Flash

Latest Posts

संभल कर चलना होगा राहुल को

- Tuesday, May 5, 2026 No Comments

Rhul Gandhi 

भारत की समकालीन राजनीति में कांग्रेस पार्टी और उसके नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी, के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्षेत्रीय परिणामों के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रासंगिकता कैसे बनाए रखी जाए। केरल, पांडिचेरी (पुडुचेरी), पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों के चुनावी रुझान इस सवाल का आंशिक उत्तर देते हैं। इन राज्यों के नतीजों को समग्र रूप से देखें तो यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस के लिए चुनौतियाँ और अवसर दोनों समान रूप से मौजूद हैं।

सबसे पहले केरल की बात करें, जो लंबे समय से कांग्रेस के लिए अपेक्षाकृत मजबूत आधार रहा है। यहाँ कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ और वामपंथी एलडीएफ के बीच सीधा मुकाबला होता है। भाजपा की उपस्थिति सीमित रही है। केरल के परिणाम यह संकेत देते हैं कि कांग्रेस अभी भी उन राज्यों में मजबूत रह सकती है जहाँ उसका पारंपरिक संगठन और वैचारिक आधार कायम है। यह राहुल गांधी के लिए एक सकारात्मक संकेत है, क्योंकि वे स्वयं वायनाड से सांसद रहे हैं और दक्षिण भारत में उनकी स्वीकार्यता अपेक्षाकृत अधिक है।

पांडिचेरी (पुडुचेरी) का राजनीतिक परिदृश्य छोटा जरूर है, लेकिन प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है। यहाँ सत्ता में बदलाव और गठबंधन की राजनीति यह दिखाती है कि कांग्रेस को छोटे राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में भी अपने संगठन को मजबूत करने की आवश्यकता है। यदि कांग्रेस इन क्षेत्रों में स्थिरता नहीं ला पाती, तो राष्ट्रीय स्तर पर उसकी छवि प्रभावित होती है। राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी को स्थानीय नेतृत्व को सशक्त बनाकर और संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करके इन कमजोरियों को दूर करना होगा।

पश्चिम बंगाल की स्थिति सबसे जटिल है। यहा ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व है और भाजपा मुख्य विपक्ष के रूप में उभरी है। कांग्रेस यहाँ लगभग हाशिए पर है। यह सच है कि अतीत में तृणमूल कांग्रेस के उदय ने कांग्रेस को कमजोर किया, लेकिन वर्तमान में भाजपा के बढ़ते प्रभाव ने ममता बनर्जी को भी एक बड़े राष्ट्रीय गठबंधन की आवश्यकता का एहसास कराया है। इस संदर्भ में ‘इंडिया गठबंधन’ कांग्रेस के लिए एक अवसर बन सकता है, जहाँ वह क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ साझा रणनीति बना सकती है। हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि गठबंधन राजनीति में कांग्रेस की भूमिका नेतृत्वकारी होगी या सहायक, यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न बना हुआ है।

असम में कांग्रेस को जो निराशा हाथ लगी है, वह पार्टी के लिए चिंताजनक है। पूर्वोत्तर भारत में भाजपा ने अपनी पकड़ मजबूत की है और कांग्रेस का पारंपरिक आधार कमजोर हुआ है। असम के परिणाम यह संकेत देते हैं कि केवल पुराने वोट बैंक पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। राहुल गांधी को यहाँ नए सामाजिक समीकरणों, स्थानीय मुद्दों और क्षेत्रीय नेतृत्व पर ध्यान देना होगा। पूर्वोत्तर में कांग्रेस की वापसी के लिए दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता है, जिसमें संगठनात्मक पुनर्निर्माण और जमीनी स्तर पर सक्रियता शामिल हो।

दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु, कांग्रेस के लिए उम्मीद की किरण बना हुआ है। यहाँ एम के स्टालिन के नेतृत्व में द्रमुक के साथ कांग्रेस का गठबंधन मजबूत है और भाजपा का प्रभाव सीमित है लेकिन वर्तमान विधानसभा चुनावों ने यहां पर भी कांग्रेस व डीएमके को निराषा दी है यहां साउथ के फिल्म स्टार थलपति की पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर कांग्रेस गठबंधन को षिकस्त दी है। यहां कांग्रेस का आधार तो है लेकिन चुनावी परिणाम यह बताते हैं कि यहां पर भी राहुल गांधी को कडी मेहनत की जरूरत है। तमिलनाडु के चुनावी परिणाम यह दर्शाते हैं कि यदि कांग्रेस सही सहयोगियों के साथ गठबंधन करती है और स्थानीय मुद्दों पर ध्यान देती है, तो वह प्रभावी भूमिका निभा सकती है। 


इन सभी राज्यों के परिणामों को जोड़कर देखें तो कांग्रेस के सामने तीन मुख्य रास्ते उभरते हैं। पहला, उन राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत करना जहाँ वह पहले से मजबूत है, जैसे केरल और तमिलनाडु। दूसरा, उन राज्यों में पुनर्निर्माण करना जहाँ वह कमजोर हो चुकी है, जैसे असम और पश्चिम बंगाल। तीसरा, राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रभावी गठबंधन बनाकर भाजपा के खिलाफ साझा मोर्चा तैयार करना।

राहुल गांधी की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में निर्णायक है। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने अपनी छवि को एक आक्रामक और मुद्दा-आधारित नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है। उनकी भारत जोड़ो यात्रा जैसे अभियानों ने उन्हें जमीनी स्तर पर जुड़ने का अवसर दिया है, लेकिन चुनावी सफलता के लिए इसे संगठनात्मक मजबूती में बदलना आवश्यक है।

