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बीकानेर का राठौड राजवंश

- Friday, January 29, 2021 No Comments

 
बीकानेर नगर की स्थापना राठौड़ राजा राव जोधा के पुत्र राव बीका ने की थी। ऐसा नहीं है कि नगर स्थापना से पूर्व यह क्षेत्र निर्जन था। राठौड़ राजा राव बीका की नगर स्थापना से पूर्व बीकानेर के क्षेत्र जांगल प्रदेश के नाम से जाना जाता था। यह क्षेत्र मारवाड़ के उत्तर क्षेत्र में स्थित है। इस क्षेत्र का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। इस प्रदेश को उस समय कुरू प्रदेश के नाम से जाना जाता था। मारवाड़ के शासक राव जोधा के छः रानियां व 17 पुत्र थे। जिसमें दूसरे पुत्र बीका ने 1465 में जांगल प्रदेश में राठौड़ वंश की रियासत की स्थापना की तथा 1488 में बीकानेर नगर बसाया। अतः राव बीका को बीकानेर राज्य का संस्थापक माना जाता है। राव जोधा का सबसे बड़ा पुत्र राव नीबा, राव जोधा के शासन काल में ही स्वर्गवासी हो गया था। दूसरा पुत्र राव बीका ही मारवाड़ का उत्तराधिकारी था लेकिन राव जोधा ने अपनी प्रिय पत्नीध्रानी जसमादे के प्रभाव में आकर दूसरे पुत्र राव सातल को जोधपुर का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। अपने पिता राव जोधा की इस हरकत से बीका नाराज हो गया। अपने चाचा के साथ राव बीका ने जोधपुर छोड दिया और करणी माता के आशीर्वाद से जांगल प्रदेश पर अधिकार कर लिया। इसी कारण इस क्षेत्र के राजा को जय जंगलधर बादशाह भी कहा गया। बीका के बढते प्रभाव से जोधपुर के राजा व राव बीका के पिता राव जोधा को डर लगने लगा और उसको यह भय सताने लगा कि कहीं उनका बेटा अपना अधिकार पाने के लिए जोधुपर पर आक्रमण न कर दे। परंतु राव बीका ने अपने पिता को वचन दिया कि वह कभी भी जोधुपर पर आक्रमण नहीं करेगा व जोधपुर रियासत को अपना ज्येष्ठ मानेगा। बीकानेर के राजाओं का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:-

1.राव बीका (1465-1504)


Rao Bikaji 
राव जोधा के पुत्र राव बीका ने 1465 ई. में जांगल प्रदेश जीतकर बीकानेर के राठौड़ राजवंश की स्थापना की। एक मान्यता के अनुसार जांगल प्रदेश को राव बीका और जाट नेता नेरा ने मिलकर जीता, दोनों के नाम पर इसका नाम बीकानेर रखा । इस अभियान में राव बिका को करणी देवी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ जिससे बीका ने अनेक छोटे बड़े कबीलो को जीत लिया। इस प्रकार बीकानेर में राठौड़ वंश की स्थापना हुयी। इन्होंने 1488 में बीकानेर शहर की स्थापना कर उसे अपनी राजधानी बनाया जो द्वितीय राठौड़ सत्ता का प्रमुख केंद्र बन गया । उसकी मृत्यु होने पर उसका ज्येष्ठ पुत्र नरा बीकानेर माँ स्वामी बना। इसके पश्चात बीका के दो पुत्र नारा और लूणकरण थे जो बीकानेर के स्वामी बने इन्होंने जैसलमेर पर भी अपना अधिकार जमा लिया

2. राव लूणकरण

नारा का देहांत 13 जनवरी 1505 को हो गया। नारा के निःसंतान होने से उसका छोटा भाई लूणकरण बीकानेर का शासक बना। राव लूणकरण पिता की भांति साहसी और वीर योद्धा था। उसकी शक्ति का लोहा रुद्रेवा, चायलवाडा आदी स्थानों के सरदार मानते थे, जिनका उसने निजी भुजबल से दमन किया व बड़ा दानी था। करमचंदवशोकिर्तनम काव्य में उसकी दानशीलता कर्ण से की गई है,  बिठू सुजा ने अपने जैतसी रो छंद में कलयुग का कर्ण कहां है। 1526 में धोसा नामक स्थान पर इसकी मृत्यु हो गई थी।

3. राव जैतसी (1526-1542 ई.)

