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दबंग व्यक्तित्व के धनी थे गोकुल प्रसाद पुरोहित

- Friday, June 5, 2015 No Comments
Gokul Prashad Purohit 
लगभग साढे छः फिट की लम्बाई, गोल चेहरा, ओजस्वी आंखे, रौबदार आवाज और व्यक्तित्व में जबरदस्त आत्मविश्वास जी हां कुछ ऐसा ही व्यक्तित्व था मजदूर नेता और स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय गोकुल प्रसाद जी पुरोहित का। बीकानेर की राजनीति के कालजयी व्यक्तित्व गोकुल प्रसाद जी पुरोहित को आज गुजरे 29 साल हो गए हैं परंतु शहर की गलियों में चैक और पाटों पर आज भी बाबा का नाम श्रद्धा व आदर के साथ लिया जाता है।

जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के निर्माता

- Wednesday, May 27, 2015 1 Comment
Jawahar Lal Nehru The First Prime Minister Of India
जवाहर लाल नेहरू का जन्म इलाहाबाद में एक धनाढ्य वकील मोतीलाल नेहरू के घर हुआ था। उनकी माँ का नाम स्वरूप रानी नेहरू था। वह मोतीलाल नेहरू के इकलौते पुत्र थे। इनके अलावा मोती लाल नेहरू की तीन पुत्रियां थीं। नेहरू कश्मीरी वंश के ब्राह्मण थे।

संदीप आचार्य को श्रद्धांजली

- Sunday, December 14, 2014 No Comments


SANDEEP ACHARYA 
गौरा रंगा, लम्बा कद, हंसमुख चेहरा, सुन्दर व सौम्य मुस्कान के साथ सरल स्वभाव जी  संदीप आचार्य जिसने इंडियन आइडल सीजन 2 में प्रथम स्थान प्राप्त कर अपनी धमाकेदार एंट्री 2006 में करी आज वह हमारे बीच नहीं रहा। राजस्थान की मरूनगरी बीकानेर के इस चहेते व लाडले को आज अंतिम विदाई देने जैसे सारा शहर ही उमड़ पड़ा था। काल के क्रूर हाथों ने संदीप को हमारे से छीन लिया लेकिन मानो किसी को यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि संदीप हमारे बीच नहीं रहा। संदीप जब किसी से भी मिलता तो अपने से बड़ों के पैर छूने नहीं भूलता था और बच्चों से उसका खास लगाव था और बच्चों के साथ खेलना उनकी बाल सुलभ हरकतों में शामिल होकर बच्चा बन जाता संदीप की आदत में था। बच्चों के लिए संदीप हमेशा चाचा और मामा रहा और संदीप हर बच्चे को अपनी ओर से चाॅकलेट देना या केाई गिफ्ट देना नहीं भूलता था।

