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बीकानेर के स्वतंत्रता सेनानी श्री सत्यनारायण पारीक

- Sunday, January 24, 2021 No Comments

बीकानेर के स्वतंत्रता सेनानी

श्री सत्यनारायण पारीक

स्वतंत्रता सेनानी श्री सत्यनारायण पारीक का जन्म स्थान ग्राम कल्याणपुरा जिला अजमेर था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा हैदराबाद में हुई। इनके दादा श्री आर्यसमाजी और सम्पूर्ण परिवार देशभक्त था। इन्होंने गंगादास जी, श्री सोहनलाल कोचर और श्री दाऊदयाल आचार्य आदि के साथ गांधी जी के विचारों का, नारों, भाषणों और प्रदर्शनियों आदि के माध्यम से प्रचार प्रसार करने का कार्य किया। ये खादी के समर्थक थे। इन्होंने ईश्वरदयाल जी के साथ बीकानेर राज्य प्रजापरिषद् का विधान भी लिखा। इन्होंने इंदौर से लाॅ की पढाई की और बाद में वकालात के लिए नामांकन कराया। डाॅ रामगोपाल मोहता, डाॅ छगन जी मोहता और उदाराम जी हटीला आदि के साथ हिन्दू पीडिता सेवा समिति का गठन करके इन्होंने अनेक सामाजिक कार्य किए। ये सन 1947 में महाराजा सार्दुलसिंह द्वारा बनाई गई विधान निर्मात्री कमेटी के पक्षधर नहीं थे। 

बीकानेर के स्वतंत्रता सेनानी श्री रावतमल पारीक

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श्री रावतमल पारीक

बीकानेर के स्वतंत्रता सेनानी

श्री रावतमल पारीक

स्वतंत्रता सेनानी श्री रावतमल पारीक, बीकानेर में षड्यंत्र केस के बन्दियों की दयनीय दशा से व्यथित होकर स्वतंत्रता आंदोलन से जुडे़। ये 27 वर्षों तक नगरपालिका में चयनित हुए। बीकानेर राज्य प्रजापरिषद् की स्थापना इनके बीकानेर स्थित मकान पर हुई। इस स्थापना के कारण रियासत द्वारा इन पर जुर्माना भी किया गया। इन्होंने श्री गंगादास कौशिक, श्री दाऊदयाल आचार्य, श्री सोहनलाल कोचर और श्री रघुवरदयाल गोयल आदि स्वतंत्रता सेनानियों के साथ आंदोलन में सक्रियतापूर्वक कार्य किया। इन्होंने कार्यकर्ता शिक्षण शिविर वनस्थली में भी भाग लिया। ये प्रजापरिषद् बीकानेर के प्रथम जनरल सेक्रेटरी थे। बीकानेर राज्य में रिश्वतखोरी संबंधी महाजन रिपोर्ट के संबंध में ये व्यक्तिगत रूप से श्री सरदार बल्लभ भाई पटेल से मिले। ये बीकानेर में आजादी के आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता थे। 

बीकानेर के महान स्वतंत्रता सेनानी श्री मूलचंद पारीक

- Saturday, January 23, 2021 1 Comment

श्री मूलचंद पारीक

बीकानेर के महान स्वतंत्रता सेनानी, श्री मूलचंद पारीक 
{05.07.1925 - 16.02.2008}

स्वतंत्रता सेनानी श्री मूलचंद पारीक आत्मज श्री नरसिंहदासजी, 14 - 15 वर्ष की उम्र में ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस के राष्ट्रीय कार्यक्रमों से प्रभावित होकर आजादी की लडाई में जुड गए थे। श्री रघुवर दयाल गोयल की प्रेरणा से इन्होंने प्रजाप्ररिषद् बीकानेर में सक्रिय भूमिका निभाई। इन्होंने श्री रघुवर दयाल गोयल के नजरबंद रहने के मध्य संदेशवाहक बनने और अन्य कार्यक्रमों को आयोजित करने का कार्य किया। इनका सम्पर्क श्री हीरालाल शास्त्री, श्री जयनारायण व्यास और श्री गोकुल भाई भट्ट आदि से निरंतर रहा। इन्होंने दूधवाखारा आदि आंदोलनों में समाचार बुलेटिन एवं अन्य माध्यमों से प्रचारित प्रसारित करने का कार्य किया। ये हिन्दू एवं जन्मभूमि जैसे समाचार पत्रों में भी लेख प्रकाशित कराते थे। ईदगाह बारी के बाहर बीकानेर में 15 अगस्त 1947 के दिन तिरंगा फहराने में इनकी प्रमुख भूमिका रही। 


बीकानेर के महान स्वतंत्रता सेनानी श्री रावतमल कोचर

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बीकानेर के महान स्वतंत्रता सेनानी

श्री रावतमल कोचर

स्वतंत्रता सेनानी श्री रावतमल कोचर आत्मज श्री महता मेघराज कोचर की शिक्षा डूंगर काॅलेज बीकानेर में हुई। श्री मुक्ताप्रसाद जी से प्रेरित होकर इन्होंने गुप्त रूप से राजनीतिक चेतना जाग्रत करने की दृष्टि से स्थानीय नाटकों में भाग लेने के साथ सामाजिक स्तर के अनेक कार्य किए। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के कलकत्ता अधिवेशन में इन्होंने प्रमुख रूप से तत्कालीन स्वतंत्रता सेनानियों के साथ भाग लिया। इन्होंने सन 1925 से निरन्तर वकालात की। ये पूर्व में मित्र मण्डल के अंतर्गत काम करते थे जो कालान्तर में प्रजामण्डल के नाम से जाना गया। इन्होंने सत्य विद्या प्रचारिणी सभा के माध्यम से शिक्षा के विकास हेतु उल्लेखनीय कार्य किये। ये ए.आई.सी.सी. और पी.सी.सी. से जुडे रहे। ये जन संघर्ष समिति के अध्यक्ष भी थे। इस समिति के माध्यम से इन्होंने अनाज के भण्डार में कमी के लिए आंदोलन किया। 

