रीना, रसोई के उस कोने में
आज भी तुम्हारी याद के साथ उबलती है चाय…
जहाँ कभी चाय नहीं,
हमारी पूरी ज़िंदगी घुल जाती थी चाय के साथ।
सुबह आँख खुलते ही
तुम्हारा वही मासूम इशारा,
हल्की सी मुस्कान और होंठों पर वो शब्द —
“रंगा जी… चाय?”
बस इतना सुनते ही
दिन अपना लगने लगता था।
कभी मैं कह देता — “अभी पीते हैं”,
कभी तुम ज़िद करती —
“पहले चाय, फिर बाकी काम।”
और सच कहूँ,
हमारी शादी का सबसे खूबसूरत रिश्ता
शायद वही छोटी-छोटी चायें थीं,
जो हमने साथ बैठकर पी थीं।
कभी बरामदे में,
कभी छत पर ठंडी हवा में,
कभी बारिश की बूंदों के बीच,
तो कभी रात की ख़ामोशी में…
दो कप चाय के साथ
हम अपना सुख-दुख बाँट लिया करते थे।
तुम कप पकड़कर धीरे-धीरे घूँट लेती,
और मैं तुम्हें देखा करता।
कभी तुम हँस पड़ती,
कभी किसी बात पर नाराज़ हो जाती,
और फिर चाय की एक प्याली
हमारी सारी नाराज़गी पिघला देती।
पर अब…
अब चाय सिर्फ़ चाय रह गई है रीना।
उसमें तुम्हारी हँसी नहीं घुलती,
तुम्हारी आवाज़ नहीं उतरती,
तुम्हारी आँखों की चमक नहीं मिलती।
अब जब अकेला चाय पीता हूँ,
तो हाथ काँप जाते हैं।
क्योंकि हर उठती हुई भाप में
तुम्हारा चेहरा दिखाई देता है।
कई बार आदत से मजबूर होकर
मैं दो कप रख लेता हूँ…
एक अपने लिए,
और एक तुम्हारे लिए।
फिर अचानक दिल चुप हो जाता है…
याद आता है कि
अब सामने बैठकर
मुझे देखने वाली वो आँखें
इस दुनिया में नहीं रहीं।
अब कोई हाथ के इशारे से नहीं पूछता
—
“रंगा जी चाय?”
और यही चार शब्द
मेरे पूरे घर की सबसे बड़ी ख़ामोशी बन गए हैं।
रीना,
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने जाना
कि इंसान सिर्फ़ लोगों को नहीं खोता,
वो अपनी आदतें खोता है,
अपनी हँसी खोता है,
अपनी शामें खोता है…
और कभी-कभी
एक साधारण सी चाय में
पूरी जिंदगी खो देता है।
अब हर शाम
मैं चाय के कप के सामने बैठा
तुम्हें ढूँढता हूँ।
लगता है जैसे अभी पीछे से आओगी,
कंधे पर हाथ रखोगी
और
धीरे से कहोगी —
“रंगा जी… चाय?”
पर अब सिर्फ़ सन्नाटा आता है…
और उस सन्नाटे में
मेरी आँखों से गिरते आँसू
चाय से भी ज्यादा गर्म होते हैं।
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