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मनचाही नहीं अनचाही मौत : आत्महत्या

By SHYAM NARAYAN RANGA - Friday, May 20, 2016 No Comments
प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन के साथ साथ अपने जीवन को समाप्त करने का अधिकार लेकर पैदा होता है। कानून भले की इस अधिकार पर प्रतिबंध लगा दे लेकिन व्यक्ति के पास यह अधिकार सदैव स्वतंत्र रहता है। कानूनी प्रतिबंध के बावजूद प्रतिवर्ष दुनिया में लाखों लोग आत्महत्या करते हैं। आत्महत्या का विचार इतना प्रबल होता है कि जब यह विचार आता है तो सिर्फ विचार अंतिम उपाय नजर आता है। यह विचार क्षणिक होता है लेकिन होता प्रभावी है। आत्महत्या किसी भी अस्थायी समस्या का स्थायी समाधान है। क्षणभर का अवसाद जब संकुचित मानसिकता के दायरे में आता है तो आत्महत्या के अलावा कोई उपाय नजर नहीं आता।
वास्तव में आत्महत्या करने वाला व्यक्ति अपनी पीड़ा को मारना चाहता है वह खुद को नहीं मारना चाहता परंतु कोई रास्ता नजर नहीं आता देख वह खुद को समाप्त करके ही पीड़ा समाप्त करने की सोचता है। इसी क्रम में बात करें तो हाल ही में छोटे पर्दे की मषहूर अभिनेत्री बालिका वधू फेम प्रत्यूषा बनर्जी ने आत्महत्या कर ली। ये खबर चकाचौंध से भरी रजत पटल की दुनिया के लिए या यू कहें कि वर्तमान में किसी के लिए भी चौकाने वाले खबर नहीं है कि किसी ने आत्महत्या कर ली। आए दिन कहीं न कहीं कोई न कोई आत्महत्या कर लेता है। आत्महत्या एक ऐसा कृत्य जिसके बारे में सोचकर भी सिहरन होती है। हमारे शरीर के किसी भी अंग में अगर कोई छोटी सी भी चोट लग जाए तो हमें काफी तकलीफ होती है और सहन नहीं होता और ऐसे में कोई व्यक्ति अपना जीवन समाप्त करने की सोच ले और जीवन समाप्त कर ले तो निष्चित ही यह एक बड़ा और निराषा भरा कदम होता है और जो व्यक्ति आत्महत्या करता है उसको आत्महत्या करने से लेकर मरने तक के समय में असीम पीड़ा होती होगी और अपने अपने इस निर्णय पर पछतावा भी होता होगा। पर क्यों कोई व्यक्ति ऐसा करता है।
फिल्म इण्डस्ट्रीज या छोटे पर्दे के लिए यह पहली बार नहीं है कि किसी ने आत्महत्या की है। अपने जमाने की मषहूर और बड़ी बड़ी हस्तियों ने ये कदम उठाया है। परवीन बॉबी, जीया खान, दिव्या भारती, सिल्क स्मिता, कन्नड़ टीवी अभिनेत्री श्रुति, तेलगू अभिनेत्री दिप्ती {रामा लक्ष्मी}, बंगाली अभिनेत्री दिषा गांगुली, सहित और भी कईं नाम है जिन्होंने यह कदम उठाया है। माया नगरी बॉम्बे सबको अपनी ओर आकर्षित करती है। चकाचौंध से भरी जिंदगी, आस पास मिलने को तरसते प्रषंसक, दौलत, शौहरत और वो सब कुछ जो एक जीवन उम्मीद करता है और फिर उसके बाद जिसको यह मिलता है तो वह इसकी आदत डाल लेता है और जब ये सब उसके पास से चला जाता है तो घोर निराषा उसको घेर लेती है और वो कुंठा या फ्रषट्रेषन का षिकार हो जाता है। समय की जमी धूल में इन मषहूर हस्तियों का दम घुटता है और फिर शुरू होता है गुमनामी का एक गहरा अंधेरा जिसकी आखिरी मंजिल आत्महत्या या गुमनाम मौत होती है। दूसरा कारण है वे लोग जो इस मायानगरी में बड़ी उम्मीदों से आते हैं और अपनी उम्मीदों को पूरा  न होते देख घोर निराषा में घिर जाते हैं। ये निराषा और संघर्ष जीवन को उस अंतिम मुकाम पर पहुॅंचा देता है जहां आत्महत्या अंतिम उपाय नजर आता है। मायानगरी में रिष्ते भी गहरे नहीं होते। जैसे सफलता मिलती है रिष्ते बनते जाते हैं और यहां सामान्यतः रिष्तों को एक सीढ़ी के रूप में उपयोग किया जाता है और जैसे ही सीढ़ी से चढ़कर उपर जाया जाता है रिष्ता समाप्त हो जाता है। भावुक मन रिष्तो के इस उहापोह में उलझ जाता है। एक तरफ असफलता और दूसरी तरफ रिष्तों की बेरूखी आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हैं। भारत