बीकानेर के महान स्वतंत्रता सेनानी श्री हनुमानसिंह चैधरी, दूधवाखारा

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श्री हनुमानसिंह चैधरी

बीकानेर के महान स्वतंत्रता सेनानी

श्री हनुमानसिंह चैधरी, दूधवाखारा {बीकानेर} 01.01.1900 - 27.03.1993

स्वतंत्रता सेनानी श्री हनुमानसिंह चैधरी आत्मज श्री उदाराम जी चैधरी का जन्म ग्राम दूधवाखारा, जिला चूरू में हुआ। ये भगत सिंह से प्रेरित होकर स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतिभागी बने। इन्होंने प्रारम्भ में बीकानेर रियासत के महाराजा के सी.आई.डी. विभाग में थानेदार के पद पर कार्य किया। किन्तु कईं कारणों से व्यथित होकर इन्होंने नौकरी छोड दी। इन्हें राजद्रोह के अंतर्गत पब्लिक सेफ्टी एक्ट में अनूपगढ किले में बंद किया गया। ये बीकानेर जेल में भी दीर्घ अवधि तक रहे। दूधवाखारा के जागीरदार द्वारा वहां के किसानों की जमीनें ले लेने, उनके साथ मारपीट करने एवं उनके अत्याचार के विरूद्ध इन्होंने सक्रिय रूप से आंदोलन में हिस्सा लिया। फलस्वरूप रियासत में इन्हें जिंदा या मुर्दा पकड कर लाने पर दो हजार रूपये का पुरस्कार घोषित कर दिया गया। ये हीरालाल जी शास्त्री के प्रशिक्षण शिविर में भी प्रतिभागी बने। 

बीकानेर के महान स्वतंत्रता सेनानी श्री दाऊदयाल आचार्य

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श्री दाऊदयाल आचार्य

बीकानेर के महान स्वतंत्रता सेनानी, श्री दाऊदयाल आचार्य

स्वतंत्रता सेनानी श्री दाऊदयाल आचार्य का जन्म स्थान सिकन्दराबाद था। ये विद्यार्थी जीवन से ही खादी धारण करते थे। ये बीकानेर राज्य प्रजापरिषद् के संस्थापक सदस्य थे। लक्ष्मणगढ - सीकर के राजनैतिक सम्मेलन में इनका सक्रिय रूप से योगदान था। बीकानेर राज्य की पहली सार्वजनिक सभा में इन्होंने संयोजक का कार्य किया। ये दीर्घ अवधि तक जेल में बंद रहे। अनूपगढ किले में भी ये कुछ समय तक नजरबंद रहे। इन्होंने अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् के प्रधानमंत्री जयनारायण व्यास के साथ अनेक कार्य किए। इनका पत्रकारिता के क्षेत्र में भी योगदान था। ये दैनिक हिन्दुस्तान टाइम्स के संवाददाता थे। बीकानेर में किसान दिवस की व्यवस्था आदि में इनकी अग्रणी भूमिका थी। बीकानेर राज्य प्रजापरिषद् की ऐलनाबाद में आयोजित अधिवेशन में ये कार्यकारिणी के सदस्य थे। भारत संघ में बीकानेर को मिलाने के लिए इन्होंने सरदार पटेल को पत्र भी लिखा था। 

बीकानेर के महान स्वतंत्रता सेनानी श्री चिरंजीलाल सुनार

- Friday, January 22, 2021 No Comments

श्री चिरंजीलाल सुनार

बीकानेर के महान स्वतंत्रता सेनानी, श्री चिरंजीलाल सुनार

30.08.1923 - 17.08.1999

स्वतंत्रता सेनानी श्री चिरंजीलाल आत्मज श्री हुकुमचंद बीकानेर में सोने चांदी आभूषण के निर्माण का काम करते थे। यहां इनका सम्पर्क स्वतंत्रता सेनानी श्री गंगादास कौशिक से हुआ। कौशिक जी की प्रेरणा से इनका राजनैतिक आंदोलन में पदार्पण हुआ। श्री गंगादास कौशिक, बाबू रघुवरदयाल गोयल, रावतमल जी पारीक और श्री चम्पालाल उपाध्याय आदि इनके सहयोगी थे। 26 जनवरी 1945 के दिन बीकानेर में झंडा फहराने के कार्यक्रम में हिस्सा लेने के कारण इन्हें रिमाण्ड पर रखा गया। प्रजामण्डल के कार्यक्रमों - धरना, प्रदर्शन, नारेबाजी और जुलूस आदि में भाग लेने के साथ ये निरंतर अन्य सामाजिक सुधार के कार्यों में भी संलग्न रहे। ये खादी और ग्रामोद्योग के कार्यक्रमों के भी सक्रिय कार्यकर्ता रहे। इन्होेंने अपने साथियों के साथ लक्ष्मीनाथ जी के मंदिर में हरिजनों और अछूतों के प्रवेश हेतु धरना भी दिया। 

बीकानेर के महान स्वतंत्रता सेनानी श्री चम्पालाल उपाध्याय

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श्री चम्पालाल उपाध्याय

 बीकानेर के महान स्वतंत्रता सेनानी, श्री चम्पालाल उपाध्याय

आषाढ कृष्ण 14 सम्वत् 1978 - 01.11.1999

स्वतंत्रता सेनानी श्री चम्पालाल उपाध्याय का जन्म बीकानेर में श्री दीनाराम जी के सुपुत्र के रूप में हुआ। बीकानेर में अध्ययन के समय इनका सम्पर्क श्री रघुवर दयाल गोयल, श्री वैद्य मघाराम, श्री गंगादास कौशिक और श्री रामनारायण आचार्य आदि देशप्रेमियों से हुआ। सन 1942 में ये बीकानेर राज्य प्रजापरिषद के सदस्य बने। प्रजापरिषद द्वारा आयोजित विभिन्न प्रदर्शनों और धरनों आदि में सहभागिता के साथ इन्होंने अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् के नागौर आदि कईं अधिवेशनों में भी सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। ये दूधवाखारा काण्ड की जांच करने के लिए आॅल इडिया कांग्रेस कमेटी के सदस्य के रूप में नियुक्त हुए थे। इन्होंने गंगानगर आदि स्थानों में भी आंदोलनों में हिस्सा लिया था। ये आज का बीकानेर आदि समाचार पत्रों में भी जन जाग्रति हेतु समाचार प्रेषित करते थे।

