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सोच गहरी हो छिछली नहीं

- Thursday, April 23, 2026 No Comments

राजस्थान के पश्चिमी रेगिस्तान में प्रचलित लोक-कहावत गहन सत्य को उजागर करती है: “पहले यहां के लोग कुओं का पानी पीते थे, इसलिए गहरे थे; आज नहरों का पानी पीते हैं, इसलिए छिछले हो गए।” यह कहावत जल-स्रोत की भौतिकता से परे सोच की गहराई और उथलापन की प्रतीक है। कुएं की खुदाई में लगने वाला श्रम, धैर्य और समय गहरी सोच का प्रतीक है, जबकि नहर का बहता पानी तात्कालिकता और सतहीता का।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से गहरी सोच व्यक्ति को प्रथम-क्रम के प्रभावों से आगे ले जाकर द्वितीय एवं तृतीय-क्रम के परिणामों, नैतिक आयामों और दीर्घकालिक प्रभावों तक पहुंचाती है। इसके विपरीत छिछली सोच सतही जानकारी, त्वरित सुख और दिखावे तक सीमित रहती है। अध्ययनों से पता चलता है कि गहरी सोच वाले व्यक्ति अधिक विश्लेषणात्मक, दूरदर्शी और निर्णय लेने में मजबूत होते हैं, जबकि छिछली सोच अस्थिरता, आवेग और कमजोर नियोजन क्षमता पैदा करती है।

सामाजिक उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है। आज सोशल मीडिया की संस्कृति छिछली सोच को बढ़ावा दे रही है। युवा पीढ़ी 15 बार से अधिक प्रतिदिन सोशल मीडिया चेक करने की आदत से पीड़ित हो रही है, जिससे मस्तिष्क सामाजिक पुरस्कारों  के प्रति अति-संवेदनशील हो गया है। परिणामस्वरूप ध्यान अवधि घट रही है, गंभीर पढ़ाई या चर्चा में असमर्थता बढ़ रही है और रिश्तों में उथलापन आ रहा है। “इंस्टेंट ग्रेटिफिकेशन” की संस्कृति में लोग शादी या दोस्ती को भी स्वाइप-जैसे डिस्पोजेबल बना रहे हैं—जल्दी कनेक्ट, जल्दी डिस्कनेक्ट। इससे विश्वास, प्रतिबद्धता और गहराई का अभाव हो रहा है।

भारतीय इतिहास में गहरे व्यक्तित्व के उदाहरण महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद और डॉ. सी.वी. रामन जैसे विचारकों में दिखते हैं। गांधीजी ने सतही स्वतंत्रता से आगे जाकर अहिंसा, सत्य और आत्म-शुद्धि की गहराई को अपनाया, जिसने पूरे राष्ट्र को रूपांतरित किया। वहीं आधुनिक समय में कई युवा केवल वायरल ट्रेंड्स और शॉर्ट वीडियो तक सीमित रहकर व्यक्तित्व की सतही परत पर ही अटक जाते हैं।

व्यक्तित्व पर इसका प्रभाव गहरा है। गहरी सोच चरित्र को मजबूत, स्वभाव को स्थिर और रिश्तों को टिकाऊ बनाती है। छिछलापन चरित्र पर धब्बा लगाता है—लोग ऐसे व्यक्ति को गंभीर जिम्मेदारियों या गहन संबंधों के लिए नहीं चुनते। समाज स्तर पर यह विभाजन, अस्थिरता और मूल्यहीनता को जन्म देता है।

आज की उपभोक्तावादी और डिजिटल संस्कृति हमें “कुएं” की गहराई से दूर ले जा रही है। सच्चा व्यक्तित्व विकास तभी संभव है जब हम सोच को कुएं की तरह गहरा बनाएं—ज्ञान, अनुभव, विवेक और मूल्यों की जड़ें जमाएं। गहराई ही व्यक्ति को सशक्त, समाज को सुदृढ़ और जीवन को अर्थपूर्ण बनाती है


- Shyam Narayan Ranga

मेरी नजर में बार काउन्सिल के चुनाव एक दृष्टिकोण

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राजस्थान बार काउंसिल के हालिया चुनावों का अवलोकन एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है—क्या यह चुनाव वास्तव में सक्रिय और प्रैक्टिस करने वाले वकीलों की सोच और हितों का प्रतिनिधित्व करता है, या फिर यह केवल संख्या, प्रभाव और सामाजिक समीकरणों का खेल बनकर रह गया है? बीकानेर जैसे शहर में चुनाव प्रक्रिया को नजदीक से देखने पर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि चुनाव का स्वरूप पेशेवर संगठन के बजाय छात्र राजनीति जैसा होता जा रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में विधि स्नातक युवाओं की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। यह स्वाभाविक भी है, लेकिन चिंताजनक पहलू यह है कि इनमें से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो सक्रिय रूप से न्यायालय में प्रैक्टिस नहीं कर रहे हैं। केवल बार काउंसिल में पंजीकरण करवा लेना और मतदान के अधिकार का प्रयोग करना—यह प्रवृत्ति चुनाव की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। जब मतदाताओं में वे लोग अधिक हों जिन्हें न्यायालय की कार्यप्रणाली, वकालत की चुनौतियों और अधिवक्ताओं की वास्तविक समस्याओं का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है, तो ऐसे में चुने गए प्रतिनिधियों की संवेदनशीलता और प्राथमिकताएं भी प्रभावित होना स्वाभाविक है।

