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- Monday, October 26, 2026 No Comments

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बीकानेर की मेयर कुर्सी पर सियासी संग्राम, 21 सितंबर को होगा शक्ति परीक्षण

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बीकानेर नगर निगम की नई सरकार का चेहरा 21 सितंबर को तय होगा। महापौर पद के लिए कांग्रेस के अनिल कल्ला और भाजपा के डॉ. सुरेंद्र सिंह शेखावत आमने-सामने हैं। 80 सदस्यीय निगम में कांग्रेस 42 पार्षदों के साथ 41 के बहुमत आंकड़े से एक कदम आगे है, जबकि भाजपा के 27 पार्षद हैं। 10 निर्दलीय और एक आरएलपी पार्षद भी राजनीतिक समीकरण का हिस्सा हैं।

अनिल कल्ला की राजनीतिक ताकत केवल पार्षदों की संख्या तक सीमित नहीं है। वे लंबे समय से कांग्रेस संगठन से जुड़े रहे हैं और बी.डी. कल्ला परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं। युवा वर्ग में उनकी सक्रियता तथा राजीव यूथ क्लब के माध्यम से सामाजिक गतिविधियों ने उनकी अलग पहचान बनाई है। हालांकि महापौर का चुनाव उनके लिए राजनीतिक जीवन की पहली प्रत्यक्ष चुनावी परीक्षा भी है।

भाजपा के डॉ. सुरेंद्र सिंह शेखावत भी युवा और अपेक्षाकृत नए चेहरे के रूप में मैदान में हैं। विधानसभा चुनाव में दावेदारी कर चुके शेखावत की छवि गंभीर और संगठन से जुड़े युवा नेता की रही है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती संख्या के अंतर को राजनीतिक समर्थन में बदलने की है।

दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस के भीतर उठी चुनौती भी चुनाव को अंतिम समय तक रोचक बनाए रही। कांग्रेस पार्षद नवरतन डागा ने स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल किया था, लेकिन 18 सितंबर को नाम वापस लेने के बाद अब मुकाबला सीधा हो गया है।

कागज पर संख्या कांग्रेस के पक्ष में है, लेकिन महापौर चुनाव केवल गणित नहीं, राजनीतिक प्रबंधन, पार्षदों की एकजुटता और अंतिम क्षण की रणनीति का भी परीक्षण है। भाजपा अंतरात्मा की आवाज और क्रॉस-वोटिंग की संभावना के जरिए समीकरण बदलने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस के लिए चुनौती अपने स्पष्ट बहुमत को मतदान के दिन सुरक्षित रखना है।

अब निगाहें 21 सितंबर पर हैं। उस दिन तय होगा कि पार्षदों का गणित किस दिशा में जाता है और बीकानेर की सियासी ऊंट किस करवट बैठता है।

लोकतंत्र के पर्व में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करें

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लोकतंत्र के पर्व में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करें

बीकानेर में नगर निगम के आज चुनाव है। शहर के 80 वार्डों में पार्षद चुनने के लिए 300 से अधिक प्रत्याशी मैदान में हैं। यह केवल चुनाव नहीं, बल्कि शहर की स्थानीय सरकार के निर्माण का अवसर है। लोकतंत्र का यह पर्व तभी सार्थक होगा, जब बीकानेर का प्रत्येक मतदाता इसमें अपनी सक्रिय भागीदारी निभाएगा।

नगर निगम हमारे दैनिक जीवन से सीधे जुड़ी हुई स्थानीय सरकार है। सड़क, सफाई, नाली, रोशनी, पार्क, सार्वजनिक सुविधाएं और शहर के विकास से जुड़े अनेक कार्य नगर निगम के माध्यम से संचालित होते हैं। इसलिए हमारा एक-एक मत केवल किसी प्रत्याशी के पक्ष में दिया गया वोट नहीं है, बल्कि यह आने वाले वर्षों में अपने शहर की दिशा और दशा तय करने का माध्यम है।

चुनाव में प्रत्याशी अनेक हैं, लेकिन चुनना केवल एक को है। ऐसे में मतदाता को किसी दबाव, प्रलोभन, जाति, रिश्तेदारी, व्यक्तिगत आग्रह अथवा भावनात्मक प्रभाव में आने के बजाय प्रत्याशी के व्यक्तित्व, कार्यक्षमता, ईमानदारी, उपलब्धता और अपने वार्ड के प्रति उसकी सोच को ध्यान में रखकर मतदान करना चाहिए।

