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बीकानेर थार की रेत में खिलता है सद्भाव का फूल

By SHYAM NARAYAN RANGA - Thursday, April 23, 2026 No Comments

Bikaner Ka Sampradayik Sadbhav (Courtesy : Rajuy)

रेगिस्तान की सुनहरी रेत में, जहां सूरज की किरणें अपनी आभा बिखेरती है और हवाएं कहानियां गुनगुनाती हैं, वहां बसा है एक शहर बीकानेर। हवेलियों का शहर, सद्भाव का गुलशन, और साझी संस्कृति का जीवंत प्रतीक। थार के उत्तर-पश्चिमी किनारे पर यह नगरी न केवल रेगिस्तानी तपिश को अपनी छाया से ठंडक देती है, बल्कि देश भर में फैले सांप्रदायिक बिखराव की आंधियों में भी एक शांत द्वीप सा अटल खडी नजर आती है। नगर को बसाने आए पूर्वजों द्वारा यहां की मिट्टी में बोए गए भाईचारे के बीज इतने गहरे हैं कि सदियों की धूप और तूफानों ने इसे मतबूत और हरा-भरा कर दिया।

कल्पना कीजिए एक विशाल रेगिस्तान, जहां पानी की बूंद भी अमूल्य है, और उसी में राव जोधा के पुत्र राव बीका और उनके चाचा राव कांधल ने एक सपना देखा। गोदारों की छोटी-सी बस्ती को उन्होंने शहर का रूप दिया। 1488 ईस्वी के आसपास जब बीकानेर की नींव पड़ी, तब उसमें सांप्रदायिक सद्भाव के बीज भी बो दिए गए। राजपूत वीरों की तलवार के साथ ही प्रेम और भाईचारे की मिट्टी मिलाई गई। आज जब हम इस शहर को देखते हैं, तो लगता है मानो कोई कवि ने रेत पर गजल लिखी हो:

“रेत की आग में भी फूल खिले हैं यहीं,

बीकानेर नाम है, जहां दिल मिले हैं यहीं।

हिंदू-मुस्लिम-जैन सब एक डोर में बंधे,

भाईचारा ऐसा कि दुनिया हैरान खड़ी।”

यह शहर एक घर की तरह है जिसमें कोई मौहल्ला घर का आहता है तो कोई आंगन, कोई घर की कोठरी है तो कोई मौहल्ला ही पूरा घर। घर की रसोई तो हर पाटा है जहां देर रात तक चाय और नमकीन के दौर चलते रहते हैं। शहर का ब्राह्मण मोहल्ला, जैन मोहल्ला, मुस्लिम मोहल्ला सब आपस में ऐसे गुथे हुए हैं जैसे गिलोय की बेल नीम के तने को चारों ओर से लिपट ले और उसे और भी गुणकारी बना दे। कोई हिंदू मोहल्ला अकेला नहीं, कोई मुस्लिम बस्ती अलग-थलग नहीं। सब एक-दूसरे में समाए हुए, एक-दूसरे को सहारा देते हुए।

सुबह की पहली किरण जब शहर पर पड़ती है, तो नागरिक अपने घर से निकलता है। अगर वह नगर सेठ लक्ष्मीनाथ जी के दर्शन के लिए जाता है, तो रास्ते में मुस्लिम भाइयों के घरों के पास से गुजरता है। सलाम का आदान-प्रदान होता है, कोई हिचक नहीं, कोई संकोच नहीं। उसी तरह कोई मुस्लिम भाई जब काम पर जाता है, तो किसी मंदिर के सामने से गुजरना होता है, वह अपने आप को रोक नहीं पाता सर झुक जाता है, मन में शांति का संचार हो जाता है। यह बीकानेर की तासीर है। यहां धर्म अलग-अलग हैं, लेकिन दिल एक हैं।

शहर का हृदय स्थल है कोटगेट, जब कोई नगर नागरिक यहां तक पहुंचता है तो दो पीर के आगे से सजदा किए बगैर नहीं जा पाता और उससे पहले वह आदि गणेष मंदिर के आगे जय गणेष बोल चुका होता है। इसी तरह कोटगेट के पास हाजी बलवान सैयद साहब की दरगाह के आगे भी उसका सर झुकता है और से निकलता है बलवान सैयद साहब की जय हो।  देखकर ऐसा लगता है मानो आकाश से कोई फरिश्ता कह रहा हो:

“एक ही धरती पर दो नाम, एक ही दिल में दो आराधना,

बीकानेर सिखाता है ईश्वर अल्लाह तेरे नाम की साधना।”

सेठ दाऊजी राठी द्वारा बनवाया गया कृष्ण मंदिर वैष्णव हिंदुओं का प्रमुख केंद्र है, लेकिन उसके आस-पास मुस्लिम परिवार और गोस्वामी मोहल्ला बसा हुआ है। यह मोहल्ला शहर की सांप्रदायिक बसावट का बेजोड़ नमूना है। मंदिर में घंटियां बजती हैं, और पड़ोस में अजान की ध्वनि गूंजती है। दोनों सुर मिलकर एक राग बनाते हैं। कोई टकराव नहीं, केवल सामंजस्य।

