रिश्ते: आत्मीयता से औपचारिकता तक का सफर
मानव जीवन का सबसे बड़ा आधार यदि कोई है तो वह रिश्ते हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसका अस्तित्व केवल उसके व्यक्तिगत प्रयासों से नहीं, बल्कि उसके परिवार, मित्रों, पड़ोसियों और समाज के साथ बने संबंधों से भी निर्धारित होता है। रिश्ते केवल खून के नहीं होते, बल्कि भावनाओं, विश्वास, अपनत्व और सहयोग के धागों से भी बुने जाते हैं। किंतु आधुनिक समय में ऐसा महसूस होने लगा है कि रिश्तों की आत्मीयता धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है और उनकी जगह औपचारिकता ने ले ली है। आज अनेक लोग यह अनुभव करते हैं कि रिश्ते निभाए नहीं जा रहे, बल्कि ढोए जा रहे हैं।
एक समय था जब रिश्तों में सहजता और अपनापन हुआ करता था। परिवार के सदस्य, रिश्तेदार, मित्र और पड़ोसी केवल परिचित नहीं होते थे, बल्कि जीवन के सुख-दुःख के सहभागी होते थे। गांवों और कस्बों में तो यह सामान्य बात थी कि कोई भी व्यक्ति बिना पूर्व सूचना के किसी रिश्तेदार के घर पहुंच जाता था और उसका स्वागत पूरे प्रेम और सम्मान के साथ किया जाता था। रिश्तेदारों के घरों में कई-कई दिन रुकना, साथ बैठकर भोजन करना, देर रात तक बातचीत करना और एक-दूसरे की खुशियों और परेशानियों में शामिल होना जीवन का सामान्य हिस्सा था।
संयुक्त परिवारों के दौर में रिश्तों की गर्माहट और भी अधिक दिखाई देती थी। दादा-दादी, चाचा-ताऊ, बुआ, मामा-मौसी और फूफा-मौसा जैसे रिश्ते केवल नाम मात्र के नहीं थे, बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा थे। बच्चों का पालन-पोषण केवल माता-पिता नहीं, बल्कि पूरा परिवार मिलकर करता था। बच्चों को अपने चाचा-ताऊ और मामा-मौसी के घर उतना ही अपनापन मिलता था जितना अपने घर में। छुट्टियों का अर्थ ही होता था रिश्तेदारों के यहां जाना और वहां के बच्चों के साथ समय बिताना।
पड़ोसियों के साथ भी संबंध अत्यंत घनिष्ठ होते थे। पड़ोसी केवल बगल में रहने वाला व्यक्ति नहीं होता था, बल्कि परिवार का सदस्य जैसा माना जाता था। यदि किसी घर में कोई परेशानी आ जाए तो सबसे पहले पड़ोसी सहायता के लिए पहुंचता था। किसी के घर मेहमान आ जाएं, कोई बीमार पड़ जाए, शादी-ब्याह हो या कोई अन्य आयोजन, पड़ोसी हर कार्य में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते थे। कई बार तो घर की चाबी भी पड़ोसियों के पास रहती थी क्योंकि विश्वास का स्तर इतना मजबूत था।
कार्यालयों और कार्यस्थलों पर भी संबंध केवल कामकाजी नहीं होते थे। सहकर्मी एक-दूसरे के परिवारों को जानते थे, उनके घरों में आना-जाना होता था और अनेक बार कार्यालय के संबंध पारिवारिक रिश्तों में बदल जाते थे। त्योहारों पर एक-दूसरे के घर जाना, बच्चों के जन्मदिन में शामिल होना और पारिवारिक कार्यक्रमों में सहभागिता सामान्य बात थी। कार्यस्थल केवल रोजगार का केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक जुड़ाव का भी माध्यम था।
लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदलती चली गईं। तकनीकी विकास, शहरीकरण, व्यस्त जीवनशैली और बढ़ती व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं ने रिश्तों की प्रकृति को भी बदल दिया। आज अधिकांश लोग अपने जीवन में इतने व्यस्त हो गए हैं कि उनके पास रिश्तों को समय देने का अवसर ही नहीं बचता। सुबह से शाम तक नौकरी, व्यवसाय और अन्य जिम्मेदारियों में उलझे रहने के कारण लोगों का सामाजिक दायरा सीमित होता जा रहा है।
मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने एक ओर जहां संवाद को आसान बनाया है, वहीं दूसरी ओर वास्तविक मुलाकातों को कम भी कर दिया है। आज लोग घंटों सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं, लेकिन अपने किसी रिश्तेदार या पड़ोसी के घर जाकर कुछ समय बिताने का समय नहीं निकाल पाते। जन्मदिन, विवाह वर्षगांठ और त्योहारों की शुभकामनाएं अब व्यक्तिगत मुलाकातों के बजाय व्हाट्सएप संदेशों और सोशल मीडिया पोस्टों तक सीमित हो गई हैं। रिश्तों की गहराई की जगह अब डिजिटल औपचारिकताओं ने ले ली है।
