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बीकानेर का राठौड राजवंश

- Friday, January 29, 2021 No Comments

 
बीकानेर नगर की स्थापना राठौड़ राजा राव जोधा के पुत्र राव बीका ने की थी। ऐसा नहीं है कि नगर स्थापना से पूर्व यह क्षेत्र निर्जन था। राठौड़ राजा राव बीका की नगर स्थापना से पूर्व बीकानेर के क्षेत्र जांगल प्रदेश के नाम से जाना जाता था। यह क्षेत्र मारवाड़ के उत्तर क्षेत्र में स्थित है। इस क्षेत्र का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। इस प्रदेश को उस समय कुरू प्रदेश के नाम से जाना जाता था। मारवाड़ के शासक राव जोधा के छः रानियां व 17 पुत्र थे। जिसमें दूसरे पुत्र बीका ने 1465 में जांगल प्रदेश में राठौड़ वंश की रियासत की स्थापना की तथा 1488 में बीकानेर नगर बसाया। अतः राव बीका को बीकानेर राज्य का संस्थापक माना जाता है। राव जोधा का सबसे बड़ा पुत्र राव नीबा, राव जोधा के शासन काल में ही स्वर्गवासी हो गया था। दूसरा पुत्र राव बीका ही मारवाड़ का उत्तराधिकारी था लेकिन राव जोधा ने अपनी प्रिय पत्नीध्रानी जसमादे के प्रभाव में आकर दूसरे पुत्र राव सातल को जोधपुर का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। अपने पिता राव जोधा की इस हरकत से बीका नाराज हो गया। अपने चाचा के साथ राव बीका ने जोधपुर छोड दिया और करणी माता के आशीर्वाद से जांगल प्रदेश पर अधिकार कर लिया। इसी कारण इस क्षेत्र के राजा को जय जंगलधर बादशाह भी कहा गया। बीका के बढते प्रभाव से जोधपुर के राजा व राव बीका के पिता राव जोधा को डर लगने लगा और उसको यह भय सताने लगा कि कहीं उनका बेटा अपना अधिकार पाने के लिए जोधुपर पर आक्रमण न कर दे। परंतु राव बीका ने अपने पिता को वचन दिया कि वह कभी भी जोधुपर पर आक्रमण नहीं करेगा व जोधपुर रियासत को अपना ज्येष्ठ मानेगा। बीकानेर के राजाओं का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:-

1.राव बीका (1465-1504)


Rao Bikaji 
राव जोधा के पुत्र राव बीका ने 1465 ई. में जांगल प्रदेश जीतकर बीकानेर के राठौड़ राजवंश की स्थापना की। एक मान्यता के अनुसार जांगल प्रदेश को राव बीका और जाट नेता नेरा ने मिलकर जीता, दोनों के नाम पर इसका नाम बीकानेर रखा । इस अभियान में राव बिका को करणी देवी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ जिससे बीका ने अनेक छोटे बड़े कबीलो को जीत लिया। इस प्रकार बीकानेर में राठौड़ वंश की स्थापना हुयी। इन्होंने 1488 में बीकानेर शहर की स्थापना कर उसे अपनी राजधानी बनाया जो द्वितीय राठौड़ सत्ता का प्रमुख केंद्र बन गया । उसकी मृत्यु होने पर उसका ज्येष्ठ पुत्र नरा बीकानेर माँ स्वामी बना। इसके पश्चात बीका के दो पुत्र नारा और लूणकरण थे जो बीकानेर के स्वामी बने इन्होंने जैसलमेर पर भी अपना अधिकार जमा लिया

2. राव लूणकरण

नारा का देहांत 13 जनवरी 1505 को हो गया। नारा के निःसंतान होने से उसका छोटा भाई लूणकरण बीकानेर का शासक बना। राव लूणकरण पिता की भांति साहसी और वीर योद्धा था। उसकी शक्ति का लोहा रुद्रेवा, चायलवाडा आदी स्थानों के सरदार मानते थे, जिनका उसने निजी भुजबल से दमन किया व बड़ा दानी था। करमचंदवशोकिर्तनम काव्य में उसकी दानशीलता कर्ण से की गई है,  बिठू सुजा ने अपने जैतसी रो छंद में कलयुग का कर्ण कहां है। 1526 में धोसा नामक स्थान पर इसकी मृत्यु हो गई थी।

3. राव जैतसी (1526-1542 ई.)

बीकानेर राज्य का प्रतापी शासक एवं राव लूणकरण का पुत्र था इनके समय कामरान ने भटनेर पर आक्रमण किया उस पर अधिकार कर लिया 1534 में राव जैतसी में मुगल सेना पर आक्रमण कर भटनेर को मुगलों से छुड़ा लिया। इस युद्ध का वर्णन बिट्ट सुजा द्वारा लिखित राव जैतसी रो छंद में मिलती है खानवा के युद्ध में राव जैतसी अपने कुंवर कल्याण को सांगा की सहायता के लिए भेजा था । पहोबाध्साहेबा- बीकानेर शासक राव जैतसी में मारवाड़ के शासक मालदेव के बीच युद्ध हुआ इस युद्ध में राव जैतसी मारा गया था बीकानेर राज्य की पराजय हुई मालदेव ने बीकानेर का व्यवस्थापक कुंपा को नियुक्त किया था।


4.राव कल्याणमल(1544-1574) 

1544 में कल्याणमल बीकानेर का राजा बना। राव जैतसी के पुत्र जिन्होंने गिरिसुमेल के युद्ध मे शेरशाह सूरी की सहायता की थी । इस युद्ध के बाद शेरशाह ने बीकानेर राज्य का शासन राव कल्याणमल को सौंपा। बीकानेर के पहले शासक जिन्होंने 1570 ई. के अकबर के नागौर दरबार मे अकबर की अधीनता स्वीकार की और वैवाहिक संबंध स्थापित किए तथा अपने छोटे पुत्र पृथ्वीराज को , जो उच्च कोटि का कवि और विष्णु भक्त था, अकबर की सेवा में भेजा । इन्ही पृथ्वीराज ने ‘वेलि किसन रुक्मणी री’ की रचना की। अकबर ने 1572 में कल्याणमल के पुत्र रायसिंह को जोधपुर का शासक नियुक्त किया।

5. महाराजा रायसिंह(1574-1612) का जन्म 20 जुलाई 1541 को हुआ। इसके पिता राव कल्याणमल थे। इनको राजपूताने का कर्ण महाराजा की उपाधि प्रदान की गई। नागौर दरबार के बाद 1572 ई. में अकबर ने इन्हें जोधपुर का प्रशासक नियुक्त किया। मुगल दरबार में जयपुर के बाद बीकानेर राजघराने का ही अकबर से अच्छा संबंध कायम हुआ। महाराजा रायसिंह ने 1573 में गुजरात के मिर्जा बंधुओं का दमन किया, 1574 में मारवाड़ के चंद्रसेन व देवड़ा सुरताण का दमन किया। महाराजा रायसिंह 1591 में खानेखाना की सहायता के लिए कंधार गये थे, 1593 रायसिंह थट्टा अभियान के लिए दानियाल का दमन करने गए, अकबर ने 1593 में जूनागढ़ तथा 1604 में शमशाबाद तथा नूरपुर की जागीर दी, जहांगीर ने रायसिंह का मनसब 5000 जात व 5000 सवार कर दिया। 1594 ई. में मंत्री कर्मचंद की देखरेख में बीकानेर किले (जूनागढ़) का निर्माण कराया जिसमे ‘रायसिंह प्रशस्ति’ उत्कीर्ण करवाई। महाराजा रायसिंह को मुंशी देवीप्रसाद द्वारा ‘राजपूताने का कर्ण’ की उपमा दी गयी।‘रायसिंह महोत्सव’ व ‘ज्योतिष रत्नमाला’ की भाषा टीका, महाराजा रायसिंह द्वारा लिखित रचनाएँ।  ‘कर्मचन्द्रों कीर्तनकम काव्यम’ इस ग्रन्थ में महाराजा रायसिंह को राजेन्द्र कहा गया है तथा लिखा है कि वह विजित शत्रुओं के साथ भी बड़े सम्मान का व्यवहार करते थे। महाराजा रायसिंह की मृत्यु सन 1612 ई. में बुरहानपुर में हुई।


6. दाव दलपत (1612-13)

महाराजा रायसिंह की मृत्यु के बाद दलपत सिह बीकानेर का शासक बना। राव दलपत का सम्राट जहांगीर से मनमुटाव हो गया। जहांगीर ने दलपत को गद्दी से हटाकर उसके भाई सूरसिह को शासक बना दिया।


7. महाराजा कर्ण सिंह (1631-1669)

पिता सुरसिंह के देहावसान के बाद ये सन 1631 में बीकानेर के सिंहासन पर बैठे। ये बीकानेर के प्रतापी शासक थे मुगल शासक औरंगजेब ने इन्हें जांगलधर बादशाह की उपाधि दी। मुगल शहजादों मे उतराधिकार संघर्ष के समय कर्णसिहं तटस्थ रहे। लेकिन उन्होंने अपने दो पुत्रों- पद्मसिंह और केसरीसिंह को औरंगजेब की ओर से भेजा।

मतीरे की राड़ - 1644 में कर्ण सिंह और अमर सिंह के बीच हुई थी जिसमें अमर सिंह विजय रहे । 17 वी शाताब्दी में बीकानेर शासक कर्ण सिंह ने बीकानेर से 25ाउ दूर देशनोक में करणी माता का मंदिर बनाया था। कर्णसिंह के काल की रचनाओं मे साहित्य कल्पद्दुम व कर्णभूषण (गंगा नंद मैथिली द्वारा रचित) प्रमुख हैं।

8. महाराजा अनूप सिंह –

  • औरंगजेब द्वारा ‘माही मरातिव’ और महाराजा की उपाधि
  •  बीकानेरी चित्रकारी का स्वर्ण युग, उस्ता कला को लाहौर से बीकानेर लाने का श्रेय
  • अनूप संग्रहालय का निर्माण
  • 33 करोड़ देवी देवताओं के मंदिर की संज्ञा वाले बीकानेर के हेरम्भ गणपति मंदिर का निर्माण का

9. सूरत सिंह राठौड

हनुमानगढ़ को पहले भटनेर (भट्टी राजपूतों का दुर्ग) कहा जाता था। 1805 ई. में बीकानेर रियासत में शामिल किये जाने के बाद इसको ‘हनुमानगढ़’ का नाम दिया गया था। सूरत सिंह के समय 1805 ई. में 5 माह के विकट घेरे के बाद राठौड़ों ने इसे ज़ाबता ख़ाँ भट्टी से छीना

यहाँ बीकानेर राज्य का एकाधिकार हुआ। मंगलवार के दिन इस क़िले पर अधिकार होने के कारण इस क़िले में एक छोटा सा हनुमान जी का मंदिर बनवाया गया तथा उसी दिन से उसका नाम ‘हनुमानगढ़’ रखा गया।

गंगानगर के सूरतगढ़ शहर तथा बीकानेर के सूरसागर झील के निर्माण का श्रेय

सूरत सिंह ने 1818 ई. में अंग्रेज़ ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सन्धि कर ली थी।