लोकतंत्र में अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। मतदान करना हमारा संवैधानिक अधिकार है, लेकिन उससे भी बढ़कर यह हमारा नागरिक दायित्व भी है। यदि हम मतदान नहीं करते तो स्थानीय सरकार के निर्माण में अपनी हिस्सेदारी स्वयं ही कम कर देते हैं।

तो इस बार बीकानेर नगर निगम चुनाव को केवल राजनीतिक गतिविधि न मानकर लोकतंत्र के उत्सव के रूप में मनाएं। परिवार, मित्रों और आसपास के लोगों को भी मतदान के लिए प्रेरित करें। आपका एक वोट आपके वार्ड की आवाज है और आपके शहर के भविष्य की नींव है।

इस लोकतांत्रिक पर्व का हिस्सा बनें, मतदान अवश्य करें और बीकानेर की स्थानीय सरकार के निर्माण में अपनी महती भूमिका निभाकर अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करें।


श्याम नारायण रंगा


यह आलेख न्यूज कास्ट समाचार पत्र में 2026 के नगर निगम चुनावों के दौरान छपा था।

दावेदारी का डिजिटल दंगल

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बीकानेर नगर निगम के चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन चुनावी मौसम की आहट सोशल मीडिया पर इतनी तेज सुनाई देने लगी है कि लगता है मतदान की तारीख घोषित हो चुकी है और मतदाता घर से निकलने ही वाला है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों दलों में टिकट के दावेदारों की ऐसी बाढ़ आई हुई है कि सोशल मीडिया खोलते ही लगता है मानो नगर निगम का चुनाव नहीं, ‘दावेदार सम्मेलन’ चल रहा हो।

कभी जमाना था जब टिकट की दावेदारी का मतलब होता था मोहल्ले के नुक्कड़ पर बैनर, चौक पर पोस्टर, दीवारों पर नारे और चौराहे पर बड़े-बड़े होर्डिंग। पोस्टर छपवाने में पैसा लगता था, बैनर लगाने के लिए कार्यकर्ता चाहिए होते थे और प्रचार के लिए कम से कम इतना जनसंपर्क तो करना पड़ता था कि लोग पहचान सकें कि दावेदार आखिर है कौन!

अब जमाना बदल गया है। हाथ में मोबाइल हो, कोई सा भी डिजाइनिंग ऐप हो और दो मिनट का खाली समय हो—बस बन जाइए संभावित पार्षद!

पहले पोस्टर छपवाने के लिए प्रिंटिंग प्रेस जाना पड़ता था, अब मोबाइल ही प्रेस है, मोबाइल ही डिजाइनर है और मोबाइल ही प्रचार कार्यालय। फोटो लगाइए, ऊपर पार्टी का झंडा लगाइए, नीचे लिखिए “जनता की सेवा के लिए सदैव तत्पर”, बीच में दो-चार नेताओं के फोटो चिपकाइए और अंत में लिख दीजिए “वार्ड नंबर फलां से अमुक पार्टी के या निर्दलीय प्रबल दावेदार।”

पोस्टर तैयार!

फिर उसे फेसबुक, व्हाट्सऐप और इंस्टाग्राम पर डालते ही दावेदारी का उद्घाटन हो जाता है।

न पैसा लगा, न प्रेस गया, न कार्यकर्ता बुलाए और न ही मोहल्ले में किसी से पूछा कि भाई साहब, आप हमें जानते भी हैं या नहीं!

सबसे मजेदार बात यह है कि अब दावेदारों की संख्या देखकर पार्टी के बड़े नेता भी कभी-कभी सोचते होंगे कि आखिर टिकट किसे दें? वार्ड में जितने मतदाता हैं उसके अनुपात में दावेदार ज्यादा दिखाई दे रहे हैं।

और इस डिजिटल दावेदारी में एक नई प्रजाति भी सामने आई है ‘मजाकिया दावेदार।’

ये वे महानुभाव हैं जिनके बारे में उनके पड़ोसी तक यह नहीं सोच सकते कि ये कभी चुनाव लड़ने की सोचेंगे। न कोई राजनीतिक गतिविधि, न पार्टी की बैठक में उपस्थिति, न सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रियता और न ही जनता से कोई विशेष संपर्क। लेकिन एक दिन अचानक मोबाइल पर उनका पोस्टर प्रकट होता है—

“वार्ड नंबर अमुक से प्रत्याशी के रूप में मेरी दावेदारी।”

पोस्टर देखकर गंभीर दावेदार के पैरों तले जमीन खिसक जाती है।

वह तुरंत फोन करता है—

“भाई साहब! आपने भी टिकट मांग लिया?”