मेरे से संदीप का जुड़ाव वैसे तो संदीप के बचपन से ही था। मेरे मामाजी मोटूलाल जी हर्ष ’मोटू महाराज’ और संदीप के पिताजी विजय कुमार जी आचार्य ‘गट्टू महाराज’ शुरू से ही मित्र हैं और उनका काम धंधा भी किसी समय साथ रहा है। इसलिए मेरे लिए संदीप के पिताजी हमेशा गट्टू मामा ही रहे और संदीप व उसका भाई आनंद मेरे लिए छोटे भाई की तरह ही हैं। मुझे याद है कि संदीप शुरू से ही शर्मिले स्वभाव का था और उसको स्टेज पर प्रस्तुति देने में झिझक रहती थी। वह  अकेले घंटों बैठकर इंस्ट्रूमेंटल धुनों पर रियाज करता था और अपने दोस्तों के बीच व परिवार के बीच बैठकर गाने से भी उसे परहेज नहीं था लेकिन स्टेज पर प्रस्तुति देने में उसे शुरू से ही हल्की परेशानी रही। मुझे याद है मेरे मित्र व संदीप के बहनोई रविन्द्र व्यास जी संदीप को लेकर काफी शादी समारोह में जाते थे और हम सब संदीप को स्टेज पर प्रस्तुति देने के लिए इतना प्रोत्साहित करते थे कि वह मजबूर होकर अपनी प्रस्तुति देता था। मेरी शादी में भी संदीप ने इसी तरह मेरे निवेदन पर अपने एक गाने की प्रस्तुति दी थी और उस समय वह इंडियन आईडल के मुकाम तक नहीं पहुॅंचा था। लेकिन जब सोनी टीवी के इंडियन आईडल मंे संदीप का मासूम चेहरा लोगों ने देखा तो जैसे बीकानेर व राजस्थान सहित पूरे देश का प्यार इस खूबसूरत गायक की गायकी पर उमड़ पड़ा था। इंडियन आईडल में जनता के एसएमएस से संगीत के सर्वोच्च पायदान पर संदीप की पहुॅंच ने ये साबित कर दिया था कि संदीप एक शानदार गायक ही नहीं बल्कि सबका चहेता बन चुका था। उस समय संदीप के लिए दिवानगी जो मैंने देखी थी वह किसी भी मशहूर फिल्मी हस्ती व राजनीति के नामी गिरामी चेहरे से कहीं ज्यादा थी। उस समय में ईटीवी राजस्थान में बीकानेर संवाददाता था और संदीप से जुड़ी हर खबर मैंने ईटीवी पर दिखाई थी। संदीप के इंडियन आईडल बनने के सारे दौर को मैंने ईटीवी के माध्यम से लोगों के सामने रखा था और वह दिन आज भी भुलाए नहीं भूलता जब संदीप के इंडियन आईडल बनने की घोषणा होने से पहले ही बीकानेर में शीतला गेट के बाहर स्थित संदीप आचार्य के घर पर हजारों की संख्या में लोगों का हूजूम था और संदीप के दादाजी ‘दाऊ जी होलेण्डर’ अपने पोते की इस गरिमामय सफलता की बधाई सबसे स्वीकार कर रहे थे। इंडियन आईडल बनने की घोषणा के साथ ही लोगों का ऐसा सैलाब था कि आमजन ने संदीप के परिवार के लोगों से मिलने के लिए उसके घर की खिडकियों तक को तोड़ दिया था और पूरे राजस्थान के साथ सारा बीकानेर सड़कों पर उतर गया था । कईं लोग शहर में घूम घूम कर थाली बजा रहे थे, कोई गुलाल उड़ा रहा था तो कोई पटाखे छोड़ रहा था, शहर की औरतों व बुजुर्गों ने तो कईं मंदिरों व मस्जिदों में मन्नतें पूरी की और रूपये बांट कर बधाईया दी। अपने लाडले के प्रति ऐसा प्रेम भुलाए नहीं भूल सकता लेकिन आज वही भीड़ थी वही लोग थे संदीप के घर के सामने का रास्ता रोक दिया गया था लेकिन आज वह खुशी का दौर महज सात साल बाद ऐसे गम में बदल चुका था जिसकी पूर्ति होना संभव नहीं था। शहर के हर सख्स की आॅंखस नम थी पर कोई किसी को कुछ करने की स्थिति में नहीं था सबकी आॅंखों में बस एक ही सवाल था कि ऐसा कैसे हो गया मानो उनका चेहरा ये कह रहा हो कि ऐसा हो ही नहीं सकता। सबका प्यारा दुलारा संदीप इन लोगों को छोड़ कर अनन्त में विलीन हो चुका था ये बात प्रसिद्ध गायक उदित नारायण ने तो मानी ही नहीं और सोनू निगम, फराह खान, अन्नू मलिक, राजा हसन, सहित ऐसी कईं हस्तियां थी जिनका गुड ब्याॅय जा चुका था हमेशा हमेशा के लिए सबको छोड़ कर। लोगों को याद आ रहा था वह दिन जब संदीप इंडियन आईडल बनने के बाद पहली बार बीकानेर आया था तो मानो शहर ने अपना सारा प्यार अपने इस बालक के लिए बिछा दिया था। हर गली, मौहल्ले, नुक्कड़ सहित सरकारी कार्यालयों में संदीप ही संदीप था। हाथी की सवारी किए संदीप ने सबका अभिवादन स्वीकार किया और बीकानेर का सर गौरव से ऊॅंचा हो गया था उस दिन कि बीकानेर के एक लाडले ने पूरे भारत में शहर का नाम रोशन किाय है। आज भी वह दिन सबकी आॅंखें के सामने था जब बीकानेर के रेलवे स्टेडियम में संदीप को सुनने के लिए इतना जन समुद्र आया था कि संदीप को महज कुछ ही मिनटों में स्टेज छोड़ कर उतरना पड़ा। यहां उपस्थित लोगों के लिए ये यादें ही अब सहारा थी संदीप की। महल उदास.....और गलियां सूनी...चुप चुप है दिवारें.....शायद ऐसे ही मौकों के लिए किसी गीतकार ने ये लाईनंे लिखी होगी।
इंडियन आईडल बनने के बाद ईटीवी और न्यूज पोर्टल खबरएक्सप्रेस डाॅट काॅम के लिए भी मैंने संदीप आचार्य का साक्षात्कार लिया था और ये बात मैंने महसूस की कि बुलंदी को छूने के बाद भी संदीप में कोई घमंड नहीं था वह वैसा ही था जैसा पहले था। बीकानेर आने के बाद अपने शहर के सब लोगों ने मिलना, पान की दुकान पर जाना, शहर के जागरणों में अपने पुराने दोस्तों के साथ भजन व गाने गाना, बारातों में स्टेज पर अपने परिवार व दोस्तों के लिए गाने गाना व अपने बचपन के मित्रों के साथ जी भर कर क्रिकेट खेलना उसकी आदत थी। बीकानेर के लोगों के लिए यह गर्व था कि उनका प्यारा बेटा जो भारत का सितारा बन चुका था जब भी बीकानेर आता तो अपने स्टारडम की छवि को बीकानेर के बाहर ही छोड़ कर आता था। किसी को किसी भी बात के लिए ‘ना’ कहना संदीप की आदत में था ही नहीं और अपने परिवार व समाज के संस्कारों को कभी उसने छोड़ा नहीं था। पिछले दिनों संदीप आचार्य ने बीकानेर के लोगों से विधानसभा चुनावों में ज्यादा से ज्यादा मतदान करने की अपील भी की थी उस समय भी जब वह स्टेज पर होता तो बीकानेर के बच्चों, बड़ों, बुजुर्गों सहित प्रशासन के अधिकारियों का प्यार उसके लिए बरबस ही सामने आ जाता था। आज अपनी इन सब यादों को छोड़कर संदीप जा चुका है। उसके साथ जीए व बिताए हर एक पल को आज सब लोग याद कर रहे हैं और फेसबुक, ट्वीटर, वाट्सअप सहित कईं सोसल साईट्स पर आज संदीप को श्रद्धांजली दी जा रही है। एक बात हर किसी के मुॅंह पर थी कि 2006 के शुरूआत में कोई भी नहीं जानता था कि बीकानेर में ऐसा भी कोई छोरा है और 2006 में ही इस छोरे के कारण शहर की पहचान बनी थी.....सबके मन में ये ही सवाल आ रहा था कि ...बना के क्यूं बिगाडा रे.............। एक साल पूरा ही हुआ था संदीप की शादी को और एक महिना भी नहीं हुआ उसके बेटी हुए लेकिन काल इतना क्रूर होता है यह सच सामने था। उसकी गाए एक गाने की आवाज आज भी याद आती है:-