भांडाशाह जैन मंदिर नगर सेठ लक्ष्मीनाथ जी के मंदिर के पास ही है। हिंदू श्रद्धालु यहां भी दर्शन करते हैं। मोहता चैक में मरुनायक मंदिर से सटा जैन उपासरा है। लक्ष्मीनाथ जी के मंदिर के आस-पास अन्य जैन मंदिर भी हैं, जहां हिंदू भक्त बिना किसी भेदभाव के जाते हैं। जैन समुदाय यहां होली और दीपावली मनाता है ठीक वैसे ही जैसे कोई हिंदू परिवार। उनके घरों में भगवान राम और कृष्ण की तस्वीरें सजी रहती हैं। जैन भाई हिंदू त्योहारों में शामिल होते हैं, और हिंदू जैन परंपराओं का सम्मान करते हैं। यह साझापन शब्दों से परे है, यह अनुभव है, अहसास है।

पुराने शहर के रहवासी  जब अपने काम पर निकलते हैं, तो उन्हें मोहल्ला चूनगरान से होकर निकलना पड़ता है। यहां मुस्लिम परिवार रहते हैं, लेकिन कोई भय नहीं, कोई दूरी नहीं। हिंदू भाई बेझिझक गुजरते हैं। कहने का तात्पर्य यही है कि मोहल्ले आपस में ऐसे गुथे हैं जैसे कोई परिवार के सदस्य। ब्राह्मण मोहल्ला जैन मोहल्ले से लगा, मुस्लिम मोहल्ला हिंदू बस्ती से सटा, सब एक सूत्र में पिरोए हुए।

मंदिरों में चढ़ने वाले पुष्पों के अधिकांश विक्रेता मुस्लिम भाई होते हैं। वे फूल चुनते हैं, माला गूंथते हैं, और मंदिरों तक पहुंचाते हैं। पूजा में प्रयुक्त रुई और बत्तियां भी मुस्लिम समुदाय के लोग तैयार करते हैं। मंदिर की घंटी बजती है, और उसी हाथों से बनी बत्ती जलती है, यह दृश्य बीकानेर की आत्मा है। उस्ता कलाकारों ने, जो मुख्यतः मुस्लिम समुदाय से हैं, मंदिरों को अपनी श्रद्धा से सजाया है। जूनागढ़ किले के अनूप महल, फूल महल, चंद्र महल में उनकी उस्ता कला चमकती है, सोने की पन्नी, फूल-पत्तियां, पक्षी और जानवरों के नक्काशीदार काम। यही कला भांडाशाह जैन मंदिर, रामपुरिया हवेलियों और अन्य मंदिरों-मस्जिदों में भी दिखती है। हिंदू मंदिरों को मुस्लिम उस्तादों ने सजाया, और मुस्लिम दरगाहों में हिंदू शिल्पकारों का योगदान रहा। कारीगर हिंदू-मुस्लिम दोनों थे, और उन्होंने एक साथ इमारतों को इंद्रधनुषी बना दिया।

“उस्ता की कलम ने लिखी है प्रेम की कहानी,

सोने की पन्नी पर, दिलों की निशानी।

मंदिर हो या मस्जिद, हवेली हो या किला,

सबमें एक रंग, एक ही पहचान मिली।”

जब शहर में कोई घर बनता है तो राजपुरोहित, माली समाज, कुम्हार समाज के साथ मुस्लिम भाई भी हाथ बंटाते हैं। नए घर बनते हैं तो सब मिलकर काम करते हैं, कोई ईंट उठाता है, कोई प्लास्टर करता है, कोई मिट्टी गूंथता है। सामूहिक मेहनत, सामूहिक खुशी और उससे बनता है एक घर जिसमें है प्रेम।

 पूर्वजों ने इस शहर के निर्माण में शरीर ही नहीं, आत्मा भी डाल दी थी। यही कारण है कि बीकानेर की संस्कृति साझी संस्कृति बनी रही। यहां के लोग त्योहारों को साथ मनाते हैं। ईद पर हिंदू भाई मुसलमानों को मिठाई पहुंचाते हैं, गणगौर या होली पर मुस्लिम भाई शामिल होते हैं। दीपावली की रोशनी में जैन घर भी जगमगाते हैं। 

बीकानेर के लोग कहते हैं कि इस शहर ने घोर सांप्रदायिक बिखराव को कभी अपने में जगह नहीं दी। जब देश में तूफान उठे, यहां शांति रही। क्योंकि यहां का ताना-बाना ऐसा बुना गया कि अलगाव की कोई सिलाई नहीं फटती। हर मोहल्ला एक कमरा है, हर परिवार एक सदस्य। यह सद्भाव केवल दिखावा नहीं है बल्कि यह दिल में बसा अफसाना है, यह प्रेम गीत है जो शहर गुनगुनाता है, जीवन का अंग है। बच्चों को बचपन से सिखाया जाता है: सब भाई हैं, सब एक परिवार। अंत में कहना चाहूंगा: बीकानेर सिर्फ एक शहर नहीं, एक संदेश है। संदेश यह कि भाईचारा संभव है। प्रेम संभव है। रेगिस्तान में भी फूल खिल सकते हैं। अगर पूरा देश बीकानेर जैसा हो जाए, तो क्या बात हो।

“काश हर शहर बीकानेर बन जाए,

जहां दिल मिलें, जहां झगड़े मिट जाएं।

हिंदू मुस्लिम जैन एक परिवार बनें,

सद्भाव का गुलशन हर कोने में खिल जाए।”

बीकानेर आइए, इस शहर को महसूस कीजिए। यहां की हवा में भाईचारे की खुशबू है। यहां की मिट्टी में प्रेम का रस है। यह शहर हमें सिखाता है, एक होकर जीना, साथ होकर बढ़ना। थार की रेत में यह हरा-भरा बगीचा सदियों से हमें प्रेरित कर रहा है।

- श्याम नारायण रंगा  "अभिमन्यु"


मेरा यह आलेख साप्ताहिक राजसूय समाचार पत्र के एक अंक में छपा था

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