10. महाराजा सरदार सिंह –

क्रांति के समय न केवल बीकानेर के महाराजा बल्कि अंग्रेजो की सहायता हेतु बाडलू गाँव (हिस्सार) तक जाने वाले एकमात्र राजस्थानी शासक 

11. महाराजा गंगा सिंह –

Mahara Gangasingh
  • प. नेहरू द्वारा राजस्थान के भागीरथ की संज्ञा
  • आधुनिक बीकानेर के निर्माता
  • अंग्रेजो द्वारा ‘केसर ऐ हिन्द’ की उपाधि
  • ऊँटो की सैन्य टुकड़ी – गंगा रिसाला
  • 1899 में चीन के साथ अफीम युद्ध में तथा 1900 में दक्षिण अफ्रीका में डचों के विरुद्ध बोआर के युद्ध में अंग्रेजो के साथ
  • 26 अक्टूम्बर 1927 में राजस्थान की प्रथम गंगनहर सिंचाई परियोजना का लोकार्पण
  • लन्दन में आयोजित तीनो गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने का श्रेय
  • आधुनिक गंगानगर शहर का निर्माण
  • 1922 से 1928 तक b.h.u. के कुलपति

12. महाराजा सार्दुल सिंह

आजादी एंव एकीकरण के समय बीकानेर के महाराजा


अलग पहचान है बीकानेर की रम्मतों की

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Rammat At Bikaner In Holi Festival
होली का त्योहार पूरे विश्व में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। भारत में यह त्योहार भारतीय सभ्यता और संस्कृति का शानदार प्रतीक है। भारत का प्रत्येक प्रदेश होली में अपनी विशिष्टता लिए है। जिस प्रकार ब्रज की लट्ठमार होली ने अपनी अलग पहचान बनाई है, उसी प्रकार राजस्थान के बीकानेर की होली में खेली जाने वाली रम्मतों में भी अपनी खास विशेषता है।


रम्मत का शाब्दिक अर्थ है खेलना। लेकिन बीकानेर में यह खेल शहर के पाटों पर और चैकों में खेला जाता है और होली के मौसम में इन रम्मतों में बीकानेर की संस्कृति की समृद्धता स्पष्ट झलकती है।


रम्मतें नाटक की एक विधा है जिसमें मनोरंजन के लिए तरह-तरह के नाटक खेले जाते हैं या विभिन्न प्रकार की गायकी से दर्शकों का मनोरंजन किया जाता है। बीकानेर में मूलतः दो तरह की रम्मतें देखने को मिलती हैं।

पहली प्रकार की रम्मतें स्वांग मेरी की रम्मतें हैं जिनमें ख्याल, लावणी व चैमासों के माध्यम से प्रस्तुति दी जाती है। रम्मतों में ख्याल हर साल नए जोड़े जाते हैं और इन ख्याल के माध्यम से देश व प्रदेश की वर्तमान व्यवस्थाओं पर तथा सामाजिक कुरूतियों पर भी कटाक्ष किया जाता है और इसका प्रभावशाली प्रस्तुतिकरण होता है।


सामंतशाही दौर में दम्माणी चैक में खेली जाने वाली रम्मत में स्वर्गीय बच्छराज जी व्यास ने ख्याल में श्भगवान पधारो भारत में, तुम बिन पड़ रहया है फोड़ा.......श् का प्रस्तुतिकरण इतना प्रभावी तरीके से किया कि उस समय इस ख्याल पर सरकारी प्रतिबंध लग गया था।


इसी तरह वर्तमान में भी महंगाई, राजनैतिक भ्रष्टाचार सहित दहेज, भ्रूण हत्या, दल-बदल सहित कईं विषयों को इन ख्यालों के माध्यम से उठाया जाता हैं।


इस साल की रम्मतों में राहुल गांधी व नरेंद्र मोदी सहित अरविंद केजरीवाल भी शामिल है और भ्रष्टाचार को ज्यादा तवज्जो दी गई है। इन रम्मतों का दूसरा आकर्षण है लावणी।

बीकानेर की रम्मतों में लावणी दो तरह की है। एक तो भक्ति रस पर आधारित लावणी है, जिसमें भगवान कृष्ण व राधा के रूप सौंदर्य का वर्णन किया गया है और दूसरी है सुंदर नायिका के नख-शिखा सौंदर्य से वर्णित शायरी। इन रम्मतों की लावणी में नायक अपनी नायिका को बरसों बाद देखता हैं और उसके रूप सौंदर्य का वर्णन करता है और यह साबित करने की कोशिश करता है कि मेरी नायिका से सुंदर कोई स्त्री इस पृथ्वी पर नहीं है। नायिका अपने इस सौंदर्य से परिचित है और वह नायक को अपने पतिव्रत होने का सबूत देती है।


इसी प्रकार इन रम्मतों का अगला चरण है चैमासा। चैमासे को लेकर यह बात है कि इस मरू प्रदेश के पुरुष किसी समय में दूर देशों में कमाने के लिए जाया करते थे और चैमासे की ऋतु में उनकी पत्नी या प्रेयसी उनको याद करती थी और भगवान से प्रार्थना करती थी कि इस चैमासे में उसका पति या प्रेमी घर आए।

वास्तव में चैमासे में नायक व नायिका की विरह वेदना का वर्णन किया जाता है। स्वांग मेरी की इन रम्मतों में ख्याल लावणी चैमासे के क्रम से गुजरती यह रम्मत रात भर चलती है और अलसुबह इसका समापन हो जाता है।


दूसरी तरह की रम्मतें है कथानक प्रधान। इनमें प्रमुख रूप से हड़ाऊ मेरी की रम्मत, भक्त पूरणमल की रम्मत और शहजादी नौटंकी और वीर अमरसिंह राठौड़ की रम्मत का मंचन किया जाता है। इन सब कथानकों की कहानी अलग-अलग है। इसमें हड़ाऊ मेरी की रम्मत में प्यार है, छेड़छाड़ है और राजा-रानी का रूठना-मनाना भी है।

भक्त पूरणमल की रम्मत में पूरणमल सौतेली मां को प्यार करने से मना कर देता है और अपने जीवन का बलिदान तक कर देता है। इस रम्मत में वेदों व पुराणों का उल्लेख किया गया है और शानदार जीवन चरित्र का प्रस्तुतिकरण है।

शहजादी नौटंकी में भी कथानक शानदार है और शहजादी से शादी करके नायक अपना प्रण पूरा करता है। वीर अमरसिंह राठौड़ की रम्मत वीर रस की शानदार कथानक लिए हुए रम्मत है, जिसमें नागौर के राव अमरसिंह के जीवन चरित्र का वर्णन किया गया है। वास्तव में बीकानेर में खेली जाने वाली इन रम्मतों में परिवार व एक विशेष प्रकार की जाति समुदाय के लोग जुड़े हैं और इन्होंने अपने परिवार की परम्परा के तौर पर इन रम्मतों को आज तक कायम रखा है।

कुछ रम्मतें जरूर बंद हो गई है परंतु जो रम्मतें वर्तमान में खेली जा रही है, उनके प्रति कलाकारों का समर्पण व उनकी कला की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। लुप्त हो रही यह कला बीकानेर में आज भी जीवित है और इनका मंचन करने वाले कलाकारों को यह नहीं पता कि वे इस देश की एक शानदार समृद्ध वैभवशाली परम्परा को संजोकर रख रहे हैं।

Rammat At Bikaner Holi

मैं यहां यह बता देना चाहता हूं कि बीकानेर की यह रम्मतें पद्य में है और रातभर गाकर इनका मंचन किया जाता है। जो इन रम्मतों की व इनको प्रस्तुत करने वालों की कला में जान डाल देने वाला पक्ष है।

भक्त पूरण मल की रम्मत के कलाकर किसन कुमार बिस्सा ने बताया कि किसी कारणवश दिल्ली व जयपुर में जवाहर कला केन्द्र और रवीन्द्र रंगमंच पर रम्मत प्रस्तुत करने का मौका मिला, तो वहां उपस्थित कलाकारों व दर्शकों ने अपने दांतों तले अंगुली दबा ली और काफी प्रस्ताव इन रम्मतों को देश व प्रदेश में प्रस्तुत करने के लिए आ रहे हैं लेकिन साधन के अभाव में वह यह काम नहीं कर पा रहे हैं।

इसी तरह ख्याल का निर्माण व लावणी को गाना व रम्मत में दौबेला, चैबेला, कड़ा, दौड, लावणी, ध्रुपद, कली, भेटी सहित विभिन्न प्रकार के पद्यात्मक प्रयोग इन रम्मतों के स्तर को काफी बड़ा कर देते हैं।


इन रम्मतों में संगीत की मुश्किल से मुश्किल साधना को काफी सरलता से साधा जाता है। जिस किसी बड़े कलाकार ने आज तक इनका मंचन देखा है उसने इसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। जरूरत है सरकारी स्तर पर या संगठनात्मक स्तर पर ऐसे प्रयासों की कि बीकानेर की यह रम्मतें अपना वैभव कायम रख सके और इनको संजोकर रखा जा सकें। आज के युवाओं में इनका रूझान दिन-ब-दिन घटता जा रहा हैं, ऐसे में इनका संरक्षण काफी जरूरी है ताकि भारत के सुदूर प्रांतों में फैली यह परम्परा अपना अस्तित्व कायम रख सकें।


श्याम नारायण रंगा

पूनरासर मेले पर प्रशासनिक व्यवस्था मेरी नजर में

- Sunday, September 11, 2016 1 Comment
बीकानेर का होने के नाते यहां होने वाले मेले मगरियों से भावनात्मक जुड़ाव रहा है और जिस होम सिकनेस का आम बीकानेरी शिकार है उसका एक कारण ये मेले मगरिये भी है, ऐसा मेरा मानना है। प्रतिवर्ष भाद्रपद में बीकानेर का आम नागरिक कैसे न कैसे इन मेलों मगरियों से जुड़ जाता है। ऐसे अवसर पर जहां आमजन का बड़े स्तर पर जुड़ाव हो वैसे में लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रषासन की जिम्मेदारी बड़ी हो जाती है कि वे धार्मिक आस्था व शहर की संस्कृति से जुड़े ऐसे पर्वों पर अपनी भूमिका किस तरह निभाते हैं इसका आंकलन आमजन किसी न किसी रूप में अवष्य करता है। सुधी नागरिक होनेे के नाते मेरा यह मानना है कि इस बार भी मेले में पुलिस व प्रषासन की व्यवस्था तो थी परंतु यह व्यवस्था ऊॅंट के मुॅंह में जीेरे के समान थी।

जीवन की उमंग का प्रतीक ऋतुराज बसंत

- Friday, February 12, 2016 No Comments
हमारी संस्कृति में पर्वों का विभाजन मौसम के अनुसार ही होता है। इन पर्वों पर हमारे मन में स्वतः ही उत्साह उत्पन्न हो जाता है। शरत् ऋतु के बाद ग्रीष्म व उसके बाद बरसात उसके बाद पुनः सर्दी का यह बदलता क्रम शरीर मे बदलाव के साथ साथ उत्साह का भी संचार करता है और यही कारण है कि हर मौसम में कोई न कोई त्यौंहार जरूर होता है।
दशहरा, दीपावली, मकर संक्रांति, बंसत पंचमी, होली, रक्षाबंधन जैसे त्यौंहारो में आदमी की संवेदनाएं अगर सुसुप्तावस्था में भी हो तो वो स्वतः ही जाग्रत हो जाती है। ऋतुओं पर आधारित त्यौंहारों के इस देश में में छः ऋतुएँ होती है। इन छः ऋतुओं में ऋतुराज बसंत ऋतु को ही कहा जाता है क्योंकि बसंत का मौसम भारतीय मौसम विज्ञान के अनुसार समशीतोष्ण वातावरण के प्रारम्भ होने का संकेत है जिसमें शरत् ऋतु अपने अंतिम पड़ाव पर होती है और ग्रीष्म की आहट होनी शुरू होती है।