आलोचकों का मानना है कि राहुल गांधी को केवल वैचारिक राजनीति से आगे बढ़कर व्यावहारिक रणनीति अपनानी होगी। उन्हें क्षेत्रीय नेताओं को महत्व देना होगा और पार्टी के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया को अधिक विकेंद्रीकृत करना होगा। वहीं समर्थकों का तर्क है कि उनकी सादगी और मुद्दों पर स्पष्टता उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती है।

अंततः, केरल, पांडिचेरी, पश्चिम बंगाल और असम के चुनावी परिणाम कांग्रेस के लिए एक मिश्रित संदेश लेकर आए हैं। यह न तो पूरी तरह निराशाजनक है और न ही पूरी तरह उत्साहजनक। यह एक संक्रमणकाल है, जहाँ पार्टी को अपने अतीत से सीख लेकर भविष्य की रणनीति तैयार करनी होगी। यदि त्ंीनस ळंदकीप इस अवसर का सही उपयोग करते हैं, तो कांग्रेस एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत दावेदार बन सकती है। लेकिन यदि संगठनात्मक कमजोरियाँ और रणनीतिक अस्पष्टता बनी रहती है, तो यह अवसर भी हाथ से निकल सकता।


Shyam Narayan Ranga

श्याम नारायण रंगा 

परिपक्व राजनेता है अशोक गहलोत

- Saturday, May 2, 2026 No Comments


अशोक गहलोत राजस्थान की राजनीति के प्रमुख स्तंभ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठतम नेताओं में से एक हैं। 3 मई 1951 को जोधपुर के महामंदिर इलाके में एक साधारण माली (सैनिक क्षत्रिय) परिवार में जन्मे गहलोत का जीवन संघर्ष, समर्पण और राजनीतिक चातुर्य की अनुपम कथा है। उनके पिता लक्ष्मण सिंह गहलोत पेशे से जादूगर थे, जिनके साथ उन्होंने बचपन में जादू के करतब सीखे। यही 'जादू' बाद में राजनीति में उनके लिए वरदान साबित हुआ। गहलोत ने छात्र जीवन से ही राजनीति में कदम रखा। उन्होंने बी.एससी., कानून और अर्थशास्त्र में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। 1970 के दशक में वे राष्ट्रीय छात्र संघ (एनएसयूआई) के राजस्थान इकाई के अध्यक्ष बने और कांग्रेस की संगठनात्मक संरचना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी पत्नी सुनीता गहलोत हैं और उनके दो बच्चे हैं – बेटा वैभव और बेटी।

अशोक गहलोत का व्यक्तित्व सादगी, विनम्रता और रणनीतिक बुद्धिमत्ता का अनोखा मिश्रण है। वे स्वयं को कट्टर गांधीवादी मानते हैं – शाकाहारी, सादा जीवन और उच्च विचारों वाले। राजनीति में उन्हें 'जादूगर' कहा जाता है क्योंकि वे संकटों को अपनी चुपचाप रणनीति से संभाल लेते हैं। वे कम बोलते हैं, लेकिन गहरी समझ रखते हैं। ग्रामीण राजस्थान की जड़ों से जुड़े होने के कारण वे आम जनता की पीड़ा को गहराई से समझते हैं। उनके आचरण में कोई दिखावा नहीं; वे हमेशा पार्टी हित और गांधी परिवार की निष्ठा को प्राथमिकता देते हैं। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी सभी के साथ उनका घनिष्ठ संबंध रहा है। फिर भी, आलोचक उन्हें सत्ता-लोलुप और उत्तराधिकारी-विरोधी बताते हैं, जैसा 2022-23 के सचिन पायलट विवाद में देखा गया।

अशोक गहलोत की राष्ट्रीय राजनीति में शुरुआत 1980 में जोधपुर से लोकसभा सांसद चुने जाने से हुई। उन्होंने इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकारों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। 1982-84 में पर्यटन, नागरिक उड्डयन और खेल विभागों के उप-मंत्री रहे। 1984-85 में पर्यटन और नागरिक उड्डयन के राज्य मंत्री बने। 1991-93 में कपड़ा मंत्रालय (स्वतंत्र प्रभार) संभाला। इन पदों पर उन्होंने पर्यटन को बढ़ावा देने, उड्डयन क्षेत्र को सुधारने और कपड़ा उद्योग को मजबूत करने के प्रयास किए। हालांकि ये कार्यकाल छोटे थे, लेकिन उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अनुभव प्राप्त किया और केंद्र-राज्य संबंधों की समझ विकसित की। इन पदों ने उन्हें कांग्रेस के भीतर विश्वसनीय और सक्षम नेता के रूप में स्थापित किया।

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के रूप में अशोक गहलोत का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। गहलोत कांग्रेस के संगठनात्मक चेहरे रहे हैं। वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रह चुके हैं (कई बार) और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के महासचिव भी रहे। 2017-19 में संगठन महासचिव के रूप में उन्होंने पार्टी की आंतरिक संरचना को मजबूत करने का प्रयास किया। 2013 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में भारी हार के बावजूद वे पार्टी को फिर से खड़ा करने में जुटे। वे कांग्रेस की विचारधारा – सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और कल्याणकारी राज्य – के प्रबल समर्थक हैं। राष्ट्रीय स्तर पर वे पार्टी की रणनीति निर्माण और संकट प्रबंधन में अहम भूमिका निभाते रहे। 2022 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के प्रबल दावेदार माने गए, लेकिन अंततः मल्लिकार्जुन खड़गे चुने गए।