बीकानेर राज्य का प्रतापी शासक एवं राव लूणकरण का पुत्र था इनके समय कामरान ने भटनेर पर आक्रमण किया उस पर अधिकार कर लिया 1534 में राव जैतसी में मुगल सेना पर आक्रमण कर भटनेर को मुगलों से छुड़ा लिया। इस युद्ध का वर्णन बिट्ट सुजा द्वारा लिखित राव जैतसी रो छंद में मिलती है खानवा के युद्ध में राव जैतसी अपने कुंवर कल्याण को सांगा की सहायता के लिए भेजा था । पहोबाध्साहेबा- बीकानेर शासक राव जैतसी में मारवाड़ के शासक मालदेव के बीच युद्ध हुआ इस युद्ध में राव जैतसी मारा गया था बीकानेर राज्य की पराजय हुई मालदेव ने बीकानेर का व्यवस्थापक कुंपा को नियुक्त किया था।


4.राव कल्याणमल(1544-1574) 

1544 में कल्याणमल बीकानेर का राजा बना। राव जैतसी के पुत्र जिन्होंने गिरिसुमेल के युद्ध मे शेरशाह सूरी की सहायता की थी । इस युद्ध के बाद शेरशाह ने बीकानेर राज्य का शासन राव कल्याणमल को सौंपा। बीकानेर के पहले शासक जिन्होंने 1570 ई. के अकबर के नागौर दरबार मे अकबर की अधीनता स्वीकार की और वैवाहिक संबंध स्थापित किए तथा अपने छोटे पुत्र पृथ्वीराज को , जो उच्च कोटि का कवि और विष्णु भक्त था, अकबर की सेवा में भेजा । इन्ही पृथ्वीराज ने ‘वेलि किसन रुक्मणी री’ की रचना की। अकबर ने 1572 में कल्याणमल के पुत्र रायसिंह को जोधपुर का शासक नियुक्त किया।

5. महाराजा रायसिंह(1574-1612) का जन्म 20 जुलाई 1541 को हुआ। इसके पिता राव कल्याणमल थे। इनको राजपूताने का कर्ण महाराजा की उपाधि प्रदान की गई। नागौर दरबार के बाद 1572 ई. में अकबर ने इन्हें जोधपुर का प्रशासक नियुक्त किया। मुगल दरबार में जयपुर के बाद बीकानेर राजघराने का ही अकबर से अच्छा संबंध कायम हुआ। महाराजा रायसिंह ने 1573 में गुजरात के मिर्जा बंधुओं का दमन किया, 1574 में मारवाड़ के चंद्रसेन व देवड़ा सुरताण का दमन किया। महाराजा रायसिंह 1591 में खानेखाना की सहायता के लिए कंधार गये थे, 1593 रायसिंह थट्टा अभियान के लिए दानियाल का दमन करने गए, अकबर ने 1593 में जूनागढ़ तथा 1604 में शमशाबाद तथा नूरपुर की जागीर दी, जहांगीर ने रायसिंह का मनसब 5000 जात व 5000 सवार कर दिया। 1594 ई. में मंत्री कर्मचंद की देखरेख में बीकानेर किले (जूनागढ़) का निर्माण कराया जिसमे ‘रायसिंह प्रशस्ति’ उत्कीर्ण करवाई। महाराजा रायसिंह को मुंशी देवीप्रसाद द्वारा ‘राजपूताने का कर्ण’ की उपमा दी गयी।‘रायसिंह महोत्सव’ व ‘ज्योतिष रत्नमाला’ की भाषा टीका, महाराजा रायसिंह द्वारा लिखित रचनाएँ।  ‘कर्मचन्द्रों कीर्तनकम काव्यम’ इस ग्रन्थ में महाराजा रायसिंह को राजेन्द्र कहा गया है तथा लिखा है कि वह विजित शत्रुओं के साथ भी बड़े सम्मान का व्यवहार करते थे। महाराजा रायसिंह की मृत्यु सन 1612 ई. में बुरहानपुर में हुई।


6. दाव दलपत (1612-13)

