इरोम शर्मिला का संघर्ष और नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। सषस्त्र बल विषेषाधिकार अधिनियम को हटाने की मांग को लेकर लगभग 16 साल तक भूख हड़ताल का विष्व रिकार्ड कायम करने वाली ईराम शर्मिला को 2007 में मानवाधिकारों के लिए उनकी लड़ाई के लिए ग्वांगजू पुरस्कार, एशियाई मानवाधिकार आयोग ने 2010 में उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ प्लानिंग एंड मैनेजमेंट ने उन्हें रवींद्रनाथ टैगोर अवार्ड से नवाजा है। इतना सब कुछ होने के बाद जब ऐसी सामाजिक कार्यकर्ता लोकतंत्र के इस दंगल में उतरती है और चुनाव लड़ती है तो उसको वोट मिलते हैं सिर्फ 90। यह इस बात का प्रतीक है कि इस लोकतंत्र में हर सामाजिक कार्यकर्ता नेता नहीं बन सकता। ईरोम की हार के कईं मायने हैं और इसको कईं नजरियों से देखा जा सकता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता जिसको वोट दे वो ही नेता बन कर आगे आता है और जनता किसको वोट दे यह बात वर्तमान में जाति धर्म ओर बांटने की राजनीति पर आधारित है। कौन कितना क्या कैसा संघर्ष करता है और कौन कितना विकास करवाता है यह बात वर्तमान परिपेक्ष्य में प्रथम दृष्टया दृष्टिगोचर नहीं होती है। यहां लोकतंत्र में 16 साल तक संघर्ष कर अपनी जवानी होम करने वाली ईरोम चुनाव हार जाती है जिसने मणिपुर के लिए संघर्ष को विष्व स्तर तक पहचान दिलवाई, यहां भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी चुनाव हार जाती है परंतु पूर्व दस्यु सुंदरी फूलन देवी सांसद बनकर लोकसभा में जाती है कहने का मतलब है कि काम, छवि और विकास नहीं जाति, धर्म और संप्रदाय की राजनीति में संघर्ष की जगह बहुत बड़ी नहीं है। जहां वोट जातियों को बांट कर दिए जाते हैं जहां टिकटों का बंटवारा धर्म को ध्यान में रखकर किया जाता है वहां ईरोम जैसा संघर्ष हाषिए पर चला जाता है। ये संघर्षों की राजनीति का नहीं दक्षिणपंथ के विकास का दौर है जहां संघर्ष की जरूरत नहीं।
अब दूसरा पहलू देखे तो यह भी बात सामने आती है कि सिर्फ लड़ने से जीत नहीं मिलती। ईरोम का संघर्ष निष्चित ही अपने आप में मिसाल है लेकिन लड़ाई की रणनीति लड़ाई की जीत का आधार है, ईरोम के पास मुद्दा था लेकिन तकनीक नहीं। ईरोम ने यह कहकर भूख हड़ताल तोड़ी थी कि आम आदमी उसके इस मुद्दंे से जुड़ नहीं रहा है। जबकि ईरोम ने जो मुद्दा उठाया वो बोर्डर पर रहने वाले लोगों के लिए एक बड़ा मुद्दा है लेकिन ईरोम ने इसको लेकर संघर्ष तो किया लेकिन आमजन तक वह अपनी बात पहुॅंचा नहीं पाई और जनता ने ईरोम के संघर्ष को नकार दिया। ईरोम क्यों अपनी बात से आमजन को जोड़ नहीं पाई, क्यों इतना बड़ा मुद्दा अकेले ईरोम तक ही सिमट कर रह गया, क्यों मणिपुर की आम महिलाएं जो सषस्त्र बल विषेषाधिकार अधिनियम का विरोध करती रहीं है ईरोम को अपना समर्थन न दे रही इसके लिए रणनीति व संघर्ष के तरीके का अभाव एक कारण हो सकता है। दूसरी बात यह भी सामने आई कि ईरोम का बाॅयफ्रेंड उसकी हार का कारण बना। ईरोम के यह बाॅयफं्रेंड डेसमंड आयरलैंड में रहता हैं और इस कारण मणिपुर ने अपनी इस बेटी को बाहरी मान लिया और ईरोम को बाहरी उम्मीदवार करार दे दिया गया। डेसमंड जासूस है और उसने ईरोम को भूख हड़ताल तोड़ने के लिए प्रेरित किया ये बात भी ईरोम के विरोध में उठाई गई। इस प्रकार ईरोम के पास जज्बा था, जोष था, जूनून था, मुद्दा था लेकिन ऐसी रणनीति नहीं थी जो भाजपा और कांग्रेस जैसी पकी पकाई पार्टीयों का मुकाबला कर सके। ईरोम का 16 सालों का संघर्ष और त्याग इन बड़ी पार्टियों के संसाधनांे और चकाचैंध के सामने फीका पड़ गया।
ईरोम जैसी सख्सियत की हार लोकतंत्र की हार है। दुनिया में निःसंदेह लोकतंत्र राज करने की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था है लेकिन इस व्यवस्था की भी अपनी सीमाएं है और अपने दोष है और जैसा की कईं राजनैतिक जानकार कहते हैं कि लोकतंत्र मुर्खों का शासन है, ईरोम की हार इस उक्ति पर सोचने को मजबूर कर देती है। जहां संघर्ष हारता है वहां जनता हारती है, वहां मुद्दा हारता है, वहां व्यवस्था हारती है। मगर ध्यान रहे कि मुद्दे कभी मरते नहीं, संघर्ष कभी रूकते नहीं और ईरोम कभी हारती नहीं। ईरोम जानती है कि उसके संघर्ष में विजय शायद नहीं है इसलिए हार जीत का असर ऐसे व्यक्तित्वों पर नहीं पड़ता। चूंकि लड़ना ईरोम का स्वभाव है उसके जीवन का हिस्सा है इसलिए वो लड़ती रही ताकि संघर्ष रूके नहीं। जिस दिन लोकतंत्र ईतना समझदार हो जाएगा कि ईराम जीत जाए उस दिन लोकतंत्र का सुंदर स्वरूप सामने आएगा।
श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’
नत्थूसर गेट के बाहर
पुष्करणा स्टेडियम के पास
बीकानेर {राजस्थान} 334004
मोबाईल 9950050079

1 One Comment " यह लोकतंत्र की हार है, सामाजिक कार्यकर्ता नेता नहीं बनते "
Yes Social worker are not to be created,Person will become a social worker after seeing badness in world. Manisha Bapna is a very cautious samajik karyakarta who always works in the interest of the people and gives them every possible help.
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