गहलोत तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे – 1998-2003, 2008-2013 और 2018-2023। यह उपलब्धि राजस्थान में दुर्लभ है। पहले कार्यकाल में भयंकर सूखे का सामना करते हुए उन्होंने राहत शिविरों और जल प्रबंधन से राज्य को बचाया, जो बाद में मनरेगा जैसी राष्ट्रीय योजनाओं की प्रेरणा बना। बिजली उत्पादन बढ़ाया, रोजगार सृजन किया और पर्यटन को बढ़ावा दिया।

दूसरे और तीसरे कार्यकाल में कल्याणकारी योजनाएं उनकी पहचान बनीं। 'चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना' (25 लाख तक कवर), मुफ्त दवा वितरण, महंगाई राहत शिविर, पुरानी पेंशन स्कीम बहाली, राइट टू हेल्थ एक्ट और महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम उल्लेखनीय हैं। उन्होंने वित्त, गृह और अन्य महत्वपूर्ण विभाग स्वयं संभाले। COVID-19 काल में प्रवासी मजदूरों और गरीबों के लिए संवेदनशील भूमिका निभाई। राज्य में सूचना का अधिकार और पारदर्शिता पर जोर दिया।

आलोचनात्मक पक्ष: उपलब्धियों के बावजूद गहलोत की आलोचना भी कम नहीं। परिवारवाद के आरोप लगे – बेटे वैभव गहलोत से जुड़े ठेकों, विदेशी मुद्रा उल्लंघन (FEMA) मामले और अन्य विवाद सामने आए। पेपर लीक, भ्रष्टाचार के आरोप और कुछ योजनाओं का वित्तीय बोझ राज्य पर पड़ा। 2023 चुनाव में कांग्रेस की हार के पीछे आंतरिक कलह, पायलट-गहलोत टकराव और कुछ वर्गों में असंतोष को जिम्मेदार ठहराया गया। आलोचक कहते हैं कि बड़े औद्योगिक निवेश और दीर्घकालिक विकास मॉडल में वे पीछे रहे। जाति-समिकरण पर निर्भरता और कभी-कभी सत्ता संरक्षण की रणनीति ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया। दलित अत्याचारों और अन्य सामाजिक मुद्दों पर भी विपक्ष ने उनकी सरकार को घेरा।

कुलमिलाकर अशोक गहलोत एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने साधारण पृष्ठभूमि से उठकर राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर अपनी छाप छोड़ी। उनका व्यक्तित्व सादगी और चातुर्य का प्रतीक है, जबकि कृतित्व कल्याणकारी शासन, संगठनात्मक मजबूती और राजनीतिक अस्तित्ववाद का मिश्रण। केंद्रीय मंत्री के रूप में उन्होंने अनुभव प्राप्त किया, मुख्यमंत्री के रूप में जन-कल्याण को प्राथमिकता दी और कांग्रेस नेता के रूप में पार्टी की रीढ़ बने। कमियां जैसे परिवारवाद और आंतरिक प्रबंधन की चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन उनका कुल योगदान राजस्थान और कांग्रेस के लिए सकारात्मक है। आज विपक्ष में रहते हुए भी उनकी रणनीतिक समझ और अनुभव पार्टी के लिए मूल्यवान हैं। इतिहास उन्हें 'राजनीति के जादूगर' के रूप में याद रखेगा – एक नेता जो संकटों में भी जादू रच देते हैं, परंतु पूर्णता की खोज में कुछ छूट भी जाती है।

- श्याम नारायण रंगा 

सोच गहरी हो छिछली नहीं

- Thursday, April 23, 2026 No Comments

राजस्थान के पश्चिमी रेगिस्तान में प्रचलित लोक-कहावत गहन सत्य को उजागर करती है: “पहले यहां के लोग कुओं का पानी पीते थे, इसलिए गहरे थे; आज नहरों का पानी पीते हैं, इसलिए छिछले हो गए।” यह कहावत जल-स्रोत की भौतिकता से परे सोच की गहराई और उथलापन की प्रतीक है। कुएं की खुदाई में लगने वाला श्रम, धैर्य और समय गहरी सोच का प्रतीक है, जबकि नहर का बहता पानी तात्कालिकता और सतहीता का।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से गहरी सोच व्यक्ति को प्रथम-क्रम के प्रभावों से आगे ले जाकर द्वितीय एवं तृतीय-क्रम के परिणामों, नैतिक आयामों और दीर्घकालिक प्रभावों तक पहुंचाती है। इसके विपरीत छिछली सोच सतही जानकारी, त्वरित सुख और दिखावे तक सीमित रहती है। अध्ययनों से पता चलता है कि गहरी सोच वाले व्यक्ति अधिक विश्लेषणात्मक, दूरदर्शी और निर्णय लेने में मजबूत होते हैं, जबकि छिछली सोच अस्थिरता, आवेग और कमजोर नियोजन क्षमता पैदा करती है।

सामाजिक उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है। आज सोशल मीडिया की संस्कृति छिछली सोच को बढ़ावा दे रही है। युवा पीढ़ी 15 बार से अधिक प्रतिदिन सोशल मीडिया चेक करने की आदत से पीड़ित हो रही है, जिससे मस्तिष्क सामाजिक पुरस्कारों  के प्रति अति-संवेदनशील हो गया है। परिणामस्वरूप ध्यान अवधि घट रही है, गंभीर पढ़ाई या चर्चा में असमर्थता बढ़ रही है और रिश्तों में उथलापन आ रहा है। “इंस्टेंट ग्रेटिफिकेशन” की संस्कृति में लोग शादी या दोस्ती को भी स्वाइप-जैसे डिस्पोजेबल बना रहे हैं—जल्दी कनेक्ट, जल्दी डिस्कनेक्ट। इससे विश्वास, प्रतिबद्धता और गहराई का अभाव हो रहा है।

