Flash

Latest Posts

दिल्ली अब भी होगी वहीं

- Thursday, May 21, 2026 No Comments

दिल्ली अब भी होगी वहीं,

चांदनी चौक की गलियों में वही भीड़ होगी,

वही परांठों की खुशबू, वही शाम की रौनक,

पर मेरे जीवन की “रीना” अब कहीं नहीं होगी।

साल में एक बार जब तुम

पीहर जाने की जिद करती थी,

तो मैं मुस्कुराकर कहता —

“इतना भी क्या याद आता है दिल्ली?”

और तुम हँसकर बोलती —

“वो मेरा बचपन है रंगा जी…”

फिर सफ़र शुरू होता था,

रेल की खिड़की से भागते पेड़,

तुम्हारी आँखों में चमक,

और हाथों में बच्चों जैसी खुशी।

चांदनी चौक पहुँचते ही

तुम जैसे फिर से बेटी बन जाती थी।

मैं तुम्हें छोड़कर लौट आता,

पर घर तब घर कहाँ रहता था…

दीवारें चुप रहतीं,

रसोई उदास रहती,

और चाय का कप भी

जैसे तुम्हारा इंतज़ार करता था।

फिर एक महीना बीतता,

और मैं तुम्हें लेने दिल्ली जाता।

तुम हमेशा कहती —

“इतना सामान है, कैसे ले जाओगे?”

और सच में,

तुम सिर्फ़ बैग नहीं लाती थी,

अपने साथ पूरा उत्सव ले आती थी।

किसी के लिए कुर्ता,

किसी के लिए मिठाई,

बच्चों के लिए खिलौने,

और मेरे लिए…

शायद कोई छोटी-सी चीज़,

पर उसमें तुम्हारा पूरा प्यार छुपा होता था।

तुम्हारे आते ही

घर अचानक जी उठता था,

जैसे सूनी चौखट पर

फिर से दीपक जल उठे हों।

तुम्हारी आवाज़, तुम्हारी हँसी,

तुम्हारा सामान फैलाना,

सबमें एक अपनापन था।

पर अब…

न दिल्ली जाने की तैयारी होती है,

न टिकटों की बात होती है,

न कोई कहता है —

“रंगा जी, इस बार मेरे साथ चलोगे ना?”

अब चांदनी चौक का नाम सुनकर

दिल भर आता है।

क्योंकि वहाँ अब भी

तुम्हारी यादें रहती होंगी,

पर तुम नहीं।

तुम्हारे जाने के बाद

सब कुछ जैसे थम गया है,

वो सालाना इंतज़ार,

वो वापसी की रौनक,

वो गिफ्टों से भरे बैग,

और सबसे बढ़कर…

मेरे घर की धड़कन।

रीना,

तुम सच में सिर्फ़ मेरी पत्नी नहीं थी,

तुम इस घर की मुस्कान थी।

अब घर तो वही है,

पर उसमें रहने वाली “रौनक”

तुम अपने साथ ले गई…॥

रीना बिना चाय फीकी…

- No Comments

रसोई में अब भी वही केतली है,

वही कप, वही चम्मच, वही चाय की महक,

पर एक आवाज़ कहीं खो गई है,

जो हर शाम मुस्कुरा कर कहती थी —

“रंगा जी… चाय?”

कभी मेरी ज़िद पर चाय बनती थी,

कभी तुम्हारी आँखों की फरमाइश पर,

कभी बरसात बहाना बन जाती,

कभी यूँ ही बिना वजह

दो कपों में घुल जाती थी ज़िंदगी।

तुम हाथ का हल्का सा इशारा करती,

और मैं समझ जाता बिना बोले,

कि अब दुनिया थोड़ी देर रुक जाएगी,

और हम दोनों

एक प्याली में सुकून घोलेंगे।

आज भी चाय बनती है घर में,

भाप भी वैसे ही उठती है,

चीनी भी उतनी ही पड़ती है,

पर स्वाद कहीं अधूरा रह जाता है,

क्योंकि अब सामने तुम नहीं बैठती।

अब मैं अकेला कप उठाता हूँ,

और हर घूंट के साथ

तुम्हारी याद भीतर उतरती जाती है।

लगता है जैसे चाय नहीं,

बीते हुए दिन पी रहा हूँ मैं।

कभी-कभी अनजाने में

दूसरा कप भी निकाल लेता हूँ,

फिर याद आता है —

अब “रंगा जी चाय” कहने वाली

इस दुनिया में नहीं रही।

तुम्हारे जाने के बाद समझ आया,

चाय सिर्फ़ चाय नहीं थी,

वो हमारे बीच की छोटी-छोटी मोहब्बत थी,

जो दिन में कई बार

हमें फिर से एक-दूसरे के करीब ले आती थी।

अब शामें बहुत लंबी हो गई हैं रीना,

और चाय बहुत फीकी…

क्योंकि उसमें चीनी तो आज भी पड़ती है,

पर तुम्हारी मुस्कान नहीं पड़ती।

रंगा जी… चाय?

