हमारी संस्कृति में पर्वों का विभाजन मौसम के अनुसार ही होता है। इन पर्वों पर हमारे मन में स्वतः ही उत्साह उत्पन्न हो जाता है। शरत् ऋतु के बाद ग्रीष्म व उसके बाद बरसात उसके बाद पुनः सर्दी का यह बदलता क्रम शरीर मे बदलाव के साथ साथ उत्साह का भी संचार करता है और यही कारण है कि हर मौसम में कोई न कोई त्यौंहार जरूर होता है।
दशहरा, दीपावली, मकर संक्रांति, बंसत पंचमी, होली, रक्षाबंधन जैसे त्यौंहारो में आदमी की संवेदनाएं अगर सुसुप्तावस्था में भी हो तो वो स्वतः ही जाग्रत हो जाती है। ऋतुओं पर आधारित त्यौंहारों के इस देश में में छः ऋतुएँ होती है। इन छः ऋतुओं में ऋतुराज बसंत ऋतु को ही कहा जाता है क्योंकि बसंत का मौसम भारतीय मौसम विज्ञान के अनुसार समशीतोष्ण वातावरण के प्रारम्भ होने का संकेत है जिसमें शरत् ऋतु अपने अंतिम पड़ाव पर होती है और ग्रीष्म की आहट होनी शुरू होती है।
यह ऐसा मौसम है जिसमें प्रकृति का कण-कण खिल उठता है, मानव तो क्या पशु पक्षी भी उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नई उमंग से सूर्योदय होता है, बसंत का मौसम भारतीय जनामनस को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीन समय से ही बसंत का आगमन ज्ञान व विद्या की देवी सरस्वती के जन्मदिन से होता है। उमंग व उत्साह की शुरूआत ज्ञान व विद्या की देवी सरस्वती की पूजा से की जाती है और वंदना की जाती है कि हमारे जीवन की नई शुरूआत में हमें विवेक रहे हमारे ज्ञान का भण्डार कम न हो। बसंत का मौसम जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, आशा और विश्वास जगाता है और जीवन में ऐसा भाव बना रहे इसके लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है और यही कारण है कि इसी ज्ञान की प्राप्ति के लिए बसंत का आगमन सरस्वती पूजन से होता है। बसंत ऋतु के आगमन से ही पृथ्वी जैसे नए प्राणों का संचार होता है खेतों में पीले फूल छा जाते हैं, पेड़ों पर मंजरियॉं उगने लगती है जिसकी सुगंध से वातावरण सवासित हो जात है। इस तरह बसंत के आगमन से ही चारों ओर उमंग, उल्लास व खुशी छा जाती है। ऐसा है ऋतुराज बसंत ।
वास्तव में बसंत का मौसम व्यक्ति को नए सिरे से जीवन शुरू करने का संकेत देता है। पीछे जो कुछ भी हुआ उसको भूलकर एक नई शुरूआत की ओर दिशा दिखाने का काम बसंत का मौसम करता है। यही कारण है कि इस मौसम में देश भर में कईं तरह के त्यौहार मनाए जाते है। इसी मौसम में देश के कईं हिस्सों में पतंगबाजी की जाती है और कामना की जाती है कि जैसे आकाश में पतंग आगे और आगे बढ़ती है वैसे ही हमारा जीवन आगे की ओर बढ़ता जाए और रंग बिरंगे रूप में हम अपने जीवन की नईं ऊचाईयों को छू ले। पतंगोत्सव जीवन में उमंग का संचार करता है और भारतीय सभ्यता और संस्कृति का सर्वोच्च त्यौहार होली भी बसंत ऋतु में ही आता है। होली प्रतीक है अल्हता का, उमंग का, नए रंगों का और बसंत ऋतु में होली के माध्यम से जीवन में जोश का संचार होता है। हमारा शरीर पॉंच तत्वों से बना है और बसंत के मौसम में ये पॉंचों तत्व अपना विषिष्ट व मोहक रूप दिखाते हैं और प्रकृति का यह मोहक रूप व्यक्ति को मादकता से भर देता है। जिस शिशिर के कारण ठिठुरन थी अब वह ठिठुरन नहीं रही और खुले आकाश में उड़ने का मन करता है। किसान अपने खेतों में पीले फूल देखकर उल्लासित होता है तो धनी व्यक्ति प्रकृति के इस नए सौंदर्य में खो जाना चाहता है ओर वहीं निर्धन व्यक्ति ऐसे मौसम में ठण्ड से अब सुखानुभूति करता है। इस प्रकार इस मौसम की मादकता से कोई भी अछूता नहीं रहता है।
बसंत बर्फ को पिघालकर पानी बनाने, कठोर पेड़ की टहनीयों से फूल फूटने, की ऋतु है ओर इसीलिए यह ऋतुराज हेै। बसंत कामदेव का मित्र भी है। कामदेव एक ऐसे देव जिनके कारण सृजन संभव होता है। कामदेव का स्वयं का कोई शरीर नहीं है परन्तु यह अदैहिक कामदेव प्रकृति के कण कण मे व्याप्त है। बसंत कामदेव की इस व्याप्ति को अभिव्यक्ति प्रदान करता है। प्रकृति के किसी भी कण में अगर सरसता है और वह कहीं दबी छिपी पड़ी है तो बसंत उसमें ऊर्जा का संचार कर देता है। बसंत निर्जीव को सजीव बनाकर फूट पड़ता है। बसंत उत्सव है सम्पूर्ण प्रकृति में प्राण रूपी ऊर्जा के विस्फोट का। यह प्रतीक है सृजनात्मक शक्ति के नव पल्लवन का यही कारण है कि सृजन की देवी सरस्वती की पूजा से यह उत्सव प्रारम्भ होता है। बसंत ऋतु में आदि से अनादि की सृजनात्मक शक्ति अपनी परिपूर्णता में प्रकट होती है। सृष्टि के कण कण में जो आग छिपी है वह बसंत में पुष्पों के रूप में चटक चटक कर खिलने लगती है। इस प्रकार बसंत पंचमी पृथ्वी की आग के आह्वान का प्रतीक है। रंग बिरंगी आभा को साथ लिए जब बसंत का मौसम आता है तो सारे माहौल मंे खुषियांे के फूल बिखर जाते हैं।
आईए तो हम सब भी प्रकृति के इस महाउत्सव का आनन्द लें और संकल्प करें कि राष्ट्र के निर्माण में एक बार फिर नए सिरे से जुड़ जाएंगे ताकि जो नई पौध तैयार हो उस पर सुंदर सुगंधित पुष्प खिलें और उन पुष्पों से हमारे राष्ट्र की बगिया महक जाए।
– श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’
पुष्करणा स्टेडियम के पास
नत्थूसर गेट के बाहर
बीकानेर।
पुष्करणा स्टेडियम के पास
नत्थूसर गेट के बाहर
बीकानेर।
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