साम्प्रदायिक सौहार्द का त्यौंहार आखाबीज

- Monday, April 20, 2015 1 Comment
बीकानेर, बीकानेर नगर की स्थापना सम्वत् पंद्रह सौ पैतालीस में राव बीका ने की थी और तब से लकर आज तक आखाबीज का यह त्यौंहार बीकानेर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। किसी भी शहर की स्थापना का दिन निष्चित रूप से उस शहर के वाषिंदों के लिए एक महत्वपूर्ण दिन होता है।

Shyam Narayan Ranga Photo On Holi Festival

- Tuesday, March 10, 2015 No Comments
Shyam Narayan Ranga Holi Bikaner

Shyam Narayan Ranga Holi Bikaner 

उस्ताद रमणसा की रम्मत: शहजादी नौटंकी

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Shyam Narayan Ranga
Bissa chowk rammat holi bikaner 
बिस्सों के चैक में होली के अवसर पर शहजादी नौटंकी का मंचन किया जाता है। यह रम्मत उस्ताद रमण सा बिस्सा की रम्मत के नाम से जानी जाती है। इस रम्मत में सर्वप्रथम बीकानेर के पुष्करणा समाज के बिस्सा जाति की कुलदेवी माॅ आषापुरा का आगमन होता है। इस रम्मत का यह दृष्य देखने लायक होता है।

फक्करदाता की रम्मत से होली का आगाज

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Shyam Narayan Ranga holi bikaner Fakkardaata rammat bikaner
बीकानेर में होली का आगाज फक्करदाता की रम्मत से होता है। नत्थूसर गेट के अंदर लाला बिस्सा की गली के सामने फूंभड़ों के पाटे पर इस रम्मत का मंचन किया जाता है। इस रम्मत में ख्याल लावणी चैमासा का गायन होता है। इस रम्मत में सबसे पहले भगवान गणेष का आगमन होता है।

खेलनी सप्तमी के साथ बीकानेर में शुरू हुई होली

- Wednesday, February 25, 2015 No Comments
thanb poooj
bikaner holi thamb poojan
बीकानेर सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहर है और होली के मौके पर बीकानेर की संस्कृति खुल कर सामने आती है। आज खेलनी सप्तमी है। फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि खेलनी सप्तमी के रूप में बीकानेर में मनाई जाती है। इस दिन बीकानेर के शाकद्धिपीय समाज के लोग शहर के बाहर स्थित नागणेची मंदिर के पुजारी है और इस समाज के लोग माॅं नागणेची को फाग खेलाते हैं और गैर के रूप में फाग व गैर के गीत गाते हुए शहर में गोगागेट से प्रवेष करते हैं। वास्तव में यह सूचना होती है पूरे बीकानेर को कि मां ने फाग खेल ली है और आज से शहर में होली के कार्यक्रम चालू हो सकते हैं। शाकद्विपीय समाज के लोग गोगागेट से होते हुए रांगड़ी चैक, बाजार होते हुए मुंधाड़ा सेवगों का चैक व पूरे शहर में गैर निकालते हैं और अपने इस महत्वपूर्ण महंत दायित्व का निर्वहन करते हैं कि देवी देवताओं की स्वीकृति हो चुकी है आओ सब मिलकर होली का त्यौंहार मनाए। इसी दिन मरूनायक चैक में थम्ब पूजन किया जाता है और इसी के साथ शुभ कार्यों पर रोक लग जाती है। मरूनायक चैक में थम्ब पूजन के अगले दिन बीकानेर के कईं और चैकों में भी थम्ब पूजन होता है। थम्ब पूजन में गणेष भगवान, विष्णु भगवान सहित कईं देवी देवताओं का पूजन होता है और एक स्वीकृति होती है कि होली के कार्यक्रम शुरू कर लिए जाए। अलग अलग जाति के लोग अपने अपने चैक में थम्ब पूजन करते हैं। यह थम्ब लाल रंग का होता है और इस पर गणेष भगवान सहित कईं देवी देवताओं के चित्र होते हैं। होली त्यौंहार समृद्धि का उल्लास का उमंग का मस्ती का और बीकानेर शहर एक आलीजा शहर जहां पर होली में उमंग उल्लास मस्ती परवान पर होती है। यहां के लोग देवी देवताओं के प्रति आस्था व श्रद्धा रखते हैं और यह खेलनी सप्तमी और थम्ब पूजन व विभिन्न रम्मतों में देवी देवीताओं की पूजा के साथ रम्मतों की  शुरूआत इस बात का प्रतीक है कि बीकानेरी देवी देवताओं व धार्मिक आस्थाओं को साथ रखकर ही त्यौंहार मनाते हैं। 
श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’
Shyam Narayan Ranga

बीकानेर में होली पर भांग खाना भांग पीना

- Tuesday, February 24, 2015 No Comments
होली पर भांग पीने व भांग खाने का विषेष महत्व है। भांग एक सात्विक नषा है और बीकानेर में होली पर भांग खाना भांग पीना और भांग से बनी मिठाई, भुजिया खाना और खिलाने का प्रचलन है। यहां होलकाष्टक चालू होते ही लोग भांग से बने खाद्य पदार्थों का सेवन शुरू कर देते हैं। भांग से बनी बादाम काजू की कतली, भांग के भुजिये, भांग के पापड़, भांग से मिश्रित दूध का बना राबडि़या, भांग की आईसक्रिम बाजार में मिलने लगती है और इन चीजों की मांग भी अचानक बढ़ जाती है। शहर में कईं दुकानों पर ये सब आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं और तो और बारहगुवाड़ चैक, मोहता चैक में और भैरवकुटिया में भांग प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती है। बीकानेर में हर जाति व समाज के लोग भांग पीते और पिलाते हैं। भांग में काजू, किषमिष, बादाम, पिस्ता, नेजा सहित केसर व ईलायची भी मिलाकर ठण्डाई तैयार की जाती है। भांग से एक और स्वादिष्ट चीज बनाई जाती है माजम। जी हां माजम इसमें गुलाब के पुष्प मिलाए जाते हैं। होली पर भांग का यह नषा परवान पर होता है। तो आप भी सावधान रहना अगर किसी ने मजाक कर दी तो फिर तो आप हो और भांग है। जय हो।
श्याम नारायण रंगा
shyam narayan ranga
shyam narayan ranga 

इनके लिए शोक का त्यौंहार है होली

- Sunday, September 14, 2014 No Comments
दुनियाभर में होली का त्यौंहार जहाँ उत्साह, उमंग व मस्ती के साथ मनाया जाता है वहीं पुष्करणा ब्राह्मण समाज की चोवटिया जोशी जाति के लिए होली खुशी का नहीं वरन् शोक का त्यौंहार है। ये लोग होली का त्यौंहार हँसी खुशी न मनाकर शोक के साथ मनाते हैं। इन दिनों में होलकाष्टक से लेकर धुलण्डी के दिन तक चोवटिया जोशी जाति के घरों में लगभग खाना नहीं बनता है। इस दौरान वे ऐसी सब्जी नहीं बनाते जिसमें छौंक लगाई जाए या कोई भी ऐसा व्यंजन नहीं बनाते जो तला जाए। फलस्वरूप इन चोवटिया जोशी जाति के रिश्तेदार व लडके के ससुराल के संबंधी इन लोगों के लिए आठ दिनों तक लगातार सुबह शाम दोनों वक्त भोजन का प्रबंध करते हैं।

इसके पीछे कहानी यह है कि एक समय की बात है कि हालिका दहन के समय इसी चोवटिया जोशी जाति की एक औरत दहन हो रही होली के फेरे निकाल रही थी। उस औरत के गोद में उसका छोटा बच्चा (लडका) भी था। बच्चा माँ की गोद में उछल कूद कर रहा था और माँ होलिका के फेरे लगा रही थी। इस दौरान हाथ से छिटक कर वह बच्चा माँ की गोद से धूं धूं कर जल रही होलिका में गिर गया। बच्चे को जलती हुई आग में देखकर माँ चीखने चिल्लाने लगी और बच्चे को बचाने के लिए गुहार करने लगी पर कोई और उपाय न दिखा तो अपने बच्चे को बचाने के लिए वह माँ भी जलती हुई होलिका में कूद पडी। इस दुर्घटना में वह माँ और बच्चा दोनों न बच सके और माँ अपने बच्चे के पीछे सती हो गई। कहते हैं बाद में इसी सती माता ने श्राप दे दिया कि कोई भी चोवटिया जोशी जाति का परिवार होलिका दहन में हिस्सा नहीं लेगा और न होली को उत्साह से मनाएगा और तब से पुष्करणा ब्राह्मण समाज की इस चोवटिया जाति के लिए होली मातम का त्यौंहार हो गया।

Holi Fire in Bikaner Cityअब अगर किसी भी चोवटिया जोशी परिवार में होलिका दहन के दिन लडके का जन्म हो और वह लडका पूरे एक साल तक जिंदा रहे और अपनी माँ के साथ जलती हुई होलिका की परिक्रमा कर होलिका की पूजा करे तो ही इस जाति के लिए होली का त्यौंहार हँसी खुशी के साथ मनाना संभव होगा। इसे चमत्कार कहेंगे या संयोग कि इस दुर्घटना को हुए आज सैंकडों साल हो गए हैं लेकिन आज तक चोवटिया जोशीयों के किसी भी परिवार  में होलिका दहन के दिन किसी लडके का जन्म नहीं हुआ है।

पुष्करणा ब्राह्मण समाज का बाहुल्य बीकानेर, जोधपुर, पोकरण, फलौदी, जैसलमेर में है और इसके साथ ही साथ भारत भर में इस जाति के लोग रहते हैं और यह परम्परा पूरे भारतवर्ष में निभाई जाति है। जोधपुर, पोकरण, बीकानेर  में तो यह परम्परा भी किसी समय रही है कि होलिका दहन से पूर्व जोर का उद्घोष कर आवाज लगाई जाति थी कि अगर कोई चोवटिया जोशी है तो वह अपने अपने घर म चला जाए क्योंकि होलिका दहन होने वाला है।

इसी के साथ यहाँ यह बताना भी आवश्यक है कि धुलंडी वाले दिन इन चोवटिया जोशी परिवार के लोगों को रंग लगाने के लिए व होली खेलने के लिए अपने घरों से बाहर निकालने के लिए इनके मित्र, रिश्तेदार, सगे, संबंधी इनके घर जाते हैं और इनके चेहरों पर रंग लगाकर होली की मस्ती में इनको शामिल करते हैं। बीकानेर में तणी जोडने का आायेजन भी इन्हीं जोशी परिवार के लोगों द्वारा किया जाता है।