- No Comments
रीना, रसोई के उस कोने में 
आज भी तुम्हारी याद के साथ उबलती है चाय… 
जहाँ कभी चाय नहीं, हमारी पूरी ज़िंदगी घुल जाती थी चाय के साथ।
सुबह आँख खुलते ही तुम्हारा वही मासूम इशारा, 
हल्की सी मुस्कान और होंठों पर वो शब्द — 
“रंगा जी… चाय?” 
बस इतना सुनते ही 
दिन अपना लगने लगता था। 
कभी मैं कह देता — “अभी पीते हैं”, 
कभी तुम ज़िद करती — 
“पहले चाय, फिर बाकी काम।” 
और सच कहूँ, हमारी शादी का सबसे खूबसूरत रिश्ता
शायद वही छोटी-छोटी चायें थीं, 
जो हमने साथ बैठकर पी थीं। 
कभी बरामदे में, 
कभी छत पर ठंडी हवा में, 
कभी बारिश की बूंदों के बीच, 
तो कभी रात की ख़ामोशी में… 
दो कप चाय के साथ 
हम अपना सुख-दुख बाँट लिया करते थे। 
तुम कप पकड़कर धीरे-धीरे घूँट लेती, 
और मैं तुम्हें देखा करता। 
कभी तुम हँस पड़ती, 
कभी किसी बात पर नाराज़ हो जाती, 
और फिर चाय की एक प्याली 
हमारी सारी नाराज़गी पिघला देती। 
पर अब… अब चाय सिर्फ़ चाय रह गई है रीना। 
उसमें तुम्हारी हँसी नहीं घुलती,
 तुम्हारी आवाज़ नहीं उतरती, 
तुम्हारी आँखों की चमक नहीं मिलती। 
अब जब अकेला चाय पीता हूँ,
 तो हाथ काँप जाते हैं। 
क्योंकि हर उठती हुई भाप में 
तुम्हारा चेहरा दिखाई देता है। 
कई बार आदत से मजबूर होकर 
मैं दो कप रख लेता हूँ… 
एक अपने लिए, 
और एक तुम्हारे लिए। 
फिर अचानक दिल चुप हो जाता है… 
याद आता है कि अब सामने बैठकर 
मुझे देखने वाली वो आँखें 
इस दुनिया में नहीं रहीं। 
अब कोई हाथ के इशारे से नहीं पूछता 
— “रंगा जी चाय?” 
और यही चार शब्द 
मेरे पूरे घर की सबसे बड़ी ख़ामोशी बन गए हैं। 
रीना, 
तुम्हारे जाने के बाद मैंने जाना 
कि इंसान सिर्फ़ लोगों को नहीं खोता, 
वो अपनी आदतें खोता है, 
अपनी हँसी खोता है, 
अपनी शामें खोता है… 
और कभी-कभी एक साधारण सी चाय में 
पूरी जिंदगी खो देता है। 
अब हर शाम मैं चाय के कप के सामने बैठा तुम्हें ढूँढता हूँ। 
लगता है जैसे अभी पीछे से आओगी, 
कंधे पर हाथ रखोगी और
 धीरे से कहोगी — 
“रंगा जी… चाय?” 
पर अब सिर्फ़ सन्नाटा आता है… 
और उस सन्नाटे में 
मेरी आँखों से गिरते आँसू 
चाय से भी ज्यादा गर्म होते हैं।

संभल कर चलना होगा राहुल को

- Tuesday, May 5, 2026 No Comments

Rhul Gandhi 

भारत की समकालीन राजनीति में कांग्रेस पार्टी और उसके नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी, के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्षेत्रीय परिणामों के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रासंगिकता कैसे बनाए रखी जाए। केरल, पांडिचेरी (पुडुचेरी), पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों के चुनावी रुझान इस सवाल का आंशिक उत्तर देते हैं। इन राज्यों के नतीजों को समग्र रूप से देखें तो यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस के लिए चुनौतियाँ और अवसर दोनों समान रूप से मौजूद हैं।