बीकानेर के स्वतंत्रता सेनानी पेंटर श्री लक्ष्मीदास स्वामी अथक

- Tuesday, January 19, 2021 No Comments

श्री लक्ष्मीदास स्वामी अथक

बीकानेर के स्वतंत्रता सेनानी

पेंटर श्री लक्ष्मीदास स्वामी अथक

स्वतंत्रता सेनानी श्री लक्ष्मीदास स्वामी आत्मज श्री कालूराम जी स्वामी स्वतंत्रता आंदोलन के समाचारों को पढकर आंदोलन के प्रतिभागी बने। इन्होंने सन 1933 से समाचार पत्रों के लिए निरंतर कार्य किए। श्री हरिभाऊ उपाध्याय के सानिध्य में इन्होंने हिन्दुस्तानी सेवादल की शिक्षा प्राप्त की। श्रीमती कस्तूरबा गांधी की अध्यक्षता में पुष्कर में आयोजित राजनीतिक सम्मेलन में इनका प्रमुख योगदान रहा। प्रदर्शन और धरना आदि में हिस्सा लेने के कारण इन्हें छः मास की जेल हुई। यहां तक कि इन्हें देश निकाला दे दिया गया। श्री मुक्ताप्रसाद और वैद्य मघाराम आदि देशभक्तों से इनका निकट का सम्पर्क रहा। बीकानेर और कलकत्ता में प्रजामण्डल की स्थापना तथा उसकी समस्त गतिविधियों में इनका सक्रिय योगदान रहा। हरिजन सेवा संघ के भी कार्यकर्ता के रूप में इन्होंने अछूतोद्धार आदि समाजसेवा के अनेक कार्य किए। कहते हैं इनको इनका उर्फ नाम अथक कस्तूरबा गांधी ने दिया था। 

बीकानेर के स्वतंत्रता सेनानी सुरेन्द्र कुमार शर्मा

- Monday, January 18, 2021 No Comments

  सुरेन्द्र कुमार शर्मा

बीकानेर के स्वतंत्रता सेनानी, सुरेन्द्र कुमार शर्मा

स्वतंत्रता सेनानी श्री सुरेन्द्र कुमार शर्मा का कार्यक्षेत्र बीकानेर और मुम्बई था। बाल्यावस्था में ही श्री शर्मा लोहिया और अध्यापकों से प्रेरित होकर नमक सत्याग्रह में और स्वतंत्रता संग्राम की अन्य गतिविधियों में संलग्न हुए। 1936 में श्री सुरेन्द्र कुमार शर्मा प्रजामण्डल के सदस्य बने। इन्होंने हितवर्धक सेवा सदन के माध्यम से कोलायत, गजनेर और शिवबाडी आदि स्थानों पर जन जागृति का प्रयास किया। इन्हें गिरफ्तार कर अनेक यातनांएं दी गई और देश निकाला भी दिया गया। दूधवाखारा किसान आंदोलन में ये गुप्तरूप से निरंतर धरना या प्रदर्शन आदि में संलग्न रहे। श्री मघाराम वैध, स्वामी कर्मानंद और श्री गंगादास कौशिक आदि राष्ट्र भक्तों से इनका घनिष्ठ संबंध रहा। श्री शिवलाल जी दूबे के माध्यम से इन्होंने आंदोलन संबंधी समाचारों को तत्कालीन समाचार पत्रों तक पहुंचाने का कार्य निपुणता से किया। 

बीकानेर के स्वतंत्रता सेनानी श्री रामनारायण शर्मा

- Sunday, January 17, 2021 No Comments


बीकानेर के स्वतंत्रता सेनानी

श्री रामनारायण शर्मा

स्वतंत्रता सेनानी श्री रामनारायण शर्मा गांधी जी के करो या मरो के आह्वान से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में प्रतिभागी बने। इनकी माताजी का निधन बाल्यावस्था में ही हो गया था। जब ये 10 वर्ष के थे जब इनके पिताजी आदरणीय मघाराम जी को बीकानेर महाराजा ने देश निकाला दे दिया था। 9 दिसम्बर 1942 को इन्होंने झण्डा आंदोलन के तहत बैदों के चैक से दाऊजी मंदिर तक झण्डा लहराते हुए नारे लगाए। इन्होंने 26 जनवरी 1943 को ध्वजारोहण कार्यक्रम में हिस्सा लिया। श्री गंगादास कौशिक, श्री रघुवर दयाल गोयल और श्री दाऊलाल जी आचार्य आदि स्वतंत्रता सेनानियों से इनका निरंतर सम्पर्क रहा। नागौर के राजनैतिक सम्मेलन तथा दूधवाखारा आंदोलन आदि के द्वारा जन चेतना जाग्रत करने के कारण इन्हें जेल जाना पडा। इन्होंने श्रीगंगानगर और सांगरिया आदि स्थानों पर भी स्वतंत्रता की अलख जगाई। 

