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दिल्ली अब भी होगी वहीं

By SHYAM NARAYAN RANGA - Thursday, May 21, 2026 No Comments

दिल्ली अब भी होगी वहीं,

चांदनी चौक की गलियों में वही भीड़ होगी,

वही परांठों की खुशबू, वही शाम की रौनक,

पर मेरे जीवन की “रीना” अब कहीं नहीं होगी।

साल में एक बार जब तुम

पीहर जाने की जिद करती थी,

तो मैं मुस्कुराकर कहता —

“इतना भी क्या याद आता है दिल्ली?”

और तुम हँसकर बोलती —

“वो मेरा बचपन है रंगा जी…”

फिर सफ़र शुरू होता था,

रेल की खिड़की से भागते पेड़,

तुम्हारी आँखों में चमक,

और हाथों में बच्चों जैसी खुशी।

चांदनी चौक पहुँचते ही

तुम जैसे फिर से बेटी बन जाती थी।

मैं तुम्हें छोड़कर लौट आता,

पर घर तब घर कहाँ रहता था…

दीवारें चुप रहतीं,

रसोई उदास रहती,

और चाय का कप भी

जैसे तुम्हारा इंतज़ार करता था।

फिर एक महीना बीतता,

और मैं तुम्हें लेने दिल्ली जाता।

तुम हमेशा कहती —

“इतना सामान है, कैसे ले जाओगे?”

और सच में,

तुम सिर्फ़ बैग नहीं लाती थी,

अपने साथ पूरा उत्सव ले आती थी।

किसी के लिए कुर्ता,

किसी के लिए मिठाई,

बच्चों के लिए खिलौने,

और मेरे लिए…

शायद कोई छोटी-सी चीज़,

पर उसमें तुम्हारा पूरा प्यार छुपा होता था।

तुम्हारे आते ही

घर अचानक जी उठता था,

जैसे सूनी चौखट पर

फिर से दीपक जल उठे हों।

तुम्हारी आवाज़, तुम्हारी हँसी,

तुम्हारा सामान फैलाना,

सबमें एक अपनापन था।

पर अब…

न दिल्ली जाने की तैयारी होती है,

न टिकटों की बात होती है,

न कोई कहता है —

“रंगा जी, इस बार मेरे साथ चलोगे ना?”

अब चांदनी चौक का नाम सुनकर

दिल भर आता है।

क्योंकि वहाँ अब भी

तुम्हारी यादें रहती होंगी,

पर तुम नहीं।

तुम्हारे जाने के बाद

सब कुछ जैसे थम गया है,

वो सालाना इंतज़ार,

वो वापसी की रौनक,

वो गिफ्टों से भरे बैग,

और सबसे बढ़कर…

मेरे घर की धड़कन।

रीना,

तुम सच में सिर्फ़ मेरी पत्नी नहीं थी,

तुम इस घर की मुस्कान थी।

अब घर तो वही है,

पर उसमें रहने वाली “रौनक”

तुम अपने साथ ले गई…॥

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