सबसे पहले केरल की बात करें, जो लंबे समय से कांग्रेस के लिए अपेक्षाकृत मजबूत आधार रहा है। यहाँ कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ और वामपंथी एलडीएफ के बीच सीधा मुकाबला होता है। भाजपा की उपस्थिति सीमित रही है। केरल के परिणाम यह संकेत देते हैं कि कांग्रेस अभी भी उन राज्यों में मजबूत रह सकती है जहाँ उसका पारंपरिक संगठन और वैचारिक आधार कायम है। यह राहुल गांधी के लिए एक सकारात्मक संकेत है, क्योंकि वे स्वयं वायनाड से सांसद रहे हैं और दक्षिण भारत में उनकी स्वीकार्यता अपेक्षाकृत अधिक है।

पांडिचेरी (पुडुचेरी) का राजनीतिक परिदृश्य छोटा जरूर है, लेकिन प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है। यहाँ सत्ता में बदलाव और गठबंधन की राजनीति यह दिखाती है कि कांग्रेस को छोटे राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में भी अपने संगठन को मजबूत करने की आवश्यकता है। यदि कांग्रेस इन क्षेत्रों में स्थिरता नहीं ला पाती, तो राष्ट्रीय स्तर पर उसकी छवि प्रभावित होती है। राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी को स्थानीय नेतृत्व को सशक्त बनाकर और संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करके इन कमजोरियों को दूर करना होगा।

पश्चिम बंगाल की स्थिति सबसे जटिल है। यहा ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व है और भाजपा मुख्य विपक्ष के रूप में उभरी है। कांग्रेस यहाँ लगभग हाशिए पर है। यह सच है कि अतीत में तृणमूल कांग्रेस के उदय ने कांग्रेस को कमजोर किया, लेकिन वर्तमान में भाजपा के बढ़ते प्रभाव ने ममता बनर्जी को भी एक बड़े राष्ट्रीय गठबंधन की आवश्यकता का एहसास कराया है। इस संदर्भ में ‘इंडिया गठबंधन’ कांग्रेस के लिए एक अवसर बन सकता है, जहाँ वह क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ साझा रणनीति बना सकती है। हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि गठबंधन राजनीति में कांग्रेस की भूमिका नेतृत्वकारी होगी या सहायक, यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न बना हुआ है।

असम में कांग्रेस को जो निराशा हाथ लगी है, वह पार्टी के लिए चिंताजनक है। पूर्वोत्तर भारत में भाजपा ने अपनी पकड़ मजबूत की है और कांग्रेस का पारंपरिक आधार कमजोर हुआ है। असम के परिणाम यह संकेत देते हैं कि केवल पुराने वोट बैंक पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। राहुल गांधी को यहाँ नए सामाजिक समीकरणों, स्थानीय मुद्दों और क्षेत्रीय नेतृत्व पर ध्यान देना होगा। पूर्वोत्तर में कांग्रेस की वापसी के लिए दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता है, जिसमें संगठनात्मक पुनर्निर्माण और जमीनी स्तर पर सक्रियता शामिल हो।

दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु, कांग्रेस के लिए उम्मीद की किरण बना हुआ है। यहाँ एम के स्टालिन के नेतृत्व में द्रमुक के साथ कांग्रेस का गठबंधन मजबूत है और भाजपा का प्रभाव सीमित है लेकिन वर्तमान विधानसभा चुनावों ने यहां पर भी कांग्रेस व डीएमके को निराषा दी है यहां साउथ के फिल्म स्टार थलपति की पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर कांग्रेस गठबंधन को षिकस्त दी है। यहां कांग्रेस का आधार तो है लेकिन चुनावी परिणाम यह बताते हैं कि यहां पर भी राहुल गांधी को कडी मेहनत की जरूरत है। तमिलनाडु के चुनावी परिणाम यह दर्शाते हैं कि यदि कांग्रेस सही सहयोगियों के साथ गठबंधन करती है और स्थानीय मुद्दों पर ध्यान देती है, तो वह प्रभावी भूमिका निभा सकती है। 