महान स्वतंत्रता सेनानी गंगादास कौशिक

- Saturday, January 16, 2021 No Comments

बीकानेर के स्वतंत्रता सेनानी

श्री गंगादास कौशिक


 बीकानेर के स्वतंत्रता सेनानी

श्री गंगादास कौशिक

09.12.1909 से 31.7.1990

स्वतंत्रता सेनानी श्री गंगादास कौशिक आमजन पर होने वाले अत्याचारों से पीडित होकर स्वतंत्रता संग्राम के संलग्न हुवे। इन्होंने श्री रघुवर दयाल गोयल, श्री रावतमल पारीक, श्री रामनारायण आचार्य, श्री दाऊलाल आचार्य और वैद्य मघाराम आदि देशभक्तों के साथ 22 जुलाई 1942 को प्रजामण्डल की स्थापना की। ये अनूपगढ किले में दीर्ध समय तक बंदी रहे। इनका कार्यक्षेत्र बीकानेर रियासत के अतिरिक्त कलकत्ता, अलवर एवं अन्य स्थान भी रहे। खादी के प्रचार प्रसार के लिए बीकानेर में खादी मंदिर की स्थापना में इनका सक्रिय योगदान था। ये सन 1957 से 1963 तक खादी मंदिर के मंत्री पद पर भी आसीन रहे। ये समाचार पत्रों में गुप्त रूप से लिखते थे। इन्होंने दूधवा खारा किसान आंदोलन, कांगड काण्ड एवं अन्य कईं आंदोलनों में सक्रिय भूमिका का निर्वहन किया था। बीकानेर के इन महान स्वतंत्रता सेनानी को कोटि नमन।

महात्मा गांधी और हिन्दी पर उनके विचार

- Friday, September 18, 2020 No Comments


भारत में सर्वाधिक बोली जानी वाली और प्रयोग में ली जाने वाली भाषा हिन्दी है। एक अनुमान के मुताबिक करीब 35 करोड लोग इस भाषा का प्रयोग देशभर में प्रतिदिन करते हैं। भारत की आजादी के बाद संविधान निर्माण के समय 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा द्वारा हिंदी को राजभाषा का दर्जा देने का निर्णय लिया गया तभी से हर साल 14 सितम्बर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। हिंदी को राजभाषा बनवाने में हजारी प्रसाद द्विवेदी, काका कालेलकर, सेठ गोविन्द दास सहित मैथिलीशरण गुप्त और कईं प्रकाण्ड विद्वानों का योगदान रहा। इस संबंध में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का दृष्टिकोण एकदम साफ था कि हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जो राजभाषा होने की तमाम योग्यताएं रखती है। रचनात्मक कार्यक्रम में गांधी जी ने लिखा है कि समूचे हिन्दुस्तान के साथ व्यवहार करने के लिए हमको भारतीय भाषाओं में से एक ऐसी भाषा की जरूरत है, जिसे आज ज्यादा से ज्यादा तादाद में लोग जानते और समझते हों और बाकी लोग जिसे झट से सीख सके। इसमें शक नहीं कि हिंदी ही ऐसी भाषा है। सच्ची शिक्षा में गांधी जी लिखते हैं कि बच्चों को सारी शिक्षा मातृभाषा में दी जानी चाहिए और बच्चों को हिन्दी और उर्दू का ज्ञान राष्ट्रभाषा के तौर पर दिया जाना चाहिए, इसका आरम्भ अक्षर ज्ञान से होना चाहिए। यहां यह बता देना जरूरी है कि गांधी जी उर्दू को हिन्दी के समकक्ष ही मानते थे और उनका मानना था कि प्रत्येक भारतीय को हिंदी और उर्दू का ज्ञान होना चाहिए। एक इस संबंध में महात्मा गांधी के दृष्टिकोण को और स्पष्ट करें तो मेरे सपनों का भारत पुस्तक में ‘राष्ट्रभाषा और लिपि’ शीर्षक में गांधी जी ने हिंदी यह बात साफ कही है देश को एक सामान्य भाषा की जरूरत है बजाय अलग अलग देशी भाषाओं के और इसके लिए उन्होंने हिंदी को सर्वाधिक उपयुक्त माना है। उन्होंने हमारे देश की अलग अलग भाषाओं की लिपियों को इस संबंध मे सबसे बडी रूकावट माना है। महात्मा गांधी के अनुसार राष्ट्रभाषा के लिए निम्नलिखित लक्षण होने चाहिए: ऐसी भाषा सरकारी नौकरों के लिए आसान होनी चाहिए, उस भाषा के द्वारा भारत का आपसी धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक कामकाज हो सकना चाहिए, उस भाषा को ज्यादातर लोग बालते हो, वह भाषा राष्ट्र के लिए आसान हो, उस भाषा का विचार करते समय क्षणिक या कुछ समय तक रहने वाली स्थिति पर जोर न दिया जाए। 

यहां पर गांधी जी हिंदी और अंग्रेजी की तुलना भी की है और साफ मत बताया है कि अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी ज्यादा आसान और सर्वग्राह्य है इसलिए यह विदेशी भाषा इस देश की आमजन की भाषा नहीं हो सकती है। गांधी जी के अनुसार पढे लिखे लोगों और उच्च पद पर आसीन व्यक्तियों को एक बार ऐसा लग सकता है कि अंग्रेजी ही इस देश की भाषा बन गई है लेकिन यह सत्य नहीं है। गांधी जी के अनुसार अंग्रेजी में एक भी ऐसा लक्षण नहीं है जो उसे इस देश की राजभाषा बनाएं बल्कि यह सारी योग्यताएं हिंदी में ही है। यहां गांधी जी लिखते हैं कि यह हिन्दुस्तानी भाषा हिन्दी और उर्दू के मेल से बने और जिसमें न तो संस्कृत की और न ही फारसी या अरबी की भरमार हो। राष्ट्रपिता कहते हैं कि हम अपनी प्रांतीयता को छोडकर अखिल भारतीय देशप्रेम को अपनाएं तो हिंदी को स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं होगी। उनके अनुसार प्रांत प्रेम से बडा देशप्रेम है और हमें अपनी तमाम अविकसित और अलिखित बोलियों का बलिदान करके उसे हिन्दुस्तानी की बडी धारा में मिला देना चाहिए, यह आत्मोत्कर्ष के लिए की गई कुरबानी होगी, आत्महत्या नहीं। 

