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सहज सरल छोटूलाल

By SHYAM NARAYAN RANGA - Thursday, April 23, 2026 No Comments

शहर की उन पुरानी हवेलियों की गलियों में, जहाँ सुबह की पहली किरण सेठों के आँगन में चाँदी की तरह बिखरती थी, उन्हीं गलियों के एक कोने में रहता था छोटूलाल। उसका नाम ही उसकी कहानी था : छोटा, सरल, और इतना साफ़ कि जैसे कोई ठहरे तालाब का पानी, जिस पर कोई भी पत्थर मार दे, पर लहरें कभी नाराज़ नहीं होतीं।

ब्राह्मण परिवार में जन्मा, लेकिन गरीबी ने उसे स्कूल की चौखट तक नहीं पहुँचने दिया। माँ की गोद में बैठकर उसने जो सीखा, वह था प्यार से खाना बनाना। उसके हाथों में जादू था : आलू की सब्ज़ी में इतनी मिठास, दाल में इतनी गहराई कि खाने वाला आँखें बंद करके कह उठता, “बस यही स्वर्ग है।” उँगलियाँ चाटते-चाटते लोग कहते, “पंडित जी, तुम तो पाकशास्त्र के ऋषि हो।” दाल का हलवा और दाल के बडे बडे बनाने का जो हूनर छोटूलाल के पास था वह उस समय में शहर में किसी और के पास हो ऐसा सुनने में नहीं आया था। 

सेठ रामनाथा डागा की हवेली में उसे नौकरी मिली। सेठानी जी ने एक बार उसके हाथ का बना हलवा खाया तो बस, छोटूलाल उनके हृदय में बस गया। धीरे-धीरे वह परिवार का सदस्य बन गया। सेठ जी की नातियों को गोद में लेकर घूमने ले जाना, बाई बेटी को ससुराल छोड़ना, पीहर लाना, बच्चों को बाजार ले जाना, सब उसके जिम्मे था। बच्चे उसे “छोटू काका” कहकर बुलाते और वह हँसते-हँसते उनकी सारी शरारतें सह लेता।

उसकी सरलता इतनी निर्मल थी कि उसे स्त्री पुरूष के रिष्तों की गहनता की जानकारी नहीं थी। पति-पत्नी का रिश्ता क्या होता है, यह बात उसकी समझ से परे थी। वह सोचता, शादी हो गई, तो बस हो गई। पत्नी घर में है, खाना बन गया, कपड़े धुल गए, तो जीवन पूरा हो गया। सब मित्रों को देखता तो फिर एक दिन उसके मन में भी शादी का बीज फूटा। माता-पिता ने रिश्ता ढूँढा। गरीब घर का लड़के को कौन बेटी देता? लेकिन समाज के एक व्यापारी ने, जो परदेश में कपड़े का बड़ा धंधा करता था, अचानक प्रस्ताव भेज दिया। छोटूलाल की माँ-बाप खुशी से फूले न समाए और छोटूलाल की शादी हो गई।

जब दुल्हन घर आई, तो लोग फुसफुसाए। लड़की का रंग काला था और उसके तीन दाँत होंठों से बाहर निकले हुए थे। लेकिन छोटूलाल ने मुस्कुराकर कहा, “मेरी पत्नी है। बस।” उसकी आँखों में कोई निराशा नहीं थी। केवल एक साफ़, निर्मल खुशी थी  कि अब उसका अपना घर है, पत्नी है, कोई है जो उसे अच्छा लगता है। 

शादी के बाद एक सुबह वह काम पर देर से पहुँचा। सहकर्मी हँसते हुए पूछने लगे, “क्या बात है पंडित जी, आज देर कैसे?”

छोटूलाल ने सरलता से जवाब दिया, “घर का सारा काम मैंने किया। पत्नी तीन दिन कुछ नहीं करेगी। कह रही है कि वो छुटटी पर है मतलब पीरियडस पर है और मां की भी तबीयत ठीक नहीं।”

साथियों ने आँखें फाड़ीं। फिर एक ने ठहाका लगाया, “अरे! तो तुम्हें भी तो पीरियड्स आना चाहिए ना? औरतें तीन दिन आराम करती हैं, तो तुम क्यों नहीं?”