 । ओम शांति ओम शांति ओम शांति।



                                                          श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’
                                                          पुष्करणा स्टेडियम के पास
                                                          नत्थूसर गेट के बाहर
                                                          बीकानेर {राजस्थान} 334004
                                                          मोबाईल - 9950050079

भारत रत्न राजीव गांधी: एक विलक्षण व्यक्तित्व

- Sunday, September 14, 2014 3 Comments

rajiv gandhi
भारत के नौंवे प्रधानमंत्री भारत रत्न राजीव गांधी भारत की महान् नेत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी व फिरोज गांधी के पुत्र व प्रधान के प्रथम प्रधानमंत्री व आधुनिक भारत के निर्माता श्री जवाहर लाल नेहरू के नाती थे। राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को मुम्बई में हुआ था। राजीव गांधी ऐेसे परिवार के सदस्य थे जिसका प्रत्येक सदस्य आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व न्यौछावर किए हुए था। राजीव गांधी के नाना पण्डित जवाहर लाल नेहरू उनके जन्म के समय अपनी अंतिम व नौवीं जेल यात्रा पर थे और उनकी माता श्रीमति इंदिरा गांधी पंद्रह महिने पहले ही जेल से छुटी थी और पिता फिरोज गांधी भी आजादी की लड़ाई के लिए उनके जन्म से एक वर्ष पहले ही जेल से बाहर आए थे। सरल स्वभाव व मिलनसार व्यक्तित्व के धनी राजीव गांधी जिनका पूरा नाम राजीव रत्न गांधी था एक संकोची प्रवृत्ति के भी इंसान थे और अपने भाई संजय गांधी की मृत्यु के बाद अपनी मां इंदिरा गांधी का राजनैतिक सहारा बनने के लिए अमेठी से सांसद के रूप में पहली बार राजनीति में आए। राजीव गांधी की प्रारंम्भिक शिक्षा देश के प्रतिष्ठित दून स्कूल में हुई थी ओर इसके बाद राजीव गांधी ने लंदन की इंपीरियल कॉलेज में प्रवेश लिया और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की उपाधि प्राप्त की। भारत आकर राजीव गांधी ने इंडियन एयरलाइंस में पायलट के तौर पर काम शुरू किया।

राजीव गांधी को अपने नाना से ‘आराम हराम है’ और अपने पिता से ‘अपना काम खुद करो’ की प्रेरणा मिली थी। राजीव गांधी को 1981 कांग्रेस पार्टी का महासचिव बनाया गया और इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद राजीव गांधी ने विश्व के लोकतंत्र में सबसे युवा व भारत देश के नौवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। राजीव गांधी एक उदार व्यक्तित्व के राजनेता माने जाते थे और अपनी माता की मृत्यु के बाद हुए चुनावों में राजीव गांधी ने विश्व रिकार्ड के साथ भारत की संसद में अपना बहुमत साबित किया। राजीव गांधी सौम्य स्वभाव के राजनेता थे और किसी भी निर्णय में जल्दबाजी नहीं करते थे वे अपने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ बैठकर व विचार विमर्श करके ही किसी निर्णय पर पहुंचते थे। राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्री बनने के बाद भारतीय राजनीति के पन्नों पर अपनी सोच और अपने सपनों को उकेरना शुरू किया लेकिन उन्होंने जो सोचा वो पुराने ढर्रे की राजनीति से एकदम अलग था। राजीव गांधी ने दिल्ली दरबार से बाहर निकलकर देश के गांवों में जाना शुरू किया और इस देश की नब्ज को टटोलना शुरू किया।
shyam narayan ranga 
राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्री काल में प्रशासन में सरकारी नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था में उदारीकरण के लिए जोरदार प्रयास किया। कश्मीर और पंजाब के अलगाववादी आंदोलनकारियों को हतोत्साहित करने के लिए राजीव गांधी ने भरकस कोशिशें की। राजीव गांधी ने देश के गरीबों के उत्थान के लिए देश में 1 अप्रेल 1989 को जवाहर रोजगार गारंटी योजना, इंदिरा आवास योजना और दस लाख कुंआ योजना जैसी योजनाएं चालू की। भारत में कम्प्यूटर व संचार क्रांति के जनक के रूप में राजीव गांधी को सदैव याद किया जाएगा। देश में रेलवे का कम्प्यूटरीकरण करके राजीव गांधी ने इस देश के सामने क्रांतिकारी परिवर्तन करके रख दिया। राजीव गांधी एक ऐसे प्रधानमंत्री थे जो जनता से सीधे जुड़े थे और एक ऐसे नेता के रूप में विख्यात थे जिनकी पहुंच देश के आम आदमी के हृदय तक थी। राजीव गांधी ने सबसे पहले क्षेत्रवाद से आगे बढ़कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर की बात सोची और भारत को 21वीं सदी का भारत बनाने की सोची।
आज हम जिस आधुनिक भारत में सांस ले रहे हैं और आज जो घर घर में कम्प्यूटर है और हर हाथ में मोबाईल है, आज जिस भारत का लोहा अमेरिका सहित पूरी दुनिया मान रही है और जिस आधुनिक भारत की तरफ विश्व आशाजनक दृष्टि से देख रहा है, वह भारत ओैर भारत का यह वर्तमान स्वरूप राजीव गांधी की ही देन है। विकास को पसन्द करने वाले राजीव गांधी ने कभी भारत को मजबूत, महफूज और तरक्की की राह पर रफ्तार से दौड़ता मुल्क बनाने का सपना देखा था। राजीव ने ही भारत को विश्व के साथ कदम से कदम चलाकर चलना सीखाया था। राजीव गांधी ने दक्षिण एशिया में शांति के प्रयास किए और इस देश में भाषा के आधार पर हो रहे बिखराब को भी रोका। इसी का परिणाम था कि राजीव गांधी ने श्रीलंका में शांति प्रयासों के लिए भारतीय सैन्य टुकड़ियों को भेजा लेकिन इसके नतीजे में वे खुद लिट्टे के निशाने पर आ गए और उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई।
मुझे याद है वो दिन जब राजीव गांधी की हत्या हुई। पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई थी और ऐसा लगा कि इस देश ने अपने एक ऐसे पुत्र को खो दिया जो इस देश के रग रग में रचता बसता था। लोग राजीव गांधी को देखने व सुनने के लिए टीवी देखा करते थे। एक ऐसा प्रधानमंत्री जिसने उस दौर में पंजाब की यात्रा की जब देश की खुफिया एंजेसिंयों ने ऐसा करने से उनको मना किया। राजीव गांधी वो शख्स थे जो जब यात्रा पर जाते थे तो जय रास्ते से अलग होकर गांवों में जाते और आम आदमी के घरों मे जाना और हर व्यक्ति से हाथ मिलाना जैसे उनको अपनी मां ओर नाना से विरासत में मिला था। राजीव गांधी की हत्या पर देश के हजारों लोगों ने अपने घरों में होने वाली शादियों को स्थगित कर दिया था। हमारे मुहल्ले में राजीव गांधी के तेहरवें दिन के भोज का आयोजन किया गया और एक बड़ा आयोजन हुआ जिसमें शहर के गरीबों को भोजन करवाया गया। मेरी स्मृति में है कि देश में हजारों लोगों ने राजीव गांधी की मृत्यु पर मुंडन तक करवाया था। ऐसी लोकप्रियता वाले नेता होना अब दिवास्वप्न सा हो गया है और आने वाली पीढि़यां शायद विश्वास नहीं करेगी कि किसी राजनेता की ऐसी लोकप्रियता भी होती है।