इन सभी राज्यों के परिणामों को जोड़कर देखें तो कांग्रेस के सामने तीन मुख्य रास्ते उभरते हैं। पहला, उन राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत करना जहाँ वह पहले से मजबूत है, जैसे केरल और तमिलनाडु। दूसरा, उन राज्यों में पुनर्निर्माण करना जहाँ वह कमजोर हो चुकी है, जैसे असम और पश्चिम बंगाल। तीसरा, राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रभावी गठबंधन बनाकर भाजपा के खिलाफ साझा मोर्चा तैयार करना।

राहुल गांधी की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में निर्णायक है। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने अपनी छवि को एक आक्रामक और मुद्दा-आधारित नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है। उनकी भारत जोड़ो यात्रा जैसे अभियानों ने उन्हें जमीनी स्तर पर जुड़ने का अवसर दिया है, लेकिन चुनावी सफलता के लिए इसे संगठनात्मक मजबूती में बदलना आवश्यक है।

आलोचकों का मानना है कि राहुल गांधी को केवल वैचारिक राजनीति से आगे बढ़कर व्यावहारिक रणनीति अपनानी होगी। उन्हें क्षेत्रीय नेताओं को महत्व देना होगा और पार्टी के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया को अधिक विकेंद्रीकृत करना होगा। वहीं समर्थकों का तर्क है कि उनकी सादगी और मुद्दों पर स्पष्टता उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती है।

अंततः, केरल, पांडिचेरी, पश्चिम बंगाल और असम के चुनावी परिणाम कांग्रेस के लिए एक मिश्रित संदेश लेकर आए हैं। यह न तो पूरी तरह निराशाजनक है और न ही पूरी तरह उत्साहजनक। यह एक संक्रमणकाल है, जहाँ पार्टी को अपने अतीत से सीख लेकर भविष्य की रणनीति तैयार करनी होगी। यदि त्ंीनस ळंदकीप इस अवसर का सही उपयोग करते हैं, तो कांग्रेस एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत दावेदार बन सकती है। लेकिन यदि संगठनात्मक कमजोरियाँ और रणनीतिक अस्पष्टता बनी रहती है, तो यह अवसर भी हाथ से निकल सकता।


Shyam Narayan Ranga

श्याम नारायण रंगा 

परिपक्व राजनेता है अशोक गहलोत

- Saturday, May 2, 2026 No Comments


अशोक गहलोत राजस्थान की राजनीति के प्रमुख स्तंभ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठतम नेताओं में से एक हैं। 3 मई 1951 को जोधपुर के महामंदिर इलाके में एक साधारण माली (सैनिक क्षत्रिय) परिवार में जन्मे गहलोत का जीवन संघर्ष, समर्पण और राजनीतिक चातुर्य की अनुपम कथा है। उनके पिता लक्ष्मण सिंह गहलोत पेशे से जादूगर थे, जिनके साथ उन्होंने बचपन में जादू के करतब सीखे। यही 'जादू' बाद में राजनीति में उनके लिए वरदान साबित हुआ। गहलोत ने छात्र जीवन से ही राजनीति में कदम रखा। उन्होंने बी.एससी., कानून और अर्थशास्त्र में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। 1970 के दशक में वे राष्ट्रीय छात्र संघ (एनएसयूआई) के राजस्थान इकाई के अध्यक्ष बने और कांग्रेस की संगठनात्मक संरचना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी पत्नी सुनीता गहलोत हैं और उनके दो बच्चे हैं – बेटा वैभव और बेटी।

अशोक गहलोत का व्यक्तित्व सादगी, विनम्रता और रणनीतिक बुद्धिमत्ता का अनोखा मिश्रण है। वे स्वयं को कट्टर गांधीवादी मानते हैं – शाकाहारी, सादा जीवन और उच्च विचारों वाले। राजनीति में उन्हें 'जादूगर' कहा जाता है क्योंकि वे संकटों को अपनी चुपचाप रणनीति से संभाल लेते हैं। वे कम बोलते हैं, लेकिन गहरी समझ रखते हैं। ग्रामीण राजस्थान की जड़ों से जुड़े होने के कारण वे आम जनता की पीड़ा को गहराई से समझते हैं। उनके आचरण में कोई दिखावा नहीं; वे हमेशा पार्टी हित और गांधी परिवार की निष्ठा को प्राथमिकता देते हैं। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी सभी के साथ उनका घनिष्ठ संबंध रहा है। फिर भी, आलोचक उन्हें सत्ता-लोलुप और उत्तराधिकारी-विरोधी बताते हैं, जैसा 2022-23 के सचिन पायलट विवाद में देखा गया।