महाराजा रायसिंह की मृत्यु के बाद दलपत सिह बीकानेर का शासक बना। राव दलपत का सम्राट जहांगीर से मनमुटाव हो गया। जहांगीर ने दलपत को गद्दी से हटाकर उसके भाई सूरसिह को शासक बना दिया।


7. महाराजा कर्ण सिंह (1631-1669)

पिता सुरसिंह के देहावसान के बाद ये सन 1631 में बीकानेर के सिंहासन पर बैठे। ये बीकानेर के प्रतापी शासक थे मुगल शासक औरंगजेब ने इन्हें जांगलधर बादशाह की उपाधि दी। मुगल शहजादों मे उतराधिकार संघर्ष के समय कर्णसिहं तटस्थ रहे। लेकिन उन्होंने अपने दो पुत्रों- पद्मसिंह और केसरीसिंह को औरंगजेब की ओर से भेजा।

मतीरे की राड़ - 1644 में कर्ण सिंह और अमर सिंह के बीच हुई थी जिसमें अमर सिंह विजय रहे । 17 वी शाताब्दी में बीकानेर शासक कर्ण सिंह ने बीकानेर से 25ाउ दूर देशनोक में करणी माता का मंदिर बनाया था। कर्णसिंह के काल की रचनाओं मे साहित्य कल्पद्दुम व कर्णभूषण (गंगा नंद मैथिली द्वारा रचित) प्रमुख हैं।

8. महाराजा अनूप सिंह –

  • औरंगजेब द्वारा ‘माही मरातिव’ और महाराजा की उपाधि
  •  बीकानेरी चित्रकारी का स्वर्ण युग, उस्ता कला को लाहौर से बीकानेर लाने का श्रेय
  • अनूप संग्रहालय का निर्माण
  • 33 करोड़ देवी देवताओं के मंदिर की संज्ञा वाले बीकानेर के हेरम्भ गणपति मंदिर का निर्माण का

9. सूरत सिंह राठौड

हनुमानगढ़ को पहले भटनेर (भट्टी राजपूतों का दुर्ग) कहा जाता था। 1805 ई. में बीकानेर रियासत में शामिल किये जाने के बाद इसको ‘हनुमानगढ़’ का नाम दिया गया था। सूरत सिंह के समय 1805 ई. में 5 माह के विकट घेरे के बाद राठौड़ों ने इसे ज़ाबता ख़ाँ भट्टी से छीना

यहाँ बीकानेर राज्य का एकाधिकार हुआ। मंगलवार के दिन इस क़िले पर अधिकार होने के कारण इस क़िले में एक छोटा सा हनुमान जी का मंदिर बनवाया गया तथा उसी दिन से उसका नाम ‘हनुमानगढ़’ रखा गया।

गंगानगर के सूरतगढ़ शहर तथा बीकानेर के सूरसागर झील के निर्माण का श्रेय

सूरत सिंह ने 1818 ई. में अंग्रेज़ ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सन्धि कर ली थी।

10. महाराजा सरदार सिंह –

क्रांति के समय न केवल बीकानेर के महाराजा बल्कि अंग्रेजो की सहायता हेतु बाडलू गाँव (हिस्सार) तक जाने वाले एकमात्र राजस्थानी शासक 

11. महाराजा गंगा सिंह –

Mahara Gangasingh
  • प. नेहरू द्वारा राजस्थान के भागीरथ की संज्ञा
  • आधुनिक बीकानेर के निर्माता
  • अंग्रेजो द्वारा ‘केसर ऐ हिन्द’ की उपाधि
  • ऊँटो की सैन्य टुकड़ी – गंगा रिसाला
  • 1899 में चीन के साथ अफीम युद्ध में तथा 1900 में दक्षिण अफ्रीका में डचों के विरुद्ध बोआर के युद्ध में अंग्रेजो के साथ
  • 26 अक्टूम्बर 1927 में राजस्थान की प्रथम गंगनहर सिंचाई परियोजना का लोकार्पण
  • लन्दन में आयोजित तीनो गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने का श्रेय
  • आधुनिक गंगानगर शहर का निर्माण
  • 1922 से 1928 तक b.h.u. के कुलपति

