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मेरी नजर में बार काउन्सिल के चुनाव एक दृष्टिकोण

By SHYAM NARAYAN RANGA - Thursday, April 23, 2026 No Comments

राजस्थान बार काउंसिल के हालिया चुनावों का अवलोकन एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है—क्या यह चुनाव वास्तव में सक्रिय और प्रैक्टिस करने वाले वकीलों की सोच और हितों का प्रतिनिधित्व करता है, या फिर यह केवल संख्या, प्रभाव और सामाजिक समीकरणों का खेल बनकर रह गया है? बीकानेर जैसे शहर में चुनाव प्रक्रिया को नजदीक से देखने पर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि चुनाव का स्वरूप पेशेवर संगठन के बजाय छात्र राजनीति जैसा होता जा रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में विधि स्नातक युवाओं की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। यह स्वाभाविक भी है, लेकिन चिंताजनक पहलू यह है कि इनमें से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो सक्रिय रूप से न्यायालय में प्रैक्टिस नहीं कर रहे हैं। केवल बार काउंसिल में पंजीकरण करवा लेना और मतदान के अधिकार का प्रयोग करना—यह प्रवृत्ति चुनाव की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। जब मतदाताओं में वे लोग अधिक हों जिन्हें न्यायालय की कार्यप्रणाली, वकालत की चुनौतियों और अधिवक्ताओं की वास्तविक समस्याओं का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है, तो ऐसे में चुने गए प्रतिनिधियों की संवेदनशीलता और प्राथमिकताएं भी प्रभावित होना स्वाभाविक है।

इसके अतिरिक्त, चुनाव में जातिगत आधार पर ध्रुवीकरण भी एक गंभीर समस्या के रूप में सामने आया। प्रत्येक मतदाता अपने-अपने सामाजिक समूह के उम्मीदवार को समर्थन देने की ओर झुकता दिखाई दिया। यह प्रवृत्ति न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है, बल्कि एक पेशेवर संस्था की गरिमा को भी आहत करती है। वकालत एक ऐसा पेशा है, जहां योग्यता, अनुभव और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता सर्वोपरि होनी चाहिए, न कि जातिगत पहचान।

चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों में भी असंगतियां देखी गईं। घर-घर संपर्क, व्यक्तिगत और पारिवारिक संबंधों के माध्यम से दबाव बनाना—ये सभी तरीके किसी सामाजिक या राजनीतिक चुनाव के हो सकते हैं, लेकिन एक पेशेवर संगठन के लिए यह उपयुक्त नहीं माने जा सकते। इससे यह संकेत मिलता है कि चुनाव का मूल उद्देश्य प्रतिनिधित्व के बजाय जीत हासिल करना बन गया है।

इस परिप्रेक्ष्य में यह आवश्यक हो जाता है कि बार एसोसिएशन के चुनावों में मतदान का अधिकार केवल उन अधिवक्ताओं तक सीमित किया जाए जो वास्तव में न्यायालय में सक्रिय रूप से प्रैक्टिस कर रहे हैं। इससे न केवल चुनाव की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि चुने गए प्रतिनिधि भी अधिक जिम्मेदार और संवेदनशील होंगे। साथ ही, चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और आचार संहिता को सख्ती से लागू करने की आवश्यकता है, ताकि जातिगत और व्यक्तिगत प्रभावों को न्यूनतम किया जा सके।

अंततः, बार एसोसिएशन केवल एक संगठन नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसके चुनावों की गंभीरता और पवित्रता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। यदि यह सुनिश्चित नहीं किया गया, तो भविष्य में यह संस्था अपने मूल उद्देश्यों से भटक सकती है, जिसका प्रभाव न केवल अधिवक्ताओं पर, बल्कि संपूर्ण न्याय प्रणाली पर पड़ेगा।


- श्याम नारायण रंगा  "अभिमन्यु"

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