उधर से जवाब आता है—

“अरे नहीं यार, ऐसे ही बना दिया था!”

“लेकिन पोस्टर तो लगा दिया!”

“अरे मोबाइल में ऐप पड़ा था। सोचा देखूं कैसा लगता हूं पार्षद बनकर!”

यानी अब राजनीति में ‘ट्रायल वर्जन’ भी आ गया है।

पहले चुनाव लड़ने के लिए आदमी वर्षों तक राजनीति करता था। अब आदमी पहले पोस्टर बनाता है, फिर सोचता है कि चुनाव लड़ना है या नहीं।

गंभीर दावेदार की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वह महीनों से पार्टी के नेताओं के चक्कर काट रहा है, कार्यकर्ताओं से संपर्क कर रहा है, वार्ड में लोगों से मिल रहा है और टिकट की उम्मीद लगाए बैठा है। तभी कोई मोबाइलवीर भाई साहब एक पोस्टर बनाकर उसे सोशल मीडिया पर डाल देता है।

गंभीर दावेदार पूछता है—

“आपकी दावेदारी किस आधार पर है?”

जवाब मिलता है—

“भाई, पोस्टर तो अच्छा बना है ना?”

बस! यही आज की डिजिटल राजनीति का सबसे बड़ा आधार है।

अब दावेदारी में जनाधार बाद में और फोटो का बैकग्राउंड पहले देखा जा रहा है। जिस फोटो में चेहरा ज्यादा चमकदार आए, उसी की दावेदारी ज्यादा मजबूत समझी जा रही है।

कुछ दावेदार तो इतने सक्रिय हैं कि सुबह किसी महापुरुष की जयंती पर पोस्टर, दोपहर में किसी सामाजिक कार्यक्रम का पोस्टर और शाम को टिकट की दावेदारी का पोस्टर। रात तक वही व्यक्ति “जनसेवक”, “समाजसेवी”, “युवा नेता”, “वरिष्ठ कार्यकर्ता” और “प्रबल दावेदार” चारों पदों पर आसीन हो चुका होता है।

डिजिटल युग की सबसे बड़ी सुविधा यह है कि दावेदारी की कोई सीमा नहीं है।

एक ही व्यक्ति दो वार्डों से दावेदारी कर सकता है। एक ही परिवार के चार लोग अलग-अलग वार्डों से दावेदारी कर सकते हैं। पति-पत्नी दोनों दावेदार हो सकते हैं और कभी-कभी तो पूरा परिवार ही टिकट की दौड़ में शामिल दिखाई देता है।

और सबसे बड़ी बात दावेदारी करने के लिए किसी से अनुमति लेने की जरूरत नहीं।

न पार्टी ने पूछा, न वार्ड ने पूछा, न कार्यकर्ताओं ने पूछा।

बस मोबाइल से कहा “Create Poster”

और दावेदार ने सोचा “Create Future!”

अब सोशल मीडिया पर दावेदारों की संख्या देखकर लगता है कि टिकट की घोषणा होते-होते कई वार्डों में दो ही लोग बचेंगे—एक टिकट पाने वाला और दूसरा वह, जिसने टिकट नहीं मिलने पर सोशल मीडिया पर लिखा होगा—

“पार्टी का फैसला शिरोधार्य है, लेकिन कार्यकर्ताओं की भावनाओं की अनदेखी हुई है।”

और उसके अगले दिन एक नया पोस्टर आएगा

“जनता के आग्रह पर निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला।”

यह डिजिटल दावेदारी केवल हास्यास्पद नहीं, लोकतंत्र की बदलती शैली का भी संकेत है। सोशल मीडिया ने राजनीति को आम आदमी के लिए आसान जरूर बनाया है, लेकिन उसने गंभीर और मजाक के बीच की रेखा भी बहुत पतली कर दी है।