एक साथी ने कहा कि हम भी महीने में तीन दिन नहीं आते भाई छोटू शायद तुमने गौर नहीं किया कि हम सब कभी न कभी तीन दिन छुटटी नहीं लेते पर तुम तो साल के प्रत्येक दिन आते हो।

वह मजाक था। लेकिन छोटूलाल के सरल मन में वह मजाक सच्चाई बन गया।

संयोगवष उस दिन सेठानी जी भी अपने पलंग से नीचे टाट पर बैठी थी और पूछ लिया छोटू आज देरी क्यों की, तुम्हे पता है न कि तुम्हारे बिन खाना नहीं बनता। 

तो छोटूलाल ने वही जबाब सेठानी को दिया और पूछ लिया कि आज आप ही खाना बना लेते तो सेठानी ने कहा कि जो समस्या  तेरी बीबी को हुई है वही आज मुझे भी है। खैर कोई नहीं अब आ गए तो देरी से सही सबके लिए खाना बना ही लो।


अगले महीने जब फिर वैसा हुआ, तो सहकर्मियों ने उसे घेर लिया। “देखो छोटूलाल, तुम बेवकूफ बन रहे हो। औरतें चोंचले करती हैं। तुम भी तीन दिन छुट्टी करो। हम सब करते हैं।”

अब तो छोटूलाल के मन में तीन दिन छुटटी लेने की बात घर कर गई और उसने साफ निर्णय ले लिया कि अब से वह भी महीने में तीन दिन छुटटी जरूर लेगा। सीधा-सादा छोटूलाल उनकी बातों में आ गया। पूरे साल में कभी छुट्टी न लेने वाला वह तीन दिन घर बैठ गया। न काम, न हवेली।

सेठानी जी ने जब सुना तो चौंक गईं। उन्होंने छोटूलाल को बुलाया।

“क्या बात है बेटा? तीन दिन क्यों नहीं आए?”

छोटूलाल ने बड़ी निश्छलता से कहा, “सेठानी जी, जैसे मेरी पत्नी पीरियड्स पर तीन दिन काम नहीं करती, वैसे ही मैं भी तीन दिन पीरियड्स पर था। अब मुझे भी पता चल गया है सब, अब आप औरते मुझे मुर्ख नहीं बना सकती।”

सेठानी जी पहले तो हँसीं, फिर उनकी आँखें नम हो गईं। उन्होंने छोटूलाल की पीठ थपथपाई और धीरे से कहा, “कल अपनी पत्नी को मेरे पास भेज देना।”

अगले दिन छोटूलाल की पत्नी सेठानी जी के सामने आई। वह औरत साधारण दिखती थी, लेकिन उसकी आँखों में गहराई थी, समझ की, सहनशीलता की और प्यार की।

सेठानी जी ने उसे अपने पास बिठाया। प्यार से उसके बालों पर हाथ फेरा और सारी बात बताई। फिर छोटूलाल की पत्नी ने भी अपना दर्द खोला। तीन साल हो गए थे शादी को, पर छोटूलाल को अभी तक पति-पत्नी के रिश्ते का ज्ञान नहीं था। वह सिर्फ़ खाना बनाता, घर संभालता और मुस्कुराता रहता।

सेठानी जी ने दोनों को समझाया।

घर लौटकर पत्नी ने छोटूलाल को पहली बार सच्ची पत्नी की तरह, प्रेमिका की तरह, माँ की तरह समझाया। रात के अंधेरे में, चाँद की रोशनी में, उसने धीरे-धीरे छोटूलाल को जीवन की वे बातें बताईं जो किताबों में नहीं लिखी होतीं, शरीर का रहस्य, मन का लगाव, प्यार का स्पर्श, और वंश की निरंतरता।

छोटूलाल सुनता रहा। उसकी आँखें चौड़ी होती गईं। फिर धीरे-धीरे उसके चेहरे पर एक नई रोशनी फैली। जैसे कोई बच्चा पहली बार फूल को देखकर समझे कि वह सिर्फ़ रंग नहीं, सुगंध भी है।

उस रात के बाद छोटूलाल बदला नहीं, केवल पूरा हुआ।

धीरे-धीरे दोनों का रिश्ता गहरा हुआ। हँसी बढ़ी, बातें बढ़ीं, स्पर्श बढ़ा। और एक दिन सेठानी जी को खुशखबरी मिली, छोटूलाल के घर बेटा हुआ। और एक साल बाद फिर दूसरा बेटा।

वंश बढ़ा।

लेकिन छोटूलाल की सरलता कभी नहीं बदली। वह अब भी वही था, जो किसी का बुरा नहीं मानता, जो खाना बनाकर सबको खिलाता, जो बच्चों को गोद में लेकर हँसता। केवल अब उसके हँसने में एक नई गहराई थी। अब वह जानता था कि प्यार केवल सेवा नहीं, बल्कि एक-दूसरे को पूरा करना भी है।

आज भी जब हवेली के आँगन में शाम ढलती है और छोटूलाल के दो बेटे दौड़ते हुए आते हैं, तो लोग कहते हैं, “देखो, पंडित जी के घर में अभी भी वही पुरानी खुशबू है।”

और छोटूलाल मुस्कुराता है। सरल, सहज, और अब थोड़ा-सा पूरा।

क्योंकि कभी-कभी सबसे बड़ी समझदारी सरलता में ही छिपी होती है। और सबसे गहरा प्यार उन लोगों के दिल में होता है, जो कभी किसी का बुरा नहीं मानते।


- श्याम नारायण रंगा  "अभिमन्यु"

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