इस तरह हम देखते हैं कि गांधी जी हिंदी के प्रखर हिमायती थे, उनके अनुसार हिंदी की शिक्षा देश के प्रत्येक विद्यालय में जरूरी कर देनी चाहिए। जो दक्षिणभाषी लोग इस मामले में थोडी असुविधा महसूस करते हैं उनको स्वदेशाभिमान पर भरोसा करके और विशेष प्रयत्न करके हिंदी सीख लेनी चाहिए। गांधी जी के अनुसर इस देश का हर प्रांत का व्यक्ति कमोबेश हिंदी समझता है, जहां उत्तर भारत के लोग हिंदी का प्रयोग धडल्ले से करते हैं वहीं दक्षिण भारत के लोग हिंदी बोलते भले न हो पर समझते अवश्य हैं। इसलिए हिंदी का प्रयोग देश में सर्वाधिक किया जाता है इसलिए सिर्फ कानूनी और संवैधानिक तौर पर नहीं आमजन के स्तर पर हिंदी को अपनाना आवश्यक है। देश में सवोच्च और उच्च न्यायालय सहित संसद की कार्यवाही और विधानसभाओं की कार्यवाही भी हिंदी में की जाए तो आमजन समस्त व्यवस्था को ज्यादा करीब से देख व समझ सकेगा। वर्तमान समय में यह जरूरी है कि हम हिंदी के प्रचार प्रसार व आमजन के उसके प्रयोग को लेकर महात्मा गांधी के सपने को साकार करें। 

श्याम नारायण रंगा

पुष्करणा स्टेडियम के पास

नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर 334004

मोबाईल 9950050079


15 अगस्त को ही क्यों मिली आजादी और साथ ही कुछ और तथ्य

- Friday, August 14, 2020 No Comments

जवाहर लाल नेहरू
क्या आपने कभी सोचा है कि भारत 15 अगस्त को ही क्यों आजाद हुआ, किसी और तारीख को क्यों नहीं। आईए जानते हैं आज इस रोचक तथ्य के बारे में। वैसे तो भारत 30 जून 1948 को आजाद होना था लेकिन ऐसा मानना है कि चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ‘राजाजी’ के कारण लार्ड माउण्टबैटन ने 15 अगस्त 1947 का दिन भारत को आजाद करने के लिए चुना। इतिहासकारों का मानना है कि अगर अंग्रेज सरकार 30 जून 1948 तक का इंतजार किया तो भारत में सत्ता हस्तानांतरण के लिए कोई सत्ता ही नहीं बचेगी। सी राजगोपालाचारी के इस मश्विरे को मानते हुए देश की आजादी का दिन 15 अगस्त 1947 चुना गया। दूसरी तरफ कईं इतिहासकों के अनुसार लार्ड माउण्टबैटन 15 अगस्त के दिन को शुभ मानते थे। जब माउण्टबैटन बर्मा में ब्रिटिश सेना का नेतृत्व कर रहे थे जब जापान ने 15 अगस्त 1945 के दिन ही बिना किसी शर्त उनके सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। ऐसे में लार्ड माउण्टबैटन का मानना था कि भारत भी इसी शुभ दिन आजाद हो तो अच्छा हो। तो इस लिहाज से देखा जाए तो लार्ड माउण्टबैटन अपनी विजय के दूसरे साल के उसी दिन को अपने नाम से इतिहास में दर्ज करवाना चाहते थे। एक तरफ जहां भारत 15 अगस्त को शुभ मानता है और विजयोत्सव मनाता है वहीं दूसरी तरफ जापान द्वितीय विश्व युद्ध में अपने समर्पण करने के कारण इस दिन को काला दिन मानता है। 

एक और रोचक बात है कि जब भारत देश के ज्योतिषियों को पता चला कि देश 15 अगस्त 1947 शुक्रवार को आजाद हो रहा है तो उनमें कोहराम मच गया और हडकम्प मच गया। ज्योतिषियों के विचार से यह दिन शुभ नही था और इस दिन आजादी मिलने से देश में भयंकर नरसंहार होने के आसार है। अपने इसी विचार के कारण कलकत्ता के ज्योतिषियों ने भारत के अंतिम वायसराय लार्ड माउण्टबैटन को एक चिट्ठी लिखी और निवेदन किया कि आजादी के दिन 15 अगस्त को बदलकर कोई और दिन मुकर्रर कर दे लेकिन वायसराय माने नहीं। जब वायसराय नहीं माने तो ज्योतिषियों ने एक उपाय किया और पंडित जवाहर लाल नेहरू को कहा कि वे अपनी आजादी का स्पीच अभिजीत मूहूर्त मंे रात्रि 11ः51 से 12ः39 के बीच में दे और अगर संभव हो तो वो अपना स्पीच 12 बजे तक समाप्त भी कर दे और नेहरू जी ने ज्योतिषियों का कहना माना भी। उनका यह स्पीच आज भी विश्व प्रसिद्ध है। जवाहरलाल नेहरू ने अपना यह ऐतिहासिक भाषण ‘ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी’ 14 अगस्त की मध्यरात्रि को वायसराय लाॅज में दिया जिसको वर्तमान में राष्ट्रपति भवन के नाम से जाना जाता है। 