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श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’ 

हौंसलों की ऊँची उडान

- Friday, September 12, 2014 No Comments
मंजिले उनको मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है,
पंखों से कुछ नहीं होता, हौंसलों से ऊँची उडान होती है।

श्याम नारायण रंगा 


Rashmi Daveये पंक्तियाँ बीकानेर की रश्मि दवे पर चरितार्थ होती है। चाँद रतन दवे और अरूणकला दवे की पुत्री रश्मि बचपन से ही बहुमुखी प्रतिभा की धनी थी और लगन की पक्की थी। जिद्दी रश्मि के मन में जो काम करने की इच्छा हो जाती उसे पूरा करके ही दम लेती थी। रश्मि अपनी कक्षा में हमे
सन् २००४ में रश्मि का चयन दिल्ली में आयोजित होने वाली गणतंत्र दिवस परेड के लिये हुआ। सभी केम्पों में अपनी सशक्त दावेदारी के साथ एन.सी.सी. राजस्थान टीम का नेतृत्व करते हुए दिल्ली पंहुची। दिल्ली में राष्ट्रपति सलामी परेड के लिए राज पथ पर चलने वाली एन.सी.सी भारतीय टीम की परेड कमाण्डर रिर्जव चुनी गई। साथ ही चेरी ब्लोसम के खिताब से नवाजा गया। रश्मि का चयन भारत की ओर से विदेश जाने वाली एन.सी.सी टीम वी.ई.पी. में हुआ। वहां उसने सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते हुए ’’समूह गान‘‘ में स्वर्ण पदक हासिल किया। 
सन् २००५ में रश्मि का चयन राजस्थान की एन.सी.सी होंर्स राईडिंग टीम में हुआ। रश्मि  राजस्थान की पहली लडकी थी जिसका चयन आर.डी.सी. की पैदल परेड तथा आर.डी.सी होर्स राईडिंग टीम दोनों में हुआ। राजस्थान की होर्स राईडिंग टीम में २ लडकियां तथा ४ लडके थे, इस टीम में एक, उसका बडा भाई नवीन दवे भी था। सीनियर अंडर ऑफिसर रश्मि ने होर्स राईडिंग में भी कमाल का जौहर दिखाते हुए अपने साहस के दम पर ’’टेंट पेगिंग‘‘ इवेन्ट में राष्ट्रीय स्तर का ’’स्वर्णपदक‘‘ हासिल किया। बहन भाई के दो स्वर्ण पदकों से राजस्थान की टीम ने इतिहास में पहली बार भारत में प्रथम स्थान प्राप्त किया।
टेंट पेगिंग खेल बहुत ही खतरनाक होता है। इस इवेंट में घोडे को एक हाथ से कंट्रोल करके १८० किलोमीटर प्रति घण्टे की रफ्तार से दौडते हुए, दूसरे हाथ से जमीन पर पडी छोटी-सी गत्ते की टुकडी को भाले की नोंक में पिरोकर उठाते हुए कौशल का परिचय देना होता है जिसमें रश्मि ने अप्रत्याशित ढंग से स्वर्णीम सफलता हासिल की।
तब तक रश्मि की सेना में आर्मी ऑफिसर बनने की इच्चा प्रबल से प्रबलतम हो गई थी। उसका यह लक्ष्य उसके करीब आ रहा था। बीकानेर (राजस्थान) शहर की पहली ’’लेडी लेफ्टिनेंट‘‘ बनने का सपना लिए उसने सन् २००६ की ’’वूमेन स्पेशल एंट्री‘‘ की परीक्षा-इंटरव्यू दिया। जिसे उसने न सिर्फ पास किया बल्कि पूरे भारत की मेरिट में तीसरे  स्थान पर आकर रश्मि ने अपने शहर व श्रीमाली समाज का नाम रोशन किया। इस उपलब्धि पर श्रीमाली समाज बीकानेरने रश्मि का सम्मानित किया और उसके पिता श्री चाँदरतन देव सुपुत्र स्वनामधन्य पं. राम कृष्ण देव का भी अभिन्नदन किया गया।
रश्मि ने एन.सी.सी का ’’बी‘‘ सर्टीफिकेट ’’ए‘‘ ग्रेड से तथा ’’सी‘‘ सर्टीफिकेट ’’ए‘‘ ग्रेड से किया।
रश्मि ने न सिर्फ अपने लक्ष्य की और ध्यान दिया बल्कि अपनी पढाई एम.एससी (कम्प्यूटर साईंस) प्रिवीयस में मेरिट में तीसरा स्थान प्राप्त किया। रश्मि खेलकूद में विश्व विद्यालयी प्रतियोगिताओं में भी बढ चढ कर हिस्सा लेती रही है। जिसमें रश्मि ने विश्व विधालय की भारोतोलन प्रतियोगिता में कांस्य पदक, तीरअंदाजी प्रतियोगिता में स्वर्णपदक और कास्य पदक तथा लॉन टेनिस प्रतियोगिता में कांस्य पदक हासिल किये। अन्तर विश्वविद्यालय की लॉन टेनिस प्रतियोगिता के लिए चेन्नई तथा तीरअंदाजी प्रतियोगिता के लिए इम्फाल जाने हेतु चयन हुआ। 
वर्तमान में रश्मि ’’ऑफीसर्स ट्रेनिंग एकेडमी, चेन्नई में लेफ्टिनेंट का प्रशिक्षण लेते हुए हार्स राईडिंग में मेरिट कार्ड हासिल किया। इस अवसर पर प्रशिक्षण अकादमी के कमान्डेन्ट ने गोल्ड मेडल (मेडल सर्मनी में) दिया। ८० महिला केडेटों में हार्स राईडिंग (जम्प्स) का मेरिट कार्ड प्राप्त करने वाली एक मात्र रश्मि दवे है।
२२ सितम्बर,२००७ को पासिंग आऊट परेड, पिपिंग सर्मनी में माननीय राष्ट्रपति महोदय की ओस से लेफ्टिनेट जनरल सुशील गुप्ता ने कमीशन-शपथ दिलाई (आर्मी ऑफीसर-भारतीय सेना में) रश्मि की पोस्टिंग ओर्डिनेंस (ए.ओ.सी) में गोवाहाटी (आसाम) की गई है।