तो यह है परम्परा आस्था और विश्वास जो हर त्यौंहार में होता है चाहे होली हो दिपावली, ईद हो या बैसाखी। विचित्र व समृद्ध परम्पराओं से भरा हमारा भारत। होली की शुभमकामनाऍं 



श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘ (Shyam Narayan Ranga)
पुष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर 

होली पर एक विशेष आयोजन फागणिया फुटबॉल

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उन्मुक्त भाव से जीना शायद दुनिया भूल गयी है, और हमारे पुरखों को इस बात को अहसास था कि आने वाला हर दिन आदमी को मशीन बनने को मजबूर कर देगा, शायद इसी सोच को ध्यान मे रखते हुए त्यौंहारों के माध्यम से आम आदमी के लिए खुशियाँ के सृजन करने का अवसर बना गये। इन अवसरों मे होली शायद सबसे उन्मुक्त भाव से मनाने का त्यौंहार है क्योकिं इस दिन राजा - रंक, बैर-भाव या छोटा-बडा सब तरह के बन्धनों से मुक्त होकर सभी लोग आनन्द मे डूब जाते है, और बात जब बीकानेर की हो तो होली पर्व का हर एक दिन कुछ विशेष ही होता है। 
 
Holi Swang
 राजस्थान का यह बीकानेर शहर होली के होलकाष्टक से प्रारम्भ होकर धुलंडी के दिन देर रात तक जमकर मनाता है। रंगों के इस त्यौंहार मे शहर वासियों के उत्साह, उमंग और उनकी आयोजनधर्मिता की वजह से पूरी तरह आनन्द मे डुब जाता हैं। मस्ती मे सरोबार लोग होली के रंग में ऐसे रंगते हैं कि बस देखते ही बनता है। इसी मस्ती और उत्साह व उमंग के बीच बीकानेर में होली का एक विशेष आयोजन होता है - फागणिया फुटबॉल का मैच। जी हाँ,  एक विशेष प्रकार का फुटबॉल मैच जिसमें पुरूष व महिलाऍं दोनो की फुटबॉल खेलते हैं। बीकानेर के पुष्करणा स्टेडियम में होने वाले इस आयोजन को देखने के लिए हजारों की संख्या में दर्शक पहचते हैं।

Dolchimar Holi between Harsh and Vyas community at Bikaner बीकानेर में आयोजित होने वाले इस फागणिया फुटबॉल के मैच की शुरूआत बीकानेर के वरिष्ठ समाजसेवी स्व. ब्रजरतन व्यास उर्फ ब्रजूभा ने की थी। आज वे दुनिया में नहीं है लेकिन उनकी याद में हर वर्ष यह आयोजन उनको श्रदांजली स्वरूप किया जाता है। इस मैच में होली पर स्वांग बने पुरूष भाग लेते ह। इसमें एक तरफ पुरूषों की टीम होती है तो दूसरी तरफ स्वांग बने महिलाओं की टीम। वास्तव में ये होते पुरूष ही है लेकिन महिलाओं का स्वांग धरे होते हैं।

पुरूषो की टीम में जहाँ आपको ब्रह्मा, विष्णु,महेश जैसे त्रिदेव दिखाई देंगे तो लालू यादव, मनमोहन सिंह, राहुल गाँधी सहित अनिल अंबानी व तांत्रिक चंद्रास्वामी के स्वांग भी देखने को मिलगे। इन स्वांगों की महिला टीम में देवी दुर्गा, अम्बा होंगी तो सोनिया गाँधी, मायावती, सानिया मिर्जा सहित विश्व प्रसिद्ध हस्तियों के स्वांग भी दिखाई देंगें। मैच खेलते वक्त आपको देखने को मिलेगा कि सोनिया ने फुटबॉल को किक मारी और अटलबिहारी वाजपेयी ने उस किस को रोक लिया। जहाँ महादेव स्वयं बॉल लेकर आगे बढते हैं तो माँ पार्वती महादेव को रोकने के लिए आती है। इसी जगह पर गोलकिपर के रूप में आपको भगवान गणेश दिखाई दे जाएंगे। लालू बॉल क पीछे पीछे भागते हैं तो मायावती बॉल को छिनने के लिए सामने से आती है। अमिताभ बच्चन गोल करना चाहते हैं तो माधुरी उनको रोकती है। इसी तरह हँसी मजाक के बीच यह फुटबॉल का मैच खेला जाता है। स्वांग धरे इन किरदारों के मैच को देखने के लिए लोगों का हूजूम उमड पडता है और इस मैच में रैफरी के रूप में आपको हाथ में हंटर लिए कोई भी किरदार दिखाई दे जाएगा। 

Holi Swangइस मैच में एक जमाने में स्वर्गीय ब्रजरतन व्यास उर्फ ब्रजूभा स्वयं रैफरी की भूमिका निभाते थे। पूरे शरीर पर काला रंग लगाए और हाथ में चाबुक लिए ब्रजूभा सारे खिलाडयों को नियंत्रित करते थे। वर्तमान में यह दायित्व कन्हैयालाल रंगा उर्फ कन्नॅ भाई जी निभाते हैं। इसी के साथ शहर के नौजवान, बुजुर्ग सहित बच्चे भी इस फुटबॉल मैच में हिस्सा लेते हैं। फागणिया फुटबॉल के इस मैच का साल भर लोगों को इंतजार रहता है और होली के दिनों में लोग एक दूसरे से पूछते रहते हैं कि कब है ये मैच। इस मैच में हिस्सा लेने वाले एक युवा उदयकुमार व्यास से बात करने पर उसने कहा कि हमारे लिए यह मैच गर्व का प्रतीक है और हम इसके लिए काफी तैयारी भी करते हैं। मैच के आयोजकों में से एक दिलीप जोशी ने बताया कि मैच से दो दिन पहले मैदान तैयार करवाया जाता है ताकि खिलाडयों को तकलीफ न हो और दर्शक भी आसानी से यह मैच देख सके। मैच में हर वर्ष महिला किरदार निभाने वाले राम जी रंगा ने हमें बताया कि वे इस स्वांग का रूप धारण करने के लिए हजारों रूपये खर्च करते हैं और रूपये खर्च करना कोई विशेष बात नहीं है जितनी विशेष बात परम्परा को निभाना है। मैच के रैफरी कन्हैयालाल रंगा ने बताया कि वे हर वर्ष इस मैच के माध्यम से पानी, बिजली बचाने का या सब को पढाने का या स्वास्थ्य सही रखने का संदेश भी स्वांग के माध्यम से देते हैं।


वर्तमान में यह फागणिया फुटबॉल का मैच अपनी विशेष पहचान बना चुका है
। बीकानेर से बाहर रहने वाले लोग कलकत्ता, चेन्नई, जोधपुर, फलोदी, नागौर, पोकरण, जैसलमेर, मम्बई, हैदराबाद आदि आदि जगहों से होली के रंग में सरोबार होने और इस मैच की स्मृतियाँ अपने मानस पटल पर सजीव करने के लिए बीकानेर आते हैं। अगर आप भी इस मैच में खेलना चाहते हैं या देखना चाहते हैं तो चले आईये बीकानेर में आपका स्वागत है, आईए और रंग जाईए बीकानेर की इस विशिष्ट आनन्ददायक होली में 



श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘ (Shyam Narayan Ranga)
पुष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर 

पानी की मार में होली की मस्ती: बीकानेर की डोलचीमार होली

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पूर्व मे प्रकाशित होली के अवसर पर बिन दुल्हन के दुल्हा, बाराती प्रकाशित कर हमने बीकानेर मे मनाई जाने वाली पारम्परिक होली के बारे मे बताया था इस बार हम पेश कर रहे है होली से एक दो दिन पूर्व पानी से भरी डोलचीमार पारम्परिक होली के बारे मे।
होली भारत का एक प्रमुख त्यौंहार है। बसंत ऋतु के आगमन पर बसंत का स्वागत करने के लिए रंगों का त्यौंहार होली पूरे देश में उल्लास व उमंग के साथ मनाया जाता है। होली के अवसर पर विभिन्न शहरों में कईं तरह के आयोजन किए जाते हैं। इसी तरह राजस्थान के बीकानेर शहर में होली का त्यौंहार परम्पराओं के निर्वहन के साथ मनाया जाता है। परम्पराओं के शहर बीकानेर में लोग होली को भी पारम्परिक अंदाज में ही मनाते ह। इन्हीं परम्पराओं के अनुसरण में बीकानेर के पुष्करणा ब्राह्मण समाज के हर्ष व व्यास जाति के लोगों के बीच डोलचीमार होली का आयोजन किया जाता है। वैसे तो बीकानेर में होली से आठ दिन पहले होलाकाष्टक के साथ ही होली के आयोजनों की शुरूआत हो जाती है लेकिन होली से दो दिन पहले डोलचीमार होली का यह खेल काफी प्रसिद्ध है। होली की इस मस्ती को देखने व आनंद उठाने के लिए के लिए दूर दूर से लोग यहाँ आते हैं। इस होली को स्थानीय मीडिया के साथ राष्ट्रीय स्तरीय मीडिया भी विशेष उल्लेखित करती है। आईए जानते हैं कि क्यो और कैसे मनाया जाता है यह आयोजन:-

Dolchimar Holi between Harsh and Vyas community at Bikaner हम इस आयोजन के बारे में जानने से पहले इस आयोजन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर एक नजर डालेंगे। एक समय था जब बीकानेर में यह कहावत प्रचलित थी कि गढ में बीका और शहर में कीका। मतलब यह कि बीकानेर के गढ में राजा बीकाजी का कहा चलता था और शहर में पुष्करणा समाज की जाति कीकाणी व्यासों का कहा माना जाता था। पुष्करणा समाज के जातिय प्रतिनिधि के तौर पर कीकाणी व्यास पंचायत को पूरे पुष्करणा समाज का नेतृत्व करने का दायित्व था और उन्हे उस समय धडपति कहा जाता था। कीकाणी व्यास पंचायत के लोग ही पुष्करणा समाज के अन्य जातियों के शादी विवाह सहित मृत्युभोज आयोजन की स्वीकृति देते थे। इन आयोजनों की स्वीकृति लेने के लिए जिस घर में काम पडता था उसे कीकाणी व्यास पंचायत के लोगों के पास जाना पडता था और कीकाणी व्यासों के चौक में बैठकर यह पंचायती के लोग सामाजिक स्वीकृति देते थे तभी वह आयोजन संभव हो पाता था। ऐसी सामाजिक स्वीकृति ’दूआ‘ कहा जाता था और कीकाणी व्यासों के चौक में आज भी वह ’दूअे की चौकी‘ विद्यमान है जिस पर बैठकर समाज के पंच संबंधित फैसला करते थे। इसी क्रम में पुष्करणा समाज के आचार्य जाति के लोगों के यहाँ किसी की मौत हो गई और उन्हें कीकाणी व्यासों के पास दूआ लेने के लिए जाना पडा। जिस समय आचार्य जाति के लोग दूआ लेने गए उस समय कीकाणी व्यास पंचायती के लोग चौक में उपस्थित नहीं थे और इस कारण आचार्यों को काफी इंतजार करना पडा। इस इंतजार से ये लोग पेरशान हो गए लेकिन करते भी क्या सामाजिक स्वीकृति लेनी जरूरी थी और बिना इसके कोई आयोजन संभव नहीं था। बाद में लम्बे इंतजार के बाद कीकाणी व्यास पंचायत के लोग आए तो आचार्यों को दूआ दे दिया। लेकिन अपने लम्बे इंतजार करवाने के अपमान के कारण आचार्यौं ने कीकाणी व्यासों के सामने आपत्ति दर्ज करवाई जिसे कीकाणी व्यास पंचायत ने गौर नहीं किया। इस पर आचार्य जाति के लोगों ने गुस्से में यह कह दिया कि अगर अगली बार हम आफ यहाँ दूआ लेने आए तो हम गुलामों के जाए जन्मे होंगे और ऐसा कहकर वे चले आए। कुछ समय बाद इन्हीं आचार्य जाति के लोगों के फिर काम पडा और उन्हें फिर से उसी कीकाणी व्यास पंचायत के पास जाना पडा। जब ये लोग कीकाणी व्यासों के चौक में पहचे तो कीकाणी व्यासों ने अपनी छत पर जाकर थाली बजाई और कहा कि आज हमारे गुलामों के बेटा हुआ है और हमारे चौक में आया है। आचार्य जाति के लोग अपने इस घोर अपमान को सहन नहीं कर सके और बिना दूआ लिए ही वापस रवाना हो गए। रास्ते मे हर्षों के चौक में इन आचार्य जाति के लोगों का ननिहाल था। जब इन हर्ष जाति के लोगों को यह बात पता चली तो इन्हने अपने भांजों की इज्जत रखने के लिए कहा कि आप चिंता न करें आफ यहाँ होने वाले भोज का आयोजन हम करवा देंगे और समाज के लोगों को बुला भी लेगे।