भारतीय इतिहास में गहरे व्यक्तित्व के उदाहरण महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद और डॉ. सी.वी. रामन जैसे विचारकों में दिखते हैं। गांधीजी ने सतही स्वतंत्रता से आगे जाकर अहिंसा, सत्य और आत्म-शुद्धि की गहराई को अपनाया, जिसने पूरे राष्ट्र को रूपांतरित किया। वहीं आधुनिक समय में कई युवा केवल वायरल ट्रेंड्स और शॉर्ट वीडियो तक सीमित रहकर व्यक्तित्व की सतही परत पर ही अटक जाते हैं।

व्यक्तित्व पर इसका प्रभाव गहरा है। गहरी सोच चरित्र को मजबूत, स्वभाव को स्थिर और रिश्तों को टिकाऊ बनाती है। छिछलापन चरित्र पर धब्बा लगाता है—लोग ऐसे व्यक्ति को गंभीर जिम्मेदारियों या गहन संबंधों के लिए नहीं चुनते। समाज स्तर पर यह विभाजन, अस्थिरता और मूल्यहीनता को जन्म देता है।

आज की उपभोक्तावादी और डिजिटल संस्कृति हमें “कुएं” की गहराई से दूर ले जा रही है। सच्चा व्यक्तित्व विकास तभी संभव है जब हम सोच को कुएं की तरह गहरा बनाएं—ज्ञान, अनुभव, विवेक और मूल्यों की जड़ें जमाएं। गहराई ही व्यक्ति को सशक्त, समाज को सुदृढ़ और जीवन को अर्थपूर्ण बनाती है


- Shyam Narayan Ranga

मेरी नजर में बार काउन्सिल के चुनाव एक दृष्टिकोण

- No Comments

राजस्थान बार काउंसिल के हालिया चुनावों का अवलोकन एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है—क्या यह चुनाव वास्तव में सक्रिय और प्रैक्टिस करने वाले वकीलों की सोच और हितों का प्रतिनिधित्व करता है, या फिर यह केवल संख्या, प्रभाव और सामाजिक समीकरणों का खेल बनकर रह गया है? बीकानेर जैसे शहर में चुनाव प्रक्रिया को नजदीक से देखने पर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि चुनाव का स्वरूप पेशेवर संगठन के बजाय छात्र राजनीति जैसा होता जा रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में विधि स्नातक युवाओं की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। यह स्वाभाविक भी है, लेकिन चिंताजनक पहलू यह है कि इनमें से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो सक्रिय रूप से न्यायालय में प्रैक्टिस नहीं कर रहे हैं। केवल बार काउंसिल में पंजीकरण करवा लेना और मतदान के अधिकार का प्रयोग करना—यह प्रवृत्ति चुनाव की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। जब मतदाताओं में वे लोग अधिक हों जिन्हें न्यायालय की कार्यप्रणाली, वकालत की चुनौतियों और अधिवक्ताओं की वास्तविक समस्याओं का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है, तो ऐसे में चुने गए प्रतिनिधियों की संवेदनशीलता और प्राथमिकताएं भी प्रभावित होना स्वाभाविक है।

इसके अतिरिक्त, चुनाव में जातिगत आधार पर ध्रुवीकरण भी एक गंभीर समस्या के रूप में सामने आया। प्रत्येक मतदाता अपने-अपने सामाजिक समूह के उम्मीदवार को समर्थन देने की ओर झुकता दिखाई दिया। यह प्रवृत्ति न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है, बल्कि एक पेशेवर संस्था की गरिमा को भी आहत करती है। वकालत एक ऐसा पेशा है, जहां योग्यता, अनुभव और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता सर्वोपरि होनी चाहिए, न कि जातिगत पहचान।

चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों में भी असंगतियां देखी गईं। घर-घर संपर्क, व्यक्तिगत और पारिवारिक संबंधों के माध्यम से दबाव बनाना—ये सभी तरीके किसी सामाजिक या राजनीतिक चुनाव के हो सकते हैं, लेकिन एक पेशेवर संगठन के लिए यह उपयुक्त नहीं माने जा सकते। इससे यह संकेत मिलता है कि चुनाव का मूल उद्देश्य प्रतिनिधित्व के बजाय जीत हासिल करना बन गया है।

इस परिप्रेक्ष्य में यह आवश्यक हो जाता है कि बार एसोसिएशन के चुनावों में मतदान का अधिकार केवल उन अधिवक्ताओं तक सीमित किया जाए जो वास्तव में न्यायालय में सक्रिय रूप से प्रैक्टिस कर रहे हैं। इससे न केवल चुनाव की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि चुने गए प्रतिनिधि भी अधिक जिम्मेदार और संवेदनशील होंगे। साथ ही, चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और आचार संहिता को सख्ती से लागू करने की आवश्यकता है, ताकि जातिगत और व्यक्तिगत प्रभावों को न्यूनतम किया जा सके।

अंततः, बार एसोसिएशन केवल एक संगठन नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसके चुनावों की गंभीरता और पवित्रता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। यदि यह सुनिश्चित नहीं किया गया, तो भविष्य में यह संस्था अपने मूल उद्देश्यों से भटक सकती है, जिसका प्रभाव न केवल अधिवक्ताओं पर, बल्कि संपूर्ण न्याय प्रणाली पर पड़ेगा।