12. महाराजा सार्दुल सिंह

आजादी एंव एकीकरण के समय बीकानेर के महाराजा


अलग पहचान है बीकानेर की रम्मतों की

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Rammat At Bikaner In Holi Festival
होली का त्योहार पूरे विश्व में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। भारत में यह त्योहार भारतीय सभ्यता और संस्कृति का शानदार प्रतीक है। भारत का प्रत्येक प्रदेश होली में अपनी विशिष्टता लिए है। जिस प्रकार ब्रज की लट्ठमार होली ने अपनी अलग पहचान बनाई है, उसी प्रकार राजस्थान के बीकानेर की होली में खेली जाने वाली रम्मतों में भी अपनी खास विशेषता है।


रम्मत का शाब्दिक अर्थ है खेलना। लेकिन बीकानेर में यह खेल शहर के पाटों पर और चैकों में खेला जाता है और होली के मौसम में इन रम्मतों में बीकानेर की संस्कृति की समृद्धता स्पष्ट झलकती है।


रम्मतें नाटक की एक विधा है जिसमें मनोरंजन के लिए तरह-तरह के नाटक खेले जाते हैं या विभिन्न प्रकार की गायकी से दर्शकों का मनोरंजन किया जाता है। बीकानेर में मूलतः दो तरह की रम्मतें देखने को मिलती हैं।

पहली प्रकार की रम्मतें स्वांग मेरी की रम्मतें हैं जिनमें ख्याल, लावणी व चैमासों के माध्यम से प्रस्तुति दी जाती है। रम्मतों में ख्याल हर साल नए जोड़े जाते हैं और इन ख्याल के माध्यम से देश व प्रदेश की वर्तमान व्यवस्थाओं पर तथा सामाजिक कुरूतियों पर भी कटाक्ष किया जाता है और इसका प्रभावशाली प्रस्तुतिकरण होता है।


सामंतशाही दौर में दम्माणी चैक में खेली जाने वाली रम्मत में स्वर्गीय बच्छराज जी व्यास ने ख्याल में श्भगवान पधारो भारत में, तुम बिन पड़ रहया है फोड़ा.......श् का प्रस्तुतिकरण इतना प्रभावी तरीके से किया कि उस समय इस ख्याल पर सरकारी प्रतिबंध लग गया था।


इसी तरह वर्तमान में भी महंगाई, राजनैतिक भ्रष्टाचार सहित दहेज, भ्रूण हत्या, दल-बदल सहित कईं विषयों को इन ख्यालों के माध्यम से उठाया जाता हैं।


इस साल की रम्मतों में राहुल गांधी व नरेंद्र मोदी सहित अरविंद केजरीवाल भी शामिल है और भ्रष्टाचार को ज्यादा तवज्जो दी गई है। इन रम्मतों का दूसरा आकर्षण है लावणी।

बीकानेर की रम्मतों में लावणी दो तरह की है। एक तो भक्ति रस पर आधारित लावणी है, जिसमें भगवान कृष्ण व राधा के रूप सौंदर्य का वर्णन किया गया है और दूसरी है सुंदर नायिका के नख-शिखा सौंदर्य से वर्णित शायरी। इन रम्मतों की लावणी में नायक अपनी नायिका को बरसों बाद देखता हैं और उसके रूप सौंदर्य का वर्णन करता है और यह साबित करने की कोशिश करता है कि मेरी नायिका से सुंदर कोई स्त्री इस पृथ्वी पर नहीं है। नायिका अपने इस सौंदर्य से परिचित है और वह नायक को अपने पतिव्रत होने का सबूत देती है।


इसी प्रकार इन रम्मतों का अगला चरण है चैमासा। चैमासे को लेकर यह बात है कि इस मरू प्रदेश के पुरुष किसी समय में दूर देशों में कमाने के लिए जाया करते थे और चैमासे की ऋतु में उनकी पत्नी या प्रेयसी उनको याद करती थी और भगवान से प्रार्थना करती थी कि इस चैमासे में उसका पति या प्रेमी घर आए।

वास्तव में चैमासे में नायक व नायिका की विरह वेदना का वर्णन किया जाता है। स्वांग मेरी की इन रम्मतों में ख्याल लावणी चैमासे के क्रम से गुजरती यह रम्मत रात भर चलती है और अलसुबह इसका समापन हो जाता है।


दूसरी तरह की रम्मतें है कथानक प्रधान। इनमें प्रमुख रूप से हड़ाऊ मेरी की रम्मत, भक्त पूरणमल की रम्मत और शहजादी नौटंकी और वीर अमरसिंह राठौड़ की रम्मत का मंचन किया जाता है। इन सब कथानकों की कहानी अलग-अलग है। इसमें हड़ाऊ मेरी की रम्मत में प्यार है, छेड़छाड़ है और राजा-रानी का रूठना-मनाना भी है।

भक्त पूरणमल की रम्मत में पूरणमल सौतेली मां को प्यार करने से मना कर देता है और अपने जीवन का बलिदान तक कर देता है। इस रम्मत में वेदों व पुराणों का उल्लेख किया गया है और शानदार जीवन चरित्र का प्रस्तुतिकरण है।

शहजादी नौटंकी में भी कथानक शानदार है और शहजादी से शादी करके नायक अपना प्रण पूरा करता है। वीर अमरसिंह राठौड़ की रम्मत वीर रस की शानदार कथानक लिए हुए रम्मत है, जिसमें नागौर के राव अमरसिंह के जीवन चरित्र का वर्णन किया गया है। वास्तव में बीकानेर में खेली जाने वाली इन रम्मतों में परिवार व एक विशेष प्रकार की जाति समुदाय के लोग जुड़े हैं और इन्होंने अपने परिवार की परम्परा के तौर पर इन रम्मतों को आज तक कायम रखा है।

कुछ रम्मतें जरूर बंद हो गई है परंतु जो रम्मतें वर्तमान में खेली जा रही है, उनके प्रति कलाकारों का समर्पण व उनकी कला की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। लुप्त हो रही यह कला बीकानेर में आज भी जीवित है और इनका मंचन करने वाले कलाकारों को यह नहीं पता कि वे इस देश की एक शानदार समृद्ध वैभवशाली परम्परा को संजोकर रख रहे हैं।

Rammat At Bikaner Holi

मैं यहां यह बता देना चाहता हूं कि बीकानेर की यह रम्मतें पद्य में है और रातभर गाकर इनका मंचन किया जाता है। जो इन रम्मतों की व इनको प्रस्तुत करने वालों की कला में जान डाल देने वाला पक्ष है।

भक्त पूरण मल की रम्मत के कलाकर किसन कुमार बिस्सा ने बताया कि किसी कारणवश दिल्ली व जयपुर में जवाहर कला केन्द्र और रवीन्द्र रंगमंच पर रम्मत प्रस्तुत करने का मौका मिला, तो वहां उपस्थित कलाकारों व दर्शकों ने अपने दांतों तले अंगुली दबा ली और काफी प्रस्ताव इन रम्मतों को देश व प्रदेश में प्रस्तुत करने के लिए आ रहे हैं लेकिन साधन के अभाव में वह यह काम नहीं कर पा रहे हैं।

इसी तरह ख्याल का निर्माण व लावणी को गाना व रम्मत में दौबेला, चैबेला, कड़ा, दौड, लावणी, ध्रुपद, कली, भेटी सहित विभिन्न प्रकार के पद्यात्मक प्रयोग इन रम्मतों के स्तर को काफी बड़ा कर देते हैं।


इन रम्मतों में संगीत की मुश्किल से मुश्किल साधना को काफी सरलता से साधा जाता है। जिस किसी बड़े कलाकार ने आज तक इनका मंचन देखा है उसने इसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। जरूरत है सरकारी स्तर पर या संगठनात्मक स्तर पर ऐसे प्रयासों की कि बीकानेर की यह रम्मतें अपना वैभव कायम रख सके और इनको संजोकर रखा जा सकें। आज के युवाओं में इनका रूझान दिन-ब-दिन घटता जा रहा हैं, ऐसे में इनका संरक्षण काफी जरूरी है ताकि भारत के सुदूर प्रांतों में फैली यह परम्परा अपना अस्तित्व कायम रख सकें।