अशोक गहलोत की राष्ट्रीय राजनीति में शुरुआत 1980 में जोधपुर से लोकसभा सांसद चुने जाने से हुई। उन्होंने इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकारों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। 1982-84 में पर्यटन, नागरिक उड्डयन और खेल विभागों के उप-मंत्री रहे। 1984-85 में पर्यटन और नागरिक उड्डयन के राज्य मंत्री बने। 1991-93 में कपड़ा मंत्रालय (स्वतंत्र प्रभार) संभाला। इन पदों पर उन्होंने पर्यटन को बढ़ावा देने, उड्डयन क्षेत्र को सुधारने और कपड़ा उद्योग को मजबूत करने के प्रयास किए। हालांकि ये कार्यकाल छोटे थे, लेकिन उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अनुभव प्राप्त किया और केंद्र-राज्य संबंधों की समझ विकसित की। इन पदों ने उन्हें कांग्रेस के भीतर विश्वसनीय और सक्षम नेता के रूप में स्थापित किया।

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के रूप में अशोक गहलोत का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। गहलोत कांग्रेस के संगठनात्मक चेहरे रहे हैं। वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रह चुके हैं (कई बार) और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के महासचिव भी रहे। 2017-19 में संगठन महासचिव के रूप में उन्होंने पार्टी की आंतरिक संरचना को मजबूत करने का प्रयास किया। 2013 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में भारी हार के बावजूद वे पार्टी को फिर से खड़ा करने में जुटे। वे कांग्रेस की विचारधारा – सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और कल्याणकारी राज्य – के प्रबल समर्थक हैं। राष्ट्रीय स्तर पर वे पार्टी की रणनीति निर्माण और संकट प्रबंधन में अहम भूमिका निभाते रहे। 2022 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के प्रबल दावेदार माने गए, लेकिन अंततः मल्लिकार्जुन खड़गे चुने गए।

गहलोत तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे – 1998-2003, 2008-2013 और 2018-2023। यह उपलब्धि राजस्थान में दुर्लभ है। पहले कार्यकाल में भयंकर सूखे का सामना करते हुए उन्होंने राहत शिविरों और जल प्रबंधन से राज्य को बचाया, जो बाद में मनरेगा जैसी राष्ट्रीय योजनाओं की प्रेरणा बना। बिजली उत्पादन बढ़ाया, रोजगार सृजन किया और पर्यटन को बढ़ावा दिया।

दूसरे और तीसरे कार्यकाल में कल्याणकारी योजनाएं उनकी पहचान बनीं। 'चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना' (25 लाख तक कवर), मुफ्त दवा वितरण, महंगाई राहत शिविर, पुरानी पेंशन स्कीम बहाली, राइट टू हेल्थ एक्ट और महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम उल्लेखनीय हैं। उन्होंने वित्त, गृह और अन्य महत्वपूर्ण विभाग स्वयं संभाले। COVID-19 काल में प्रवासी मजदूरों और गरीबों के लिए संवेदनशील भूमिका निभाई। राज्य में सूचना का अधिकार और पारदर्शिता पर जोर दिया।

आलोचनात्मक पक्ष: उपलब्धियों के बावजूद गहलोत की आलोचना भी कम नहीं। परिवारवाद के आरोप लगे – बेटे वैभव गहलोत से जुड़े ठेकों, विदेशी मुद्रा उल्लंघन (FEMA) मामले और अन्य विवाद सामने आए। पेपर लीक, भ्रष्टाचार के आरोप और कुछ योजनाओं का वित्तीय बोझ राज्य पर पड़ा। 2023 चुनाव में कांग्रेस की हार के पीछे आंतरिक कलह, पायलट-गहलोत टकराव और कुछ वर्गों में असंतोष को जिम्मेदार ठहराया गया। आलोचक कहते हैं कि बड़े औद्योगिक निवेश और दीर्घकालिक विकास मॉडल में वे पीछे रहे। जाति-समिकरण पर निर्भरता और कभी-कभी सत्ता संरक्षण की रणनीति ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया। दलित अत्याचारों और अन्य सामाजिक मुद्दों पर भी विपक्ष ने उनकी सरकार को घेरा।

