खिलौने है पर नहीं है तो कश्ती वो पतंग और वो अल्हडपन और वो बचपना। 
वर्तमान परिदृश्य पर गौर फरमाए तो हमें पता चलता है कि हमने विकास की इस दौड में बच्चों से बचपन छिन लिया है और उनके सिर पर स्कूल के बैग का इतना बोझ डाल दिया है कि आजकल के बच्चों की अल्हडता और नाजुकता इन बस्तों को बोझ में दब कर रह गई ह। आज किसी भी गली मोहल्ले में बच्चे आपको खेलते नजर नहीं आएंगे। आजकल का बच्चा टीवी के सामने सीरियल देखता है, कार्टून की फिल्म देखता है,  टीवी फिल्म देखता है और गेम्स पीरियड में थोपा हुआ गेम खेलकर अपनी दिनचर्या पूरी करता है। 
क्या यह स्थितियाँ बच्चों के लिए लाभदायक है। इस पर गंभीरता से चिंतन करने की आवश्यकता है।
पिछले दौर में गली मौहल्ले में खेलकर बच्चा साामाजिकता सीखता था आपस में मिलकर रहना, पडौसी से प्रेम, भाईचारा और समाज में रहने का तरीका सीखता था। वह खेल खेल में अपने पूरे मौहल्ले और पडौसी को जान जाता और वह बच्चा पूरे मौहल्ले का बच्चा माना जाता था। आज जो सामाजिक स्तर गिरा है और नैतिकता में जो कमी आई है और व्यक्ति ने स्व की कोटर में रहना सीखा है इसका मूल कारण एक यह भी है कि हमने बच्चों को उनके स्वाभाविक खेलों से दूर कर लिया। हमने उसको एकाकीपन से भरे खेल दिए जिन्हे खेलकर वह स्वयं एकाकी होता जा जाता है उसे पता नहीं कि पडोस में कौनसा उसकी हमउम्र का बच्चा रहता है और उसको उससे दोस्ती करनी है। उसे यह तो पता है कि आज किस कार्टून चैनल पर कौनसा सीरियल आएगा और आईपीएल खेलों का कलेण्डर क्या है लेकिन वह यह नहीं जानता कि उसका मौहल्ला कितना बडा है और उसमें कौन कौन रहते हैं। कम्प्यूटर पर बैठकर दुनिया भर की खबर रखने के चक्कर में वह अपने पडौस से अनजान रह जाता है। जिन खेलों के माध्यम से पूरे समाज में उसका प्रवेश होना था वह द्वार अब उसके पास नही रहा है और यही कारण है कि मौहल्ले का होने वाला यह बच्चा अब शर्मा जी, वर्माजी, सक्सेनाजी का बच्चा होकर रह गया है। 
खेल जीवन में अनुशासन तो सीखाते ही है साथ ही साथ खेलों के माध्यम से बच्चे के व्यक्तित्व का भी विकास होता है। लेकिन बंद कमरे में विडियोगेम पर खेले जाने वाले खेलों के माध्यम से आजकल के बच्चे ने अपने बचपन को खो दिया है और वह बच्चा बडा होकर अपने ही समाज में अकेला महसूस करता ह।
आप इमानदारी से अपने आस पास के घर परिवार के माहौल पर नजर डाले और अपने आप के बचपन से अपने आज के बच्चे के बचपन की तुलना करें तो शायद जो बात में कहना चाह रहा ह वह अपने आप आफ समझ में आ जाएगी।
जरूरत है आज के बच्चे को स्व की कोटर से निकाल कर सामाज के उस पटल पर रखने की जहाँ समग्र समाज उसे अपना परिवार लगे और वह अपने बचपन से ही वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के साथ बडा हो और एक जिम्मेदार नागरिक बने ।
किसी कवि की कही ये पंक्तियाँ के साथ मैं अपनी बात को विराम देना चाहुंगाः -
ये दौलत भी ले लो,
ये शोहरत भी ले लो,
भले छिन लो मुझसे मेरी जवानी,
मगर मुझको लौटा दो 
वो बचपन का सावन 
वो कागज की कश्ती 
वो बारिस का पानी.........

