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श्रीमद्भगवत गीता : पवित्र व पुनीत शास्त्र

By SHYAM NARAYAN RANGA - Monday, December 21, 2015 No Comments
भारतवर्ष में ऋषी मुनियों ने गहन चिंतन मनन व गहरे अध्ययन के बाद ज्ञान केे जिस षिखर को प्राप्त किया वहां वेदों की रचना हुई और ये कहा गया कि वेद भगवान की वाणी है जिसका कोई रचयिता नहीं क्योंकि वेद जीवन के सर्वोच्च आदर्षों, सर्वोच्च ज्ञान का निष्कर्ष है जिसे कोई एक व्यक्ति या एक समय निर्धारित नहीं कर सकता। इन्हीं वेदों का अंतिम भाग उपनिषद कहलाता है। मानव एक बौद्धिक प्राणी है और यही उसकी विषेषता उसको अन्य प्राणियों से अलग करती है। उपनिषद इसी ज्ञान की उच्चतम अवस्था है जहां बुद्धि की सीमाओं से परे मनुष्य का अनुभव झलकता है। इन्हीं उपनिषदों में एक उपनिषद ऐसा है जिसने भारत के घर घर में अपनी विषेष जगह बनाई है और जो भारतीय जनमानस के रोम रोम में रचा बसा है। ये उपनिषद है श्रीमद्भगवत गीता।
श्रीमद्भगवत गीता एक पवित्र व पुनीत नाम, जिसके स्मरण से भगवान कृष्ण व अर्जुन का वो रूप सामने आता है जिसमें अर्जुन कुरूक्षेत्र में अपने रथ पर पीछे की तरफ बैठा है और भगवान कृष्ण उसको उपदेष देते नजर आते हैं। मार्गषीर्ष शुक्ल एकादषी ही वह दिन था जब भगवान कृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से पूरे विष्व को गीता का ज्ञान दिया था। इसलिए इस दिन को गीता जयंती के रूप में मनाया जाता है। श्रीमद्भगवत् गीता सनातन धर्म का का एक प्रसिद्ध व व पवित्र ग्रंथ है जो उपनिषद् के रूप में है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व में गीता को लिखा गया है। इसमें कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, सांख्ययोग सहित एकेष्वरवाद पर जोर दिया गया है। मनुष्य के जीवन में जब भी मुसीबतें या समस्याएॅं आती है तो उसका मन पलायनवादी हो जाता है और वह इन मुसीबतों व समस्याओं के बचकर निकलने का उपाय सोचता है। गीता की पृष्ठभूमि भी ऐसी ही है जहां महाभारत के युद्ध में नायक अर्जुन अपने कर्तव्यों से विमुख होकर अनिर्णय की स्थिति मंे आ जाता है। ऐसी स्थिति में भगवान कृष्ण अर्जुन को गीता ज्ञान के माध्यम से युद्ध करने के लिए प्रेरित करते हैं ताकि वह क्षत्रिय धर्म का पालन कर सके। यहां अर्जुन अपने प्रष्नों के माध्यम से सामान्य मनुष्य के जीवन से संबंधित संदेहों को कृष्ण के सामने रखता है और कृष्ण एक एक करके इन संदेहों को दूर करते रहते हैं और तत्व ज्ञान देते हैं। गीता में भगवान कृष्ण ने शरीर के मुकाबले आत्मा की अजरता व अमरता की चर्चा की है और कहा है कि आत्मा कभी मरती नहीं। गीता में सम्पूर्ण जीवन का सार है। यह सत्य है कि सम्पूर्ण विष्व में गीता ही वह औषधि है जो सांसारिक रोगों के रोगियों को जीवन ऊर्जा प्रदान करती है। यही कारण है कि गीता ने सभी धर्मों के लोगों को और सभी देषों के लोगों को आकर्षित व लाभांवित किया। महाभारत के युद्ध से लेकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तक गीता का अतुलनीय योगदान रहा है। महात्मा गांधी ने कहा था कि मैं चाहता हूॅं कि गीता राष्ट्रीय विद्यालयों में ही नहीं बल्कि प्रत्येक षिक्षा संस्थानों में पढ़ाई जाए।  महात्मा गांधी तो गीता के अनन्य भक्त थे। वे एक स्थान पर लिखते हैं, "जब कभी मैं संशयों से घिर जाता हूं, जब निराशाएं मेरी ओर घूरने लगती हैं और मुझे क्षितिज में प्रकाश की किरण भी नहीं दिखाई देती, तब मैं गीता का आश्रय लेता हूं और इसका कोई न कोई श्लोक मुझे प्रेरणा देने वाला मिल जाता है तब तत्काल मैं मुस्कराने लगता हूं।" 
     
 भारत के सैंकड़ों विद्वानों ने गीता पर भाष्य व टीकाएं लिखी। आदि गुरू शंकराचार्य ने गीताभाष्य लिखा इसी तरह रामानुज ने भी गीताभाष्य, बालगंगाधर तिलक ने गीता रहस्य, महात्मा गांधी ने अनासक्ति योग, विनोबा भावे ने गीता प्रवचन, अरविन्द घोष ने गीता पर लेख, संत ज्ञानेष्वर ने ज्ञानेष्वरी और स्वामी रामसुखदास जी महाराज ने गीता साधक संजीवनी नामक पुस्तकें लिखी। 

