बीकानेर नगर निगम की नई सरकार का चेहरा 21 सितंबर को तय होगा। महापौर पद के लिए कांग्रेस के अनिल कल्ला और भाजपा के डॉ. सुरेंद्र सिंह शेखावत आमने-सामने हैं। 80 सदस्यीय निगम में कांग्रेस 42 पार्षदों के साथ 41 के बहुमत आंकड़े से एक कदम आगे है, जबकि भाजपा के 27 पार्षद हैं। 10 निर्दलीय और एक आरएलपी पार्षद भी राजनीतिक समीकरण का हिस्सा हैं।
अनिल कल्ला की राजनीतिक ताकत केवल पार्षदों की संख्या तक सीमित नहीं है। वे लंबे समय से कांग्रेस संगठन से जुड़े रहे हैं और बी.डी. कल्ला परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं। युवा वर्ग में उनकी सक्रियता तथा राजीव यूथ क्लब के माध्यम से सामाजिक गतिविधियों ने उनकी अलग पहचान बनाई है। हालांकि महापौर का चुनाव उनके लिए राजनीतिक जीवन की पहली प्रत्यक्ष चुनावी परीक्षा भी है।
भाजपा के डॉ. सुरेंद्र सिंह शेखावत भी युवा और अपेक्षाकृत नए चेहरे के रूप में मैदान में हैं। विधानसभा चुनाव में दावेदारी कर चुके शेखावत की छवि गंभीर और संगठन से जुड़े युवा नेता की रही है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती संख्या के अंतर को राजनीतिक समर्थन में बदलने की है।
दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस के भीतर उठी चुनौती भी चुनाव को अंतिम समय तक रोचक बनाए रही। कांग्रेस पार्षद नवरतन डागा ने स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल किया था, लेकिन 18 सितंबर को नाम वापस लेने के बाद अब मुकाबला सीधा हो गया है।
कागज पर संख्या कांग्रेस के पक्ष में है, लेकिन महापौर चुनाव केवल गणित नहीं, राजनीतिक प्रबंधन, पार्षदों की एकजुटता और अंतिम क्षण की रणनीति का भी परीक्षण है। भाजपा अंतरात्मा की आवाज और क्रॉस-वोटिंग की संभावना के जरिए समीकरण बदलने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस के लिए चुनौती अपने स्पष्ट बहुमत को मतदान के दिन सुरक्षित रखना है।
अब निगाहें 21 सितंबर पर हैं। उस दिन तय होगा कि पार्षदों का गणित किस दिशा में जाता है और बीकानेर की सियासी ऊंट किस करवट बैठता है।
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