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शिक्षा में समन्वय जरूरी

By SHYAM NARAYAN RANGA - Tuesday, August 11, 2009 7 Comments
वर्तमान में पूरे देश में यशपाल समिति व ज्ञान आयोग की रिपोर्ट को लेकर बहस छिडी हुई है। कोई व्यक्ति इसके पक्ष में अपनी राय प्रकट कर रहा है तो कोई विपक्ष में अपने विचार रख रहा है। इस सारी बहस में एक बात तो तय है कि सारे व्यक्ति व संस्थाऍं वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में बदलाव तो अवश्य ही चाहते हैं। उस बदलाव का स्वरूप कैसा हो इस पर अलग अलग राय हो सकती है। यह जानकर आश्चर्य होता है कि विश्व के सबसे बडे लोकतंत्र व दूसरी सबसे बडी आबादी वाले देश के पास एक भी ऐसा शिक्षण संस्थान नहीं है जिसकी गिनती विश्व स्तर पर तो क्या एशिया स्तर पर भी करवाई जा सके। यह इस बात का स्पष्ट प्रामण है कि बडी आबादी वाले इस देश में स्तरीय शिक्षा का अभाव है और यही कारण है कि हमारा देश बेरोजगारी व भूखमरी जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। यशपाल समिति ने अपनी रिपोर्ट में जो कहा है या ज्ञान आयोग ने जो सिफारिशें की है उसे किस रूप में लिया जाए यह एक अलग व बडा विषय हो सकता है परंतु यह सत्य है कि शिक्षा के स्तर को सुधारने की अब बेहद आवश्यकता है। यह बात आज बडी अजीब लगती है कि हमारे देश में पाँचवी कक्षा से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन व प्रोफेशनल डिग्रीयों तक की व्यवस्था में पढाने का एक ही तरीका काम में लिया जाता है। वही एक घण्टा चपरासी लगाता है और एक की जगह दूसरा शिक्षक आता है तथा पैंतालीस मिनट की अपनी नौकरी पूरी करके चला जाता है। क्या पाँचवीं कक्षा की शिक्षा पद्धति में व उच्च स्तर की शिक्षा व्यवस्था में कोई फर्क नहीं होना चाहिए। क्या पाँचवीं के विद्यार्थी में और अधिस्नातक के शोधार्थी में कोई फर्क नहीं है। वर्तमान में यहाँ पर बदलाव के नाम पर यही नजर आता है कि एक संस्था विद्यालय कहलाती है और संस्था महाविद्यालय। परन्तु इनमें महा जैसा कोई अर्थ स्पष्ट होता नजर नहीं आता है। इस व्यवस्था में कोई ऐसा सुधार किया जाए ताकि इन दोनों ही स्तरों पर एक स्तरीय भेद किया जा सके और वो भेद ऐसा हो कि दोनों ही स्तरों पर शिक्षा की गुणवत्ता को बढावा मिले। अगर हम स्कूलों की बात करे तो स्थितियाँ बहुत गंभीर नजर आती है। अध्यापकों का यह कहना है कि छात्र पढना नहीं चाहता है, छात्र नियमित तौर पर स्कूल में नहीं आता है जबकि दूसरी ओर अभिभावकों का यह कहना है कि स्कूलों में छात्रों पर व उनकी पढाई पर गौर नहीं किया जाता है। जहाँ सरकारी स्कूलों के प्रबंधन से अभिभावक नाराज है वहीं प्राईवेट स्कूलों की फीस व्यवस्था व दादागिरी से अभिभावकों को परेशानी होती है।* कुल मिलाकर नुकसान छात्रों का हो रहा है। यह समझने की जरूरत है कि छात्र एक कोरा कागज है आप उस पर जो और जैसा लिखेंगे वह वैसा ही लिखा जाएगा। जहाँ अध्यापकों को अपने कर्त्तव्यों के प्रति निष्ठावान होना पडेगा वहीं अभिभावकों को भी अपने घर व समाज में शिक्षा का एक सौहार्दपूर्ण माहौल पैदा करना होगा। राज्य व केंद्र सरकारें भले कैसी भी समितियाँ बनाऍं* या कोई भी उपाय कर ले जब तक शिक्षक, अभिभावक व विद्यार्थी के मध्य समन्वय नहीं होगा तब तक शिक्षा के स्तर को सुधारा नहीं जा सकता। हालात यह है कि आज विद्यार्थी व शिक्षक के मध्य एक बडा गैप हो गया है और दोनों के बीच में संवादहीनता की जबरदस्त स्थिति