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| mangal chand ranga |
बीकानेर में खेल व खिलाड़ियों का समृद्ध इतिहास रहा है। स्वर्गीय उदयकरण जी जागा उर्फ बच्ची मास्टर जी भी इस सुनहरे इतिहास का एक अध्याय है। खेलों के प्रति समर्पण व खिलाड़ियों का चयन कर उनको राष्ट्रीय स्तर तक पहचान दिलाने में बच्ची मास्टर जी का बीकानेर में विषेष योगदान रहा है। उनसे जुड़ी एक बात आज आपसे शेयर करना चाहता हूॅं जो मुझे स्वयं श्री मंगलचंद जी रंगा ने बताई जो राष्ट्रीय स्तर पर बैंडमिंटन खेल में अपनी विषेष पहचान रखते हैं। बात है सन् 1964-65 की जब बच्ची मास्टर जी पुष्करणा स्कूल में पीटीआई मतलब खेल प्रषिक्षक हुआ करते थे और स्कूल के समस्त खेलों को खिलाड़ियों को सीखा कर अभ्यास करवाया करते थे।
वैसे बच्ची मास्टर जी की पहचान फुटबॉल के कारण विषेष थी। इस स्कूल मे एक विद्यार्थी था मंगलचंद रंगा उर्फ मूलचंद रंगा। ये खिलाड़ी बैंडमिंटन खेला करते थे और बच्ची मास्टर जी इस अपने षिष्य को बैंडमिंटन का अभ्यास करवाया करते थे। इस खिलाड़ी को लेकर बच्ची मास्टर जी स्कूल खेलों में हिस्सा लेने गए। वहां पर रेलवे के एक सीनियर खिलाड़ी श्री एन डी शर्मा ने बच्ची मास्टर जी को मजाक में ताना मार दिया कि मास्टर जी ये फुटबॉल नहीं है जो आप किसी को लाए और वो जीत गया ये बैंडमिंटन है जिसमें कोच और खिलाड़ी को काफी मेहनत करनी पड़ती है। बच्ची मास्टर जी ने यह ताना सुन लिया और कुछ नहीं बोले। पर बीकानेर में खेलों के इस भीष्म को यह बात कहीं मन की गहराई में चोट कर गई। फिर सफर शुरू हुआ बच्ची मास्टर जी का अपने षिष्य मंगलचंद रंगा के साथ। साल भर की मेहनत और मास्टर जी ने दिन रात एक कर दिया। खूब अभ्यास किया। फिर वही समय लौट कर आया स्कूल खेलों में अगले साल ही बच्ची मास्टर जी के इस षिष्य ने राष्ट्रीय खिताब हासिल किया। श्री एन डी शर्मा को जबाब मिल गया था, उन्होंने बच्ची मास्टर जी से अफसोस जाहिर किया और मंगलचंद जी रंगा के अनुसार फिर जब वो रेलवे में नौकरी लगे जो इस शर्मा जी का विषेष स्नेह भी मिला। बच्ची मास्टर जी की तपस्या और मंगल चंद जी की मेहनत वो रंग लाई कि आज मंगलचंद जी रंगा बैंडमिंटन खेल में राजस्थान में भीष्म पितामह जाने जाते हैं। तो ऐसा होता था खेल खिलाड़ी और प्रषिक्षक का रिष्ता। यहां खेल खेला नहीं जाता था जीया जाता था और सांस बनकर पूरे शरीर में प्राणों का संचार करता था।
वैसे बच्ची मास्टर जी की पहचान फुटबॉल के कारण विषेष थी। इस स्कूल मे एक विद्यार्थी था मंगलचंद रंगा उर्फ मूलचंद रंगा। ये खिलाड़ी बैंडमिंटन खेला करते थे और बच्ची मास्टर जी इस अपने षिष्य को बैंडमिंटन का अभ्यास करवाया करते थे। इस खिलाड़ी को लेकर बच्ची मास्टर जी स्कूल खेलों में हिस्सा लेने गए। वहां पर रेलवे के एक सीनियर खिलाड़ी श्री एन डी शर्मा ने बच्ची मास्टर जी को मजाक में ताना मार दिया कि मास्टर जी ये फुटबॉल नहीं है जो आप किसी को लाए और वो जीत गया ये बैंडमिंटन है जिसमें कोच और खिलाड़ी को काफी मेहनत करनी पड़ती है। बच्ची मास्टर जी ने यह ताना सुन लिया और कुछ नहीं बोले। पर बीकानेर में खेलों के इस भीष्म को यह बात कहीं मन की गहराई में चोट कर गई। फिर सफर शुरू हुआ बच्ची मास्टर जी का अपने षिष्य मंगलचंद रंगा के साथ। साल भर की मेहनत और मास्टर जी ने दिन रात एक कर दिया। खूब अभ्यास किया। फिर वही समय लौट कर आया स्कूल खेलों में अगले साल ही बच्ची मास्टर जी के इस षिष्य ने राष्ट्रीय खिताब हासिल किया। श्री एन डी शर्मा को जबाब मिल गया था, उन्होंने बच्ची मास्टर जी से अफसोस जाहिर किया और मंगलचंद जी रंगा के अनुसार फिर जब वो रेलवे में नौकरी लगे जो इस शर्मा जी का विषेष स्नेह भी मिला। बच्ची मास्टर जी की तपस्या और मंगल चंद जी की मेहनत वो रंग लाई कि आज मंगलचंद जी रंगा बैंडमिंटन खेल में राजस्थान में भीष्म पितामह जाने जाते हैं। तो ऐसा होता था खेल खिलाड़ी और प्रषिक्षक का रिष्ता। यहां खेल खेला नहीं जाता था जीया जाता था और सांस बनकर पूरे शरीर में प्राणों का संचार करता था।

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