अब असली परीक्षा पोस्टर बनाने की नहीं, पोस्टर के पीछे खड़े जनाधार की होगी।

क्योंकि ऐप से फोटो बड़ी की जा सकती है, नाम को मोटे अक्षरों में लिखा जा सकता है, पीछे हजारों लोगों की भीड़ भी लगाई जा सकती है—लेकिन वोटर की उंगली पर लगने वाली स्याही किसी ऐप से नहीं बनती।

चुनाव में अंततः वही जीतेगा, जिसके पोस्टर से ज्यादा उसके साथ लोग खड़े होंगे।

फिलहाल तो बीकानेर में डिजिटल दावेदारों का मौसम है। हर मोबाइल में नेता है, हर ऐप में पार्षद है और हर व्हाट्सऐप स्टेटस में भावी जनप्रतिनिधि!

कहना गलत नहीं होगा कि आने वाले दिनों में शायद टिकट के आवेदन के साथ पार्टी को एक और दस्तावेज मांगना पड़े, “कृपया अपनी दावेदारी के साथ यह भी प्रमाणित करें कि पोस्टर आपने मजाक में नहीं बनाया है।”

क्योंकि बीकानेर की चुनावी राजनीति में अब सवाल यह नहीं है कि “कौन चुनाव लड़ना चाहता है?”

सवाल यह है कि

“कौन सचमुच लड़ना चाहता है और कौन सिर्फ मोबाइल ऐप में पार्षद बनकर खुश है?”

फिलहाल चुनावी मैदान तैयार होने से पहले ही सोशल मीडिया का मैदान पूरी तरह सज चुका है।

पोस्टर लग रहे हैं, शुभकामनाएं मिल रही हैं, फूल बरस रहे हैं और दावेदार बढ़ रहे हैं।

अब देखना सिर्फ इतना है कि मोबाइल के पोस्टर से निकला नेता मतदान केंद्र तक कितने वोटर पहुंचा पाता है!


श्याम नारायण रंगा


यह आलेख न्यूज कास्ट समाचार पत्र में 2026 के नगर निगम चुनावों के दौरान छपा था।

दिल के अरमां आंसुओं में बह गए

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नगर निगम चुनाव की घोषणा से पहले बीकानेर में मेयर पद के दावेदारों की कमी नहीं थी। कांग्रेस हो या बीजेपी, दोनों ही दलों में कई नेता खुद को भावी मेयर के रूप में देखने लगे थे। लेकिन जैसे ही मेयर पद और वार्डों की आरक्षण लॉटरी निकली, कई दावेदारों के राजनीतिक अरमानों पर पानी फिर गया—और उनके दिल के अरमां आंसुओं में बह गए।


बीकानेर नगर निगम में मेयर का पद सामान्य वर्ग के लिए अनारक्षित रहा है। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि दोनों प्रमुख दल अब सामान्य वर्ग के किसी नेता को ही मेयर पद के लिए आगे कर सकते हैं। ऐसे में ओबीसी और अनुसूचित जाति वर्ग से आने वाले वे नेता, जो अब तक मेयर पद की दावेदारी ठोक रहे थे, अचानक असहज नजर आने लगे हैं।


हालांकि उनमें से कुछ नेता यह तर्क देते जरूर सुनाई दे रहे हैं कि अनारक्षित का मतलब ओपन फॉर ऑल है और कोई भी चुनाव लड़ सकता है, लेकिन अंदरखाने वे भी जानते हैं कि राजनीतिक समीकरण अब सामान्य वर्ग के दावेदारों के पक्ष में झुक सकते हैं। नतीजतन, कई नेताओं ने फिलहाल मेयर बनने के सपने को किनारे रखकर पार्टी के लिए काम करने की भूमिका स्वीकार कर ली है।


वार्डों की आरक्षण लॉटरी ने भी कई बड़े दावेदारों की गणित बिगाड़ दी। सामान्य वर्ग के कई ऐसे नेता, जो मेयर पद की दौड़ में खुद को मजबूत मान रहे थे, उस समय सकते में आ गए जब उनका अपना वार्ड किसी अन्य वर्ग के लिए आरक्षित हो गया। अब उनके सामने दो ही रास्ते बचे हैं—या तो किसी दूसरे वार्ड से अपनी दावेदारी की संभावनाएं तलाशें, या फिर अपने किसी समर्थक को चुनाव मैदान में उतारकर राजनीतिक पकड़ बनाए रखें।