बनी हुई है। कईं शिक्षकों से बात करने पर यह बात खुल कर सामने आती है कि शिक्षकों का यह मानना है कि विद्यार्थी को ज्यादा नजदीक नहीं आने देना चाहिए क्योंकि इससे वह सिर चढ जाता है। और इस कारण दोनों के बीच में एक खाई बन गई है। जब तक यह मानसिकता रहेगी विद्यार्थी शिक्षकों से कुछ सीख नहीं पाएगा और न ही शिक्षक विद्यार्थीयों को कुछ दे पाएंगे। एक जमाना वह था जब गुरू को माता पिता से भी बडा दर्जा प्राप्त था और गुरू की कही बात को इन्कार करने की हिम्मत माता पिता की नहीं होती थी। ऐसा इसलिए था क्योंकि अभिभावकों को शिक्षकों पर पूरा विश्वास था तथा वह शिक्षक भी अपने उत्तरदायित्वों को लेकर पूरी तरह सजग था। इसी का परिणाम था कि बिना केल्कुलेटर व कम्प्यूटर के बडी बडी गिनतियाँ वो लोग सैकण्डों में हल कर दिया करते थे और उस समय के हिसाब से एक स्तरीय शिक्षा विद्यार्थी को प्राप्त होती थी। मतलब यह कि स्तरीय शिक्षा समितियाँ बनाने से या सिफारिशें करने भर से* नहीं आऍंगी, इनके जो घटक तत्व है उनको मजबूत करना होगा। एक तथ्य यह भी है कि शिक्षा के व्यावसायिकरण ने शिक्षा व्यवस्था के माहौल को खराब कर रखा है। ट्यूशन प्रवृत्ति इसी की कोख से निकला परिणाम है। व्यावसायिकरण ने विद्यार्थी को ग्राहक व शिक्षक को दुकानदार बना दिया है। यहाँ शिक्षा के बाजार में दुकानदार ग्राहक के सामने लुभावनी व मनभावन स्कीमें रखता है और ग्राहक को आकर्षित कर अपना उत्पाद बेचने का प्रयास करता है। हमारी संस्था में एयरकंडीशनर लगा है भव्य बिल्डिंग है तथा आलीशान पुस्तकालय है जैसे जुमले इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है। हालात यहाँ तक बिगडे हुए हैं कि जो छात्र अपने अध्यापक के ट्यूशन जाता है उसे प्रेक्टिकल में अच्छे नम्बर दिए जाते हैं और जो छात्र ऐसी ट्यूशन नहीं कर पाते उन्हें कम नम्बरों की सजा दी जाती है। ऐसे भी उदाहरण हमारे सामने आते हैं कि जहाँ शिक्षक स्कूलों व कॉलेजों में जाते ही इसलिए हैं कि उन्हें ट्यूशन रूपी व्यवसाय में कच्चा माल आसानी से प्राप्त हो जाए। अध्यापक अपने ट्यूशन सेंटर पर तो पूरे मनोयोग व मेहनत से पढाते हैं लेकिन वो जज्बा स्कूलों के लिए नहीं दिखता है, स्पष्ट है कि अगर वह सारा कुछ स्कूलों में ही दे देंगे तो अपने ट्यूशन सेंटर पर क्या दे पाएंगे। ट्यूशन के इस कारबार से शिक्षा की गुणवत्ता में कमी आई है। यहाँ मेरा मतलब यह कदापि नहीं है कि शिक्षा का व्यावसायिकरण न हो लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि शिक्षा का क्षेत्र सामाजिक सरोकारों से जुडा हुआ है जहाँ चरित्र निर्माण होता है और इसी से राष्ट्र निर्माण होता है। अतः इस व्यावसायिकरण का अंदाज ऐसा हो कि राष्ट्र निर्माण में किसी प्रकार की बाधा न आए । जहाँ तक व्यवसाय की बात है तो व्यवसाय की भी अपनी कुछ नैतिकताऍं व नीतियाँ होती है और उनका पालन किया जाना जरूरी होता है,तो* इन समितियों के माध्यम से ऐसे उपायों की खोज की जाए कि एक शिक्षक अपना सर्वश्रेष्ठ स्कूलों में ही विद्याार्थियों को प्रदान कर दे और उन्हें ट्यूशन की बजाय सिर्फ मार्गदर्शन की आवश्यकता हो। ऐसे उपायों की खोज की जानी अत्यन्त आवश्यक है जिससे शिक्षा के व्यावसायिकरण में सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को प्रधानता मिले व एक गुणात्मक परिणाम समाज व राष्ट् को प्रदान किया जाए । अगर हम कॉलेज व विश्वविद्यालयों की बात करे तो हालात और भी बिगडे नजर आते है। आज हमारे