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश की आजादी के सबसे बडे महानायक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी आजादी के इस जश्न में शामिल नहीं हुए। जब देश को आजादी मिली तो वो गांधी जी दिल्ली से दूर बंगाल के नोवाखाली में हिन्दूओं और मुसलमानों के बीच हो रही साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए अनशन कर रहे थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल ने गांधी जी को एक पत्र भी लिखा और गांधी जी को निवेदन किया कि वे देश के राष्ट्रपिता है और इस जश्न में शामिल हो अपना आशीर्वाद प्रदान करें। इसके जबाब में गांधी ने कहा कि जब कलकत्ते में हिन्दू मुस्लिम एक दूसरे की जान ले रहे हैं, ऐसे में मैं जश्न मनाने के लिए कैसे आ सकता हूं। मैं दंगा रोकने के लिए अपनी जान दे दूंगा। यह भी गौर करने वाली बात है कि जब नेहरू अपना विश्वप्रसिद्ध भाषण ‘ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी’ देने वाले थे उस दिन गांधी जी रात्रि 9 बजे ही सोने को चले गए और वो भाषण उन्होंने नहीं सुना। 

आज तक हम देखते आ रहे हैं कि सभी प्रधानमंत्री 15 अगस्त के दिन लालकिले से झंडा फहराते हैं लेकिन 1947 में ऐसा नहीं हुआ। 15 अगस्त 1947 के दिन तक लार्ड माउण्टबैटन ने अपने दफ्तर में काम किया और इसी दिन दोपहर को जवाहरलाल नेहरू ने इनको अपने मंत्रीमंडल की सूची सौंपी। इसी दिन लार्ड माउण्टबैटन ने इंडिया गेट के पास प्रिसेंज गार्डन में एक सभा को संबोधित किया।  उसके बाद 16 अगस्त 1947 को नेहरू जी ने लालकिले की प्राचीर से झंडारोहरण किया। 

15 अगस्त तक भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा निर्धारण भी नहीं हुआ था। यह काम 17 अगस्त को सम्पन्न हुआ। 17 अगस्त को रेडक्लिफ लाइन की घोषण हुई और देश के विभाजन की सीमा मय हुई। 


संकलतकर्ता: श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’


यह लोकतंत्र की हार है, सामाजिक कार्यकर्ता नेता नहीं बनते

- Friday, March 17, 2017 1 Comment
इरोम शर्मिला का संघर्ष और नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। सषस्त्र बल विषेषाधिकार अधिनियम को हटाने की मांग को लेकर लगभग 16 साल तक भूख हड़ताल का विष्व रिकार्ड कायम करने वाली ईराम शर्मिला को 2007 में मानवाधिकारों के लिए उनकी लड़ाई के लिए ग्वांगजू पुरस्कार, एशियाई मानवाधिकार आयोग ने 2010 में उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ प्लानिंग एंड मैनेजमेंट ने उन्हें रवींद्रनाथ टैगोर अवार्ड से नवाजा है। इतना सब कुछ होने के बाद जब ऐसी सामाजिक कार्यकर्ता लोकतंत्र के इस दंगल में उतरती है और चुनाव लड़ती है तो उसको वोट मिलते हैं सिर्फ 90। यह इस बात का प्रतीक है कि इस लोकतंत्र में हर सामाजिक कार्यकर्ता नेता नहीं बन सकता। ईरोम की हार के कईं मायने हैं और इसको कईं नजरियों से देखा जा सकता है।

राष्ट्रीय दलों को चुनौती देते क्षेत्रीय दल

- Tuesday, May 24, 2016 No Comments
भारत में जनप्रतिनिधि चुनने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाई जाती है जिसमें बहुदलीय व्यवस्था रखी गई है। भारत विष्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक गणराज्य है इस नाते इस देष में प्रत्येक व्यक्ति, जाति, वर्ग और समाज की आवाज सत्ता के केन्द्र तक पहुॅंचे इसकी व्यवस्था की गई है। पिछले कुछ दषकों से हो रहे चुनावों के परिणामों पर गौर करें तो यह समझ आता है कि वर्तमान में ये क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय दलों के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं।

लोकतंत्र मे विचार की लड़ाई

- Sunday, February 14, 2016 No Comments
देश वर्तमान मे वैचारिक लड़ाई के दौर से गुजर रहा है
एक तरफ वो लोग है जो सिर्फ अपने आप को ही सही बताने मे जूटे है और दूसरी तरफ वो सोच है जिसने बरसो भारत पर राज किया है
एक तरफ इस देश को एक आँख से देखने की कोशिश हो रही है वहीँ दूसरी तरफ ये देश सैकड़ो उम्मीदों के साथ अटल खड़ा है

विचारधारा की राजनैतिक लड़ाई

- Tuesday, June 16, 2015 No Comments
Shyam Narayan Ranga
श्याम नारायण रंगा
विचार व्यक्ति व समाज को आईना दिखाता है और यह विचार ही है जो किसी व्यक्ति या संगठन को खड़ा करता है या रसातल में ले जाता है। व्यक्ति का निर्माण भी विचार से ही होता है और विचार की लड़ाई लड़कर ही व्यक्तियों ने इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाया है। महात्मा गांधी व्यक्ति के रूप में एक स्थूल काया थे और जब विचार बनकर समाज के सामने आए तब राष्ट्रपिता भी लोग कहने लगे।