- श्याम नारायण रंगा  "अभिमन्यु"

सहज सरल छोटूलाल

- No Comments

शहर की उन पुरानी हवेलियों की गलियों में, जहाँ सुबह की पहली किरण सेठों के आँगन में चाँदी की तरह बिखरती थी, उन्हीं गलियों के एक कोने में रहता था छोटूलाल। उसका नाम ही उसकी कहानी था : छोटा, सरल, और इतना साफ़ कि जैसे कोई ठहरे तालाब का पानी, जिस पर कोई भी पत्थर मार दे, पर लहरें कभी नाराज़ नहीं होतीं।

ब्राह्मण परिवार में जन्मा, लेकिन गरीबी ने उसे स्कूल की चौखट तक नहीं पहुँचने दिया। माँ की गोद में बैठकर उसने जो सीखा, वह था प्यार से खाना बनाना। उसके हाथों में जादू था : आलू की सब्ज़ी में इतनी मिठास, दाल में इतनी गहराई कि खाने वाला आँखें बंद करके कह उठता, “बस यही स्वर्ग है।” उँगलियाँ चाटते-चाटते लोग कहते, “पंडित जी, तुम तो पाकशास्त्र के ऋषि हो।” दाल का हलवा और दाल के बडे बडे बनाने का जो हूनर छोटूलाल के पास था वह उस समय में शहर में किसी और के पास हो ऐसा सुनने में नहीं आया था। 

सेठ रामनाथा डागा की हवेली में उसे नौकरी मिली। सेठानी जी ने एक बार उसके हाथ का बना हलवा खाया तो बस, छोटूलाल उनके हृदय में बस गया। धीरे-धीरे वह परिवार का सदस्य बन गया। सेठ जी की नातियों को गोद में लेकर घूमने ले जाना, बाई बेटी को ससुराल छोड़ना, पीहर लाना, बच्चों को बाजार ले जाना, सब उसके जिम्मे था। बच्चे उसे “छोटू काका” कहकर बुलाते और वह हँसते-हँसते उनकी सारी शरारतें सह लेता।

उसकी सरलता इतनी निर्मल थी कि उसे स्त्री पुरूष के रिष्तों की गहनता की जानकारी नहीं थी। पति-पत्नी का रिश्ता क्या होता है, यह बात उसकी समझ से परे थी। वह सोचता, शादी हो गई, तो बस हो गई। पत्नी घर में है, खाना बन गया, कपड़े धुल गए, तो जीवन पूरा हो गया। सब मित्रों को देखता तो फिर एक दिन उसके मन में भी शादी का बीज फूटा। माता-पिता ने रिश्ता ढूँढा। गरीब घर का लड़के को कौन बेटी देता? लेकिन समाज के एक व्यापारी ने, जो परदेश में कपड़े का बड़ा धंधा करता था, अचानक प्रस्ताव भेज दिया। छोटूलाल की माँ-बाप खुशी से फूले न समाए और छोटूलाल की शादी हो गई।

जब दुल्हन घर आई, तो लोग फुसफुसाए। लड़की का रंग काला था और उसके तीन दाँत होंठों से बाहर निकले हुए थे। लेकिन छोटूलाल ने मुस्कुराकर कहा, “मेरी पत्नी है। बस।” उसकी आँखों में कोई निराशा नहीं थी। केवल एक साफ़, निर्मल खुशी थी  कि अब उसका अपना घर है, पत्नी है, कोई है जो उसे अच्छा लगता है। 

शादी के बाद एक सुबह वह काम पर देर से पहुँचा। सहकर्मी हँसते हुए पूछने लगे, “क्या बात है पंडित जी, आज देर कैसे?”

छोटूलाल ने सरलता से जवाब दिया, “घर का सारा काम मैंने किया। पत्नी तीन दिन कुछ नहीं करेगी। कह रही है कि वो छुटटी पर है मतलब पीरियडस पर है और मां की भी तबीयत ठीक नहीं।”

साथियों ने आँखें फाड़ीं। फिर एक ने ठहाका लगाया, “अरे! तो तुम्हें भी तो पीरियड्स आना चाहिए ना? औरतें तीन दिन आराम करती हैं, तो तुम क्यों नहीं?”

एक साथी ने कहा कि हम भी महीने में तीन दिन नहीं आते भाई छोटू शायद तुमने गौर नहीं किया कि हम सब कभी न कभी तीन दिन छुटटी नहीं लेते पर तुम तो साल के प्रत्येक दिन आते हो।

वह मजाक था। लेकिन छोटूलाल के सरल मन में वह मजाक सच्चाई बन गया।

संयोगवष उस दिन सेठानी जी भी अपने पलंग से नीचे टाट पर बैठी थी और पूछ लिया छोटू आज देरी क्यों की, तुम्हे पता है न कि तुम्हारे बिन खाना नहीं बनता। 

तो छोटूलाल ने वही जबाब सेठानी को दिया और पूछ लिया कि आज आप ही खाना बना लेते तो सेठानी ने कहा कि जो समस्या  तेरी बीबी को हुई है वही आज मुझे भी है। खैर कोई नहीं अब आ गए तो देरी से सही सबके लिए खाना बना ही लो।


अगले महीने जब फिर वैसा हुआ, तो सहकर्मियों ने उसे घेर लिया। “देखो छोटूलाल, तुम बेवकूफ बन रहे हो। औरतें चोंचले करती हैं। तुम भी तीन दिन छुट्टी करो। हम सब करते हैं।”

अब तो छोटूलाल के मन में तीन दिन छुटटी लेने की बात घर कर गई और उसने साफ निर्णय ले लिया कि अब से वह भी महीने में तीन दिन छुटटी जरूर लेगा। सीधा-सादा छोटूलाल उनकी बातों में आ गया। पूरे साल में कभी छुट्टी न लेने वाला वह तीन दिन घर बैठ गया। न काम, न हवेली।

सेठानी जी ने जब सुना तो चौंक गईं। उन्होंने छोटूलाल को बुलाया।

“क्या बात है बेटा? तीन दिन क्यों नहीं आए?”