देश में महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों की कक्षाओं में उपस्थिति गौण नजर आती है। छात्र कक्षाओं में बैठना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। यहाँ तक आते आते छात्र व शिक्षक के बीच का संवाद लगभग समाप्त हो चुका होता है। जहाँ छात्र कक्षाओं में बैठते नहीं है वहीं उनके शिक्षक भी उन्हें इस बात के लिए समझाते नजर नहीं आते। प्राध्यापकों का यह मानना है कि कक्षा में कौन छात्र बैठता है और कौन नहीं बैठता है इससे उन्हें कोई मतलब नहीं है। अगर एक छात्र भी आए तो हम उन्हें पढा देंगे लेकिन अगर दूर खडा देख रहा है तो उसे आवाज नहीं लगाएंगे। होना यह चाहिए कि महाविद्यालय का शिक्षक छात्र को समझाऍं व उसे सही राह बताए कि उसके लिए कक्षा में बैठना कितना जरूरी है। इस सारे माहौल का परिणाम यह हुआ कि छात्र परीक्षा के दिनों में महत्वपूर्ण प्रश्न ढढते फिरते हैं तथा दस बारह प्रश्नों के उत्तर रट कर याद कर लेते हैं और उसी से उनकी नैया पार हो जाती है और इस तरह त्रिवर्षीय डिग्री कोर्स पैंतीस तीस प्रश्नों को याद करके ही पूरा कर लिया जात है। ऐसी स्थिति में गुणात्मक शिक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है। वहीं दूसरी और बडे पैमाने पर शिक्षा के निजीकरण ने आग में घी डालने का काम किया है । निजीकरण रूपी इस हाथी पर सरकार का अंकुश ही नहीं रहा है जिससे यह मदमस्त होकर शिक्षा का बेडा गर्क करने में लगा हुआ है। इस पर अंकुश की निहायत आवश्यकता है। निजी क्षेत्र में महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों की बाढ सी आ रही है। ये विश्वविद्यालय व महाविद्यालय ज्ञान के केन्द्र होने के बजाय डिग्रीयाँ बेचने के केन्द्र के रूप में उभर रहे है। यहाँ छात्रों से मोटी रकम फीस के नाम पर वसूली जाती है और उन्हें मह मागी डिग्रीयॉ उपलब्ध करवाई जा रही है। ऐसे कईं विश्वविद्यालयों के उदाहरण आए दिन सामने आ रहे है। सरकार के हुक्मरानों से ये बात छिपी नहीं है लेकिन निजीकरण की अधी दौड में इन पर अंकुश रखने के उपाय इन्हें भी या तो नजर नहीं आ रहे है या जानबूझकर नजरअंदाज किए जा रहे है। ज्ञान आयोग के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने पिछले दिनों राजस्थान सहित कई राज्यों का दौरा कर यह बात स्वीकार की है कि शिक्षा के स्तर में भारी गिरावट आई है और हालात बदतर है। निजी महाविद्यालयों में खुले आम छात्रों को नकल करवाई जाती है ताकि महाविद्यालय का परिणाम श्रेष्ठ रहे और ज्यादा से ज्यादा एडमिशन अगले साल महाविद्यालय को मिले।* छात्र भी इन महाविद्यालयों में प्रवेश इसी कारण लेते हैं कि परीक्षा के दिनों में उन्हें ज्यादा मेहनत न करनी पडे। अभिभावक इन तथ्यों को जानकर भी परिस्थितियों से समझौता कर रहे हैं ताकि लाडले की अंकतालिका अच्छी बनी रहे। इसका परिणाम यह हो रहा है कि बडी संख्या तो छात्र स्नातक व अधिस्नातक तो हो रहे है लेकिन उनमें स्तरीय ज्ञान का अभाव होता है। कुल मिलाकर पूरे परिदृश्य पर नजर डाले तो हालात भयंकर ही लगते हैं। इन पर सिर्फ सरकारी प्रयासों या समितियों या सिफारिशों से ही नियंत्रण नहीं किया जा सकता जब तक आम आदमी का राष्ट्रीय चरित्र व नैतिक चरित्र ऊॅंचा नहीं उठेगा तब तक स्थितियाँ और विकट होगी । जरूरत है ऐसा माहौल पैदा करने की ताकि प्रत्येक शिक्षार्थी, शिक्षक, व अभिभावक के मन में नैतिक मूल्यों का विकास हो और भारतीय चरित्र निर्माण की उत्कंठ ईच्छा हो।