श्याम नारायण रंगा
पुष्करणा स्टेडियम के पास, बीकानेर

कितने रावण मार दिए कितने अभी बाकी है

- Monday, January 17, 2011 1 Comment
कल विजयादशमी का त्यौंहार पूरे भारत में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक, अमर्यादित शक्तियों पर मर्यादित शक्ति के प्रतीक इस त्यौंहार को हर साल बडे उत्साह व उमंग के साथ मनाया जाता है। इस दिन रावण, मेघनाथ, कुंभकर्ण के पुतलों का दहन कर तालियाँ बजाई जाती है और अगले दिन भारत भर के समाचार पत्र रावण के मरने, रावण का दंभ खत्म होने जैसी खबरों को प्रमुखता से छापते हैं।
मेरे मन में यह ख्याल आता है कि जनसंख्या में सबसे ज्यादा योगदान रखने वाला यह मध्यम वर्ग बहुत खुश होता है कि आज उसने सत्य की जीत का त्यौंहार मनाया है। हमेशा सत्य के आगे झुककर प्रणाम करने की चाह रखने वाला यह मध्यम वर्ग प्रतिदिन न जाने कितने रावणों के सामने असत्य को जीताता है और अपनी मर्यादा का उल्लंघन होते देखता है। सही है ऐसे दबे और कुचले हुए वर्ग के सामने साल में एक दिन रावण का दहन बहुत खुशी का पल होता है कि चलो सच में न सही प्रतीक में सही, असत्य की हार तो हुई। बुझे मन से वह यह मानता है कि असत्य की ही जीत हमेशा होती है, मर्यादाऍं हमेशा से टूटती आई है।
कभी राशन की दुकान की लाईन में घंटों लगने के बाद जब केरोसिन कम मिलता है चीनी का तोल सही नहीं होता तो मध्यम वर्ग का यह इंसान सोचता है कि आज भी कितने रावण जिंदा है जो सीता का हरण कर जनता को द्रोपदी बनाने का प्रयास करते हैं। सरकारी कार्यालयों में, रोडवेज की बसों में, आयकर - बिक्रीकर विभागों में, आदि आदि व्यवस्थाओं में आज ज हालात है, उससे तो यही लगता है कि आज भी रावण जिंदा है। एक ही पल में रावण व दुःशासन के प्रतीक ये लोग आज हमारे समाज को खोखला कर रहे ह। जो मंदोदरी का पति रावण था उसकी नजर तो सिर्फ राम की सीता पर ही खराब रही और कहीं न कहीं अपनी बहन के साथ हुए अन्याय का बदला लेने का प्रयास भी उस रावण का रहा। पर आज की इस जनता ने न तो किसी राम की सीता का हरण किया है और न ही किसी रावण की बहन का तिरस्कार किया है, फिर भी उसका सामना प्रतिदिन कईं रावणों से होता है। एक रावण पाँच साल के लिए छलने आता है और सने की सुनहरी लंका का सपना दिखाता है और जनता को यह बताने का प्रयास करता है कि यह सोने की लंका मेरी नहीं है आपकी है और मैं आफ लिए भी ऐसी ही सोने की लंका बना दगा बस एक बार आप मुझे फिर राजसिंहासन पर बैठा दो। पिछले साठ सालों से यह रावण अपना प्रतिदिन रूप और काया बढा रहा है। अस्पतालों में राम बनने की कवायद करते डॉक्टरों के सामने जब मरीज आता है तो भगवान रूपी इस इंसान से जिंदगी की उम्मीद लगाता है पर अपनी हडतालों मं व्यस्त, अपनी मांगों को मनवाने में व्यस्त इस भगवान को भक्त की फरियाद सुनाई नहीं देती और एक और रावण जनता के सामने अपना मह लेकर खडा हो जाता है। कहीं तस्करी करते रावण है तो कहीं बम विस्फोट करते रावण है, कहीं संसद में प्रश्न उठाने के बदले पैसा लेने वाले रावण है तो कहीं माँ बहनों की अस्मत लूटने वाले रावण है, कहीं बेकरी कांड के रूप में रावण नजर आते हैं तो कहीं तंदर कांड के रूप में, कहीं कसाब बन कर रावण घूम रहे हैं तो कहीं सफेद चोलों में मह पर मुस्कान लिए जनता में घूमते रावण है, कहीं लाल बत्तियों में अफसरशाही करते रावण है तो कहीं अनाज के गोदामों की पहरेदारी करते रावण है। रावण जगह जगह है पर आज के इस हालात में राम नहीं है। सीता है जिसका हरण हुआ है, जिसके साथ हमेशा अन्याय हो रहा है, पर एक ऐसी सीता जिसका कोई राम नहीं, एक ऐसी सीता का हरण हुआ जिसने लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन नहीं किया। आज गली गली में रावण घूम रहे हैं किसी शायर की कही ये पंक्तियाँ याद आ रही है कि गली गली में रावण खडे हैं, इतने राम कहॉ से लाऊॅं। जनता रूपी इस सीता को आज भी अपने राम का इंतजार है जो किसी अहिंसा का अस्त्र लेकर आएगा और इन रावणों से छुटकारा दिलाएगा। भारत का आम नागरिक खुश है कि उसने रावण को मार गिराया, पटाखे फूटे, विजय उल्लास हुआ लेकिन इस शोर गुल में रावण अभी भी जिंदा रह गया। उसका अट्टाहस ये कहता है कि मुझे मारने के लिए राम लाओ मैं किसी रावण के हाथों नहीं मारा जा सकता।

श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘ पुष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर