बीकानेर नगर निगम के चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन चुनावी मौसम की आहट सोशल मीडिया पर इतनी तेज सुनाई देने लगी है कि लगता है मतदान की तारीख घोषित हो चुकी है और मतदाता घर से निकलने ही वाला है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों दलों में टिकट के दावेदारों की ऐसी बाढ़ आई हुई है कि सोशल मीडिया खोलते ही लगता है मानो नगर निगम का चुनाव नहीं, ‘दावेदार सम्मेलन’ चल रहा हो।
कभी जमाना था जब टिकट की दावेदारी का मतलब होता था मोहल्ले के नुक्कड़ पर बैनर, चौक पर पोस्टर, दीवारों पर नारे और चौराहे पर बड़े-बड़े होर्डिंग। पोस्टर छपवाने में पैसा लगता था, बैनर लगाने के लिए कार्यकर्ता चाहिए होते थे और प्रचार के लिए कम से कम इतना जनसंपर्क तो करना पड़ता था कि लोग पहचान सकें कि दावेदार आखिर है कौन!
अब जमाना बदल गया है। हाथ में मोबाइल हो, कोई सा भी डिजाइनिंग ऐप हो और दो मिनट का खाली समय हो—बस बन जाइए संभावित पार्षद!
पहले पोस्टर छपवाने के लिए प्रिंटिंग प्रेस जाना पड़ता था, अब मोबाइल ही प्रेस है, मोबाइल ही डिजाइनर है और मोबाइल ही प्रचार कार्यालय। फोटो लगाइए, ऊपर पार्टी का झंडा लगाइए, नीचे लिखिए “जनता की सेवा के लिए सदैव तत्पर”, बीच में दो-चार नेताओं के फोटो चिपकाइए और अंत में लिख दीजिए “वार्ड नंबर फलां से अमुक पार्टी के या निर्दलीय प्रबल दावेदार।”
पोस्टर तैयार!
फिर उसे फेसबुक, व्हाट्सऐप और इंस्टाग्राम पर डालते ही दावेदारी का उद्घाटन हो जाता है।
न पैसा लगा, न प्रेस गया, न कार्यकर्ता बुलाए और न ही मोहल्ले में किसी से पूछा कि भाई साहब, आप हमें जानते भी हैं या नहीं!
सबसे मजेदार बात यह है कि अब दावेदारों की संख्या देखकर पार्टी के बड़े नेता भी कभी-कभी सोचते होंगे कि आखिर टिकट किसे दें? वार्ड में जितने मतदाता हैं उसके अनुपात में दावेदार ज्यादा दिखाई दे रहे हैं।
और इस डिजिटल दावेदारी में एक नई प्रजाति भी सामने आई है ‘मजाकिया दावेदार।’
ये वे महानुभाव हैं जिनके बारे में उनके पड़ोसी तक यह नहीं सोच सकते कि ये कभी चुनाव लड़ने की सोचेंगे। न कोई राजनीतिक गतिविधि, न पार्टी की बैठक में उपस्थिति, न सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रियता और न ही जनता से कोई विशेष संपर्क। लेकिन एक दिन अचानक मोबाइल पर उनका पोस्टर प्रकट होता है—
“वार्ड नंबर अमुक से प्रत्याशी के रूप में मेरी दावेदारी।”
पोस्टर देखकर गंभीर दावेदार के पैरों तले जमीन खिसक जाती है।
वह तुरंत फोन करता है—
“भाई साहब! आपने भी टिकट मांग लिया?”
उधर से जवाब आता है—
“अरे नहीं यार, ऐसे ही बना दिया था!”
“लेकिन पोस्टर तो लगा दिया!”
“अरे मोबाइल में ऐप पड़ा था। सोचा देखूं कैसा लगता हूं पार्षद बनकर!”
यानी अब राजनीति में ‘ट्रायल वर्जन’ भी आ गया है।
पहले चुनाव लड़ने के लिए आदमी वर्षों तक राजनीति करता था। अब आदमी पहले पोस्टर बनाता है, फिर सोचता है कि चुनाव लड़ना है या नहीं।
गंभीर दावेदार की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वह महीनों से पार्टी के नेताओं के चक्कर काट रहा है, कार्यकर्ताओं से संपर्क कर रहा है, वार्ड में लोगों से मिल रहा है और टिकट की उम्मीद लगाए बैठा है। तभी कोई मोबाइलवीर भाई साहब एक पोस्टर बनाकर उसे सोशल मीडिया पर डाल देता है।
गंभीर दावेदार पूछता है—
“आपकी दावेदारी किस आधार पर है?”
जवाब मिलता है—
“भाई, पोस्टर तो अच्छा बना है ना?”
बस! यही आज की डिजिटल राजनीति का सबसे बड़ा आधार है।
अब दावेदारी में जनाधार बाद में और फोटो का बैकग्राउंड पहले देखा जा रहा है। जिस फोटो में चेहरा ज्यादा चमकदार आए, उसी की दावेदारी ज्यादा मजबूत समझी जा रही है।
कुछ दावेदार तो इतने सक्रिय हैं कि सुबह किसी महापुरुष की जयंती पर पोस्टर, दोपहर में किसी सामाजिक कार्यक्रम का पोस्टर और शाम को टिकट की दावेदारी का पोस्टर। रात तक वही व्यक्ति “जनसेवक”, “समाजसेवी”, “युवा नेता”, “वरिष्ठ कार्यकर्ता” और “प्रबल दावेदार” चारों पदों पर आसीन हो चुका होता है।
डिजिटल युग की सबसे बड़ी सुविधा यह है कि दावेदारी की कोई सीमा नहीं है।
एक ही व्यक्ति दो वार्डों से दावेदारी कर सकता है। एक ही परिवार के चार लोग अलग-अलग वार्डों से दावेदारी कर सकते हैं। पति-पत्नी दोनों दावेदार हो सकते हैं और कभी-कभी तो पूरा परिवार ही टिकट की दौड़ में शामिल दिखाई देता है।
और सबसे बड़ी बात दावेदारी करने के लिए किसी से अनुमति लेने की जरूरत नहीं।
न पार्टी ने पूछा, न वार्ड ने पूछा, न कार्यकर्ताओं ने पूछा।
बस मोबाइल से कहा “Create Poster”
और दावेदार ने सोचा “Create Future!”
अब सोशल मीडिया पर दावेदारों की संख्या देखकर लगता है कि टिकट की घोषणा होते-होते कई वार्डों में दो ही लोग बचेंगे—एक टिकट पाने वाला और दूसरा वह, जिसने टिकट नहीं मिलने पर सोशल मीडिया पर लिखा होगा—
“पार्टी का फैसला शिरोधार्य है, लेकिन कार्यकर्ताओं की भावनाओं की अनदेखी हुई है।”
और उसके अगले दिन एक नया पोस्टर आएगा
“जनता के आग्रह पर निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला।”
यह डिजिटल दावेदारी केवल हास्यास्पद नहीं, लोकतंत्र की बदलती शैली का भी संकेत है। सोशल मीडिया ने राजनीति को आम आदमी के लिए आसान जरूर बनाया है, लेकिन उसने गंभीर और मजाक के बीच की रेखा भी बहुत पतली कर दी है।
अब असली परीक्षा पोस्टर बनाने की नहीं, पोस्टर के पीछे खड़े जनाधार की होगी।
क्योंकि ऐप से फोटो बड़ी की जा सकती है, नाम को मोटे अक्षरों में लिखा जा सकता है, पीछे हजारों लोगों की भीड़ भी लगाई जा सकती है—लेकिन वोटर की उंगली पर लगने वाली स्याही किसी ऐप से नहीं बनती।
चुनाव में अंततः वही जीतेगा, जिसके पोस्टर से ज्यादा उसके साथ लोग खड़े होंगे।
फिलहाल तो बीकानेर में डिजिटल दावेदारों का मौसम है। हर मोबाइल में नेता है, हर ऐप में पार्षद है और हर व्हाट्सऐप स्टेटस में भावी जनप्रतिनिधि!
कहना गलत नहीं होगा कि आने वाले दिनों में शायद टिकट के आवेदन के साथ पार्टी को एक और दस्तावेज मांगना पड़े, “कृपया अपनी दावेदारी के साथ यह भी प्रमाणित करें कि पोस्टर आपने मजाक में नहीं बनाया है।”
क्योंकि बीकानेर की चुनावी राजनीति में अब सवाल यह नहीं है कि “कौन चुनाव लड़ना चाहता है?”
सवाल यह है कि
“कौन सचमुच लड़ना चाहता है और कौन सिर्फ मोबाइल ऐप में पार्षद बनकर खुश है?”
फिलहाल चुनावी मैदान तैयार होने से पहले ही सोशल मीडिया का मैदान पूरी तरह सज चुका है।
पोस्टर लग रहे हैं, शुभकामनाएं मिल रही हैं, फूल बरस रहे हैं और दावेदार बढ़ रहे हैं।
अब देखना सिर्फ इतना है कि मोबाइल के पोस्टर से निकला नेता मतदान केंद्र तक कितने वोटर पहुंचा पाता है!
श्याम नारायण रंगा
यह आलेख न्यूज कास्ट समाचार पत्र में 2026 के नगर निगम चुनावों के दौरान छपा था।
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