चूंकि हर्ष जाति के लोग साधन सम्पन्न व धनिक थे । अतः समाज के एक वर्ग उनके साथ भी था। जैसा की वर्तमान में भी देखने को मिलता है कि कुछ लोग पेसे वालों के साथ होते हैं तो कुछ लोग पावरफुल व्यक्तियों के साथ, वैसा ही कुछ उस समय भी था कि कुछ लोग हर्ष जाति के साथ भी थे लेकिन ज्यादातर लोगों का साथ व्यास जाति के साथ ही था। खैर जैसा भी हो हर्ष जाति के लोगों ने अपने नातिनों की भोज की व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाली और वर्तमान में बीकानेर में जहाँ हर्षों का चौक है उसमें स्थित गेवर गली में बडे बडे माटों में लापसी बनाने के लिए गाल बनाकर रख ली और भोज के आयोजन की सारी तैयारियाँ कर ली। जब कीकाणी व्यास पंचायती को यह पता लगा तो उन्हें यह सहन नहीं हुआ और उन्होंने रात के समय छिप कर इन माटों में पडी गाल को गिरा दिया और माटे फोड दिए। इस बात को लेकर हर्ष व व्यास जाति के लोगों के बीच जातिय संघर्ष हुआ और आपस में लडाई हुई और यह विवाद काफी गहराया। उस समय पूरे पुष्करणा समाज में दो गुट बन गए जिसमें कुछ लोग हर्ष जाति के साथ हो गए और कुछ व्यास जाति के साथ। लम्बे संघर्ष के बाद इन जातियों में समझौता हुआ और हर्ष व व्यास जाति के लोगों के बीच वैवाहिक संबंध स्थातिपत हुए।

इसी जातिय संघर्ष की याद में उसी गेवर गली के आगे आज भी होली के अवसर पर हर्ष व व्यास जाति के लोग डोलची होली खेलते हैं। इसमें आचार्य जाति के लोग हर्ष जाति के साथ होते हैं और बाकी लोग व्यास जाति के साथ।

इस खेल में चमडे की बनी डोलची होती है जिसमें पानी भरा जाता है और यह पानी हर्ष व व्यास जाति के लोग एक दूसरे की पीठ पर पूरी ताकत के साथ फेंकते हैं। पानी का वार इतना तेज होता है कि पीठ पर निशान बन जाते हैं। इस खेल को हर्षों के चौक में हर्षों की ढलान पर खेला जाता है। पानी डालने के लिए बडे बडे कडाव यहाँ रखे जाते हैं। खेल के प्रारम्भ होने से पहले इस स्थल पर अखाडे की पूजा होती है और खेल में हिस्सा लेने वाले लोगों के तिलक लगाया जाता है। यहाँ यह बता देना जरूरी है कि व्यास जाति के लोगो द्वारा खेल से एक दिन पहले गेवर का आयोजन किया जाता है जो कीकाणी व्यासों के चौक से रवाना होती है और तेलीवाडा में स्थित भक्तों की गली तक जाकर आती है। यहाँ ये लोग अपने खेल के लिए पैसा इकट्ठा करते हैं और होली के गीत गाते हुए मस्ती व उल्लास के साथ जाते हैं। अगले दिन इसमें खेल की शुरूआत व्यास जाति के लोगों के आने के साथ होती है और यहाँ पानी की व्यवस्था हर्ष जाति के लोगों द्वारा की जाती है। करीब तीन घण्टे तक इस खेल में पानी का वार चलता रहता है और अंत में हर्ष जाति के लोग गुलाल उछालकर खेल के समापन की घोषणा करते हैं। समापन के साथ ही गेवर गली के आगे खडे होकर ये लोग होली के गीत गाते हैं और अपनी अपनी विजय की घोषणा कर प्रेमपूर्वक होली मनाते हैं। परम्पराओं के निर्वहन में आज भी बीकानेर के लोग पीछे नहीं है और यह आयोजन सैकडों सालों बाद भी पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। बाद में शाम के समय इसी दिन हर्ष जाति के लोग हर्षोल्लाव तलाब स्थित अपने कुलदेव अमरेश्वर महादेव की पूजा करते हैं और गेवर के रूप में गीत गाते हुए अपने घरों की ओर आते हैं। आज भी इन जातियों के लोग अपनी परम्पराओं से गहरे तक जुडे हैं। इस दिन इस चौक से जाने वाला प्रत्येक व्यक्ति भीग कर ही जाता है। आप यहाँ से सूखे नहीं निकल सकते। अगर आपको भी होली की इस मस्ती में भीगना है तो इस बार सत्रह मार्च को चले आईए बीकानेर - आपका स्वागत है।



श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘ 
पुष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर 

एक बारात ऐसी भीः बिन दुल्हन के दूल्हा

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दूल्हा है, बारात है, दूल्हे और बारातियों का स्वागत है, स्वागत करने के लिए पूरा वधु पक्ष भी है, लेकिन नहीं है तो सिर्फ दुल्हन। बीकानेर की अनुठी साँस्कृतिक परम्पराओं मे शुमार एक ओर  मिसाल के बारे मे प्रस्तुत है इस बार का आलेख -होली एक विशिष्ट त्यौंहार है और होली पर विभिन्न प्रकार के विचित्र आयोजन भी किए जाते हैं। भारत में होली का त्यौंहार उल्लास, उमंग व परम्पराओं के निर्वहन के साथ मनाया जाता है। जहाँ ब्रज की लट्ठमार होली प्रसिद्ध है वहीं राजस्थान के बीकानेर की परम्परागत होली भी अपने आप में एक विशिष्ट स्थान रखती है। बीकानेर में होली का त्यौंहार आठ दिन तक परम्पराओं के निर्वहन के साथ मनाया जाता है। उसी परम्पराओं के अनुसरण में एक ऐसी परम्परा भी है जिसे सुनकर आप आश्चर्य किए बिना नहीं रहेंगें। आईए जानते हैं कि क्या है यह परम्पराः

A Groom without bride in Bikaner on holiबीकानेर के पुष्करणा ब्राह्मण समाज के हर्ष व व्यास जाति के लोगों के बीच विभिन्न परम्पराओं के साथ होली का त्यौंहार मनाया जाता है। इन परम्पराओं मे एक विवाह परम्परा भी होती है जिसमे एक दूल्हा होता है, दुल्हे के साथ पूरे बाराती होते है, दूल्हे और बारातियों का स्वागत करने के लिए वधु पक्ष वाले भी तैयार रहते है, लेकिन दुल्हन बगैर। होली के धुलण्डी वाले दिन शाम को हर्ष जाति का एक दूल्हा वाकायदा बैण्ड बाजों के साथ बारात लेकर व्यास जाति के घरों के आगे जाता है और इस दूल्हे के घर की औरतें पारम्परिक तरीके से स्वागत करती है, गीत गाती है और घर के पुरूष अपने घर आई बारात का आवभगत करते हैं, दूध, चाय व नाश्ते के साथ इस बारात का स्वागत किया जाता है लेकिन बिना दूल्हन और फेरे लिए ही यह दूल्हा उस घर से वापस रवाना हो जाता है। इस प्रकार यह दूल्हा बारी बारी से तेरह घरों में जाता है और इसी तरह अपना व बारातियों का स्वागत करवा कर वापस अपने घर बिना दूल्हन के ही आ जाता है। बीकानेर के हर्ष जाति में यह परम्परा करीब साढे चार सौ साल पुरानी है जिसका निर्वहन आज भी पूरी शिद्दत के साथ किया जाता है। 

वास्तव में इस परम्परा के पीछे एक इतिहास जुडा है। किवदंती यह है कि करीब साढे चार सौ साल पहले बीकानेर में हर्ष व व्यास जाति के बीच जातिय संघर्ष हुआ था और इसमें मामला रक्तपात व राजदरवार तक गया था और जब वापस इन जातियों में समझौता हुआ तो समझौते के परिणामस्वरूप यह तय हुआ कि हर्ष जाति के लडकों को व्यास  जाति के लोग अपनी बेटियाँ विवाह करके देंगे। इसी परम्परा  के निर्वहन में प्रतीक स्वरूप आज भी अपनी विजय की जुलुस के रूप में हर्ष जाति के लोग अपने एक लडके को पारम्परिक विष्णु रूप में दूल्हा बनाकर ले जाते हैं। इस दूल्हे के साथ सैकडों की संख्या में बैण्ड की धुन पर नाचते गाते और विवाह के पारम्परिक गीत गाते हुए बाराती भी होते हैं। सर्वप्रथम यह बारात बीकानेर के मोहता चौक स्थित आनन्द भैरव मंदिर से रवाना होती है। इस दूल्हे को हर्ष जाति के पंच परिवार बनमाली जी हर्ष के घर में बनमाली जी के वंशज अपने हाथों से सजाते और संवारते हैं। खास बात यह है कि धुलण्डी वाले दिन जब सारे शहर के लोग रंग और गुलाल से होली खेल रहे होते हैं तो यह दूल्हा सिर्फ देखकर ही होली का आनंनद लेता है क्योंकि इस दिन दूल्हा अपने रंग व गुलाल नहीं लगा सकता और नही कोई और व्यक्ति इस दूल्हे के रंग व गुलाल लगाता है। तैयार होकर दूल्हे की यह बारात हर्षों की ढालान के नीचे बलावतों की गली में स्थित पंच व्यास जी के घर पर जाती है जहाँ घर की औरतें पुष्करणा समाज की विवाह परम्परा के अनुसार दूल्हे को घर की देहरी पर पोखती है अर्थात् स्वागत करती है। व्यास परिवार की यह औरतें वाकायदा बारात की स्वागत के परम्परागत गीत गाती है। यहाँ पर व्यास परिवार के पुरूष बारातियों के गुलाल लगाकर स्वागत करते हैं। यहाँ से बारात वापस निकल कर दम्माणियों के चौक में व फिर लालाणी व्यासों के चौक व किकाणी व्यासों के चौक में होते हुए वापस अपने चौक में आ जाती है। बारात का यह स्वागत तेरह घरों में किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो हर्ष जाति का लडका इस बारात में दूल्हा बनता है उसका एक साल के अंदर विवाह हो जाता है। वर्तमान का युवा वर्ग भी इस परम्परा से गहरे तक जुडा है और इसका निर्वहन करता है। तो अगर आपको भी इस बारात में शामिल होना है तो चले आईए बीकानेर इस धुलण्डी वाले दिन। 


श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘  (Shyam Narayan Ranga)
पुष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर 

पुष्करणा सावा: एक दृष्टिकोण

- Friday, September 12, 2014 No Comments

Shyam Narayan Rangaबीकानेर एक ऐसा शहर जहाँ परम्पराओं का निवास है, जहाँ के लोग अपनी संस्कृति और अपने रिवाजों के लिए जाने जाते हैं और उन्हीं रिवाजों और परम्पराओं में से एक है बीकानेर में रहने वाले पुष्करणा समाज के लोगों का सामूहिक विवाहोत्सव - सावा। जी हाँ, सावा परम्परा!