छोटूलाल ने बड़ी निश्छलता से कहा, “सेठानी जी, जैसे मेरी पत्नी पीरियड्स पर तीन दिन काम नहीं करती, वैसे ही मैं भी तीन दिन पीरियड्स पर था। अब मुझे भी पता चल गया है सब, अब आप औरते मुझे मुर्ख नहीं बना सकती।”

सेठानी जी पहले तो हँसीं, फिर उनकी आँखें नम हो गईं। उन्होंने छोटूलाल की पीठ थपथपाई और धीरे से कहा, “कल अपनी पत्नी को मेरे पास भेज देना।”

अगले दिन छोटूलाल की पत्नी सेठानी जी के सामने आई। वह औरत साधारण दिखती थी, लेकिन उसकी आँखों में गहराई थी, समझ की, सहनशीलता की और प्यार की।

सेठानी जी ने उसे अपने पास बिठाया। प्यार से उसके बालों पर हाथ फेरा और सारी बात बताई। फिर छोटूलाल की पत्नी ने भी अपना दर्द खोला। तीन साल हो गए थे शादी को, पर छोटूलाल को अभी तक पति-पत्नी के रिश्ते का ज्ञान नहीं था। वह सिर्फ़ खाना बनाता, घर संभालता और मुस्कुराता रहता।

सेठानी जी ने दोनों को समझाया।

घर लौटकर पत्नी ने छोटूलाल को पहली बार सच्ची पत्नी की तरह, प्रेमिका की तरह, माँ की तरह समझाया। रात के अंधेरे में, चाँद की रोशनी में, उसने धीरे-धीरे छोटूलाल को जीवन की वे बातें बताईं जो किताबों में नहीं लिखी होतीं, शरीर का रहस्य, मन का लगाव, प्यार का स्पर्श, और वंश की निरंतरता।

छोटूलाल सुनता रहा। उसकी आँखें चौड़ी होती गईं। फिर धीरे-धीरे उसके चेहरे पर एक नई रोशनी फैली। जैसे कोई बच्चा पहली बार फूल को देखकर समझे कि वह सिर्फ़ रंग नहीं, सुगंध भी है।

उस रात के बाद छोटूलाल बदला नहीं, केवल पूरा हुआ।

धीरे-धीरे दोनों का रिश्ता गहरा हुआ। हँसी बढ़ी, बातें बढ़ीं, स्पर्श बढ़ा। और एक दिन सेठानी जी को खुशखबरी मिली, छोटूलाल के घर बेटा हुआ। और एक साल बाद फिर दूसरा बेटा।

वंश बढ़ा।

लेकिन छोटूलाल की सरलता कभी नहीं बदली। वह अब भी वही था, जो किसी का बुरा नहीं मानता, जो खाना बनाकर सबको खिलाता, जो बच्चों को गोद में लेकर हँसता। केवल अब उसके हँसने में एक नई गहराई थी। अब वह जानता था कि प्यार केवल सेवा नहीं, बल्कि एक-दूसरे को पूरा करना भी है।

आज भी जब हवेली के आँगन में शाम ढलती है और छोटूलाल के दो बेटे दौड़ते हुए आते हैं, तो लोग कहते हैं, “देखो, पंडित जी के घर में अभी भी वही पुरानी खुशबू है।”

और छोटूलाल मुस्कुराता है। सरल, सहज, और अब थोड़ा-सा पूरा।

क्योंकि कभी-कभी सबसे बड़ी समझदारी सरलता में ही छिपी होती है। और सबसे गहरा प्यार उन लोगों के दिल में होता है, जो कभी किसी का बुरा नहीं मानते।


- श्याम नारायण रंगा  "अभिमन्यु"

बीकानेर थार की रेत में खिलता है सद्भाव का फूल

- No Comments

Bikaner Ka Sampradayik Sadbhav (Courtesy : Rajuy)

रेगिस्तान की सुनहरी रेत में, जहां सूरज की किरणें अपनी आभा बिखेरती है और हवाएं कहानियां गुनगुनाती हैं, वहां बसा है एक शहर बीकानेर। हवेलियों का शहर, सद्भाव का गुलशन, और साझी संस्कृति का जीवंत प्रतीक। थार के उत्तर-पश्चिमी किनारे पर यह नगरी न केवल रेगिस्तानी तपिश को अपनी छाया से ठंडक देती है, बल्कि देश भर में फैले सांप्रदायिक बिखराव की आंधियों में भी एक शांत द्वीप सा अटल खडी नजर आती है। नगर को बसाने आए पूर्वजों द्वारा यहां की मिट्टी में बोए गए भाईचारे के बीज इतने गहरे हैं कि सदियों की धूप और तूफानों ने इसे मतबूत और हरा-भरा कर दिया।