इसके अतिरिक्त, चुनाव में जातिगत आधार पर ध्रुवीकरण भी एक गंभीर समस्या के रूप में सामने आया। प्रत्येक मतदाता अपने-अपने सामाजिक समूह के उम्मीदवार को समर्थन देने की ओर झुकता दिखाई दिया। यह प्रवृत्ति न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है, बल्कि एक पेशेवर संस्था की गरिमा को भी आहत करती है। वकालत एक ऐसा पेशा है, जहां योग्यता, अनुभव और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता सर्वोपरि होनी चाहिए, न कि जातिगत पहचान।

चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों में भी असंगतियां देखी गईं। घर-घर संपर्क, व्यक्तिगत और पारिवारिक संबंधों के माध्यम से दबाव बनाना—ये सभी तरीके किसी सामाजिक या राजनीतिक चुनाव के हो सकते हैं, लेकिन एक पेशेवर संगठन के लिए यह उपयुक्त नहीं माने जा सकते। इससे यह संकेत मिलता है कि चुनाव का मूल उद्देश्य प्रतिनिधित्व के बजाय जीत हासिल करना बन गया है।

इस परिप्रेक्ष्य में यह आवश्यक हो जाता है कि बार एसोसिएशन के चुनावों में मतदान का अधिकार केवल उन अधिवक्ताओं तक सीमित किया जाए जो वास्तव में न्यायालय में सक्रिय रूप से प्रैक्टिस कर रहे हैं। इससे न केवल चुनाव की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि चुने गए प्रतिनिधि भी अधिक जिम्मेदार और संवेदनशील होंगे। साथ ही, चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और आचार संहिता को सख्ती से लागू करने की आवश्यकता है, ताकि जातिगत और व्यक्तिगत प्रभावों को न्यूनतम किया जा सके।

अंततः, बार एसोसिएशन केवल एक संगठन नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसके चुनावों की गंभीरता और पवित्रता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। यदि यह सुनिश्चित नहीं किया गया, तो भविष्य में यह संस्था अपने मूल उद्देश्यों से भटक सकती है, जिसका प्रभाव न केवल अधिवक्ताओं पर, बल्कि संपूर्ण न्याय प्रणाली पर पड़ेगा।


- श्याम नारायण रंगा  "अभिमन्यु"

सहज सरल छोटूलाल

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शहर की उन पुरानी हवेलियों की गलियों में, जहाँ सुबह की पहली किरण सेठों के आँगन में चाँदी की तरह बिखरती थी, उन्हीं गलियों के एक कोने में रहता था छोटूलाल। उसका नाम ही उसकी कहानी था : छोटा, सरल, और इतना साफ़ कि जैसे कोई ठहरे तालाब का पानी, जिस पर कोई भी पत्थर मार दे, पर लहरें कभी नाराज़ नहीं होतीं।

ब्राह्मण परिवार में जन्मा, लेकिन गरीबी ने उसे स्कूल की चौखट तक नहीं पहुँचने दिया। माँ की गोद में बैठकर उसने जो सीखा, वह था प्यार से खाना बनाना। उसके हाथों में जादू था : आलू की सब्ज़ी में इतनी मिठास, दाल में इतनी गहराई कि खाने वाला आँखें बंद करके कह उठता, “बस यही स्वर्ग है।” उँगलियाँ चाटते-चाटते लोग कहते, “पंडित जी, तुम तो पाकशास्त्र के ऋषि हो।” दाल का हलवा और दाल के बडे बडे बनाने का जो हूनर छोटूलाल के पास था वह उस समय में शहर में किसी और के पास हो ऐसा सुनने में नहीं आया था। 

सेठ रामनाथा डागा की हवेली में उसे नौकरी मिली। सेठानी जी ने एक बार उसके हाथ का बना हलवा खाया तो बस, छोटूलाल उनके हृदय में बस गया। धीरे-धीरे वह परिवार का सदस्य बन गया। सेठ जी की नातियों को गोद में लेकर घूमने ले जाना, बाई बेटी को ससुराल छोड़ना, पीहर लाना, बच्चों को बाजार ले जाना, सब उसके जिम्मे था। बच्चे उसे “छोटू काका” कहकर बुलाते और वह हँसते-हँसते उनकी सारी शरारतें सह लेता।

उसकी सरलता इतनी निर्मल थी कि उसे स्त्री पुरूष के रिष्तों की गहनता की जानकारी नहीं थी। पति-पत्नी का रिश्ता क्या होता है, यह बात उसकी समझ से परे थी। वह सोचता, शादी हो गई, तो बस हो गई। पत्नी घर में है, खाना बन गया, कपड़े धुल गए, तो जीवन पूरा हो गया। सब मित्रों को देखता तो फिर एक दिन उसके मन में भी शादी का बीज फूटा। माता-पिता ने रिश्ता ढूँढा। गरीब घर का लड़के को कौन बेटी देता? लेकिन समाज के एक व्यापारी ने, जो परदेश में कपड़े का बड़ा धंधा करता था, अचानक प्रस्ताव भेज दिया। छोटूलाल की माँ-बाप खुशी से फूले न समाए और छोटूलाल की शादी हो गई।

जब दुल्हन घर आई, तो लोग फुसफुसाए। लड़की का रंग काला था और उसके तीन दाँत होंठों से बाहर निकले हुए थे। लेकिन छोटूलाल ने मुस्कुराकर कहा, “मेरी पत्नी है। बस।” उसकी आँखों में कोई निराशा नहीं थी। केवल एक साफ़, निर्मल खुशी थी  कि अब उसका अपना घर है, पत्नी है, कोई है जो उसे अच्छा लगता है। 

शादी के बाद एक सुबह वह काम पर देर से पहुँचा। सहकर्मी हँसते हुए पूछने लगे, “क्या बात है पंडित जी, आज देर कैसे?”

