रावण के पुतले तो हर साल जलते हैं, लेकिन समाज के भीतर जिंदा बुराइयों के रावण आज भी चुनौती बनकर खड़े हैं। हर साल दशहरे पर हम बड़े-बड़े रावण के पुतले जलाते हैं। आतिशबाजी होती है, जयकारे गूंजते हैं और पूरा वातावरण बुराई पर अच्छाई की जीत के उद्घोष से भर जाता है। हम गर्व से कहते हैं कि सत्य की जीत हुई और असत्य का अंत हो गया। लेकिन जब अगले दिन जीवन की वास्तविकताओं से सामना होता है, तो एक सवाल मन में उठता है—आखिर हमने कितने रावण मार दिए और कितने अभी बाकी हैं?
क्या रावण केवल मैदान में खड़ा दस सिरों वाला पुतला है, जिसे आग के हवाले कर देने से बुराई समाप्त हो जाती है? यदि ऐसा होता, तो सदियों से मनाई जा रही विजयादशमी के बाद समाज में अन्याय, शोषण और नफरत का अस्तित्व नहीं होना चाहिए था। सच तो यह है कि रावण के पुतले हर साल जलते हैं, लेकिन उसके प्रतीक अनेक बुराइयां हमारे भीतर और हमारे आसपास आज भी जीवित हैं।
जातिवाद का रावण आज भी इंसान को इंसान से छोटा-बड़ा समझता है। वह जन्म के आधार पर किसी की योग्यता, सम्मान और अधिकार तय करता है। धर्मांधता का रावण आस्था को प्रेम और करुणा का माध्यम बनाने के बजाय नफरत का हथियार बना देता है। धर्म के नाम पर दूसरे धर्मों के प्रति घृणा फैलाने वाले लोग भूल जाते हैं कि किसी भी धर्म की वास्तविक शक्ति मानवता, सद्भाव और सहिष्णुता में होती है।
क्षेत्रवाद का रावण देश को प्रांतों और भाषाओं की संकीर्ण सीमाओं में बांटता है। वह अपने क्षेत्र के व्यक्ति को श्रेष्ठ और दूसरे क्षेत्र के व्यक्ति को पराया मानता है। जबकि भारत की असली पहचान उसकी विविधता में एकता है। इसी तरह सामाजिक असमानता का रावण किसी को संसाधनों और अवसरों के पहाड़ पर बैठाता है, तो किसी को बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करने को मजबूर करता है। जब किसी बच्चे को गरीबी के कारण शिक्षा नहीं मिलती, किसी योग्य युवा को अवसर नहीं मिलता और किसी कमजोर व्यक्ति की आवाज सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंचती, तब समझ लेना चाहिए कि अन्याय का रावण अभी जीवित है।
आज अहंकार का रावण पद, प्रतिष्ठा और सत्ता के मद में इंसान को इंसान समझना भुला देता है। लालच का रावण दूसरों के हक पर कब्जा करने के लिए विवेक और नैतिकता को बेच देता है। भ्रष्टाचार का रावण जनता के धन को निजी संपत्ति समझता है और व्यवस्था की जड़ों को खोखला करता है। रिश्वत लेकर न्याय और सेवाओं को सौदे में बदल देना भी उसी रावण का एक चेहरा है।
अन्याय का रावण कमजोर की आवाज दबाता है, महिलाओं की गरिमा पर चोट करता है और पीड़ित को न्याय के लिए दर-दर भटकाता है। आतंकवाद का रावण निर्दोष लोगों के खून से अपनी विचारधारा की इबारत लिखना चाहता है। नफरत, हिंसा और कट्टरता का हर रूप मानवता के विरुद्ध खड़ा है। इसके अतिरिक्त मिलावटखोरी, जमाखोरी, दहेज प्रथा, नशाखोरी, पर्यावरण विनाश, झूठ, अफवाह, दिखावा और संवेदनहीनता भी ऐसे रावण हैं, जो समाज को भीतर से कमजोर कर रहे हैं।
लेकिन सवाल केवल व्यवस्था या दूसरों की बुराइयों का नहीं है। हमें अपने भीतर भी झांकना होगा। जब हम किसी जरूरतमंद की मदद करने से मुंह मोड़ लेते हैं, किसी के अपमान पर चुप रहते हैं, अपने लाभ के लिए गलत का साथ देते हैं या अपनी गलती स्वीकार करने से इनकार करते हैं, तब हमारे भीतर का रावण मजबूत होता है। दूसरों के पुतले जलाना आसान है, अपने भीतर के अहंकार, लालच और नफरत को जलाना कठिन।
विजयादशमी का वास्तविक संदेश केवल रावण का वध नहीं, बल्कि उन प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करना है, जो मनुष्य को मनुष्य का शत्रु बनाती हैं। रावण दहन तभी सार्थक होगा, जब जाति से ऊपर इंसानियत, धर्मांधता से ऊपर सद्भाव, लालच से ऊपर ईमानदारी और अहंकार से ऊपर विनम्रता को स्थान मिलेगा।
आइए, इस दशहरे पर केवल पुतला जलाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री न करें। अपने भीतर झांकें, अपनी गलतियों को पहचानें और समाज की बुराइयों के विरुद्ध खड़े होने का संकल्प लें।
क्योंकि जब तक किसी गरीब के साथ अन्याय होता रहेगा, किसी निर्दोष के मन में नफरत भरी जाती रहेगी, किसी योग्य व्यक्ति का हक छीना जाता रहेगा और भ्रष्टाचार ईमानदारी पर भारी पड़ता रहेगा, तब तक रावण का अंत अधूरा रहेगा।
इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यही है—कितने रावण मार दिए, कितने अभी बाकी हैं?
और इसका उत्तर हमारे कर्मों में छिपा है। जिस दिन हम अपने भीतर के रावण को मारना सीख जाएंगे और समाज की बुराइयों के विरुद्ध एकजुट हो जाएंगे, उसी दिन विजयादशमी का वास्तविक अर्थ साकार होगा।
रावण का पुतला हर साल जलना चाहिए, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि रावण की सोच का अंत हो। क्योंकि असली विजय मैदान में नहीं, इंसान के विचारों और व्यवहार में होती है।
श्याम नारायण रंगा

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