दोनों ही दलों में इस बार एक बात लगभग तय मानी जा रही है कि टिकट उसी व्यक्ति को मिलेगा, जिसका संबंधित वार्ड में मजबूत आधार और स्थानीय जुड़ाव हो। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष भी साफ कर चुके हैं कि पार्टी इस बार वार्ड के बाहर के व्यक्ति को टिकट देने के पक्ष में नहीं है। ऐसे में उन नेताओं की मुश्किलें और बढ़ गई हैं, जिनका अपना वार्ड आरक्षित हो चुका है और दूसरे वार्ड में उनकी पकड़ सीमित है।


कुल मिलाकर, बीकानेर का यह निकाय चुनाव कुछ नेताओं के लिए सत्ता तक पहुंचने का अवसर जरूर बनेगा, लेकिन कई दावेदारों के लिए यह चुनाव निराशा का सबब भी साबित हो सकता है। टिकट की आस, मेयर बनने का सपना और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की लंबी कतार—आरक्षण की लॉटरी ने कई समीकरण एक झटके में बदल दिए हैं।


अब देखना यह होगा कि जिनके अरमान लॉटरी में बह गए हैं, वे पार्टी के साथ कितनी मजबूती से खड़े रहते हैं और कौन अपने राजनीतिक भविष्य के लिए नया रास्ता तलाशता है।


श्याम नारायण रंगा


यह आलेख न्यूज कास्ट समाचार पत्र में 2026 के नगर निगम चुनावों के दौरान छपा था।

कुछ यादें हैं उन लम्हों की

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कुछ यादें हैं उन लम्हों की .........

जिन लम्हों में हम साथ रहे ......

खुशियों से भरे जज्बात रहे .,.....

इक उम्र गुजारी है हमने....... 

जहां रोते हुए भी हंसते थे..... 

कुछ कहते थे........... 

कुछ सुनते थे...... 

हम रोज जब यहाँ मिलते थे.....

तो सबके चहरे खिलते थे ...........

पुर लुत्फ़ वो मंजर होता था ........

सब मिल कर बातें करते थे ........

हम सोचो कितना हंसते थे ...........

वो गूंज हमारे हंसने की ..........

अब एक पुरानी याद बनी ..........

ये बातें हैं उन लम्हों की .............

जिन लम्हों में हम साथ रहे ..........


(श्याम नारायण रंगा)


मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामना बधाई 🙏🙏🙏

कितने रावण मार दिए, कितने अभी बाकी हैं?

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रावण के पुतले तो हर साल जलते हैं, लेकिन समाज के भीतर जिंदा बुराइयों के रावण आज भी चुनौती बनकर खड़े हैं। हर साल दशहरे पर हम बड़े-बड़े रावण के पुतले जलाते हैं। आतिशबाजी होती है, जयकारे गूंजते हैं और पूरा वातावरण बुराई पर अच्छाई की जीत के उद्घोष से भर जाता है। हम गर्व से कहते हैं कि सत्य की जीत हुई और असत्य का अंत हो गया। लेकिन जब अगले दिन जीवन की वास्तविकताओं से सामना होता है, तो एक सवाल मन में उठता है—आखिर हमने कितने रावण मार दिए और कितने अभी बाकी हैं?

क्या रावण केवल मैदान में खड़ा दस सिरों वाला पुतला है, जिसे आग के हवाले कर देने से बुराई समाप्त हो जाती है? यदि ऐसा होता, तो सदियों से मनाई जा रही विजयादशमी के बाद समाज में अन्याय, शोषण और नफरत का अस्तित्व नहीं होना चाहिए था। सच तो यह है कि रावण के पुतले हर साल जलते हैं, लेकिन उसके प्रतीक अनेक बुराइयां हमारे भीतर और हमारे आसपास आज भी जीवित हैं।

जातिवाद का रावण आज भी इंसान को इंसान से छोटा-बड़ा समझता है। वह जन्म के आधार पर किसी की योग्यता, सम्मान और अधिकार तय करता है। धर्मांधता का रावण आस्था को प्रेम और करुणा का माध्यम बनाने के बजाय नफरत का हथियार बना देता है। धर्म के नाम पर दूसरे धर्मों के प्रति घृणा फैलाने वाले लोग भूल जाते हैं कि किसी भी धर्म की वास्तविक शक्ति मानवता, सद्भाव और सहिष्णुता में होती है।