छोटूलाल ने सरलता से जवाब दिया, “घर का सारा काम मैंने किया। पत्नी तीन दिन कुछ नहीं करेगी। कह रही है कि वो छुटटी पर है मतलब पीरियडस पर है और मां की भी तबीयत ठीक नहीं।”

साथियों ने आँखें फाड़ीं। फिर एक ने ठहाका लगाया, “अरे! तो तुम्हें भी तो पीरियड्स आना चाहिए ना? औरतें तीन दिन आराम करती हैं, तो तुम क्यों नहीं?”

एक साथी ने कहा कि हम भी महीने में तीन दिन नहीं आते भाई छोटू शायद तुमने गौर नहीं किया कि हम सब कभी न कभी तीन दिन छुटटी नहीं लेते पर तुम तो साल के प्रत्येक दिन आते हो।

वह मजाक था। लेकिन छोटूलाल के सरल मन में वह मजाक सच्चाई बन गया।

संयोगवष उस दिन सेठानी जी भी अपने पलंग से नीचे टाट पर बैठी थी और पूछ लिया छोटू आज देरी क्यों की, तुम्हे पता है न कि तुम्हारे बिन खाना नहीं बनता। 

तो छोटूलाल ने वही जबाब सेठानी को दिया और पूछ लिया कि आज आप ही खाना बना लेते तो सेठानी ने कहा कि जो समस्या  तेरी बीबी को हुई है वही आज मुझे भी है। खैर कोई नहीं अब आ गए तो देरी से सही सबके लिए खाना बना ही लो।


अगले महीने जब फिर वैसा हुआ, तो सहकर्मियों ने उसे घेर लिया। “देखो छोटूलाल, तुम बेवकूफ बन रहे हो। औरतें चोंचले करती हैं। तुम भी तीन दिन छुट्टी करो। हम सब करते हैं।”

अब तो छोटूलाल के मन में तीन दिन छुटटी लेने की बात घर कर गई और उसने साफ निर्णय ले लिया कि अब से वह भी महीने में तीन दिन छुटटी जरूर लेगा। सीधा-सादा छोटूलाल उनकी बातों में आ गया। पूरे साल में कभी छुट्टी न लेने वाला वह तीन दिन घर बैठ गया। न काम, न हवेली।

सेठानी जी ने जब सुना तो चौंक गईं। उन्होंने छोटूलाल को बुलाया।

“क्या बात है बेटा? तीन दिन क्यों नहीं आए?”

छोटूलाल ने बड़ी निश्छलता से कहा, “सेठानी जी, जैसे मेरी पत्नी पीरियड्स पर तीन दिन काम नहीं करती, वैसे ही मैं भी तीन दिन पीरियड्स पर था। अब मुझे भी पता चल गया है सब, अब आप औरते मुझे मुर्ख नहीं बना सकती।”

सेठानी जी पहले तो हँसीं, फिर उनकी आँखें नम हो गईं। उन्होंने छोटूलाल की पीठ थपथपाई और धीरे से कहा, “कल अपनी पत्नी को मेरे पास भेज देना।”

अगले दिन छोटूलाल की पत्नी सेठानी जी के सामने आई। वह औरत साधारण दिखती थी, लेकिन उसकी आँखों में गहराई थी, समझ की, सहनशीलता की और प्यार की।

सेठानी जी ने उसे अपने पास बिठाया। प्यार से उसके बालों पर हाथ फेरा और सारी बात बताई। फिर छोटूलाल की पत्नी ने भी अपना दर्द खोला। तीन साल हो गए थे शादी को, पर छोटूलाल को अभी तक पति-पत्नी के रिश्ते का ज्ञान नहीं था। वह सिर्फ़ खाना बनाता, घर संभालता और मुस्कुराता रहता।

सेठानी जी ने दोनों को समझाया।

घर लौटकर पत्नी ने छोटूलाल को पहली बार सच्ची पत्नी की तरह, प्रेमिका की तरह, माँ की तरह समझाया। रात के अंधेरे में, चाँद की रोशनी में, उसने धीरे-धीरे छोटूलाल को जीवन की वे बातें बताईं जो किताबों में नहीं लिखी होतीं, शरीर का रहस्य, मन का लगाव, प्यार का स्पर्श, और वंश की निरंतरता।

छोटूलाल सुनता रहा। उसकी आँखें चौड़ी होती गईं। फिर धीरे-धीरे उसके चेहरे पर एक नई रोशनी फैली। जैसे कोई बच्चा पहली बार फूल को देखकर समझे कि वह सिर्फ़ रंग नहीं, सुगंध भी है।

उस रात के बाद छोटूलाल बदला नहीं, केवल पूरा हुआ।

धीरे-धीरे दोनों का रिश्ता गहरा हुआ। हँसी बढ़ी, बातें बढ़ीं, स्पर्श बढ़ा। और एक दिन सेठानी जी को खुशखबरी मिली, छोटूलाल के घर बेटा हुआ। और एक साल बाद फिर दूसरा बेटा।