इसके अलावा बात करें तो औरंगजेब का भाई दाराशिकोह तो गीता पर इतना मुग्ध था कि उसने इसका फारसी में अनुवाद करके अपने बंधु-बांधवों में इसका प्रचार-प्रसार किया था। फारसी अनुवाद की मूल प्रति "इंडिया आफिस" के पुस्तकालय में आज भी देखी जा सकती है। 
       अरबी-फारसी के सुप्रसिद्ध लेखक प्रो. केरवशरूजे दस्तूर ने कहा, "गीता को केवल हिन्दुओं का ही नहीं, बल्कि सभी जातियों का धर्मग्रंथ समझना चाहिए। गीता को यदि दिव्य ज्ञान की खान कहें तो अत्युक्ति नहीं होगी। संसार में ऐसा कोई ग्रंथ नहीं, जो इसकी महत्ता कम कर सके।" 
       प्रो. एडवर्ड जे थामस (लंदन) के उद्गार सर्वथा सत्य हैं, "श्रीमद्भगवद्गीता को भारत का न्यू टेस्टामेंट (धर्मशास्त्र) कहा जाता है, किन्तु धार्मिक इतिहास की खोज के लिए यह इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। हिन्दू लोग वंश-परंपरा से नैतिक, धार्मिक, ईश्वरीय ज्ञान और आत्मिक शांति कहां से पाते हैं- इसका ज्ञान हमें गीता ही देती है। यही नहीं, पश्चिमी देशों में नैतिकता व धार्मिकता के बारे में आज जो बहुत से प्रश्न हैं उन सबका उत्तर भी इसी से प्राप्त होता है।"        
       विद्वान् विलियन बॉन हम्बोल्ट का कहना है कि गीता सबसे ज्यादा सुंदर और वास्तविक अर्थों में एकमात्र दार्शनिक गीत है जो किसी ज्ञात भाषा में लिखा गया है। उसमें वर्णन है कि, "श्रीनारायणदेव और आश्रम परम पवित्र है, जहां उष्ण गंगा व शीतल गंगा है, जहां देवता, यक्ष, गंधर्व, ऋषि-मुनि सदा वास करते हैं। यह क्षेत्र पवित्रतम है।" गीता में दार्शनिक मन की सकल प्रगति व सक्रियता का अनुपम सम्मिश्रण है। वास्तव में इसे उपनिषदों की आत्मा कहना अधिक उपयुक्त होगा।
      सम्पूर्ण गीता शास्त्र का निचोड़ है बुद्धि को हमेशा सूक्ष्म करते हुए महाबुद्धि आत्मा में लगाये रक्खो तथा संसार के कर्म अपने स्वभाव के अनुसार सरल रूप से करते रहो। स्वभावगत कर्म करना सरल है और दूसरे के स्वभावगत कर्म को अपनाकर चलना कठिन है क्योंकि प्रत्येक जीव भिन्न भिन्न प्रकृति को लेकर जन्मा है, जीव जिस प्रकृति को लेकर संसार में आया है उसमें सरलता से उसका निर्वाह हो जाता है। श्री भगवान ने सम्पूर्ण गीता शास्त्र में बार-बार आत्मरत, आत्म स्थित होने के लिए कहा है। स्वाभाविक कर्म करते हुए बुद्धि का अनासक्त होना सरल है अतः इसे ही निश्चयात्मक मार्ग माना है। यद्यपि अलग-अलग देखा जाय तो ज्ञान योग, बुद्धि योग, कर्म योग, भक्ति योग आदि का गीता में उपदेश दिया है परन्तु सूक्ष्म दृष्टि से विचार किया जाय तो सभी योग बुद्धि से श्री भगवान को अर्पण करते हुए किये जा सकते हैं इससे अनासक्त योग निष्काम कर्म योग स्वतः सिद्ध हो जाता है।गीता संसार के मानवमात्र से कहती है, मन, वचन व कर्म से एक बनो। कथनी व करनी में फर्क होने से सारे झगड़े दुनिया को आपस में लड़ाए हुए हैं और मानवमात्र त्राहि-त्राहि कर रहा है। संसार आज एक ज्वालामुखी पर खड़ा है न जाने कब-क्या हो जाए। ऐसे समय गीता ही सबको बचा सकती है। श्रीकृष्ण ने आश्वासन दिया था कि वे दौड़े आएंगे जब मानव पर संकट आएगा। लंबी प्रतीक्षा से भारी हानि होने वाली है, इसलिए गीता के गायक अपना वचन निभाकर मानवता का त्राण करो। मानवता की गुहार गीता का उपदेशक ही सुन सकता है। गीता कहती है- अशांतस्य कुत: सुखम्।। आज अशांत संसार में सुख व शांति नहीं है। आइए, उस भगवान श्रीकृष्ण की वाणी को सुनें- सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं ब्राज।- सभी तथाकथित धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुमको सब पापों-क्लेशों से मुक्त कर दूंगा।

श्याम नारायण रंगा "अभिमन्यु"



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