हताश जनता का उत्ताहित परिणाम

- Tuesday, February 10, 2015 No Comments
भारतीय लोकतंत्र ने वर्तमान में दिल्ली का जो परिणाम देखा उसको देखकर सबको आष्चर्य हो रहा है कि ऐसा भी होता है। जी हां ये ही है लोकतंत्र में जनभावना कि जनता जब जिसके साथ होती है तब दिल खोलकर होती है। ये जन तंत्र है जिसमें तंत्र का निर्माण जनता स्वयं करती है ताकि उसके प्रतिनिधि उस पर राज कर सके। इस देष में लोकतंत्र को लागू हुए सात दषक का समय हो रहा है परंतु लोक को अपना तंत्र नजर नहीं आ रहा। भारतीय लोक हमेषा किसी न किसी रोल माॅडल को अपनाता रहा है। चाहे राजनीति में गांधी की बात करें या नेहरू की या इंदिरा की या अटल की, समय समय पर भारतीय जन ने अपने नायकों का चुनाव किया है और उनसे उम्मीदें की है। वर्तमान समय मोदी व अब केजरीवाल का है। नरेन्द्र दामोदर दास मोदी को जो परिणाम लोकसभा में मिला उससे कहीं ज्यादा उत्साहित परिणाम दिल्ली विधानसभा में अरविंद केजरीवाल को मिला। ये दोनों की परिणाम हताष जनता के उत्साहित परिणाम नजर आते हैं।
वर्तमान में पिछले तीन दषक से भारतीय जन मानस में अपनी राजनीति के प्रति एक निराषा का माहौल पैदा हुआ है। नकारात्मक मीडिया व नकारात्मक भाषणों ने देष की जनता के मन में राजनीति की नकारात्मक छवि प्रस्तुत की है जिस देष में हुए घोटालों ने आग में घी का काम किया है। ऐसा नहीं है कि इस देष ने पिछले सात दषकों में प्रगति नहीं की है या देष गर्त में गया है परंतु जनता के मन में यह बात घर कर गई है कि राजनीति अच्छे लोगों का काम नहीं है और राजनेता एक ऐसा वर्ग है जो देष को लुटने का काम करता है। इसी निराषा के माहौल में इस देष में अन्ना हजारे ने एक आंदोलन किया भ्रष्टाचार के खिलाफ और इसी आंदोलन के समुद्र मंथन से निकला अरविंद केजरीवाल। हाथ में भ्रष्टाचार के खिलाफ झण्डा लिए हुए और आम आदमी की टोपी पहनकर आम आदमी के दिल की बात अपनी जुबान पर लाकर अरविंद केजरीवाल आम आदमी की आवाज बन गया। इस देष के आम आदमी ने इस अरविंद केजरीवाल के रूप में अपना एक नया नायक नजर आया और दिल्ली की जनता ने दिल खोलकर अपने नायक का स्वागत किया। इसी का परिणाम था कि पिछले चुनावों में जनता अपने नायक को जो समर्थन नहीं दे पायी उसी जनता ने मुक्त हस्त ने अपने नायक के हाथ मजबूत किए हैं।
SHYAM NARAYAN RANGA
एक हताष जनता को उत्साहित नायक नजर आया जिसने बिजली पानी सड़क और ऐसे ही छोटे छोटे मुद्दों पर अपनी बात कही और दैनिक दिनचर्या से जुड़े मसलों पर जनता को आकर्षित किया।आम आदमी के चारों और जो निराषा का माहौल है उसी निराषा के माहौल में एक उजाले की किरण है अरविंद केजरीवाल। फास्ट फूड के इस जमाने मंे जनता को भी फास्ट परिणाम की आषा है। पिछले लोकसभा चुनावों में दिल्ली की जनता ने सभी सीटें भाजपा को दी और सिर्फ नौ माह में जनता को अपनी उम्मीदों के अनुसार परिणाम नहीं मिले तो विधानसभा में 70 में से 67 सीटें आम आदमी पार्टी को दे दी। अब जब इतनी बड़ी जीत है और इतना बड़ा समर्थन है तो उम्मीदें भी बड़ी है कि हमारा नायक सब समस्याओं का समाधान कर देगा। लोगों को उम्मीद है कि आम आदमी का ये प्रतिनिधि हमारी सब समस्याओं को हर लेगा। जनता ने हमेषा किसी नेता या पार्टी को नहीं अपनी उम्मीदों को वोट दिया है और जनता ने हराया कभी किसी को नहीं सिर्फ अपनी इच्छाओं और कामनाओं को जिताने की कोषिष की है। ये जनता का मन है कि इतने सालों से इन सबको देख ही रहे हैं तो क्यों न एक बार एक नए नायक पर भी दांव खेला जाए और खुल कर खेला जाए ताकि किसी जगह अड़चन न हो। अब नया नायक अपनी निराष जनता की उम्मीदों पर कितना खरा उतरता है यह तो आने वाला समय बताएगा पर इतना जरूर है कि जनता ने अपना काम कर दिया उत्साह से अब काम जननायक को करना है।

श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’ बीकानेर
mob. 9950050079

मोदी का डर और नेहरू गांधी

- Monday, November 3, 2014 No Comments
SHYAM NARAYAN RANGA 
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरदार पटेल की जयंती मनाने में इतने व्यस्त रहे कि वे पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी की समाधि पर जाकर श्रद्धांजलि तक अर्पित नहीं कर पाए। ये इस देष की परम्परा रही है कि वर्तमान प्रधानमंत्री पूर्व प्रधानमंत्री की समाधि पर जाता है और श्रद्धा से अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है। इसे राजधर्म कह सकते हैं और जिस पद पर व्यक्ति है उस पद की गरिमा की बात भी कही जा सकती है। परन्तु भारतीय सभ्यता और संस्कृति का सबसे ज्यादा ढिंढोरा पीटने वाली पार्टी के नेता द्वारा यह एक असांस्कृतिक कदम निष्चित ही चैंकाने वाला है। किसी भी राजनेता का कोई भी कदम राजनीति की आहट देता है। इसी तरह मोदी जी का इंदिरा जी की समाधि पर नहीं जाना भी किसी न किसी विचार या मन की थाह की पहचान बताता है। भारतीय जनता पार्टी की मुष्किल ये है कि उनके पास अपना कोई इतिहास नहीं है और या यूूं कहे कि ऐसा कोई इतिहास नहीं है जिसको वे देष की आजादी या राष्ट्रभक्ति से जोड़ सके। इसलिए ऐतिहासिक नेता के अभाव में इस पार्टी ने सरदार पटेल को पकड़ा और उसको भुनाना शुरू कर दिया। ये तो वो ही बात हुई कि जिनके खुद के बाप दादाओं का इतिहास नहीं होता वो बाजार से कोई अच्छा सा फोटो लाकर आंगन में लगा दे और आने जाने वालों को बताए कि ये हैं मेरे दादाजी। भारतीय जनता पार्टी की पृष्ठभूमि संघ की रही है और संघ पर किसी समय गांधी की हत्या के आरोप लगे और इन्हीं लौह पुरूष ने संघ पर अपने हस्ताक्षरों से पाबंदी लगाई थी और इसको राष्ट्र को खतरा देने वाला संगठन बताया था। पटेल कांग्रेसी थे भले ही उनके नेहरू से विवाद रहे हो परंतु विचारधारा कंाग्रेसी ही थी और उन्होंने अपने विचार को कभी इतना उग्र नहीं होने दिया और वे हमेषा कांग्रेस में उदारवादी नेता के रूप में नजर आए। इसी ऐतिहासिक कांग्रेसी नेता को अपना बताकर महान् नेत्री आयरन लेडी इंदिरा गांधी की अनेदखी करना प्रधानमंत्री मोदी जी की किस मानसिकता को बताता है यह कहने की जरूरत नहीं है।
PT. JAWAHAR LAL NEHRU