जैसे देष में फिल्म व टीवी इंडस्ट्री इतनी बड़ी हो चुकी है कि यहां प्रत्येक के लिए अपार संभावनाएं नजर आती है। वर्तमान में यहां इतना काम है कि हर काम हर रोज होता है। एक समय था जब सीरियल और फिल्मों की संख्या कम थी और क्वाटिंटी नहीं क्वालिटी को महत्व दिया जाता था परंतु वर्तमान में इतने चैनल है कि प्रत्येक पर रोजना दसों सीरियल आते हैं और हर साल न जाने कितनी फिल्में रजत पटल पर आती है। ऐसी स्थिति में काम का बोझ और दूसरे शहर से आकर मायानगरी में काम करने का बोझ, जहां न कोई अपना है और न केई संवेदना, सिर्फ काम और काम और सिर्फ काम ऐसे में हर बात महत्वहीन हो जाती है और फिर एक या दो सीरियल के बाद जाना पहचाना चेहरा अनजान हो जाता है। यह सब बातें सिर्फ मायानगरी के लिए जीवन में किसी भी क्षेत्र में काम करने वाले के साथ कभी भी आ सकती है। जीवन में कुछ पाने की चाह और काम का संघर्ष फिर असफलता निराषा की ओर फिर निराषा अवसाद की ओर धकेलती है। यह अवसाद ही सब समस्या की जड़ है। मायानगरी ही क्यों आज पूरा समाज इस अवसाद और गंभीर समस्या से रूबरू हो रहा है। प्रेम में असफलता, बेरोजगारी, गरीबी, कर्जा, पारिवारीक कलह, तनाव, कईं ऐसे कारण है जो वयक्ति को इस ओर धकेलते हैं।
ऐसे में काम का बोझ व महत्वहीनता निराषा के साथ जीवन के प्रति भी निरसता पैदा करती है। उम्मीदें जब पूरी नहीं होती तो चारों ओर अंधेरा ही नजर आता है। ऐसे में आत्महत्या एक सामान्य सी बात नजर आती है। ऐसे में जरूरी है कि जीवन में ऊर्जा का संचार हो और उम्मीदों के पंख पर लगाम हो, संतुष्टि और समर्पण भी ऐसी हरकतों पर रोक लगा सकता है। जरूरी है कि जीवन के प्रति सकारात्मक नजरीया अपनाया जाए और जो मिल जाए उसका दिल खोलकर स्वागत किया जाए। आत्महत्या कोई उपाय नहीं है, ये निराषा का रास्ता है जहां व्यक्ति खुद तो चला जाता है परंतु अपने पीछे एक ऐसी न मिटने वाली लकीर छोड़ जाता है जिस पर चलकर समाज पतन की ओर जा रहा है। सोचों पीछे से ऐसे परिवारों का क्या होता होगा और क्या बीतती होगी उन पर और कैसे वो अपना जीवन बीताते होंगे। जिन्होंने अपने दिल के टुकड़े को आसमान की ऊॅंचाईयों पर पहुॅंचाने के लिए मायानगरी में भेजा था वे जब छत से लटका देखते हैं जो दिल चीर जाता है ये कृत्य। जीवन के प्रति सिर्फ अपनी सोच न रखकर अपने लोगों के प्रति भी सोच रखने से आत्महत्या पर रोक लगाई जा सकती है।
जब व्यक्ति अवसाद में हो तो उसे अपने परिवार व मित्रों से बात करनी चाहिए। कहा भी है कि दुःख बॉटने से घटता है। समस्याओं पर चर्चा करनी चाहिए। कुछ बातें परिवार से या मित्रों से करी नहीं जा सकती है तो ऐसे में अपने विषेष व खास मित्र से जीवन की समस्याओं पर खुलकर बात करनी चाहिए। जीवन में ऐसा मित्र हो जो सब रिष्तों से अलग और खास हो जिसको आपके जीवन की सारी जानकारी हो और जो आपके बारे में सब जानता हो ऐसे रिष्ते बनाए जो सब रिष्तों से हटकर हो और ऐसे रिष्तों में खुलकर जीने की आदत डालें। वर्तमान के दबाब के दौर में खुले रिष्तों की अहमियत जरूरी है। बंधनों से मुक्त होकर जीवन को खुले विचारों के आकाष में ले जाए ओर निराषा को अपने आस पास न आने दे। लंबे समय से आत्महत्या की बात मन मे आ रही हो निराषा व अवसाद हो तो डॉक्टर से बात करे यह एक बीमारी भी हो सकती है जिसका ईलाज संभव है। अगर इन सब बातों पर समाज में खुलकर चर्चा हो तो हम आने वाले समाज को इस गंभीर समस्या से मुक्त करवा सकते हैं।

श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’
पुष्करणा स्टेडियम के पास,
नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर
मोबाईल : 9950050079

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