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मेरा बचपन मेरा पार्क

By SHYAM NARAYAN RANGA - Wednesday, June 30, 2021 1 Comment

Laimai Park, Bikaner
इक्कड बिक्कड बम्बे बो से गुजरा मेरा सुनहरा बचपन जिसकी यादें मेरे स्मृतिपटल पर ज्यों की त्यों पड़ी है, लुकाछिपी, धाडधुक्कड, मारदडी, सतोलिया, सावन के झूले, बहनों के साथ बर्फी का खेल, रस्सीकुद, पत्थर के टुकडों से गडडे खेलने के सजा मेरा बचपन चिंता, भय, फिक्र, मान, अपमान से एकदमदूर, अल्लहडता, फक्कडपन, चुहलबाजी के साथ बीता। कभी मेरे खुद के घर पर तो कभी शहर के अंदरूनी भाग में स्थित ननिहाल में। मीडिल क्लास परिवार का मैं अपने माता पिता की एकलौती संतान भले था पर जीवन में आज तक कभी इस बात का अहसास मेरे परिवार के भाई बहनों ने होने ही नहीं दिया। पापा के दस भाई बहनों की संतानों में मेरे दादाजी का सबसे बडा पोता और मेरे ननिहाल में नानाजी का सबसे बडा नाती मैं ही हंूं। हमारे साझे चूल्हे में, मेरा बचपन कईं यादों से घिरा है उसमें से एक है महात्मा लाली माई पार्क जो मेरे घर के पिछवाडे में स्थित है और मौहल्ले के बच्चों का प्रिय स्थल भी। पार्क में उस समय बडे बडे सफेदे के पेड हुआ करते थे जिनकी छांव में गर्मियों की तपती दुपहर में शीतल छांव का अहसास होता रहता था। इस पेड के फल को ईलायची मानकर हजारों बार हम सबने खाया है। इसके पत्ते की बंदरवार बनाकर खेलने से हम चूकते नहीं थे। जेठ की गर्म दुपहरी में जब स्कूल की छुट्टियां होती थी तो यह पार्क हमारा दोपहर के समय का स्थायी पता ही होता था। यहां लगी दूब में खेलने का एक फायदा यह था कि अगर गिर भी जाओ तो चोट लगने का भय नहीं होता था। पार्क में लगे झूलों पर बारी बारी से झूलने में कभी कभार गलत गिनती गिनकर ज्यादा झूले खाने पर जो महानता का अहसास होता था उसका कोई सानी नहीं था। फिर खुद ही यह बता देना कि आज मैंने झूठ बोलकर दस झूलों का ज्यादा आनंद लिया है बाकी भाई बहनों के चिढाने का कारण भी बन जाता था। पार्क में बनी गाय की कुंडी में गाये ंतो पानी पीती ही थी साथ ही साथ हमारे लिए वह कुंडी किसी स्वीमिंग पूल से कम न थी। जब तक कोई बडा बुजुर्ग डांट डपट कर भगा न देता गर्मी के उस स्वीमिंग पूल से बाहर निकलने का मन ही नहीं करता था। कभी कभी हम सभी बच्चे मिलकर ईंट के टुकडों से इस गाय की कुडी की सफाई भी कर देते थे। गाय की कुडी पर लगे सार्वजनिक नल के स्टेंड से गिरकर चोट भी खाई है और ज्यादा दर्द तो तब होता जब यह चोट टोंटी की नोंक से लगी होती और कभी कभार हल्का खून भी आ जाता था। इस पार्क में प्रवेश करने का जो गेट था वह गोल था और उसको घुमाकर एक एक करके हम बच्चे पार्क में प्रवेश करते थे, बहुत बार ऐसा होता कि उस गेट में हमारी चप्पल फंस जाती या कभी पांव का अंगूठा या उंगली उसकी भेंट चढ जाती तो खून जरूर आता फिर सभी भाई बहन मिलकर कोई बी डी का कागज ढूंढते जो बडी मुश्किल से मिलता और उस घाव पर बी डी के कागज की बैण्डेज लगाकर निष्फिक्र हो जाते कि हो गया ईलाज और उससे घाव पर बहता खून रूक भी जाता। पार्क के एक हिस्से में प्याऊ बनी हुई थी जो आज भी कायम है, उस प्याऊ की मटकियों से ठण्डे पानी पीने से जो गला तर होता उसकी संतुष्टि आज भी दिल को सुकुन देती है। पार्क में कुछ झाडियां थी और कभी कभी अगर कोई कांटा चुभ गया तो सभी भाई बहन डाॅक्टर बन जाते और कांटा निकालने का प्रयास करते अगर निकल गया तो ठीक वरना मेरे चाचाजी जो ऐसे कांटे निकालने में एक्पर्ट थे उनसे कांटा निकलवाया जाता, वे डांटते और बिना चप्पल बाहर जाने के लिए खरी खोटी सुनाते सुनाते वह छोटा सा आॅपरेशन कर ही देते थे। फिर वही घोडे वही मैदान। खेलते खेलते भूख लगना तो स्वाभाविक ही था और याद आती घर की रसोई की और एक ने भूख की बात छेड दी तो सभी भाई बहनों को भी भूख लग जाती। सारे के सारे पहुंचते घर की रसोई में और दादी, मम्मी या चाची दोपहर की भूख मिटाते। कभी कभार ऐसा होता कि घर में सिर्फ रोटी होती और सब्जी नहीं बनी होती तो ऐसे में नमक मिर्ची की चटनी बनाकर खाना एक प्यारा शगल था। रोटी पर हल्की तेल की धार देकर उस पर नमक मिर्च लगाकर बीडकी बनाकर खाने को मैं कभी नहीं भूल सकता। भुजिया के साथ रोटी जो बचपन से लेकर आज तक खाई जा रही है। आज गर्मियां भी आती है, पार्क भी वहीं हैं, सफेदे के पेडों का स्थान नीम पीपल के पेडों ने ले लिया है, दूब तो आज भी बेहतर ढंग से लगी हुई है, पार्क का गेट, झूले सब ज्यो के त्यों है अगर नहीं है तो वो नहीं है मेरा बचपन। बस याद है बचपन की, मन करता है आज भी खेलता खेलता आऊ और आवाज दूं बाई {मेरी दादी} भूख लगी है बीडकी बना दें। पर ए मेरे दिल जरा ठहर ...आज बाई भी नहीं है और दादा एक चाचा और पापा भी नहीं हैं जिनके कारण वो निष्फिक्र बचपन था। बस यादें ..यादें रह जाती है। 


श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’


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1 One Comment " मेरा बचपन मेरा पार्क "

उमाकान्त व्यास May 15, 2024 at 8:27 AM

इसी बगीचे में मेरे गुरु और पथ प्रदर्शक स्व श्री पन्नालाल जी की भी यादें जुड़ी हैं। जब कभी भी इस बगीचे के आगे से निकलता हूं तो श्री गुरु जी की भावुक छवि मस्तिष्क पटल पर केंद्रित हो जाती है। बाकी रही बात बचपन के पार्क की तो आप भाग्यशाली हैं कि आपके घर के पास बगीचा था और है वरना मेरे बचपन के समय में मेरे घर के आसपास ऐसा कोई पार्क ही नहीं था जहां की यादें आज साझा कर सकूं। हां, लेकिन वह सभी खेल जिनका आपने आनन्द लिया था आपके छोटे भाई और उत्तराधिकारी के रूप में हमने गलियों में लिया था।