यूं देखा जाए तो कांग्रेस के विरोधी लोग कभी कांग्रेस से नहीं डरते उनका डर हमेषा नेहरू और गांधी से रहा है। मोदी जी कांग्रेस विरोधी होने के नाते ये अच्छे से जानते हैं कि कंाग्रेस संगठन से उनको कोई खतरा नहीं है परंतु नेहरू गांधी खानदान हमेषा उनकी भावी राहों में भी रोड़ा बना रहेगा। मोदी जी एक श्रेष्ठ राजनेता होने के नाते ये भी जानते हैं कि जब तक इस देष में नेहरू और इंदिरा और गांधी जी का नाम रहेगा तब तक कांग्रेस संगठन जिंदा रहेगा और उसका अस्तित्व बना रहेगा। इसलिए मोदी जी दो अक्टूबर की छुट्टी को हमेषा के लिए निरस्त कर स्वच्छता का नारा दिया। ये मोदी जी की मजबूरी है कि महात्मा गांधी का कद इतना बड़ा है कि उनको उपेक्षित भारत में कभी नहीं किया जा सकता परंतु दो अक्टूबर की छुट्टी के नाम पर महात्मा गांधी हमेषा किसी न किसी रूप में याद रहेंगे तो क्यूं न जड़ पर ही चोट की जाए और ये छुट्टी रद्द कर दी जाए ताकि आने वाले समय में अभियान तो लोग भूल ही जाएंगे और गांधी भी धीरे धीरे भूला दिए जाएंगे। यही डर नेहरू और इंदिरा से मोदी जी को सता रहा है और इंदिरा जी की पुण्यतिथि पर उनको श्रद्धांजलि देने नहीं जाना इसी रणनीति का हिस्सा है कि क्यूं इंदिरा जी को याद किया जाए क्यूंकि जब तक इंदिरा जी याद रहेगी उनके कार्य याद रहेंगे उनको आयरन लेडी के रूप में याद किया जाएगा तब तक कांग्रेसी की जड़ों में पानी जाता रहेगा तो क्यूं न इंदिरा को उपेक्षित किया जाए और यही डर मोदी जी को शक्ति स्थल जाने से रोक रहा है। नेहरू की तो आलोचना मोदीजी और संघ शुरू से ही करते रहे हैं। तो वास्तव में ये सिर्फ इंदिरा जी को श्रद्धांजलि नहीं देने तक की बात नहीं है ये विचारधारा की लड़ाई का एक हिस्सा है और कांग्रेस की मूल जड़ को समाप्त करने की रणनीति है कि कैसे करके कांग्रेस को समाप्त किया जाए और ये प्रयास आज से नहीं आजादी के बाद से हो रहे हैं और पिछले लोकसभा चुनावों में पहली बार कांग्रेसी की धुर विरोधी पार्टी को मौका मिला है पूर्ण बहुमत में सत्ता में आने का तो निष्चत रूप से ये लोग अपनी रणनीति और विचारधारा को लागू करने के प्रयास करेंगे। लेकिन शायद मोदी जी भूल रहे हैं कि जब तब आधुनिक भारत के निर्माता की बात होगी तब तब नेहरू याद आएंगे। जब जब देष में बड़ी बड़ी योजनाओं को देखा जाएगा। भेल, सेल, सरदार सरोवर आदि आदि देखे जाएंगे तब तब नेहरू याद आएंगे। जब जब पंचषील के सिद्धांतों की बात होगी नेहरू याद आएंगे। जब जब पाकिस्तान के दो टुकड़े कर अलग बांग्लादेष बनाने की बात होगी इंदिरा गांधी याद आएगी, जब जब बैंको के राष्ट्रीयकरण की बात होगी, जब जब देषी राजाओं के प्रिवी पर्स बंद करने की बता होगी, जब आॅपरेषन ब्लू स्टार करके देष को आतंकवादियों से मुक्त करवाने की बात होगी तब तब इंदिरा गांधी याद आएगी और रही बात महात्मा गांधी की तो वो इस देष की आत्मा है और इस देष की रग रग में गांधी का वास है। भारत की जीवनषैली के रोम रोम में गांधीवाद भरा है इसलिए इन लोगों से मुक्त होकर देष को देखना मुर्खता है। आज अगर मोदी जी सही को सही कहें और गांधी, नेहरू, इंदिरा के दिए योगदान को याद रखें और उनके विकास को आगे ले जाने की बात करें तो अच्छा लगता। मोदी जी की कार्यषैली भी इंदिरा गांधी जैसी ही है फिर क्यूं डर सता रहा है मोदी जी को। भारत के प्रधानमंत्री को दिमाग खुला व दिल बड़ा रखना चाहिए क्यूंकि भारत सिर्फ गुजरात नहीं है और न ही भारत का मतलब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से है। 
INDRA GANDHI


श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’पुष्करणा स्टेडियम के पास,नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर {राज0}मोबाईल - 9950050079