आधुनिक जीवन में निजता की अवधारणा भी बहुत मजबूत हुई है। पहले लोग एक-दूसरे के जीवन में रुचि लेते थे और उसे अपनत्व का प्रतीक माना जाता था। आज वही बात कई लोगों को हस्तक्षेप प्रतीत होती है। लोग अपनी निजी दुनिया में रहना पसंद करते हैं और दूसरों को उसमें प्रवेश नहीं देना चाहते। परिणामस्वरूप पड़ोसियों के बीच भी संवाद कम हो गया है। एक ही भवन में वर्षों तक रहने वाले लोग एक-दूसरे का नाम तक नहीं जानते।
संयुक्त परिवारों के स्थान पर एकल परिवारों का बढ़ना भी रिश्तों में आई दूरी का एक महत्वपूर्ण कारण है। जब परिवार छोटे हो गए तो बच्चों का संपर्क भी अपने विस्तारित परिवार से कम हो गया। आज अनेक बच्चों को अपने चचेरे, ममेरे या फुफेरे भाई-बहनों के साथ वैसा जुड़ाव नहीं मिल पाता जैसा पहले की पीढ़ियों को मिला करता था। परिणामस्वरूप रिश्ते केवल पारिवारिक आयोजनों तक सीमित होकर रह गए हैं।
आर्थिक प्रतिस्पर्धा ने भी रिश्तों पर प्रभाव डाला है। पहले समाज में सहयोग की भावना अधिक थी, जबकि आज तुलना और प्रतिस्पर्धा का वातावरण बढ़ गया है। लोग अनजाने में एक-दूसरे की सफलता और असफलता का मूल्यांकन करने लगते हैं। इससे रिश्तों में सहजता कम होती है और दूरी बढ़ने लगती है। कई बार आर्थिक स्थिति, सामाजिक प्रतिष्ठा और जीवनशैली के अंतर भी रिश्तों में खटास का कारण बन जाते हैं।
एक अन्य महत्वपूर्ण कारण विश्वास की कमी भी है। आधुनिक समाज में लोगों का विश्वास एक-दूसरे पर पहले की तुलना में कम हुआ है। समाचारों में धोखाधड़ी, विश्वासघात और स्वार्थ से जुड़ी घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं, जिससे लोग अपने संबंधों को सीमित रखने में ही सुरक्षित महसूस करते हैं। यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रही है।
हालांकि यह कहना भी उचित नहीं होगा कि आज के सभी रिश्ते कमजोर हो गए हैं। आज भी अनेक परिवार और समाज ऐसे हैं जहां आत्मीयता और अपनापन जीवित है। कठिन परिस्थितियों में लोग आज भी एक-दूसरे की सहायता के लिए आगे आते हैं। कोरोना महामारी के दौरान हमने देखा कि अनेक लोगों ने रिश्तों और मानवता की मिसाल प्रस्तुत की। इससे यह सिद्ध होता है कि रिश्तों की भावना समाप्त नहीं हुई है, बल्कि उसे पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।
रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए सबसे पहले हमें समय देना होगा। कोई भी रिश्ता केवल फोन कॉल, संदेश या सोशल मीडिया के माध्यम से लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकता। रिश्तों को जीवित रखने के लिए व्यक्तिगत मुलाकातें, संवाद और साथ बिताया गया समय आवश्यक है। हमें अपने रिश्तेदारों, मित्रों और पड़ोसियों से मिलने-जुलने की पुरानी परंपरा को पुनर्जीवित करना होगा।
परिवारों को भी अपने बच्चों को रिश्तों का महत्व सिखाना चाहिए। यदि नई पीढ़ी को बचपन से ही परिवार और समाज के साथ जुड़ने की संस्कृति मिलेगी तो वे भविष्य में भी इन मूल्यों को आगे बढ़ाएंगे। त्योहारों, पारिवारिक आयोजनों और सामाजिक कार्यक्रमों को केवल औपचारिकता न बनाकर उन्हें मिलन और संवाद का अवसर बनाना चाहिए।
पड़ोसियों के साथ भी आत्मीय संबंध स्थापित करने का प्रयास किया जा सकता है। एक छोटी-सी मुस्कान, अभिवादन, हालचाल पूछना या किसी आवश्यकता के समय सहायता करना भी रिश्तों को मजबूत बना सकता है। समाज की शक्ति केवल बड़ी संस्थाओं में नहीं, बल्कि पड़ोस और समुदाय के स्तर पर बने विश्वास और सहयोग में निहित होती है।
अंततः यह समझना होगा कि रिश्ते जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं। धन, पद और प्रतिष्ठा जीवन को सुविधाजनक बना सकते हैं, लेकिन सुखी नहीं बना सकते। सुख और संतोष का वास्तविक स्रोत वे लोग हैं जो हमारे जीवन के हर उतार-चढ़ाव में हमारे साथ खड़े रहते हैं। यदि रिश्तों की गर्माहट समाप्त हो गई तो आधुनिकता की सारी उपलब्धियां भी हमें भीतर से अकेला ही छोड़ देंगी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने व्यस्त जीवन से थोड़ा समय निकालकर उन रिश्तों को फिर से सींचें, जिन्होंने कभी हमारे जीवन को अर्थ और आनंद दिया था। क्योंकि रिश्ते बोझ नहीं होते, वे जीवन की वह अमूल्य धरोहर हैं जो मनुष्य को मनुष्य बनाए रखती हैं। जब रिश्तों में अपनापन, विश्वास और संवेदना जीवित रहती है, तभी समाज मजबूत और जीवन सार्थक बनता है। यही वह मूल्य है जिसे हमें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना होगा।
– श्याम नारायण रंगा





