मैं नहीं रहा अब किसी की जरूरत
मुझे बनाया था किसी ने बडी शिद्दत से
एक एक पैसा जोडकर खडा किया था मुझे
मैं किसी का सपना था
किसी का अपना था
किसी की आस था
किसी का विश्वास था
किसी की जरूरत था
किसी ने अपना सबकुछ लुटाया था मुझ पर
तब पाया था मुझे
आज मैं नहीं रहा किसी की जरूरत
आज मैं बन गया मुसीबत
कौन ले मुझे, किसका बनूं मैं
मैं सबका नहीं बन सकता
मैं सबको नहीं समा सकता
इसलिए मैं किसी का नहीं रहा
सब चले गए मुझे छोडकर
बना लिए नए आशियाने
रह गया मैं अकेला
काश सब करते मुझसे
वैसा ही प्यार
रखते वैसा ही विश्वास
जताते वैसा ही प्यार
बनाते वैसी ही जरूरत
तो शायद मैं बदल लेता रूप अपनी काया
मिटा देता अपना वजूद अपना अस्तित्व
उनके लिए जो हैं मेरे अपने मेरे खुद के
मेरे आंगन ने इनको देखा है
रेंगते हुए, घुटनों पर चलते हुए
छोटे से बडे ये मेरी गोद में हुए
वो सब चले गए जिन्होंने मुझे बनाया मुझे अपनाया
मेरे सिराहने रख गए अपने ये निशान
मैंने कभी भेद नहीं किया किसी में
पर आज मैं हो गया पराया
हो गया बेगाना,
अब ज्यादा दिन नहीं जी पाऊंगा
और बिना प्यार, विश्वास, उमंग, उत्साह के
एक दिन मैं भी समाप्त हो जाऊंगा
उन सब यादों को लिए सबको समेटे
घर ही तो हूं मैं पुराना
जो था कभी नया
घर ही तो था
किसी की जागीर था जो बंट बंट कर रह गया
इतना बंटा कि किसी का नहीं रहा
कोई और नहीं मैं था पुरखों का घर

4 Comments " घर ही तो था "
ये आज की सच्चाई का आईना है, जिसे हर किसी को समझना है, में अब इतना खामोश हु, अपनी बात किस जुबा से कहूं, ये दरो दीवार कुछ केहती है अपनी आपबीती,8 जाने कैसे किस तरह से जिन्दगी बीती, फिर भी में खामोश था इन फ़ितरतो को देखकर।। श्याम जी आपकी इस कविता ने जिन्दगी की सच्चाई से रूबरू कराया है जो मुझे प्रेरित करती है आपकी इस सुंदर कविता के लिए मेरे पास शब्द नही है ये इतनी अद्भुत ओर प्रेरणा दायक है में आपको इस कविता के लिये भूरी भूरी प्रशंसा करता हु आप जीवन मे सदैव ऐसी कविताओं से हमें ओर समाज का मार्गदर्शन करते रहेंगे।आपका आभार सहृदय से खुब खुब आशीर्वाद🙏🙏
उम्दा
बिल्कुल सही लिखा आपने ।ठीक पास वाले घर को ऐसे ही खंडहर होते देख चुका हूँ जबकि उस आंगन में समाज के कई बड़े व्यक्तित्व को जवान होते देखा।खुद भी जिस आंगन में पल बढ़ा उसे गत मास ही छोड़ा।आपकी कविता ने झकजोर दिया आज खुद से और अपने घर से वादा उसे कभी निर्जन न होने दूंगा।
धन्यवाद रंगा जी
अति सुंदर
Post a Comment