वंश बढ़ा।

लेकिन छोटूलाल की सरलता कभी नहीं बदली। वह अब भी वही था, जो किसी का बुरा नहीं मानता, जो खाना बनाकर सबको खिलाता, जो बच्चों को गोद में लेकर हँसता। केवल अब उसके हँसने में एक नई गहराई थी। अब वह जानता था कि प्यार केवल सेवा नहीं, बल्कि एक-दूसरे को पूरा करना भी है।

आज भी जब हवेली के आँगन में शाम ढलती है और छोटूलाल के दो बेटे दौड़ते हुए आते हैं, तो लोग कहते हैं, “देखो, पंडित जी के घर में अभी भी वही पुरानी खुशबू है।”

और छोटूलाल मुस्कुराता है। सरल, सहज, और अब थोड़ा-सा पूरा।

क्योंकि कभी-कभी सबसे बड़ी समझदारी सरलता में ही छिपी होती है। और सबसे गहरा प्यार उन लोगों के दिल में होता है, जो कभी किसी का बुरा नहीं मानते।


- श्याम नारायण रंगा  "अभिमन्यु"

बीकानेर थार की रेत में खिलता है सद्भाव का फूल

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Bikaner Ka Sampradayik Sadbhav (Courtesy : Rajuy)

रेगिस्तान की सुनहरी रेत में, जहां सूरज की किरणें अपनी आभा बिखेरती है और हवाएं कहानियां गुनगुनाती हैं, वहां बसा है एक शहर बीकानेर। हवेलियों का शहर, सद्भाव का गुलशन, और साझी संस्कृति का जीवंत प्रतीक। थार के उत्तर-पश्चिमी किनारे पर यह नगरी न केवल रेगिस्तानी तपिश को अपनी छाया से ठंडक देती है, बल्कि देश भर में फैले सांप्रदायिक बिखराव की आंधियों में भी एक शांत द्वीप सा अटल खडी नजर आती है। नगर को बसाने आए पूर्वजों द्वारा यहां की मिट्टी में बोए गए भाईचारे के बीज इतने गहरे हैं कि सदियों की धूप और तूफानों ने इसे मतबूत और हरा-भरा कर दिया।

कल्पना कीजिए एक विशाल रेगिस्तान, जहां पानी की बूंद भी अमूल्य है, और उसी में राव जोधा के पुत्र राव बीका और उनके चाचा राव कांधल ने एक सपना देखा। गोदारों की छोटी-सी बस्ती को उन्होंने शहर का रूप दिया। 1488 ईस्वी के आसपास जब बीकानेर की नींव पड़ी, तब उसमें सांप्रदायिक सद्भाव के बीज भी बो दिए गए। राजपूत वीरों की तलवार के साथ ही प्रेम और भाईचारे की मिट्टी मिलाई गई। आज जब हम इस शहर को देखते हैं, तो लगता है मानो कोई कवि ने रेत पर गजल लिखी हो:

“रेत की आग में भी फूल खिले हैं यहीं,

बीकानेर नाम है, जहां दिल मिले हैं यहीं।

हिंदू-मुस्लिम-जैन सब एक डोर में बंधे,

भाईचारा ऐसा कि दुनिया हैरान खड़ी।”

यह शहर एक घर की तरह है जिसमें कोई मौहल्ला घर का आहता है तो कोई आंगन, कोई घर की कोठरी है तो कोई मौहल्ला ही पूरा घर। घर की रसोई तो हर पाटा है जहां देर रात तक चाय और नमकीन के दौर चलते रहते हैं। शहर का ब्राह्मण मोहल्ला, जैन मोहल्ला, मुस्लिम मोहल्ला सब आपस में ऐसे गुथे हुए हैं जैसे गिलोय की बेल नीम के तने को चारों ओर से लिपट ले और उसे और भी गुणकारी बना दे। कोई हिंदू मोहल्ला अकेला नहीं, कोई मुस्लिम बस्ती अलग-थलग नहीं। सब एक-दूसरे में समाए हुए, एक-दूसरे को सहारा देते हुए।

सुबह की पहली किरण जब शहर पर पड़ती है, तो नागरिक अपने घर से निकलता है। अगर वह नगर सेठ लक्ष्मीनाथ जी के दर्शन के लिए जाता है, तो रास्ते में मुस्लिम भाइयों के घरों के पास से गुजरता है। सलाम का आदान-प्रदान होता है, कोई हिचक नहीं, कोई संकोच नहीं। उसी तरह कोई मुस्लिम भाई जब काम पर जाता है, तो किसी मंदिर के सामने से गुजरना होता है, वह अपने आप को रोक नहीं पाता सर झुक जाता है, मन में शांति का संचार हो जाता है। यह बीकानेर की तासीर है। यहां धर्म अलग-अलग हैं, लेकिन दिल एक हैं।

शहर का हृदय स्थल है कोटगेट, जब कोई नगर नागरिक यहां तक पहुंचता है तो दो पीर के आगे से सजदा किए बगैर नहीं जा पाता और उससे पहले वह आदि गणेष मंदिर के आगे जय गणेष बोल चुका होता है। इसी तरह कोटगेट के पास हाजी बलवान सैयद साहब की दरगाह के आगे भी उसका सर झुकता है और से निकलता है बलवान सैयद साहब की जय हो।  देखकर ऐसा लगता है मानो आकाश से कोई फरिश्ता कह रहा हो:

“एक ही धरती पर दो नाम, एक ही दिल में दो आराधना,

बीकानेर सिखाता है ईश्वर अल्लाह तेरे नाम की साधना।”

सेठ दाऊजी राठी द्वारा बनवाया गया कृष्ण मंदिर वैष्णव हिंदुओं का प्रमुख केंद्र है, लेकिन उसके आस-पास मुस्लिम परिवार और गोस्वामी मोहल्ला बसा हुआ है। यह मोहल्ला शहर की सांप्रदायिक बसावट का बेजोड़ नमूना है। मंदिर में घंटियां बजती हैं, और पड़ोस में अजान की ध्वनि गूंजती है। दोनों सुर मिलकर एक राग बनाते हैं। कोई टकराव नहीं, केवल सामंजस्य।

भांडाशाह जैन मंदिर नगर सेठ लक्ष्मीनाथ जी के मंदिर के पास ही है। हिंदू श्रद्धालु यहां भी दर्शन करते हैं। मोहता चैक में मरुनायक मंदिर से सटा जैन उपासरा है। लक्ष्मीनाथ जी के मंदिर के आस-पास अन्य जैन मंदिर भी हैं, जहां हिंदू भक्त बिना किसी भेदभाव के जाते हैं। जैन समुदाय यहां होली और दीपावली मनाता है ठीक वैसे ही जैसे कोई हिंदू परिवार। उनके घरों में भगवान राम और कृष्ण की तस्वीरें सजी रहती हैं। जैन भाई हिंदू त्योहारों में शामिल होते हैं, और हिंदू जैन परंपराओं का सम्मान करते हैं। यह साझापन शब्दों से परे है, यह अनुभव है, अहसास है।

पुराने शहर के रहवासी  जब अपने काम पर निकलते हैं, तो उन्हें मोहल्ला चूनगरान से होकर निकलना पड़ता है। यहां मुस्लिम परिवार रहते हैं, लेकिन कोई भय नहीं, कोई दूरी नहीं। हिंदू भाई बेझिझक गुजरते हैं। कहने का तात्पर्य यही है कि मोहल्ले आपस में ऐसे गुथे हैं जैसे कोई परिवार के सदस्य। ब्राह्मण मोहल्ला जैन मोहल्ले से लगा, मुस्लिम मोहल्ला हिंदू बस्ती से सटा, सब एक सूत्र में पिरोए हुए।

मंदिरों में चढ़ने वाले पुष्पों के अधिकांश विक्रेता मुस्लिम भाई होते हैं। वे फूल चुनते हैं, माला गूंथते हैं, और मंदिरों तक पहुंचाते हैं। पूजा में प्रयुक्त रुई और बत्तियां भी मुस्लिम समुदाय के लोग तैयार करते हैं। मंदिर की घंटी बजती है, और उसी हाथों से बनी बत्ती जलती है, यह दृश्य बीकानेर की आत्मा है। उस्ता कलाकारों ने, जो मुख्यतः मुस्लिम समुदाय से हैं, मंदिरों को अपनी श्रद्धा से सजाया है। जूनागढ़ किले के अनूप महल, फूल महल, चंद्र महल में उनकी उस्ता कला चमकती है, सोने की पन्नी, फूल-पत्तियां, पक्षी और जानवरों के नक्काशीदार काम। यही कला भांडाशाह जैन मंदिर, रामपुरिया हवेलियों और अन्य मंदिरों-मस्जिदों में भी दिखती है। हिंदू मंदिरों को मुस्लिम उस्तादों ने सजाया, और मुस्लिम दरगाहों में हिंदू शिल्पकारों का योगदान रहा। कारीगर हिंदू-मुस्लिम दोनों थे, और उन्होंने एक साथ इमारतों को इंद्रधनुषी बना दिया।

“उस्ता की कलम ने लिखी है प्रेम की कहानी,

सोने की पन्नी पर, दिलों की निशानी।

मंदिर हो या मस्जिद, हवेली हो या किला,

सबमें एक रंग, एक ही पहचान मिली।”

जब शहर में कोई घर बनता है तो राजपुरोहित, माली समाज, कुम्हार समाज के साथ मुस्लिम भाई भी हाथ बंटाते हैं। नए घर बनते हैं तो सब मिलकर काम करते हैं, कोई ईंट उठाता है, कोई प्लास्टर करता है, कोई मिट्टी गूंथता है। सामूहिक मेहनत, सामूहिक खुशी और उससे बनता है एक घर जिसमें है प्रेम।

 पूर्वजों ने इस शहर के निर्माण में शरीर ही नहीं, आत्मा भी डाल दी थी। यही कारण है कि बीकानेर की संस्कृति साझी संस्कृति बनी रही। यहां के लोग त्योहारों को साथ मनाते हैं। ईद पर हिंदू भाई मुसलमानों को मिठाई पहुंचाते हैं, गणगौर या होली पर मुस्लिम भाई शामिल होते हैं। दीपावली की रोशनी में जैन घर भी जगमगाते हैं। 