शा से ही प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुई है। हमेशा कुछ हटकर करने की चाह ने रश्मि को एन सी सी में प्रवेश लेन के लिए प्रेरित किया और यहाँ से शुरू हुई रश्मि कर सफलता की यात्रा।

Article by : Shyam Narayan Ranga

आलीजा है मेरा शहर

- Monday, January 17, 2011 No Comments

राजस्थान के पश्चिम के थार के दूर तक फले मरूस्थल में एशिया के सबसे बडे गॉव के नाम से विख्यात एक ऐसा शहर जिसकी पहचान भुजिया व पापड के साथ साथ साझा संस्कृति के लिए भी पूरी दुनिया में की जाती है। मैं बात कर रहा ह बीकानेर की, मेरे शहर बीकानेर की। बीकानेर में आते ही एक मस्ती और उमंग का अनुभव होता है। बीकानेर की गलियों में संस्कृति बसती है, अपनापन बसता है, यहाँ के लोग स्वभाव से फक्कड व मस्त है लेकिन यहाँ के लोगों में आदमीयत की पहचान है। मेरे शहर में आकर आप किसी का पता पूछोगे तो साथ चलकर उस पते के घर तक छोड कर आएगा मेरे शहर का आदमी और बाहर से ही आवाज लगाएगा ’भाईजी थोरे कोई आयो है‘ । बीकानेर के लोग बाहर से आने वाले को यह नहीं पूछते कि घर ढढने में परेशानी तो नहीं हुई। इक्कसवीं सदी के विकास के इस दौर में विज्ञान की सफलताओं के साथ मेरे शहर ने तहजीब व अपनेपन से किनारा नहीं किया है। मेरा शहर पाटों व धूणियों पर बसता है। यहाँ के लोग दिन भर की मेहनत के बाद अपने समाज व दोस्तों के साथ बैठना नहीं भूलते। बीकानेर के लोग हिन्दी फिल्मों व गानों को सुनते व गुनगुनाते तो है मगर गणगौर के वक्त पाटों पर बैठकर गणगौर के गीत भी गाते है। मेरे शहर में आदमी के साथ साथ जानवरों की भी चिन्ता की जाती है, यहाँ आज भी जब कुत्तों के पिल्ले होते हैं तो गली मौहल्ले के लडके अपने पूरे मौहल्ले में घूमकर आटा व तेल इकट्ठा करते है और अपने गली की कुतिया के लिए हलवा बनाते ह। आज भी शहर के बडा बाजार सहित कईं स्थानों पर रात को लोग रोटीयाँ बनाते मिलेंगे अपने लिए नहीं बल्कि शहर के जानवरों के लिए। जी हाँ फिर ये सारी रोटियाँ घूमघूम कर शहर के जानवरों को खिलाई जाती है और यह काम एक दिन का नहीं रोज का है। यहॉ के जानवर भी अपने लोगों की भाषा पहचानते है अगर आपको इसका नजारा देखना हो तो कभी लक्ष्मीनाथजी के मंदिर या भैरव कुटिया की तरफ जाइएगा जहाँ किसी के लूना के हार्न की आवाज सुनकर कए इक्ट्ठे हो जाते हैं तो कहीं किसी की टिचकारी पर गायें आ जाती है। कोई अपने साईकिल की घंटी से कबूतरों को बुलाता है तो कोई अपने आने की आहट मात्र से कुत्तों को इकट्ठा करता है और ये सब लोग किसी न किसी तरह इन जानवरों को चुग्गा दाना या रोटी डालते है। समाजवाद के सिद्धांत को अमलीजामा पहना देंखेगे आप इस शहर में। यहाँ अमीर गरीब में भेद नहीं है। चाहे कितना भी बडा सेठ साहूकार हो या गरीब से गरीब आदमी शाम के वक्त पाटों पर धूणियों पर और मंदिरों में चौक में आपको सब एक साथ नजर आएंगे। आज भी मेरे शहर में भाई भाई की कदर करता है। इसकी मिसाल यह है कि एक घर में अगर दो भाई है और एक बेराजगार है तो कमाता खाता भाई अपने दूसरे भाई की पूरी मदद करता है और इसके बच्चों की शादी व सारे सामाजिक दायित्व भी निभाता है। यहाँ बुजुर्गों का सम्मान होता है, आपको मेरे शहर में बडे बुजुर्गों की कद्र करते लोग व उनको ’पगेलागणा‘ व ’राम राम‘ करते लोग मिल जाएंगे। शायद यही कारण है कि मेरे शहर में अनाथालयों व वृद्धाश्रमों की संख्या नही ंके बराबर है। मेरे शहर ने अपने स्वभाव को नहीं छोडा है। यहाँ के इंसानों को इंसान की पहचान है और शायद यही कारण है कि अपनी स्थापना के सवा पाँच सौ साल के इतिहास में कभी