क्षेत्रवाद का रावण देश को प्रांतों और भाषाओं की संकीर्ण सीमाओं में बांटता है। वह अपने क्षेत्र के व्यक्ति को श्रेष्ठ और दूसरे क्षेत्र के व्यक्ति को पराया मानता है। जबकि भारत की असली पहचान उसकी विविधता में एकता है। इसी तरह सामाजिक असमानता का रावण किसी को संसाधनों और अवसरों के पहाड़ पर बैठाता है, तो किसी को बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करने को मजबूर करता है। जब किसी बच्चे को गरीबी के कारण शिक्षा नहीं मिलती, किसी योग्य युवा को अवसर नहीं मिलता और किसी कमजोर व्यक्ति की आवाज सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंचती, तब समझ लेना चाहिए कि अन्याय का रावण अभी जीवित है।

आज अहंकार का रावण पद, प्रतिष्ठा और सत्ता के मद में इंसान को इंसान समझना भुला देता है। लालच का रावण दूसरों के हक पर कब्जा करने के लिए विवेक और नैतिकता को बेच देता है। भ्रष्टाचार का रावण जनता के धन को निजी संपत्ति समझता है और व्यवस्था की जड़ों को खोखला करता है। रिश्वत लेकर न्याय और सेवाओं को सौदे में बदल देना भी उसी रावण का एक चेहरा है।

अन्याय का रावण कमजोर की आवाज दबाता है, महिलाओं की गरिमा पर चोट करता है और पीड़ित को न्याय के लिए दर-दर भटकाता है। आतंकवाद का रावण निर्दोष लोगों के खून से अपनी विचारधारा की इबारत लिखना चाहता है। नफरत, हिंसा और कट्टरता का हर रूप मानवता के विरुद्ध खड़ा है। इसके अतिरिक्त मिलावटखोरी, जमाखोरी, दहेज प्रथा, नशाखोरी, पर्यावरण विनाश, झूठ, अफवाह, दिखावा और संवेदनहीनता भी ऐसे रावण हैं, जो समाज को भीतर से कमजोर कर रहे हैं।

लेकिन सवाल केवल व्यवस्था या दूसरों की बुराइयों का नहीं है। हमें अपने भीतर भी झांकना होगा। जब हम किसी जरूरतमंद की मदद करने से मुंह मोड़ लेते हैं, किसी के अपमान पर चुप रहते हैं, अपने लाभ के लिए गलत का साथ देते हैं या अपनी गलती स्वीकार करने से इनकार करते हैं, तब हमारे भीतर का रावण मजबूत होता है। दूसरों के पुतले जलाना आसान है, अपने भीतर के अहंकार, लालच और नफरत को जलाना कठिन।

विजयादशमी का वास्तविक संदेश केवल रावण का वध नहीं, बल्कि उन प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करना है, जो मनुष्य को मनुष्य का शत्रु बनाती हैं। रावण दहन तभी सार्थक होगा, जब जाति से ऊपर इंसानियत, धर्मांधता से ऊपर सद्भाव, लालच से ऊपर ईमानदारी और अहंकार से ऊपर विनम्रता को स्थान मिलेगा।

आइए, इस दशहरे पर केवल पुतला जलाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री न करें। अपने भीतर झांकें, अपनी गलतियों को पहचानें और समाज की बुराइयों के विरुद्ध खड़े होने का संकल्प लें।

क्योंकि जब तक किसी गरीब के साथ अन्याय होता रहेगा, किसी निर्दोष के मन में नफरत भरी जाती रहेगी, किसी योग्य व्यक्ति का हक छीना जाता रहेगा और भ्रष्टाचार ईमानदारी पर भारी पड़ता रहेगा, तब तक रावण का अंत अधूरा रहेगा।

इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यही है—कितने रावण मार दिए, कितने अभी बाकी हैं?

और इसका उत्तर हमारे कर्मों में छिपा है। जिस दिन हम अपने भीतर के रावण को मारना सीख जाएंगे और समाज की बुराइयों के विरुद्ध एकजुट हो जाएंगे, उसी दिन विजयादशमी का वास्तविक अर्थ साकार होगा।

रावण का पुतला हर साल जलना चाहिए, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि रावण की सोच का अंत हो। क्योंकि असली विजय मैदान में नहीं, इंसान के विचारों और व्यवहार में होती है।


श्याम नारायण रंगा