ये रचना मैंने 10.8.94 को लिखी जब मैं श्री जैन पी जी महाविद्यालय में प्रथम वर्ष वाणिज्य वर्ग का विद्यार्थी था। उस समय मेरी उम्र 18 साल की थी और मेरी यह रचना जब मैंने आज देखी पढ़ी तो मेरे मन मंे आया कि शायद कोई था जिसके लिए यह रचनाएं लिखी गई होगी। उम्मीद है पंसद आएगी और नहीं भी आए तो पढ़ लेना भाई शायद खुद को काॅलेज का समय याद आ जाए। मेरी इस तरह की रचनाओं की यह अंतिम रचना है शायद अब आप समझ सकते हैं ..........
आप पास से निकल जाते हो, मैं देखता ही रहता हूॅं,
दिल के लाख कहने पर भी आपको रोक नहीं पाता हूॅ।
आपको देखने की कोषिष करता हूॅं पर अच्छी तरह देख भी नहीं पाता हूॅं,
क्या करूं दुनिया से घबराता हूॅं।
दूर दूर से देखकर ही दिल को समझाता हूॅं,
आप कहते हो मजबूर हूॅं, बात नहीं करते है,
इस कारण अफसोस भी जताते हैं।
बाकी सब ठीक है कि बात भी बताते हैं,
आप हमसे प्यार करते थे, हैं, रहेंगे भी फरमाते हैं।
आपकी इन्हीं बातों पर हम मर मर जाते हैं।
हाल आपके दिल का हमने तो समझ लिया, आप भी हमें समझना,
प्यार है तो पत्रों का सिलसिला तो जारी रखना।
श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’
नत्थूसर गेट के बाहर
पुष्करणा स्टेडियम के पास
बीकानेर {राजस्थान} 334004
मोबाईल 9950050079
| Shyam Narayan Ranga श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’ |
आप पास से निकल जाते हो, मैं देखता ही रहता हूॅं,
दिल के लाख कहने पर भी आपको रोक नहीं पाता हूॅ।
आपको देखने की कोषिष करता हूॅं पर अच्छी तरह देख भी नहीं पाता हूॅं,
क्या करूं दुनिया से घबराता हूॅं।
दूर दूर से देखकर ही दिल को समझाता हूॅं,
आप कहते हो मजबूर हूॅं, बात नहीं करते है,
इस कारण अफसोस भी जताते हैं।
बाकी सब ठीक है कि बात भी बताते हैं,
आप हमसे प्यार करते थे, हैं, रहेंगे भी फरमाते हैं।
आपकी इन्हीं बातों पर हम मर मर जाते हैं।
हाल आपके दिल का हमने तो समझ लिया, आप भी हमें समझना,
प्यार है तो पत्रों का सिलसिला तो जारी रखना।
श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’
नत्थूसर गेट के बाहर
पुष्करणा स्टेडियम के पास
बीकानेर {राजस्थान} 334004
मोबाईल 9950050079
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