कुलमिलाकर अशोक गहलोत एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने साधारण पृष्ठभूमि से उठकर राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर अपनी छाप छोड़ी। उनका व्यक्तित्व सादगी और चातुर्य का प्रतीक है, जबकि कृतित्व कल्याणकारी शासन, संगठनात्मक मजबूती और राजनीतिक अस्तित्ववाद का मिश्रण। केंद्रीय मंत्री के रूप में उन्होंने अनुभव प्राप्त किया, मुख्यमंत्री के रूप में जन-कल्याण को प्राथमिकता दी और कांग्रेस नेता के रूप में पार्टी की रीढ़ बने। कमियां जैसे परिवारवाद और आंतरिक प्रबंधन की चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन उनका कुल योगदान राजस्थान और कांग्रेस के लिए सकारात्मक है। आज विपक्ष में रहते हुए भी उनकी रणनीतिक समझ और अनुभव पार्टी के लिए मूल्यवान हैं। इतिहास उन्हें 'राजनीति के जादूगर' के रूप में याद रखेगा – एक नेता जो संकटों में भी जादू रच देते हैं, परंतु पूर्णता की खोज में कुछ छूट भी जाती है।

- श्याम नारायण रंगा 

सोच गहरी हो छिछली नहीं

- Thursday, April 23, 2026 No Comments

राजस्थान के पश्चिमी रेगिस्तान में प्रचलित लोक-कहावत गहन सत्य को उजागर करती है: “पहले यहां के लोग कुओं का पानी पीते थे, इसलिए गहरे थे; आज नहरों का पानी पीते हैं, इसलिए छिछले हो गए।” यह कहावत जल-स्रोत की भौतिकता से परे सोच की गहराई और उथलापन की प्रतीक है। कुएं की खुदाई में लगने वाला श्रम, धैर्य और समय गहरी सोच का प्रतीक है, जबकि नहर का बहता पानी तात्कालिकता और सतहीता का।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से गहरी सोच व्यक्ति को प्रथम-क्रम के प्रभावों से आगे ले जाकर द्वितीय एवं तृतीय-क्रम के परिणामों, नैतिक आयामों और दीर्घकालिक प्रभावों तक पहुंचाती है। इसके विपरीत छिछली सोच सतही जानकारी, त्वरित सुख और दिखावे तक सीमित रहती है। अध्ययनों से पता चलता है कि गहरी सोच वाले व्यक्ति अधिक विश्लेषणात्मक, दूरदर्शी और निर्णय लेने में मजबूत होते हैं, जबकि छिछली सोच अस्थिरता, आवेग और कमजोर नियोजन क्षमता पैदा करती है।

सामाजिक उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है। आज सोशल मीडिया की संस्कृति छिछली सोच को बढ़ावा दे रही है। युवा पीढ़ी 15 बार से अधिक प्रतिदिन सोशल मीडिया चेक करने की आदत से पीड़ित हो रही है, जिससे मस्तिष्क सामाजिक पुरस्कारों  के प्रति अति-संवेदनशील हो गया है। परिणामस्वरूप ध्यान अवधि घट रही है, गंभीर पढ़ाई या चर्चा में असमर्थता बढ़ रही है और रिश्तों में उथलापन आ रहा है। “इंस्टेंट ग्रेटिफिकेशन” की संस्कृति में लोग शादी या दोस्ती को भी स्वाइप-जैसे डिस्पोजेबल बना रहे हैं—जल्दी कनेक्ट, जल्दी डिस्कनेक्ट। इससे विश्वास, प्रतिबद्धता और गहराई का अभाव हो रहा है।

भारतीय इतिहास में गहरे व्यक्तित्व के उदाहरण महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद और डॉ. सी.वी. रामन जैसे विचारकों में दिखते हैं। गांधीजी ने सतही स्वतंत्रता से आगे जाकर अहिंसा, सत्य और आत्म-शुद्धि की गहराई को अपनाया, जिसने पूरे राष्ट्र को रूपांतरित किया। वहीं आधुनिक समय में कई युवा केवल वायरल ट्रेंड्स और शॉर्ट वीडियो तक सीमित रहकर व्यक्तित्व की सतही परत पर ही अटक जाते हैं।

व्यक्तित्व पर इसका प्रभाव गहरा है। गहरी सोच चरित्र को मजबूत, स्वभाव को स्थिर और रिश्तों को टिकाऊ बनाती है। छिछलापन चरित्र पर धब्बा लगाता है—लोग ऐसे व्यक्ति को गंभीर जिम्मेदारियों या गहन संबंधों के लिए नहीं चुनते। समाज स्तर पर यह विभाजन, अस्थिरता और मूल्यहीनता को जन्म देता है।