मेरे शहर में कोई साम्प्रदायिक उन्माद नहीं हुआ है। जिस दिन बाबरी मस्जिद का विवादित ढाँचा टूटा था उस दिन पूरे देश में हाहाकार था लेकिन बीकानेर में शहर के मौजीज लोग सडकों पर थे जिनमें हिन्दू व मुसलमान दोनों थे और एक कंकर भी किसी पर नहीं उछाला किसी ने, ऐसा है मेरा शहर। बीकानेर में प्रत्येक त्यौंहार साम्प्रदायिक सौहार्द व अपनेपन के साथ मिलकर मनाया जाता है। होली पर यहाँ के लोग खुल कर मस्ती करते हैं सारा शहर पूरे दिन होली के रंग मे सरोबार रहता है और यहाँ की होली मुसलमान व हिन्दू या कोई और धर्म के लोग एक साथ मनाते हैं। बीकानेर में दिपावली का त्यौंहार भी हिन्दू मुसलमान दोनों द्वारा मनाया जाता है। बीकानेर के मुसलमान भाईयों की दुकानों पर आपको माँ लक्ष्मी व भगवान गणेश के चित्र देखने को मिल जाएंगे। बीकानेर के पूर्व महापौर मकसूद अहमद के घर दिपावली की रौनक किसी हिन्दू के घर से कम नहीं रहती। वे अपने सब बच्चों को नए कपडे व मिठाई दिलाते हैं और इनके बच्चे पटाखे छोड कर दिपावली का स्वागत करते है। मेरे से एक बार बातचीत के दौरान मकसूद भाई ने कहा कि दिपावली का समय है सो घर की औरतें साफ सफाई में लगी है, मतलब यह कि यहाँ सिर्फ हिन्दू ही दिपावली के समय अपने घरों का रंग रोगन कर सफाई नहीं करते बल्कि यहाँ के मुसलमान भी दिपावली को बडी शिद्दत व भाव से मनाते ह। पुराने बाजार में रंग के पुराने व्यापारी बरकत भाई जी के लडके से बात करने पर पता चलता है कि वो किसी वैष्णव से कम नहीं है, अपने घर का ही पानी पीते हैं और अपने घर का बना ही खाना खाते है। मेरे शहर के नामचीन मुसलमान व्यापारी हारून मेमन साहब आज भी प्रतिदिन बडा गणेश जी के मंदिर जाते है। गणेश जी के मंदिर के पुजारी भी हारून साहब का इंतजार करते हैं। इसी तरह मेरा दोस्त शराफत हनुमान जी का भक्त है और हनुमान जी का बडा प्रसाद होने पर वह जरूर आता है और अपनी तरफ से भी प्रसाद में हिस्सेदारी निभाता है। ईद के दिन जब मुसलमान भाई शहर की सबसे बडी ईदगाह पर नमाज पढने आते हैं तो उन्हें ईद की मुबारक बाद देने मनोहर जी पहलवान व नू महाराज व नीना भाईजी जैसे लोग तैयार मिलते हैं। यहाँ ईद के दिन ईद की सेवाईयाँ खाने अजीत भुट्टा के घर शहर के सब पत्रकारी पहचते हैं। शहर की इस सबसे बडी ईदगाह में जितना समय मुसलमान भाईयों ने नहीं बिताया होगा उससे ज्यादा समय यहाँ के आस पास रहने वाले हिन्दू भाईयों ने व्यतीत किया है। बीकानेर के दो पीर व हाजी बलवान सैयद साहब के समने से गुजरते वक्त हर व्यक्ति का सिर सजदे होता है। मैं अपने बारे में बताता ह कि मुझे खुद मोहर्रम वाले दिन ताजिये के नीचे से निकाला गया था जब मैं छोटा था मुझे वो दिन आज भी याद है क्योंकि मेरी नानी ने यह मन्नत मांगी थी कि अगर मेरे नाती होता है तो उसे ताजिये के नीचे से निकालूंगी। इसी तरह बीकानेर की सब समाजों की शादियों में ’मीनू‘ चाहे जो कुछ हो पर होगा बिना प्याज लहसुन का। चाहे रूबी की रूखसाना की शादी हो या शराफत की बारात। यहाँ के सभी जाती के लोगों को पता है कि उनकी शादियों में शहर के पुष्करणा ब्राह्मण भी बडी संख्या में शरीक होते है जो प्याज लहसुन नहीं खाते तो यहाँ की शादियों में प्याज लहसुन का सामान्यतः प्रयोग नहीं किया जाता, ऐसा है मेरा शहर। मेरे को शायर अजीज साहब की पंक्तियाँ याद आ रही है कि .........बस एक रात मेरे शहर में गुजार कर तो देख सारा जहर न उतर जाए तो कहना। इसी तरह लक्ष्मी नारायण रंगा जी की कही पंक्तियों में भी बताया गया है कि
बीकानेर की संस्कृति में सबका साझा सीर, दाउजी मेरे देवता, नौगजा मेरे पीर।