बीकानेर के लोग कहते हैं कि इस शहर ने घोर सांप्रदायिक बिखराव को कभी अपने में जगह नहीं दी। जब देश में तूफान उठे, यहां शांति रही। क्योंकि यहां का ताना-बाना ऐसा बुना गया कि अलगाव की कोई सिलाई नहीं फटती। हर मोहल्ला एक कमरा है, हर परिवार एक सदस्य। यह सद्भाव केवल दिखावा नहीं है बल्कि यह दिल में बसा अफसाना है, यह प्रेम गीत है जो शहर गुनगुनाता है, जीवन का अंग है। बच्चों को बचपन से सिखाया जाता है: सब भाई हैं, सब एक परिवार। अंत में कहना चाहूंगा: बीकानेर सिर्फ एक शहर नहीं, एक संदेश है। संदेश यह कि भाईचारा संभव है। प्रेम संभव है। रेगिस्तान में भी फूल खिल सकते हैं। अगर पूरा देश बीकानेर जैसा हो जाए, तो क्या बात हो।

“काश हर शहर बीकानेर बन जाए,

जहां दिल मिलें, जहां झगड़े मिट जाएं।

हिंदू मुस्लिम जैन एक परिवार बनें,

सद्भाव का गुलशन हर कोने में खिल जाए।”

बीकानेर आइए, इस शहर को महसूस कीजिए। यहां की हवा में भाईचारे की खुशबू है। यहां की मिट्टी में प्रेम का रस है। यह शहर हमें सिखाता है, एक होकर जीना, साथ होकर बढ़ना। थार की रेत में यह हरा-भरा बगीचा सदियों से हमें प्रेरित कर रहा है।

- श्याम नारायण रंगा  "अभिमन्यु"


मेरा यह आलेख साप्ताहिक राजसूय समाचार पत्र के एक अंक में छपा था

टूटते परिवार बिखरते रिश्ते

- Wednesday, October 16, 2024 No Comments

 टूटते परिवार बिखरते रिश्ते 

बिखरते परिवार टूटते रिश्ते 

लाचार परिवार बेबस रिश्ते 

बेबस परिवार लाचार रिश्ते 

रिसते परिवार सीलते रिश्ते 

अनजाने परिवार मनमाने रिश्ते

सुलगते परिवार अंगारते रिश्ते 

बीमार परिवार रोगी रिश्ते 

घबराते परिवार डरते रिश्ते

सकुचाते परिवार सिमटते रिश्ते

स्व होते परिवार स्वाहा होते रिश्ते

घर होते परिवार बन्द होते रिश्ते

ऑफलाइन परिवार आनलाइन रिश्ते

आभाषी परिवार आभाषी रिश्ते 

सम्मानित परिवार अपमानित रिश्ते 

बड़े बड़े परिवार छोटे होते रिश्ते

मुक्त होते परिवार रिक्त होते रिश्ते

ऐसे कैसे परिवार कैसे ऐसे रिश्ते 

बचा लो परिवार निभा लो रिश्ते 

जोड़ो परिवार जोड़ो रिश्ते

आपके परिवार मेरे परिवार 

आपके रिश्ते मेरे रिश्ते


Shyam Narayan Ranga

श्याम नारायण रंगा

कौन करेगा पंचायती, गोविंद या अर्जुन

- Monday, May 13, 2024 No Comments


भारत में वर्तमान में देश की सबसे बडी पंचायत के लिए चुनाव हो रहे हैं। विभिन्न चरणों में हो रहे इस चुनाव में कांग्रेस बीजेपी सहित समस्त राष्ट्रीय व क्षेत्रीय राजनैतिक दल पूरे जोश खरोश व ताकत के साथ मैदान में है। बीकानेर में भी यह चुनाव प्रथम चरण में ही सम्पन्न हो चुका है। कांग्रेस ने अशोक गहलोत सरकार के केबिनेट मंत्री रहे गोेविंद मेघवाल को मैदान में उतारा वहीं बीजेपी ने केन्द्रीय मंत्री और तीन बार  बीकानेर से सांसद रहे अर्जुनराम मेघवाल पर ही दाव खेला। चूंकि दोनों ही अपने अपने क्षेत्र के कददावर राजनेता माने जाते हैं इसलिए चुनावी मुकाबला भी आसान नहीं था। बीजेपी कांग्रेस संगठन सहित दोनों उम्मीदवारों ने भी पूरी ताकत के साथ यह चुनाव लडा। खास बात यह रही कि कांग्रेस का संगठन भी इस चुनाव में पूरी मेहनत करता नजर आया। जहां भाजपा को केडरबेस पार्टी माना जाता है और भाजपा के लिए यह खास बात नहीं होती कि संगठन पूरी तरह मैदान में उतरे वहीं कांग्रेस जैसे मासबेस संगठन ने भी इस बात एक मंच पर आकर पूरी अपनी उपस्थिति दर्ज ही नहीं कराई वरन पूरी शिद्दत से काम भी किया। कांग्रेस के प्रदेश स्तर के बडे नेता बीडी कल्ला अपने क्षेत्र में अपनी टीम के साथ गली गली घूमते नजर आए और पश्चिम बीकानेर में एक कार्यालय खोलकर वहां से चुनाव संचालित किया। इसी तरह गहलोत सरकार में केबिनेट मंत्री रहे भंवरसिंह भाटी ने भी पूरी मेहनत के साथ चुनाव में काम किया। लूणकरणसर के बडे लीडर वीरेन्द्र बेनीवाल को राजी किया गया और इसी तरह मंगलाराम गोदारा, बडे जाटनेता रामेश्वर डूडी की पत्नी विधायक सुशीला डूडी और उनकी टीम भी मैदान में पसीना निकालती नजर आई। अनूपगढ विधायक शिमला नायक भी पूरे उत्साह के साथ चुनाव में काम कर रही थी। पार्टी के शहर अध्यक्ष यशपाल गहलोत व देहात अध्यक्ष विशनाराम भी दिनरात मेहनत में जुटे थे। उधर बीजेपी में अगर गौर किया जाए तो अर्जुनराम मेघवाल खुद केन्द्र में मंत्री है तो उनके साथ उनकी टीम ने पूरी ताकत चुनाव में झोंक रखी थी। शहरी क्षेत्र में सत्यप्रकाश आचार्य और उनकी टीम ने कमान संभाल रखी थी। जहां भाजपा संगठन फील्ड में काम कर रहा था वहीं क्षेत्र के विधायक ज्यादा सक्रिय नजर नहीं आए। लोकसभा क्षेत्र के बीजेपी के कुछ विधायक तो खानापूर्ति करते ही नजर आ रहे थे। पर परम्परा की तरह भाजपा का संगठन आरएसएस के साथ पूरी ताकत से लगा हुआ था। चुनाव विशलेषकों का मानना है कि बीकानेर लोकसभा क्षेत्र में किसी समय जो हालत कांग्रेस की थी वर्तमान चुनाव में वो हालत भाजपा की नजर आई। फिर भी गोविंद मेघवाल और अर्जुनराम मेघवाल ने चुनाव को रोचक बनाकर रखा और आज तक वोटर यह बता नहीं पा रहा है कि चुनाव जितेगा कौन। 