7 Comments " शिक्षा में समन्वय जरूरी "

rajni chhabra August 11, 2009 at 11:10 AM

Impressive!Shows ur deep concern for betterment in d field of education.Keep it up!

Unknown August 13, 2009 at 3:27 AM

this is true that u tell.... and u have realise this and i also....good ..

prem bissa

Guddi Vyas August 13, 2009 at 10:16 AM

good ....

RAJNISH PARIHAR August 18, 2009 at 8:16 AM

शिक्षा जैसे महत्व्पूरण क्षेत्र में अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकि है ,लेकिन अफ़सोस अक्सर इसे गंभीरता से नहीं लिया जाता..!इसीलिए आज भी शैक्षिक पिछडापन हर जगह देखने को मिल जाता है...

Gopal Singh November 27, 2009 at 2:16 AM

aapka lekh siksha ki satahi bato ko to spast karta hai lekin "Gyan Aayog" or "Yashpal Samiti" ki report se jo aapne suruat ki uski gehrai main aap kyu nahi gaye? sahi baat to yahi hai ki yashpal samiti ki report ko dafnane k baad ek or nayi report ko taiyar karne ki jugat main hamara siksha aayog laga hai. aap yadi yanha yashpal samiti ki report ki kuch bate likhte to shayad humko jyada acha lagta. siksha ke prashn or unke uttaro ki talash kisi aayog main nahi milegi balki jab tak hum ek sikshak ya lecturer ya abhibhavak k nazariye se is prashn ko dekhenge hame kuch hasil nahi hone wala. koi hai jo bacho ki nazar se is pure siksha tantra ki padtal kare?

rajesh vyas December 9, 2009 at 10:37 PM

good....nice....True.....

कीर्ति राणा January 8, 2010 at 7:07 AM

bahut sahi likha. sarkari soch lakir ke fakir saman ho gai hai, niji sansthano ki soch kamai wali hai, fir to banthadhar hona hi hai.
...kirti rana/blog pachmel