श्याम नारायण रंगा

पूनरासर मेले पर प्रशासनिक व्यवस्था मेरी नजर में

- Sunday, September 11, 2016 1 Comment
बीकानेर का होने के नाते यहां होने वाले मेले मगरियों से भावनात्मक जुड़ाव रहा है और जिस होम सिकनेस का आम बीकानेरी शिकार है उसका एक कारण ये मेले मगरिये भी है, ऐसा मेरा मानना है। प्रतिवर्ष भाद्रपद में बीकानेर का आम नागरिक कैसे न कैसे इन मेलों मगरियों से जुड़ जाता है। ऐसे अवसर पर जहां आमजन का बड़े स्तर पर जुड़ाव हो वैसे में लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रषासन की जिम्मेदारी बड़ी हो जाती है कि वे धार्मिक आस्था व शहर की संस्कृति से जुड़े ऐसे पर्वों पर अपनी भूमिका किस तरह निभाते हैं इसका आंकलन आमजन किसी न किसी रूप में अवष्य करता है। सुधी नागरिक होनेे के नाते मेरा यह मानना है कि इस बार भी मेले में पुलिस व प्रषासन की व्यवस्था तो थी परंतु यह व्यवस्था ऊॅंट के मुॅंह में जीेरे के समान थी।

जीवन की उमंग का प्रतीक ऋतुराज बसंत

- Friday, February 12, 2016 No Comments
हमारी संस्कृति में पर्वों का विभाजन मौसम के अनुसार ही होता है। इन पर्वों पर हमारे मन में स्वतः ही उत्साह उत्पन्न हो जाता है। शरत् ऋतु के बाद ग्रीष्म व उसके बाद बरसात उसके बाद पुनः सर्दी का यह बदलता क्रम शरीर मे बदलाव के साथ साथ उत्साह का भी संचार करता है और यही कारण है कि हर मौसम में कोई न कोई त्यौंहार जरूर होता है।
दशहरा, दीपावली, मकर संक्रांति, बंसत पंचमी, होली, रक्षाबंधन जैसे त्यौंहारो में आदमी की संवेदनाएं अगर सुसुप्तावस्था में भी हो तो वो स्वतः ही जाग्रत हो जाती है। ऋतुओं पर आधारित त्यौंहारों के इस देश में में छः ऋतुएँ होती है। इन छः ऋतुओं में ऋतुराज बसंत ऋतु को ही कहा जाता है क्योंकि बसंत का मौसम भारतीय मौसम विज्ञान के अनुसार समशीतोष्ण वातावरण के प्रारम्भ होने का संकेत है जिसमें शरत् ऋतु अपने अंतिम पड़ाव पर होती है और ग्रीष्म की आहट होनी शुरू होती है।

साम्प्रदायिक सौहार्द का त्यौंहार आखाबीज

- Monday, April 20, 2015 1 Comment
बीकानेर, बीकानेर नगर की स्थापना सम्वत् पंद्रह सौ पैतालीस में राव बीका ने की थी और तब से लकर आज तक आखाबीज का यह त्यौंहार बीकानेर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। किसी भी शहर की स्थापना का दिन निष्चित रूप से उस शहर के वाषिंदों के लिए एक महत्वपूर्ण दिन होता है।

Shyam Narayan Ranga Photo On Holi Festival

- Tuesday, March 10, 2015 No Comments
Shyam Narayan Ranga Holi Bikaner

Shyam Narayan Ranga Holi Bikaner 

उस्ताद रमणसा की रम्मत: शहजादी नौटंकी

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Shyam Narayan Ranga
Bissa chowk rammat holi bikaner 
बिस्सों के चैक में होली के अवसर पर शहजादी नौटंकी का मंचन किया जाता है। यह रम्मत उस्ताद रमण सा बिस्सा की रम्मत के नाम से जानी जाती है। इस रम्मत में सर्वप्रथम बीकानेर के पुष्करणा समाज के बिस्सा जाति की कुलदेवी माॅ आषापुरा का आगमन होता है। इस रम्मत का यह दृष्य देखने लायक होता है।

फक्करदाता की रम्मत से होली का आगाज

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Shyam Narayan Ranga holi bikaner Fakkardaata rammat bikaner
बीकानेर में होली का आगाज फक्करदाता की रम्मत से होता है। नत्थूसर गेट के अंदर लाला बिस्सा की गली के सामने फूंभड़ों के पाटे पर इस रम्मत का मंचन किया जाता है। इस रम्मत में ख्याल लावणी चैमासा का गायन होता है। इस रम्मत में सबसे पहले भगवान गणेष का आगमन होता है।