सावा जिसमें पुष्करणा समाज की सैकडों शादियाँ एक ही दिन सम्पन्न होती है। इस परम्परा के अंतर्गत के समाज के लोग एक दिन निश्चित कर अपने बेटे बेटियों की शादियाँ उसी दिन सम्पन्न कर देते हैं। इस परम्परा में शादी के सारे कार्यक्रम एक निश्चित कार्यक्रम के अनुसार सम्पन्न किए जाते हैं और उस दिन ऐसा लगता है जैसे सारा शहर ही मण्डप हो गया है और शहर के लोग बाराती। जहाँ देखो वहाँ दूल्हा, दूल्हन और बारातें ही नजर आती हैं। 
यह परम्परा बीकानेर के पुष्करणा ब्राह्मण समाज में आज से नहीं बल्कि करीब सवा चार सौ साल से निभाई जा रही है। इस परम्परा को शुरू करने के पीछे क्या कारण रहे होंगे यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता पर ऐसा माना जाता है कि एक समय था जब पुष्करणा ब्राह्मण अपने राजाओं के साथ युद्ध पर जाया करते थे, (बीकानेर की बगीचीयों म लगे पुष्करणा ब्राह्मणों के पूर्वजों के चित्रों से यह स्पष्ट है कि पुष्करणा ब्राह्मण राजाओं की युद्ध में पूरी सहायाता किया करते थे), वह ऐसा समय था जब युद्ध वर्तमान समय की तरह नहीं बल्कि हाथों मे हथियार पकड कर लडे जाते थे और ऐसे युद्धों में समय भी बहुत लगता था। यह वह दौर था जब मनुष्य की साम्राज्यवादी अभिलाषा जोरों पर थी और राजा महाराजा अपने जीवन का एक बडा भाग इन युद्धों में लगा देते थे और इनके साथ आम सैनिक इनके सरदार और सब तरह के लोग भी युद्धों में अपना जीवन होम करते थे। माना जाता है कि ऐसे ही एक समय में बीकानेर के इन पुष्करणा ब्राह्मणों को लम्बा समय हो गया और इनके घरों में शादी विवाह जैसे संस्कार ही नहीं हो पाए। इन ब्राह्मणों ने राजा के सामने फरियाद करी और राजा ने उपाय सुझाया कि क्यों न ऐसा हो कि एक दिन निश्चित कर दिया जाए और उस दिन ब्राह्मणों के घर में शादी हो जाए और ऐसा करने के राजा के काम भी प्रभावित नहीं होंगें और शादी जैसा पवित्र संस्कार भी सम्पन्न हो जाएगा और माना जाता है कि ऐसे करके पुष्करणा ब्राह्मणों ने सावे ही शुरूआत की। 
शुरूआत में यह सावा सात साल में एक बार मनाया जाता था फिर समय के साथ इसमें परिवर्तन हुआ और यह सावा चार साल में एक बार मनाया जाने लगा। वर्तमान में बढती आबादी के कारण समय में फिर परिवर्तन हुआ और यह सावा अब दो साल में एक बार मनाया जाता है। इस सावे की तिथियाँ सावे वाले साल में दिपावली से पहले तय की जाती है। यह तिथियाँ पण्डितों के शास्त्रार्थ द्वारा तय की जाती है जिसमें पुष्करणा ब्राह्मण समाज के किराडू, ओझा, छंगाणी, जोशी सहित कईं जातियों के लोग हिस्सा लेते हैं। सामाजिक व्यवस्था क अनुसार यह इन पण्डितों को सावे की तिथियाँ तय करने के लिए पुष्करणा समाज के लालाणी व किकाणी व्यास समाज लोग वाकायदा आमंत्रित करते हैं और जब यह तिथियाँ तय हो जाती है तो धनतेरस के दिन पूरे समाज के सामने समारोहपूर्वक यह तिथियाँ घोषित की जाती है। इन तिथियों में हाथकाम, गणेश परिक्रमा, पाणिग्रहण संस्कार सहित बरी की तिथियाँ व ब्राह्मण बालकों के यज्ञोपवित धारण करने की तिथियाँ घोषित की जाती है। इसी के साथ पूरी दुनिया में रहने वाले पुष्करणा ब्राह्मणों में एक उत्साह दौड जाता है कि सावे के दिन बीकानेर जाना है। 
वास्तव में सामूहिक शादियों का यह उत्सव सावा प्रतीक है ब्राह्मण समाज की प्रगतिशील सोच का और समाजवादी दृष्टिकोण का। जिस समाजवाद की कल्पना कार्ल माक्र्स, गाँधी ने की थी, जिस समाजवाद को स्थापित करने का संकल्प भारतीय संविधान में लिया गया है उस समाजवादी सोच के अनुसार शादियाँ करने की यह परम्परा बीकानेर के पुष्करणा समाज में सदियों पुरानी रही है। एक ही दिन सैकडों शादियाँ होने से धन का अपव्यय नहीं होता और कम खर्च में सारा काम हो जाता है। महंगाई के इस दौर में सदियों पुरानी यह परम्परा उन परिवारों के लिए जीवनदान है जिनकी आय कम है और जो शादी के लाखों रूपय खर्च करने में अपने आप को असमर्थ समझता है और उन धनाढ्य वर्ग के लिए भी वरदान है जो अपनी विशिष्ट पहचान बनाना चाहता है। एक दिन सैकडो शादी मतलब लगभग हर घर में शादी इसलिए न तो रूठना  न मनाना न ज्यादा खर्च न ज्यादा दिखावा और न ही किसी प्रकार का आडम्बर। सभी एक ही जैसे चाहे अमीर हो या गरीब चाहे छोटा हो या बडा। साहब सावा है सो सावे की शादी परम्पराओं के अनुसार शादी। 
सावे की जो सबसे बडा फायदा होता है वह यह है कि सावे में शादी करने वाला दहेज का लेन देन बिल्कुल नहीं करता वैसे यहाँ यह बात मैं आपको बताना चाहँगा कि पुष्करणा ब्राह्मण समाज में दहेज के लेन देन की प्रथा नहीं के बराबर रही है। आज भी इस समाज में दहेज हत्या या दहेज के कारण तलाक के मामले लाखों में कोई ही नजर आता है। सावे के कारण दहेज नहीं होना इस सामूहिक विवाह की सबसे बडी उपलब्धि कहा जा सकता है। 
Pushkarna Grooms in Lord Vishnu Avtarबीकानेर के पुष्करणा ब्राह्मण आज पूरे भारतवर्ष में फैले हैं इसलिए सावे के दिनों में बीकानेर शहर लघु भारत का रूप धारण कर लेता है कोई बंगाल से आया होता है तो कोई महाराष्ट्र या गुजरात से कोई उडीसा से आता है तो कोई मध्यप्रदेश से। इस तरह पूरे शहर में खुशी का माहौल रहता है। देर रात तक शहर की सडकों पर उत्सव का माहौल रहता है। पान की दुकानों पर, चौक के पाटों पर मेल मिलाप के साथ साथ चर्चाओं व खाने पीने के दौर चलते रहते हैं। बीकानेर शहर का हर भवन बुक रहता है और सारा शहर रोशनी से नहाया होता है। औरते मंगल गीत गाती है तो पुरूष तैयारियों में लगे रहते हैं। खुशी का यह माहौल सारे शहर को एकता के धागे में पिरोता है। सावे वाले दिन पारम्परिक विष्णु रूप में दूल्हे दौडते नजर आते हैं तो बाराती भी एक के बाद एक बारात में जाने की कोशिश करता है। बीकानेर के उत्साही युवक आजकल सावे के दिन तरह तरह के आयोजन भी करते हैं जैसे बारहगुवाड चौक में विष्णु रूप में जो दूल्हा सबसे पहले आता है उसे सम्मानित किया जाता है और बाकी आने वाले दूल्हों का भी अभिनन्दन किया जाता है। इसी तरह का आयोजन साले की होली के चौक सहित कईं अन्य चौकों में भी होता है। वर्तमान में राज्य सरकार द्वारा सावे के कारण सस्ती दरों पर चीनी, चावल व गेंह, दूध के साथ ईंधन की व्यवस्था भी की जाती है तो समाज कल्याण विभाग द्वारा सामूहिक शादी के आयोजन मे शादी करने के कारण चार हजार पाँच सौ रूपये की आर्थिक सहायता भी की जाती है। इस तरह सावे का यह आयोजन अपने में कईं तरह के अन्य आयोजन भी समेटे होता है। इन दिनों में शहर में सांस्कृतिक कार्यक्रम, रंगोली प्रतियोगिता, ब्याह के गीत आदि के आयोजन भी किए जाते हैं। 
सावे का प्रभाव सिर्फ पुष्करणा समाज के लोगों पर ही नहीं रहता है वरन् बीकानेर का रहने वाला हर व्यक्ति विवाह की इन खुशियों में शामिल होता है। विवाह के कारण हर वर्ग का व्यक्ति चाहे वह कपडे का व्यापारी हो या खाने पीने की वस्तुओं का व्यापारी, दूध दही बेचने वाला हो या सब्जी वाला सब कोई इस सावे में अपने आप को खुश व उत्साह से भरा हुआ महसूस करता है। घरों में रंग रोगन से लेकर सफाई कर्मचारी तक की व्यवस्था शादी ब्याह में करनी होती है सो सावे के कारण यह सारा वर्ग अपने आप को व्यस्त करता है और दिल से इस सावे का स्वागत करता है। दूकानदार अपनी दुकानों को रंग बिरंगी रोशनी सहित कईं तरह से सजाते हैं। इस सावे के कारण शहर की अर्थव्यवस्था को गति मिलती है और संस्कृति जीवित हो उठती है। शुभ मुहुर्त होने के कारण अन्य जातियों के लोग भी इस दिन शादियाँ करते हैं। 
सामूहिक शादी का यह उत्सव सावा बीकानेर के पुष्करणा ब्राह्मण समाज में ही होता है जबकि बीकानेर के अलावा पुष्करणा समाज के लोग जैसलमेर, जोधपुर, फलौदी, पोकरण सहित कई स्थानों पर रहते हैं परन्तु परम्परा का यह अनूठा आयोजन सिर्फ बीकानेर में ही मनाया जाता है। आज विभिन्न समाजों के लोग सामूहिक शादियाँ करते हैं शायद उनकी प्रेरणा का स्रोत यह उत्सव ही रहा है। 
एक बात और जहाँ आम दिनों में शादियों में बारातों में सैकडों और हजारों लोग होते हैं वहीं इस दिन बारात में आपको दस से बीस लोग ही नजर आएंगे कारण साफ है कि सैकडों शादियाँ है हर घर में शादी है सो कौन किसके जाए सब अपने अपने घर में हो रही शादी में शरीक होते हैं। इसी तरह पण्डितों को भी समय नहीं मिलता क्योंकि आज पण्डित जी को एक ही रात में कईं जोडों का मिलन करवाना है सो पण्डित जी भी काफी व्यस्त रहते हैं और यही हाल बण्ड वालों का टैण्ट वालों का होता है। मतलब जिधर देखो शादी शादी और बस शादी। ऐसा होता है माहौल बीकानेर का सावे वाले दिन। 
इस बार यह सावा चौबीस फरवरी को हो रहा है अतः अगर आपकों इस माहौल में शामिल होना है तो आईए बीकानेर और साक्षी बनिए एक ऐसे आयोजन के जिसे देखकर आप यह जरूर कहेंगे वाह क्या बात है! और एक बात सावे में निमन्त्रण की आवश्यकता भी नहीं होती बीकानेर में सो जहाँ अच्छा लगे वहाँ खाना भी खा सकते हैं आप और खिलाने वाले भी बडे प्यार से खिलाएंगे। पर मुस्कान रहे और उसकी नजरों की आशाओं के दीप झिलमिलाते रहे। 