कल्पना कीजिए एक विशाल रेगिस्तान, जहां पानी की बूंद भी अमूल्य है, और उसी में राव जोधा के पुत्र राव बीका और उनके चाचा राव कांधल ने एक सपना देखा। गोदारों की छोटी-सी बस्ती को उन्होंने शहर का रूप दिया। 1488 ईस्वी के आसपास जब बीकानेर की नींव पड़ी, तब उसमें सांप्रदायिक सद्भाव के बीज भी बो दिए गए। राजपूत वीरों की तलवार के साथ ही प्रेम और भाईचारे की मिट्टी मिलाई गई। आज जब हम इस शहर को देखते हैं, तो लगता है मानो कोई कवि ने रेत पर गजल लिखी हो:

“रेत की आग में भी फूल खिले हैं यहीं,

बीकानेर नाम है, जहां दिल मिले हैं यहीं।

हिंदू-मुस्लिम-जैन सब एक डोर में बंधे,

भाईचारा ऐसा कि दुनिया हैरान खड़ी।”

यह शहर एक घर की तरह है जिसमें कोई मौहल्ला घर का आहता है तो कोई आंगन, कोई घर की कोठरी है तो कोई मौहल्ला ही पूरा घर। घर की रसोई तो हर पाटा है जहां देर रात तक चाय और नमकीन के दौर चलते रहते हैं। शहर का ब्राह्मण मोहल्ला, जैन मोहल्ला, मुस्लिम मोहल्ला सब आपस में ऐसे गुथे हुए हैं जैसे गिलोय की बेल नीम के तने को चारों ओर से लिपट ले और उसे और भी गुणकारी बना दे। कोई हिंदू मोहल्ला अकेला नहीं, कोई मुस्लिम बस्ती अलग-थलग नहीं। सब एक-दूसरे में समाए हुए, एक-दूसरे को सहारा देते हुए।

सुबह की पहली किरण जब शहर पर पड़ती है, तो नागरिक अपने घर से निकलता है। अगर वह नगर सेठ लक्ष्मीनाथ जी के दर्शन के लिए जाता है, तो रास्ते में मुस्लिम भाइयों के घरों के पास से गुजरता है। सलाम का आदान-प्रदान होता है, कोई हिचक नहीं, कोई संकोच नहीं। उसी तरह कोई मुस्लिम भाई जब काम पर जाता है, तो किसी मंदिर के सामने से गुजरना होता है, वह अपने आप को रोक नहीं पाता सर झुक जाता है, मन में शांति का संचार हो जाता है। यह बीकानेर की तासीर है। यहां धर्म अलग-अलग हैं, लेकिन दिल एक हैं।

शहर का हृदय स्थल है कोटगेट, जब कोई नगर नागरिक यहां तक पहुंचता है तो दो पीर के आगे से सजदा किए बगैर नहीं जा पाता और उससे पहले वह आदि गणेष मंदिर के आगे जय गणेष बोल चुका होता है। इसी तरह कोटगेट के पास हाजी बलवान सैयद साहब की दरगाह के आगे भी उसका सर झुकता है और से निकलता है बलवान सैयद साहब की जय हो।  देखकर ऐसा लगता है मानो आकाश से कोई फरिश्ता कह रहा हो:

“एक ही धरती पर दो नाम, एक ही दिल में दो आराधना,

बीकानेर सिखाता है ईश्वर अल्लाह तेरे नाम की साधना।”

सेठ दाऊजी राठी द्वारा बनवाया गया कृष्ण मंदिर वैष्णव हिंदुओं का प्रमुख केंद्र है, लेकिन उसके आस-पास मुस्लिम परिवार और गोस्वामी मोहल्ला बसा हुआ है। यह मोहल्ला शहर की सांप्रदायिक बसावट का बेजोड़ नमूना है। मंदिर में घंटियां बजती हैं, और पड़ोस में अजान की ध्वनि गूंजती है। दोनों सुर मिलकर एक राग बनाते हैं। कोई टकराव नहीं, केवल सामंजस्य।

भांडाशाह जैन मंदिर नगर सेठ लक्ष्मीनाथ जी के मंदिर के पास ही है। हिंदू श्रद्धालु यहां भी दर्शन करते हैं। मोहता चैक में मरुनायक मंदिर से सटा जैन उपासरा है। लक्ष्मीनाथ जी के मंदिर के आस-पास अन्य जैन मंदिर भी हैं, जहां हिंदू भक्त बिना किसी भेदभाव के जाते हैं। जैन समुदाय यहां होली और दीपावली मनाता है ठीक वैसे ही जैसे कोई हिंदू परिवार। उनके घरों में भगवान राम और कृष्ण की तस्वीरें सजी रहती हैं। जैन भाई हिंदू त्योहारों में शामिल होते हैं, और हिंदू जैन परंपराओं का सम्मान करते हैं। यह साझापन शब्दों से परे है, यह अनुभव है, अहसास है।

पुराने शहर के रहवासी  जब अपने काम पर निकलते हैं, तो उन्हें मोहल्ला चूनगरान से होकर निकलना पड़ता है। यहां मुस्लिम परिवार रहते हैं, लेकिन कोई भय नहीं, कोई दूरी नहीं। हिंदू भाई बेझिझक गुजरते हैं। कहने का तात्पर्य यही है कि मोहल्ले आपस में ऐसे गुथे हैं जैसे कोई परिवार के सदस्य। ब्राह्मण मोहल्ला जैन मोहल्ले से लगा, मुस्लिम मोहल्ला हिंदू बस्ती से सटा, सब एक सूत्र में पिरोए हुए।