बीकानेर के चौक, गलियों, मौहल्लों और पाटों पर आजकल यह चर्चा आम नजर आती है कि लोग एक दूसरे से पूछते हैं कि आखिर जितेगा कौन। पाटे पर चर्चा करने वाले लोगों की राय है कि अर्जुनराम मेघवाल के पास अपना काम गिनाने के लिए भले ही कुछ खास न था और न ही केन्द्रीय मंत्री होने के नाते वो कोई बडा काम बीकानेर में करवा सके बावजूद इसके मोदी के नाम पर और राम मंदिर के नाम पर भाजपा ने यह चुनाव शानदार लडा है।वहीं कुछ लोगों की राय है कि गोविंद मेघवाल बडबोले हैं और जातिगत टिप्पणियों के कारण हमेशा चर्चा में रहे और इसी कारण खाजूवाला में उनकी हार हुई लेकिन फिर भरी क्षेत्र के मतदाता ने गोविंद मेघवाल को गंभीरता से लिया और ऐसी छोटी मोटी बातों को नजरअंदाज भी किया है। गोविंद मेघवाल अपनी टिप्पणीयों के कारण आमजन से माफी भी मांगते घूम रहे थे और अर्जुनराम मेघवाल जयश्रीराम के नारे के साथ मोदी की गारंटी की चर्चा पूरे चुनाव में करते रहे। चुनाव में पिछले चुनाव के मुकाबले वोटों की कम कास्टिंग को एक वर्ग  लोग कांग्रेस लिए अच्छा मान रहा है तो एक वर्ग कम कास्टिंग को अर्जुनराम मेघवाल के जीत के अंतर को कम करने की दृष्टि से भी देख  रहा है। उम्मीदवारों से बात करने पर यह साफ होता है कि अर्जुनराम मेघवाल शहरी मतदाताओं को लेकर आशान्वित है तो गांविंदराम मेघवाल ग्रामीण मतदाताओं को लेकर उत्साह में नजर आते हैं। चुनावी पंडितों का भी मानना है कि बीकानेर पूर्व व पश्चिम शहरी मतदाता मोदी की गारंटी पर बटन दबाकर आए हैं, ऐसा लगता है  और ग्रामीण मतदाता ने कांग्रेस की न्याय सहित अन्य गारंटियों पर विश्वास जताया है। अब परिणाम का उंट किस करवट बैठता है यह तो चार जून को ही पता लगेगा पर यह जरूर है कि दोनों की पार्टीयां और उनके समर्थक सकारात्मक है। यह तो सब जगह चर्चा है कि टक्कर एकतरफा नजर नहीं आ रही थी, टक्कर जोरदार रही। अब देखना यह है कि बीकानेर से देश की सबसे बडी पंचायत में किसे पंचायती करने का अधिकार मिलता है।