श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘ 
पुष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर 

एक सफल व सार्थक आयोजन: अंतर्राष्ट्रीय बाल आनन्द महोत्सव

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22 नवम्बर से 28 नवम्बर तक बीकानेर के धरणीधर स्पोट्स काॅम्पलेक्स में राष्ट्रीय युवा योजना व आंतर भारती ट्रस्ट इंदौर के संयुक्त तत्वाधन में अंतर्राष्ट्रीय बाल आनन्द महोत्सव का आयोजन किया गया। यह आयोजन बीकानेर के लिए एक शानदार व अपने आप में पहला आयोजन था। बीकानेर अपनी विविध संस्कृति व भाईचारे तथा साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए पूरे भारत में विशिष्ट पहचान रखता है तो इस लिहाज से बीकानेर नगर की संस्कृति व स्वभाव के अनुरूप यह आयोजन बीकानेर के लिए विशेष महत्व रखता है। इस आयोजन में उत्तरप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, केरला, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, बंगाल सहित भारत भर के करीब 16 राज्यों व एक पड़ौसी देश नेपाल के सैकड़ों बच्चों ने हिस्सा लिया। इस आायेजन के मूल व्यक्तित्व राष्ट्रीय युवा योजना के निदेशक व प्रखर गांधीवादी चिंतक विचारक डाॅ एस एन सुब्बाराव थे। डा एस एन सुब्बाराव की सेाच के अनुसार ये सैंकड़ों बच्चे बीकानेर केे बच्चों के घरों में अतिथि की तरह रहे और बीकानेर के बच्चों ने इनकी मेजबानी की। इस तरह संस्कृतियों के आदान प्रदान का यह एक महान् आयोजन था जहां पर बाल मन को भारत की विभिन्न संस्कृतियों व भाषाओं को जानने का एक स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ। बीकानेर के बच्चों ने नेपाली, कोंकणी, मराठी, मैथेली, असमिया, बंगाली भाषाओं की जानकारी प्राप्त की वहीं बाहर से आए बच्चे मारवाड़ी से परिचित हुए। 
आयोजन के पहले दिन विश्व शांति मार्च स्थानीय रतन बिहारी पार्क से पुष्करणा स्टेडियम तक निकाला गया। 84 वर्षीय डा एस एन सुब्बाराव के नेतृत्व में हजारों बच्चों ने इस शांति मार्च में हिस्सा लिया और जोड़े जोडो भारत जोड़ो के नारों से भारत की एकता की आवाज को बुलंद किया। इस शांति मार्च में बच्चे नारे लगा रहे थे कि बीकानेर हो या गुवाहटी, अपना देश अपनी माटी,  कश्मीर हो या कन्याकुमारी एक है भारत माता हमारी, हम बच्चों की कामना सद्भावना सद्भावना। इस तरह से नारों से बाल मन में देश के प्रति एकता की भावना व पूरे देश को एक नजर से देखने की भावना पैदा होती है और यह बात उनके मन में उतारने का प्रयास किया जाता है कि हम सबसे पहले भारतीय है न कि कोई बिहारी राजस्थानी मराठी या गुजराती। सद्भावना का ये संदेश देने के लिए जब ये बच्चे बीकानेर की सड़कों पर उतरें तो अपनी तासीर के अनुसार बीकानेर की हर कौम व हर वर्ग के लोगों ने डाॅ एस एन सुब्बाराम व इन हजारों बच्चों का मुक्त कंठ से व खुले मन से स्वागत किया। इन बच्चों को जगह जगह पर टाॅफिया, बिस्किट, चाॅकलेट, पानी, नींबू पानी व पुष्प वर्षा कर स्वागत किया गया और एक बार तो ऐसा लगा जैसे पूरे बीकानेर में इन बच्चों के सामने फूलों की सड़क बना दी गई है। इस रैली का स्वागत करने बीकानेर के राजनेता, समाजसेवी, उद्योगपति, व्यवसायी, विद्यर्थी, युवा, नौजवान, स्वयंसेवी संस्थाएॅं सब आगे आए। 
इस आयोजन में प्रतिदिन सुबह भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का ध्वज वंदन किया जाता और राष्ट्रगान व राष्ट्रगीत के माध्यम से बच्चो में राष्ट्रीयता की भावना का संचार किया जाता। सभी प्रांतों से आए बच्चे जब एक ही प्रांगण में खड़ंे होकर जब तिरंगे को सलामी देते तो ऐसा लगता था मानो पूरा भारत अपने राष्ट्र ध्वज के सामने नमन कर रहा हो। इस दौरान भारत माता की जय व नेपाल माता की जय के नारे लगाए जाते और भारत नेपाल मैत्री जिंदाबाद का उद्घोष किया जाता। इस तरह अपने पड़ौसी देश के साथ मैत्री रखने का संदेश बच्चों तक पहुॅंचाया जाता। 
इस पूरे आयोजन के दौरान देश के विभिन्न प्रांतों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से बच्चों को भारत दर्शन हुआ। बच्चे विविधता से भरे इस देश की संस्कृति से रूबरू हुए और जाना की अपना देश कितना विशाल है और इस देश में कितनी विविधता है और सीखा कि इन विविधताओं के साथ हमें भारत को एक रखना है। जब डाॅ एस एन सुब्बाराव जिनको सब प्यार से भाईजी कहते हैं, अपने स्वर में भारत माता की संतान गीत प्रस्तुत करते और साथ साथ अलग अलग भाषा प्रांतों के बच्चों द्वारा इस गीत पर प्रस्तुति दी जाती तो लगता कि 18 भाषाओं का यह देश एक सूत्र में पिरोया है और भाईजी बच्चों को इस दौरान सीखाते कि भाषा चाहे कुछ भी हो हमें एक माला तरह सब मोतियों को सजा कर रखना है और भारत को जोड़े रखने का संकल्प लेना है। सूदूर प्रांतों से आए बच्चे इस देश की विविधता से परिचित हुए। कार्यक्रम के दौरान बच्चों को देश भक्ति व राष्ट्रीय एकता के गीतों को सीखाया ही जाता साथ ही साथ बच्चों मे सकारात्मक ऊर्जा का विकास हो इसके लिए विभिन्न हाॅबी क्लासेज का भी आयोजन किया जाता। बच्चो ने इस दौरान मिट्टी से, कागज से, पुरानी चीजों से, व घरों में फालतू पड़े सामानों से कई प्रकार की वस्तुओं को बनाना सीखा। बच्चों को इस आयोजन में कविता, चित्रकला, पेंटिंग, कढ़ाई, बुनाई, विचित्र वेशभूषा आदि कईं प्रकार की जानकारी दी गई ताकि बच्चों में रचनात्मकता का विकास हो और बच्चा अपने अंदर छिपी प्रतिभा को स्वयं पहचानकर बाहर लाए। 
अभिभावकों के बिना एक सप्ताह तक अपने घर से दूर रह कर बच्चों ने स्वावलम्बन की शिक्षा ली। बीकानेर के लोगों ने बच्चों को यहां की शादियो में शरीक करवाया, यहां के पर्यटक व दर्शनीय स्थलों पर घुमाया और यहां के व्यंजनों के स्वाद को चखाया और अंतिम दिन जाते जाते बच्चों को आकर्षक उपहार भी दिए गए। रेलवे स्टेशन पर जब बच्चे वापस अपने घरों की ओर रवाना हो रहे थे तो उनकी आॅंखों में आंसू थे। मैं आपको यहां यह बताना चाहूॅंगा कि बच्चों के पहले दिन भी आंखों में आंसू थे क्योंकि वे एक दूसरे को समझ नहीं पा रहे थे और आखिरी दिन भी आंसू थे क्योंकि वे एक दूसरे से जुदा हो रहे थे । जब मैंने इस विषय पर भाईजी से बात करी तो उन्होंने कहा कि पहले दिन इसलिए रो रहे थे कि देश को जानते नहीं थे और अंतिम दिन इसलिए रो रहे हैं कि अपने भाईयों से बिछुड़ना नहीं चाहते। 
इस आयोजन को सफल करने के लिए बीकानेर के युवाओं की टीम कमल कल्ला, मनोज व्यास, के नेतृत्व में लगी हुई थी और अपने इस प्रयास में वे सफल भी रहे ऐसा मै कह सकता हूॅं। बीकानेर के लिए यह अनूठा आयोजन अपने आप में अनोखा भी था। यहां पर मै डाॅ एस एन सुब्बाराव के बारे में कुछ जरूर कहना चाहूॅंगा कि एक 84 साल का युवा जिसमें जबरदस्त ऊर्जा है जो अपने सारे दैनिक कार्य स्वयं अपने हाथों से करता है। सुबह जल्दी उठता है और समय पर अपने दिनभर के सारे कार्य सम्पादित करता है। मैने भाईजी के व्यक्तित्व मे एक चमक एक उत्साह और लगत देखी है जिसके जीवन का एक ही मकसद है कि हिमालय से लेकर सूदूर दक्षिण समुद्र पर्यंत भारत एक है और इस देश में शांति प्रगति व विकास बंदूक के बल पर नहीं प्यार से ही हासिल किया जा सकता है। युवा योजना व आंतर भारती के कार्यक्रमों के माध्यम से भाईजी ने सारा जीवन अपने इस उद्देश्य को पूरा करने में लगा रखा है। बिनाबा भावे के बाद शायद यह पहला व्यक्तित्व है जिसने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आदर्शों को न सिर्फ अपना रखा है बल्कि उन आदर्शों पर जीवन यापन कर रहा हैं। भाईजी को सादर नमन। और उनके इस प्रयास में बीकानेर के कार्यक्रम को शामिल होकर मैं अपने आप को धन्य मानता हूॅं


श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’
पुष्करणा स्टेडियम के पास
नत्थूसर गेट के बाहर
बीकानेर {राजस्थान}
मो. 9950050079

हिरणा रे किसना गोविन्दा प्रहलाद भजे...