आज की उपभोक्तावादी और डिजिटल संस्कृति हमें “कुएं” की गहराई से दूर ले जा रही है। सच्चा व्यक्तित्व विकास तभी संभव है जब हम सोच को कुएं की तरह गहरा बनाएं—ज्ञान, अनुभव, विवेक और मूल्यों की जड़ें जमाएं। गहराई ही व्यक्ति को सशक्त, समाज को सुदृढ़ और जीवन को अर्थपूर्ण बनाती है


- Shyam Narayan Ranga

मेरी नजर में बार काउन्सिल के चुनाव एक दृष्टिकोण

- No Comments

राजस्थान बार काउंसिल के हालिया चुनावों का अवलोकन एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है—क्या यह चुनाव वास्तव में सक्रिय और प्रैक्टिस करने वाले वकीलों की सोच और हितों का प्रतिनिधित्व करता है, या फिर यह केवल संख्या, प्रभाव और सामाजिक समीकरणों का खेल बनकर रह गया है? बीकानेर जैसे शहर में चुनाव प्रक्रिया को नजदीक से देखने पर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि चुनाव का स्वरूप पेशेवर संगठन के बजाय छात्र राजनीति जैसा होता जा रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में विधि स्नातक युवाओं की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। यह स्वाभाविक भी है, लेकिन चिंताजनक पहलू यह है कि इनमें से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो सक्रिय रूप से न्यायालय में प्रैक्टिस नहीं कर रहे हैं। केवल बार काउंसिल में पंजीकरण करवा लेना और मतदान के अधिकार का प्रयोग करना—यह प्रवृत्ति चुनाव की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। जब मतदाताओं में वे लोग अधिक हों जिन्हें न्यायालय की कार्यप्रणाली, वकालत की चुनौतियों और अधिवक्ताओं की वास्तविक समस्याओं का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है, तो ऐसे में चुने गए प्रतिनिधियों की संवेदनशीलता और प्राथमिकताएं भी प्रभावित होना स्वाभाविक है।

इसके अतिरिक्त, चुनाव में जातिगत आधार पर ध्रुवीकरण भी एक गंभीर समस्या के रूप में सामने आया। प्रत्येक मतदाता अपने-अपने सामाजिक समूह के उम्मीदवार को समर्थन देने की ओर झुकता दिखाई दिया। यह प्रवृत्ति न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है, बल्कि एक पेशेवर संस्था की गरिमा को भी आहत करती है। वकालत एक ऐसा पेशा है, जहां योग्यता, अनुभव और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता सर्वोपरि होनी चाहिए, न कि जातिगत पहचान।

चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों में भी असंगतियां देखी गईं। घर-घर संपर्क, व्यक्तिगत और पारिवारिक संबंधों के माध्यम से दबाव बनाना—ये सभी तरीके किसी सामाजिक या राजनीतिक चुनाव के हो सकते हैं, लेकिन एक पेशेवर संगठन के लिए यह उपयुक्त नहीं माने जा सकते। इससे यह संकेत मिलता है कि चुनाव का मूल उद्देश्य प्रतिनिधित्व के बजाय जीत हासिल करना बन गया है।

इस परिप्रेक्ष्य में यह आवश्यक हो जाता है कि बार एसोसिएशन के चुनावों में मतदान का अधिकार केवल उन अधिवक्ताओं तक सीमित किया जाए जो वास्तव में न्यायालय में सक्रिय रूप से प्रैक्टिस कर रहे हैं। इससे न केवल चुनाव की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि चुने गए प्रतिनिधि भी अधिक जिम्मेदार और संवेदनशील होंगे। साथ ही, चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और आचार संहिता को सख्ती से लागू करने की आवश्यकता है, ताकि जातिगत और व्यक्तिगत प्रभावों को न्यूनतम किया जा सके।

अंततः, बार एसोसिएशन केवल एक संगठन नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसके चुनावों की गंभीरता और पवित्रता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। यदि यह सुनिश्चित नहीं किया गया, तो भविष्य में यह संस्था अपने मूल उद्देश्यों से भटक सकती है, जिसका प्रभाव न केवल अधिवक्ताओं पर, बल्कि संपूर्ण न्याय प्रणाली पर पड़ेगा।


- श्याम नारायण रंगा  "अभिमन्यु"