श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘
पुष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर

खबरएक्सप्रेस एक अद्भुत वेबसाइट संदीप आचार्य

- Monday, July 20, 2009 1 Comment
खबरएक्सप्रेस डॉट काँम को बीकानेर से संचालित एक अद्भूत न्यूज पोर्टल बताते हुए संदीप आचार्य ने कहा कि आज का युग मीडिया का युग है और मीडिया मे व्यक्तित्व को छोटा या बडा करने की अद्भूत ताकत है। पेश है श्याम नारायण रंगा द्वारा संदीप आचार्य से की गई बातचीत के प्रमुख अंशः- ---------------------------------------------------- सोनी टी वी के चचित प्रोग्राम इण्डियन आइडोल-२ के विजेता संदीप आचार्य ने खबरएक्सप्रेस कार्यालय में न्यूज पोर्टल खबरएक्सप्रेस डाट काँम को अवलोकन किया। संदीप आचार्य ने बताया कि बीकानेर जैसे एक ऐतिहासिक शहर से निकलकर मायानगरी मुम्बई मे जाना और एक सेलिब्रिटी बनना एक अद्भूत अनुभव है जिंदगी में सोचा नहीं था कि इतना सब हो जाएगा और यह सब काफी अच्छा लगता है संदीप ने कहा कि इसका सारा श्रेय बीकानेर सहित भारत की पूरी जनता को जाता है जिसका आपार स्नेह और प्यार मिला और फिर मेहनत व बुजुर्गों के आर्शीवाद ने इस मुकाम तक पहचाया।संदीप आचार्य ने अपने केरियर के बारे मे कहा कि अभी तो शुरूआत की है। एक प्लेटफोर्म मिला है और आगे और आगे जाना है। एक लम्बी इनिंग खेलनी है। उदित नारायण को पसंद करने वाले संदीप ने कहा कि वह उदित जी की नकल नहीं करता बल्कि वह उदित जी को पसंद करता है और शायद यही कारण है कि उदित जी की नकल हो जाती है संदीप ने कहा कि शुरूआती दौर मे तो यह समस्या थी कि वह ऊचें स्वर के गाने गाने में दिक्कत होती थी लेकिन लगातार रियाज व मेहनत इस समस्या को हल कर दिया, अब कोई दिक्कत नहीं है। मिलेनियम स्टार अमिताभ बच्चन से मुलाकात में याद करते हुए संदीप कहता है। कि यह एक अद्भत अनुभव था। अमित जी के साथ बैठना, बातचीत करना व उनके साथ परफार्म करना एक स्वार्णिम अनुभव था जो उसे हमेशा याद रहेगा। संदीप ने बताया है कि अमिताभ बच्चन काफी विनम्र व्यक्तित्व है व उसे काफी हौसला दिया व हिम्मत दी। अमिताभ जी का जितना बडा नाम है उतना ही बडा उनका दिल भी है । संदीप ने कहा कि यह एक उम्र भर याद रहने वाला क्षण था। अपनी शादी के बारे में पूछे गए एक सवाल का जबाव देते हुए संदीप ने अपने पापा की तरफ देखा और कहा कि ये तो पापा व मम्मी का काम है और वह उनकी पसन्द से ही शादी करेगा। इडियंन ऑयडाल-२ ने कहा कि वह आप अपने दादाजी ’’स्व दाऊलाल जी आचार्य‘‘ को काफी याद करता है। और उन्ही का आर्षीवाद है कि वह आज लगातार सफलता की और बढ रहा है। संदीप ने बताया कि उसके दादाजी का सपना था कि बीकानेर ने एक संगीत का संस्थान खोला जाए वहां बीकानेर शहर के गायक कलाकारों के तैयार किया जाए और एक दिन वह यह सपना जरूर पूरा करेंगे। संदीप को अपने शहर और अपने दोस्तों की बहुत याद आती है और जब भी मौका मिलता है वह उनसे जरूर बात करता है। संदीप ने बताया कि उसे आज भी याद है कि वह शुरूआती दिनों में स्टेज के नाम से भी डरता था और अब वह लाखों लोगों के सामने गा सकता है। यह सब इस बात का प्रमाण है कि अगर आदमी सोच ले तो कुछ भी असंभव नहीं है। खबरएक्सप्रेस के विजिटर्स के लिए इंडियन आइडाल २ ने कहा कि खबरएक्सप्रेस एक तकनीकी रूप से उन्नत वेबसाइट है और इसका हर पेज अपने आप में पूरी स्टोरी है। संदीप आचार्य ने खबरएक्सप्रेस के उज्ज्वल भविश्य की कामना की।

सम्पादक के नाम पत्रों ने दर्ज करवाया लिम्का बुक ऑफ रिकाड्र्स में श्याम लाल दम्माणी को