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Shyam N Ranga
बीकानेर में आज नृंसह चतुर्दशी का त्यहार पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। शहर के लखोटिया चौक सहित डागा चौक, दुजारियों की गली, लालाणी व्यासों का चौक व नत्थूसर गेट के बाहर नृसिंह लीलाऍं आयोजित की गई और शाम ढलते ही भगवान नृसिंह ने हरिण्यकश्यप का वध कर दिया।
Narsing avtaar
परम्पराओं व आस्थाओं के शहर बीकानेर में यह आयोजन पिछले सैंकडों सालों से हो रहा है। इस आयोजन की शुरूआत शहर के लखोटिया चौक से हुई। कहा जाता है कि शहर के डागा व लखोटिया जाति के लोगों ने इस मेले की शुरूआत करीब साढे चार सौ साल पहले की थी। इस जाति के लोग व्यापार व्यवसाय का काम करते थे और वर्तमान में जहाँ लखोटिया चौक है वहाँ पर आकर रूकते थे। कहा जाता है कि यहाँ पर एक सरोवर था और पास ही के एक टीले पर मंदिर था। उन्होंने इसी सरोवर के पास स्थित मंदिर में भगवान नृसिंह की प्रतिमा स्थापित की और इस मेले की शुरूआत की। लखोटिया चौक में जो मेला आयोजित किया जाता है वहाँ पर भगवान नृसिंह का एक मुखौटा और हरिण्यकश्यप के दो मुखौटे हैं। पहले दोपहर में कोई कम उम्र का व्यक्ति या लडका हरिण्यकश्यप बनकर पूरे शहर में घूमता है और फिर शाम को दूसरा व्यक्ति नृसिंह लीला के समय हरिण्कश्यप बनता है। जो पहले मुखटा काम में लिया जाता है उसका वजन करीब पंद्रह किलो है और जो शाम को मुखौटा काम में लिया जाता है उसका वजन करीब सात किलो है। उस समय के डागा व लखोटिया जाति के लोग वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित मुल्तान शहर में व्यापार के लिए जाया करते थे और वहीं से ये मुखौटे बनाकर लाए गए है। बाद में आपसी विवाद के कारण इस मेले से डागा जाति के लोग अलग हो गए और अपने डागा चौक में जाकर नए मंदिर की स्थापना की और वहाँ पर भी इसी दिन इस मेले की शुरूआत की जो आज तक जारी है। इसी प्रकार शहर के दुजारी गली व लालाणी व्यासों के चौक सहित नत्थूसर गेट के बाहर भी इस मेले का आयोजन श्रद्धा के साथ किया जाता है। नत्थूसर गेट पर रंगा ठाकुर के निर्देशन में पिछले करीब तीस साल से इस मेले का आयोजन किया जा रहा है। 
कहा जाता है श्रषि विश्रवा और माता अदिति के दो संताने थी एक हिरण्याक्ष और दूसरा हरिण्यकश्यप । दोनों में अत्यंत बल था जिसके कारण व मानव जाति को सताते थे। हिरण्याक्ष का वध तो वामन अवतार में भगवान विष्णु ने किया और जब से अपने भाई की मौत के बाद हरिण्यकश्यप विष्णु भगवान को अपना शत्रु मानने लगा। इसी हरिण्यकश्यप ने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या की और ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया कि हरिण्यकश्प को कोई मानव न पशु मार सकता है और न रात में और न दिन में कोई मार सकता है न वह अस्त्र से मर सकता है और न शस्त्र से । ऐसा वरदान प्राप्त कर हरिण्यकश्यप पूरे संसार में उत्पात मचाने लगा लेकिन उसी के पुत्र प्रहलाद ने भगवान विष्णु की भक्ति की जो उसके पिता को पसन्द न आई। अपने पुत्र को मारने के कईं यत्न उसने किए और अंत में एक खम्भे से भगवान नृसिंह ने अवतार लिया जो नर व सिंह दोनों रूपों में थे और इस अवतार ने न दिन को और न रात को मतलब संाझे ढलते वक्त गोधूली बेला में हरिण्यकश्यप का वध कर अपने भक्त की रक्षा की। 
इसी लीला का मंचन बीकानेर शहर में पिछले सैंकडों सालों से हो रहा है। आस्थाओं के शहर बीकानेर में यह परम्परा आज भी बडी भक्ति व श्रद्धा से निभाई जाती है और इस नृसिंह लीला को देखने के लिए हजारों का जन समूह इन स्थानों पर उमडता है और सयह सिद्ध करता है कि आज भी धर्म नगरी बीकानेर के लोग अपने संस्कारों व परम्पराओं से गहरे जक जुडे ह
गौर करने वाली बात यह भी है कि इस तरह की नृसिंह लीला का आयोजन भारत भर में बीकानेर सहित उत्तरप्रदेश के कुछ जिलों में ही होता है। बीकानेर के लोग जो वर्तमान में कलकत्ता में रहते हैं वे भी बांसतल्ला स्थित भैरव मंदिर में आज के दिन इस लीला का आयोजन कर ते ह ।
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Article by :- shyam narayan ranga श्याम नारायण रंगा 

यहाँ पुरूष गाते हैं गणगौर के गीत

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Shyam N Rangaगणगौर का त्यौंहार राजस्थान में बडे धूमधाम से मनाया जाता है। जयपुर, बीकानेर, चुरू, नागौर सहित राजस्थान के कई जिलों में गणगौर की सवारी शाही लवाजमें के साथ गाजे बाजे से निकाली जाती है। घर घर में लडकियाँ और नववधू महिलाऍं गणगौर की पूजा करती है और अपने सुहाग व परिवार की खुशहाली की कामना करती है। गणगौर का यह त्यौंहार राजस्थान की संस्कृति में रचा बसा है। शिव पार्वती के इस रूप की पूजा व अर्चना बीकानेर में महिलाओं के साथ पुरूषों के द्वारा भी भक्ति व श्रद्धा के साथ की जाती है।
होली के अगले दिन धुलण्डी के समाप्त होते ही रात को ही बारहगुंवाड चौक में जुगल किशोर ओझा ’पुजारी बाबा‘ के सानिध्य में फूंभडों के पाटे के पास चौक के पुरूष गणगौर के गीत गाते हैं। इसी तरह हर्षों के चौक में, मोहता चौक में, आचार्यों के चौक में, व्यासों के चौक में पाटों पर पुरूष शाम ढलते ही गणगौर के गीत गाना शुरू कर देते हैं और देर रात तक गणगौर  के गीत गाते हैं। सामान्यतः गणगौर का यह त्यहार महिलाओं द्वारा धूमधाम से मनाया जाता है और यह माना जाता है कि यह त्यौंहार महिलाओं का ही है लेकिन इस त्यौंहार में पुरूषों का इस तरह से जुडाव इस बात का प्रतीक है कि पुरातन समाज में स्त्री के साथ पुरूष भी हर त्यौंहार में उसका भागीदार रहा है। गणगौर के इन गीतों में पुरूष जहाँ पार्वती स्वरूपा माँ गणगौर की पूजा अर्चना करता है वहीं गणगौर के श्रृंगार का भी वर्णन किया जाता है। इसमें यह बताया जाता है कि माँ गणगौर का रूप कितना सुंदर है और कितना मनमोहक है। हर्षों के चौक में पाटे पर गीत गाने वाले अबीरचन्द हर्ष उर्फ कैपली के अनुसार यह परम्परा बीकानेर में सैंकडों वर्ष पुरानी है और आज भी चौक के लोग इस परम्परा का पूरे मनोयोग से निर्वाह कर रहे हैं। इसी पाटे पर गीत गाने वाले बुजुर्ग पन्नालाल हर्ष बताते हैं कि इन गीत में गणगौर के सगुण स्वरूप व निर्गुण स्वरूप दोनों के गीतों को गाया जाता है। चूंकि गणगौर पार्वती का रूप है और शिव की पत्नी है और शिव सगुण रूप व निर्गुण रूप दोनों ही तरह से पूजा जाता है। अतः गणगौर की भी इन दोनों रूपों में ही पूजा होती है।
जब चौक के पाटों पर पुरूष यह गीत गाते हैं तो इन गीतों को सुनने के लिए आस पास से निकलने वालों के कदम बरबस ही ठहर जाते हैं। पुरूषों के मह से ठण्डी रातों में निकलने वाले ये गीत लोगों का ध्यान उनकी ओर खींचत है। यह माना जाता है गणगौर अपने पीहर आती है और फिर पीछे पीछे गणगौर का पति ईसर उसे वापस लेने आता है और आखिर मे चैत्र शुक्ल द्वितीया व तृतीया को गणगौर को अपने ससुराल वापस रवाना कर दिया जाता है और इन्हीं दिनों में जब गणगौर अपने पीहर होती है, गणगौर को खुश करने के लिए गणगौर के सामने गीत गाए जाते है और माता से कामना की जाती है वह देश, शहर, परिवार व कुल की समृद्धि करे उसकी रक्षा करे। पुरूषों द्वारा भी इन गीतों में माँ गवरजा से यही कामना की जाती ह। साथ ही साथ इन गीतों में वीर रस के गीत भी गाए जाते हैं और ईसर द्वारा यह दर्शाया जाता है कि वह गणगौर के लिए योग्य वर है और वह गणगौर को प्राप्त करने की कामना रखता है। इसी तरह गीतों में यह भी दर्शाया जाता है कि गणगौर ईसर को ताने मारती है और कहती है कि अगर तूने मेरी तरफ देखा तो तुझे मेरी बहन दातुन में, मेरा भाई खाने में जहर दे देंगे लेकिन ईसर नहीं मानते और आखिर वह अपनी गणगौर को अपने साथ लेकर ही जाते है। गणगौर की बहनों की तरफ से यह भी गीत गाया जाता है कि अब ईसर जी आप आ तो गए ही हो और गणगौर को लेकर ही जाआगे तो कुछ दिनों के लिए तो इसे छोड दो ताकि यह जब तक यहॉ है हमारे साथ रह सके। यह भक्ति, श्रृंगार व वीर रस के सारे गीत चौक में पाटों पर पुरूषों द्वारा गाए जाते है। आखिरी दिन पूरे चौक में गणगौर के प्रसाद स्वरूप दूध से बने राबडये का भोग लगाया जाता है और पूरे चौक में बाँटा जाता है और भक्ति भाव से गणगौर को विदाई दी जाती है।
परम्पराओं के शहर बीकानेर में सैकडों वर्षों से यह परम्परा चली आ रही है और आज भी इस परम्परा का निर्वहन किया जाता है। और सच भी है कि त्यौंहार वह चाहे पुरूषों का है या महिलाओं का इसे श्रद्धा, भक्ति के साथ मनाकर देश, समाज की खुशहाली की कामना करने से भाईचारा ही बढता है।

श्याम नारायण रंगा
पुष्करणा स्टेडियम के पास, बीकानेर