Shyam Narayan Ranga

जैसा था पहले वैसा नहीं है अब बीकानेर

- Thursday, May 9, 2024 1 Comment


एक समय था जब पश्चिमी राजस्थान के सूदूर रेगिस्तान में बसा बीकानेर शहर अपनी सरलता, सहजता, सौम्यता और संस्कृति के कारण पूरे देश में विशिष्ट स्थान रखता था। बीकानेर का नाम आते ही सभी के दिल में पाटों पर बसा, रेगिस्तान में फैला, सर्दियों में भयंकर ठंड के साथ कोहरे की चादर लपेटे और गर्मियों में जबरदस्त लू के थपेडों के साथ धूल भरी आधियों की छवि सामने आती थी। साथ ही तस्वीर बनती थी ऐसे शहर की जो होली के रंगों से सरोबार है और गणगौर के गीत गा रहा है। ऐसा शहर जहां जैन समाज के महान संतों ने अपनी वाणी सुनाई और जहां मुस्लिम समाज ने साथ बैठकर दिपावली मनाई। बीकानेर से बाहर रहने वाले प्रवासी अपने शहर बीकानेर में घी, दूध, दही छाछ पीने आते थे । जब प्रवासी बीकानेरी अपनी कर्मभूमि  पर बीमार हो जाता तो वहां उसको सलाह दी जाती थी कि आप अपने शहर बीकानेर चले जाईए और स्वस्थ हवा पानी लिजिए। अपणायत की संस्कृति के साथ सबको अपने में समेटे ये शहर सबका स्वागत करता था और जहां चैन था, सूूकून था, शांति थी। अपराध नाममात्र का था। एक ऐसा शहर जहां लोग सुरक्षित थे और ऐसा कहा जाता था कि अगर देर रात्रि में भी कोई औरत गहनों से लदी हुई अकेली अपने घर जा रही है तो वो अपनी सुरक्षा को लेकर निश्चिंत है। जहां अनजान व्यक्ति को देखकर पाटों पर बैठे लोग आवाज देकर पूछते थे कि भाई कौन हो, किसका पूछ रहे हो। यह सामाजिक मोनिटरिंग बीकानेर की धरोहर थी और किसी की हिम्मत नहीं थी कि वो कोई गैर कानूनी हरकत कर सके। परंतु समय की करवट जब बदली तो उसका असर बीकानेर पर  भी पडा। आज बीकानेर वैसा नहीं रहा जैसा हुआ करता था। आज बीकानेर वो ही है, पाटे  वो ही है, त्यौंहार वैसे ही आते है  लेकिन जो रंगत जो रौनक और जो अपनायत थी उसका अभाव साफ देखने को मिलता है। स्व की कोटर में कैद होता शहरवासी रोकने टोकने की आदत छोड चुका है। सामाजिक मोनिटरिंग के अभाव ने अपराधों को बढावा दिया है। आज आमजन के मन में यह बात घर कर गई है कि हम क्यों किसी को कुछ कहें, टूटते परिवारों में साझा चूल्हे की विरासत को नष्ट कर दिया है और संबंध दरकते नजर आते हैं। आज घर का  बुजुर्ग भी अपने ही घर के युवा को टोकने से डरता है। बुजुर्ग का ये सोचना है कि अगर सामने बोल गया तो मेरी बची खुची इज्जत भी जाती रहेगी। नशे जैसी जानलेवा बीमारी ने अपने पांव पसार लिए हैं। क्रिकेट के सट्टे ने गली गली में नए व्यवसायी पैदा कर दिए हैं। साम्प्रदायिक सौहार्द भी दरकता नजर आता है। पिछले दशक में कईं बार साम्प्रदायिक सौहार्द पर चोट होती नजर आई। मगर साम्प्रदायिक सौहार्द को कहीं न कहीं आज भी बचाकर रखा गया है। उत्तेजना के पल कईं बार आते हैं परंतु लगभग साढ़े पांच शताब्दी की विरासत भारी पडती है। जुए की लत ने युवाओं को दिशाहीन किया है। अनचाहे ब्याज का धंधा कईं जीवन लील चुका है। कहा जाता था कि बीकानेर में पीने का पानी कुओं से निकाला जाता था इसलिए गहरा पानी पीने वाले लोगों की सोच भी गहरी होती थी और उनका जीवन संजीदा होता था परंतु नहरी सतही पानी पीने वाले लोग अब गहरी सोच के नहीं रहे। नहर के गंदे पानी ने विचार को भी दूषित किया है। नित होती चैन स्नेचिंग, लूटपाट, चोरी आदि की घटनाओं ने आमजन में असुरक्षा की भावना बनाई है। खाने पीने में मिलावट खुलेआम जारी है। आए दिन सरकारी अमला मिलावट और जमाखोरी को पकडता है। मिलावट करने वाले लोग भीतर छुपे ऐसे आतंकवादी हैं जो इस शहर की मूल संस्कृति को खराब कर रहे हैं। आज कोलकत्ता, मुम्बई सहित प्रवासी बीकानेरी यह बात खुलेआम कहता नजर आता है कि आज बीकानेर के दूध दही घी छाछ में पहले जैसी बात बिलकुल भी नहीं रही है। त्यौंहारों की चमक और रौनक भी पहले जैसी बिलकुल नहीं रही है। किसी समय अक्षय तृतीया और अक्षय द्वितीया पर महीने महीने भर पतंग उडाने वाला शहर आज त्यौंहार के दिन भी उस उत्साह में नजर नहीं आता है। होली की रौनक में पिछले दो दशकों से खासा फीकापन आया है। दिपावली तो ऐसे लगता है जैसे   दिखावे का ही त्यौंहार रह गया है। शादी विवाह में  भी परम्पराओं का स्थान आधुनिकता ने ले लिया है। बढ चढ कर खर्चा करना इस मितव्वययी शहर में रच बस सा गया है। धार्मिक स्तर पर भी एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृति बढी ही है। कुल मिलाकर जैसा था वैसा नहीं रहा मेरा शहर। आज स्थापना दिवस पर एक बार इस विषय पर जरूर सोचें और मनन चिंतन करें कि हम लगभग साढे पांच सौ साल की विशाल व समृद्ध परम्परा को कैसे अक्षुण बनाए रखें और शहर के प्रति सच्चा प्रेम ये ही होगा कि कि हम सब जी जान से प्रयास करें कि बीकानेर को बीकानेर रहने दें। जय जय बीकाणा।

श्याम नारायण रंगा