मंदिरों में चढ़ने वाले पुष्पों के अधिकांश विक्रेता मुस्लिम भाई होते हैं। वे फूल चुनते हैं, माला गूंथते हैं, और मंदिरों तक पहुंचाते हैं। पूजा में प्रयुक्त रुई और बत्तियां भी मुस्लिम समुदाय के लोग तैयार करते हैं। मंदिर की घंटी बजती है, और उसी हाथों से बनी बत्ती जलती है, यह दृश्य बीकानेर की आत्मा है। उस्ता कलाकारों ने, जो मुख्यतः मुस्लिम समुदाय से हैं, मंदिरों को अपनी श्रद्धा से सजाया है। जूनागढ़ किले के अनूप महल, फूल महल, चंद्र महल में उनकी उस्ता कला चमकती है, सोने की पन्नी, फूल-पत्तियां, पक्षी और जानवरों के नक्काशीदार काम। यही कला भांडाशाह जैन मंदिर, रामपुरिया हवेलियों और अन्य मंदिरों-मस्जिदों में भी दिखती है। हिंदू मंदिरों को मुस्लिम उस्तादों ने सजाया, और मुस्लिम दरगाहों में हिंदू शिल्पकारों का योगदान रहा। कारीगर हिंदू-मुस्लिम दोनों थे, और उन्होंने एक साथ इमारतों को इंद्रधनुषी बना दिया।

“उस्ता की कलम ने लिखी है प्रेम की कहानी,

सोने की पन्नी पर, दिलों की निशानी।

मंदिर हो या मस्जिद, हवेली हो या किला,

सबमें एक रंग, एक ही पहचान मिली।”

जब शहर में कोई घर बनता है तो राजपुरोहित, माली समाज, कुम्हार समाज के साथ मुस्लिम भाई भी हाथ बंटाते हैं। नए घर बनते हैं तो सब मिलकर काम करते हैं, कोई ईंट उठाता है, कोई प्लास्टर करता है, कोई मिट्टी गूंथता है। सामूहिक मेहनत, सामूहिक खुशी और उससे बनता है एक घर जिसमें है प्रेम।

 पूर्वजों ने इस शहर के निर्माण में शरीर ही नहीं, आत्मा भी डाल दी थी। यही कारण है कि बीकानेर की संस्कृति साझी संस्कृति बनी रही। यहां के लोग त्योहारों को साथ मनाते हैं। ईद पर हिंदू भाई मुसलमानों को मिठाई पहुंचाते हैं, गणगौर या होली पर मुस्लिम भाई शामिल होते हैं। दीपावली की रोशनी में जैन घर भी जगमगाते हैं। 

बीकानेर के लोग कहते हैं कि इस शहर ने घोर सांप्रदायिक बिखराव को कभी अपने में जगह नहीं दी। जब देश में तूफान उठे, यहां शांति रही। क्योंकि यहां का ताना-बाना ऐसा बुना गया कि अलगाव की कोई सिलाई नहीं फटती। हर मोहल्ला एक कमरा है, हर परिवार एक सदस्य। यह सद्भाव केवल दिखावा नहीं है बल्कि यह दिल में बसा अफसाना है, यह प्रेम गीत है जो शहर गुनगुनाता है, जीवन का अंग है। बच्चों को बचपन से सिखाया जाता है: सब भाई हैं, सब एक परिवार। अंत में कहना चाहूंगा: बीकानेर सिर्फ एक शहर नहीं, एक संदेश है। संदेश यह कि भाईचारा संभव है। प्रेम संभव है। रेगिस्तान में भी फूल खिल सकते हैं। अगर पूरा देश बीकानेर जैसा हो जाए, तो क्या बात हो।

“काश हर शहर बीकानेर बन जाए,

जहां दिल मिलें, जहां झगड़े मिट जाएं।

हिंदू मुस्लिम जैन एक परिवार बनें,

सद्भाव का गुलशन हर कोने में खिल जाए।”

बीकानेर आइए, इस शहर को महसूस कीजिए। यहां की हवा में भाईचारे की खुशबू है। यहां की मिट्टी में प्रेम का रस है। यह शहर हमें सिखाता है, एक होकर जीना, साथ होकर बढ़ना। थार की रेत में यह हरा-भरा बगीचा सदियों से हमें प्रेरित कर रहा है।

- श्याम नारायण रंगा  "अभिमन्यु"


मेरा यह आलेख साप्ताहिक राजसूय समाचार पत्र के एक अंक में छपा था

टूटते परिवार बिखरते रिश्ते

- Wednesday, October 16, 2024 No Comments

 टूटते परिवार बिखरते रिश्ते 

बिखरते परिवार टूटते रिश्ते 

लाचार परिवार बेबस रिश्ते 

बेबस परिवार लाचार रिश्ते 

रिसते परिवार सीलते रिश्ते 

अनजाने परिवार मनमाने रिश्ते

सुलगते परिवार अंगारते रिश्ते 

बीमार परिवार रोगी रिश्ते 

घबराते परिवार डरते रिश्ते

सकुचाते परिवार सिमटते रिश्ते

स्व होते परिवार स्वाहा होते रिश्ते

घर होते परिवार बन्द होते रिश्ते

ऑफलाइन परिवार आनलाइन रिश्ते

आभाषी परिवार आभाषी रिश्ते 

सम्मानित परिवार अपमानित रिश्ते 

बड़े बड़े परिवार छोटे होते रिश्ते

मुक्त होते परिवार रिक्त होते रिश्ते

ऐसे कैसे परिवार कैसे ऐसे रिश्ते 

बचा लो परिवार निभा लो रिश्ते 

जोड़ो परिवार जोड़ो रिश्ते

आपके परिवार मेरे परिवार 

आपके रिश्ते मेरे रिश्ते


Shyam Narayan Ranga

श्याम नारायण रंगा