ये रचना मैनंे 17.05.96 को तब लिखी थी तब लिखी थी जब मैं श्री जैन पी जी महाविद्यालय बीकानेर में वाणिज्य द्वितीय वर्ष का छात्र था। उस समय मेरी उम्र 20 साल की थी।
दहेज की ज्वाला को
भ्रष्टाचार की आग को बुझाना होगा
रिश्वत की लपट को
और दूसरे हर कपट को हटाना होगा
तिरंगे के चक्र को
बापू के चरखे को फिर से चलाना होगा
नेहरू के चमन को
सुभाष के बाग को फिर से बसाना होगा
लूट रहे हैं जो आज अपने ही देष को,
उन्हें समझाना या फिर मिटाना होगा।
भारत भूमि को स्वर्ग से सुन्दर बनाकर
विश्व मानचित्र पर सम्मान दिलाना होगा।
नेहरू को चमन को सुभाष के बाग को फिर से बसाना होगा।
नेहरू के चमन को सुभाष के बाग को फिर से बसाना होगा।
श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’
पुष्करणा स्टेडियम के पास,
नत्थूसर गेट के बाहर,
बीकानेर - 334004
मोबाईल 9950050079
दहेज की ज्वाला को
भ्रष्टाचार की आग को बुझाना होगा
रिश्वत की लपट को
और दूसरे हर कपट को हटाना होगा
तिरंगे के चक्र को
बापू के चरखे को फिर से चलाना होगा
नेहरू के चमन को
सुभाष के बाग को फिर से बसाना होगा
लूट रहे हैं जो आज अपने ही देष को,
उन्हें समझाना या फिर मिटाना होगा।
भारत भूमि को स्वर्ग से सुन्दर बनाकर
विश्व मानचित्र पर सम्मान दिलाना होगा।
नेहरू को चमन को सुभाष के बाग को फिर से बसाना होगा।
नेहरू के चमन को सुभाष के बाग को फिर से बसाना होगा।
श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’
पुष्करणा स्टेडियम के पास,
नत्थूसर गेट के बाहर,
बीकानेर - 334004
मोबाईल 9950050079
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