- Wednesday, July 8, 2009 5 Comments
सामान्यतः प्रत्येक समाचार पत्र में हम सम्पादक के नाम पत्र का एक कॉलम देखते हैं। यह कॉलम किसी भी समाचार पत्र के लिए अहम् स्थान रखता है। इस पत्र का महत्व इतना है कि यह पत्र पाठकों के मध्य समाचार पत्र की साख को बढाता है और अखबार की पारदर्शिता व निर्भिकता को प्रदर्शित करता है और अगर कोई व्यक्ति सम्पादक के नाम पत्र को ही अपना जूनून बना ले तो आप क्या कहेंगे। जी हाँ हम आपको एक ऐसे ही बुजुर्ग व्यक्ति से मिलाने जा रहे हैं जो पिछले सोलह सालों से सम्पादक के नाम पत्र लिखने का शौक पाले हुए हैं और आज तक करीब साढे चार हजार उनके ऐसे पत्रों का प्रकाशन हो चुका है। ये शख्सियत हैं बीकानेर मूल के बम्बई प्रवासी श्याम लाल जी दम्माणी। अब तक अपनी उम्र के सत्तहर साल पूरे कर चुके श्याम लाल दम्माणी का नाम आज लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड्स में दर्ज हो चुका है। अपनी उम्र के साठवें साल में श्याम लाल दम्माणी ने सम्पादक के नाम पत्रों को लिखना शुरू किया और आज तक करीब साढे चार हजार उनके ऐसे पत्रों का प्रकाशन हो चुका है। श्याम लाल दम्माणी के ये पत्र हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी सहित गुजराती के समाचार पत्रों में छप चुके हैं। श्याम लाल दम्माणी ने अपनी स्नात्तकोत्तर शिक्षा अर्थशास्त्र में की है तथा विधि में भी स्नातक उपाधि ग्रहण की। श्याम लाल दम्माणी बॉम्बे युनिवर्सिटी में स्नात्तकोत्तर अर्थशास्त्र के स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी थे। श्याम लाल दम्माणी से जब हमने ये पूछा कि आपने यह कार्य क्यों शुरू किया तो दम्माणी जी ने बताया कि अपने साठवें जन्म दिन पर वे स्वाध्याय आंदोलन के प्रमुख व स्वनामधन्य पांडुरंग जी शास्त्री का आशीर्वाद लेने उनके घर पहचे। दम्माणी शास्त्री जी को अपना गुरू मानते है तो एक गुरू ने शिष्य से पूछा कि जिंदगी के साठ सालों म उपलब्धि क्या हासिल की तो श्याम लाल दम्माणी निरूत्तर हो गए तब गुरू पांडुरंग जी शास्त्री ने श्याम लाल दम्माणी को सम्पादक के नाम पत्र लिखने का आदेश दिया और अपने गुरू का आदेश पाते ही श्याम लाल दम्माणी ने अपना पहला सम्पादक के नाम पत्र १९९१ में लिखा और प्रसिद्ध दैनिक अखबार जनसत्ता को भेजा जिसका शीर्षक था हम कहाँ जा रहें हैं। श्याम लाल दम्माणी का यह पहला पत्र जनसत्ता में छपा और इस तरह शुरू हुआ एक सिलसिला जो २००४ तक जारी रहा। इस दौरान श्याम लाल दम्माणी देश के राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय अखबारों में अनवरत व प्रतिदिन लिखते रहे और छपने रहे। इस दौरान उन्होंने सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक सहित लगभग सभी विषयों को छुआ। श्याम लाल दम्माणी ने इस दौरान हिन्दुस्तान के नामचीन सम्पादकों के सम्पादकीय पर टिप्पणियाँ की और अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया। श्याम लाल दम्माणी के सम्पादक के नाम पत्र इंडियन एक्सप्रेस, नव भारत टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया, गुजरात समाचार, दैनिक सामना सहित देश के सभी अखबारों में छप चुके हैं। श्याम लाल दम्माणी की इस अनवरत यात्रा को लिम्का बुक ऑंफ रिकार्ड्स में दर्ज किया गया। पूरे देश ने श्याम लाल दम्माणी के इस जूनून को इज्जत दी और देश भर की कईं संस्थाओं ने समय समय पर श्याम लाल दम्माणी को सम्मानित किया। श्याम लाल दम्माणी ने अपने संस्मरण सुनाते हुए बताया कि आज भी उन्हें वह दिन याद है जब उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका के विरोध में सम्पादक के नाम पत्र लिखा और गोयनका जी ने उसे अपने अखबार में उसको स्थान दिया और इस पत्र की प्रशंसा की। श्याम लाल दम्माणी से जब हमने पूछा की आप अब इस के बारे में क्या सोचते हैं तो दम्माणी ने बताया कि वह अपने इस कार्य से काफी प्रसन्न है और इस कार्य के कारण उनको जो सम्मान मिला है उसे गौरवान्वित महसूस करते हैं लेकिन अखबार की कुछ नीतियों को लेकर थोडी पीडा महसूस करते हुए दम्माणी ने बताया कि सम्पादक के नाम पत्र वैचारिक द्वन्द्व को अभिव्यक्त करने का सशक्त जरीया है और किसी भी समाचार पत्र का महत्वपूर्ण स्तम्भ है लेकिन कोई भी अखबार सम्पादक के नाम पत्र के लेखक को उस अखबार की एक प्रति तक उपलब्ध करवाना उचित नहीं समझता और न ही कभी लेखक को किसी प्रकार का कोई भुगतान करने की बात सोचता है। दम्माणी ने कहा कि अगर ऐसा कुछ हो जाए तो इस प्रवृत्ति को प्रेरणा मिले। श्याम लाल दम्माणी का स्वास्थ्य अब पूर्ण रूप से सही नहीं है इसलिए २००४ के बाद दम्माणी ने लिखना बंद कर दिया और अब वे ऑखों की कमजोरी के कारण लिख नहीं पाते लेकिन लिखने की तमन्ना आज भी उनके मन में है और वे इसे समय समय पर विभिन्न समारोहों में बोल कर पूरा करते हैं। श्याम लाल दम्माणी का यह प्रयास वास्तव में काबिले तारीफ है और प्रेरणादायी है और एक मिसाल है ऐसे लोगों के लिए जो उम्र के पिछले पडाव में भी कुछ करना चाहते हैं।